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नदियों को जोड़ने की योजना पर नए सवाल

चारु बाहरी,

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मध्य प्रदेश के ओरछा में बेतवा नदी का एक दृश्य। वर्षा आंकड़ों के नए विश्लेषण से पता चलता है कि अधिक पानी वाली नदी घाटियों में मानसून की कमी बढ़ रही है। जिन नदियों में पानी की कमी है वहां मानसून की मात्रा रही है। ऐसी स्थिति में ‘अधिक’ से ‘कमी वाली’नदी घाटियों में पानी के हस्तांतरण के लिए नदियों को जोड़ने की योजना पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठ रहे हैं। इस योजना में आने वाली लागत 11 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है।

 

सामान्य मानसून के बावजूद दक्षिण-कर्नाटक के कावेरी बेसिन में सूखे पड़े हुए जलाशय पिछले 65 वर्षों में भारत में वर्षा की एक नई कहानी को दर्शाते हैं। सामान्य मानसुन में गिरावट और मानसुन की अधिकता जिस ढंग से सूखे और बाढ़ का कारण बन रहे हैं, वह अपने आप में किसी जादी कथा से कम नहीं। इस आशय की एक रिपोर्ट इंडियास्पेंड में अप्रैल 2015 में छपी थी।

 

अब, वर्षा आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि अधिक पानी के साथ नदी घाटियों में मानसून की कमी बढ़ रही है और जहां पानी की कमी है वहां मानसून की मात्रा बढ़ रही है। ऐसी स्थिति से ऐसी स्थिति में ‘अधिक’ से ‘कमी वाली’ नदी घाटियों में पानी के हस्तांतरण के लिए भारत की 11 लाख करोड़ रुपये (165 बिलियन डॉलर) की योजना पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठा रहे हैं।

 

एक अध्ययन बताता है कि सरप्लिस बेसिन की नदियों जैसे कि महानदी और पश्चिमी भारत में अन्य बहने वाली प्रमुख नदियों के जल में 10 फीसदी की गिरावट हुई है। यह अध्ययन वर्ष 1951 से 1975 और वर्ष 1976-2000 के बीच की अवधि का है। जबकि सिंधु, गंगा और  विशेषकर निचली घाटी में दक्षिण पूर्व की ओर बहने वाली कुछ नदियों के जल में 10 फीसदी की वृद्धि हुई है। यह जानकारी एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल, पीएलओएस वन में प्रकाशित अध्ययन में सामने आई है।

 

भारत में चयन किए गए मुख्य नदियों के लिए पानी प्राप्ति में बदलाव

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Source: PLOS One

 

अध्ययन के लेखक और मद्रास आईआईटी में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर, सचिन एस गुंथे ने इंडियास्पेंड से बातचीत के दौरान बताया कि भारतीय नदी घाटियों में पानी विस्तार में बढ़ रही असमानताएं इस बात पर जोर देती हैं कि इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर योजना की समीक्षा एक बार फिर से हम करें।.

 

2001 की कीमत पर नहरों, बांधों, जलसेतु और पम्पिंग स्टेशनों के प्रस्तावित नेटवर्क के माध्यम से 30 इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर का बजट 560,000 करोड़ रुपए (2001 के विनिमय दरों पर 124 बिलियन डॉलर) दिया गया था। अप्रैल 2016 में, जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने अनुमान को संशोधित कर 11 लाख रुपए करोड़ का किया है। ये आंकड़े 15 वर्ष पहले बनाए गए अनुमान से करीब दोगुना है। यह राशि भारत के कृषि बजट का 44 गुना या 2015-16 में सभी सरकारी खर्च का 1.6 गुना है।

 

भारत भर में जुड़ने वाली 30 प्रमुख प्रस्तावित नदियां
 

प्रायद्वीपीय लिंक

 

1. महानदी (मनीभड़ा), गोदावरी दोवलाइस्वरम

2. गोदावरी (इंपपाली) कृष्णा (नागार्जुन सागर)

3. गोदावरी (इनचांपली लो डैम-कृष्णा नागार्जुन सागर तालाब)

4. गोदावरी (पोलावरम) कृष्णा- विजयवाड़ा

5. कृष्णमूर्ति (अल्माती) पेहनर

6. कृष्णा (श्रीशैलम) पेन्नार

7. कृष्णा नागार्जुन सागर (पेन्नार सोमासलिया)

8. बेनसर (सोमासलिया) कावेरी ग्रैंड अहिकट

9. कावेरी (कटालाई) वैगई-गुनडर

10. केन-बेतवा

11. पार्वती-ललिसिंगोह-चंबल

12. बराबर तापी-नर्मदा

13. दमनगंगा-पिनजल

14. बेडती-बेहरदा

15. नेत्राबति-हेमवती

16. पंबा-अचकोविल – वाईपर

 

हिमालय लिंक

 

1. कोसी-मेची

2. कोसी-घाघरा

3. गंडक-गंगा

4. घाघरा- जमुना

5. शरदा- जमुना

6. जमुना-राजस्थान

7. राजस्थान-साबरमती

8.चुनार-सोन-बैराज

9. गंगा के सोन बांध-दक्षिण वायु सहायक नदियों

10. ब्रह्मपुत्र-गंगा (एमएसटीजी)

11. ब्रह्मपुत्र-गंगा (जीटीएफ) (एएलटी)

12. फरक्का-सुंदरवन

13. गंगा-दामोदर-सुबर्णरेखा

14. सुबर्णरेखा-महानदी

Source: Water Resources Department

 

नदी को जोड़ने वाली पहली परियोजना को सितंबर 2016 में विवादों के बीच मंजूरी दी गई थी, क्योंकि जोड़ने का मतलब मध्य भारत के पन्ना टाइगर रिजर्व के 100 वर्ग किलोमीटर को जलमग्न करना था।  गौरतलब है कि पहली परियोजना के तहत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सूखा ग्रस्त बुंदेलखंड के लिए 231 किमी दूर मध्य प्रदेश से दौधन के पानी को लाना था।

 

एक नया तथ्य यह है कि मानसून के बदलते पैटर्न से इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर कार्यक्रम की समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है। भारत के पर्यावरण मंत्री ने इंडियास्पेंड के साथ बात करते हुए स्वीकार किया कि ” इस मामले में कई परस्पर विरोधी विचार हैं और  केन परियोजना के जल का परीक्षण होगा।

 

नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी के महानिदेशक एस मसूद हुसैन ने इंडियास्पेंड को बताया, “आईआईटी द्वारा प्रारंभिक विश्लेषण से पता चलता है कि हालांकि आंकड़े सही हैं,हम लोग गलत निष्कर्ष पर पहुंच गए हैं, ऐसा लगता है।”

 

स्वतंत्र विशेषज्ञों की राय है कि अरबों डॉलर की इस परियोजना पर आगे बढ़ने से पहले, जिससे पारिस्थितिक उथल-पुथल भी संभव है, सावधानी बरती जाए। वैसे भी वैश्विक स्तर पर नदियों को जोड़ना एक विवादास्पद मुद्दा है।

 

वैश्विक वन्य जीवन संस्था वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के भारत में निदेशक सुरेश बाबू एस वी, कहते हैं, “जाहिर है कि बेसिनों के जल विज्ञान को बेहतर तरीके से समझने की जरुरत है और बेसिन में पानी अधिक हुआ है या घटा है, इसपर अधिक तथ्य एकत्र करने की आवश्यकता है।”

 

नदी को जोड़ने पर विवाद वित्तीय लागत के साथ ही शुरू होता है।
 

अधूरे लागत अनुमान के साथ, सटीक लाभ विश्लेषण है मुश्किल

 

30 इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर के लिए 124 बिलियन डॉलर की लागत के अनुमान में बांधों, राहत और पुनर्वास और पानी पंप करने के लिए बिजली की जरूरत की लागत जैसे महत्वपूर्ण खर्च को शामिल नहीं किया गया है। यह जानकारी केन्द्रीय जल आयोग और केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड के पुनर्गठन पर जुलाई 2016 की इस रिपोर्ट (पूर्व योजना आयोग के सदस्य मिहिर शाह द्वारा सह लिखा है) में सामने आई है।

 

अनुमानित लागत की गणना में कई चीजों को जोड़ा नहीं गया है।

 

केन-बेतवा लिंक को जल संसाधन मंत्री उमा भारती एक ‘मॉडल परियोजना’ कहती हैं और इसमें पर्यावरण प्रबंधन और पुनर्वास के लिए 15,000 करोड़ रुपए (2.2 बिलियन डॉलर बजट का तिहाई) अलग रखे गए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि “पारिस्थितिकी तंत्र ” कोजलवायु, बेसिन मिट्टी, मछली और पर्यावरण पर्यटन के रूप में केन नदी जो उपहार देता है, उसका परियोजना रिपोर्ट में कोई जिक्र नहीं किया गया है। बेतवा के साथ जोड़े जाने से उस पर प्रभाव पड़ सकता है

 

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और सतत विकास पर काम कर रही एक जर्मन एजेंसी ‘जीआईजेड’  की 2016 की एक रिपोर्ट के मुताबिक  बुंदेलखंड के पूरबी जिला बांदा में करीब केन नदी से 2,575 करोड़ रुपए (387 मिलियन डॉलर) का रेत निकाला जाता है। विभिन्न स्थलों पर सर्दियों में मछली पकड़ने का मूल्य 3 लाख रुपए से 17 लाख रुपए आंका गया है और 543 वर्ग किलोमीटर पन्ना टाइगर रिजर्व भर में पर्यावरणीय पर्यटन (जैसा कि हमने बताया कि परियोजना में 18 फीसदी या 100 वर्ग किलोमीटर गवांया जाएगा) में गिरावट होगी।

 

2016 के पर्यावरण मंत्रालय अध्ययन के सह लेखक और सेंटर फॉर इनलैंड वाटर्स इन साउथ एशिया के संस्थापक-समन्वयक बृज गोपाल कहते हैं, “केन के रास्ते को बदलने का प्रतिकूल प्रभाव इन मूल्यवान पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर पड़ेगा, लेकिन इनका और इसी तरह के घाटे का परियोजना लागत में जिक्र नहीं है।”

 

सरकार के प्रवक्ता हुसैन कहते हैं, “प्रोफेसर गोपाल ने पर्यावरण मंत्रालय के सामने कई सवाल उठाए थे, हमने सभी मुद्दों का जवाब दिया है और विश्वास रखें, हमने पर्यावरण विशेषज्ञों की आशंकाओं का ख्याल रखा है।”

 

पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा कि, “हम 40 वर्षों से इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर की बात कर रहे हैं। पर्यावरणविदों और जल संसाधन विशेषज्ञों ने बहुत कुछ कहा है, लेकिन स्थानीय हितधारकों की आवाज बहुत कम सुनी गई है। हमें उनकी राय भी पूछनी चाहिए। कई परस्पर विरोधी विचारों के साथ, सबसे बेहतर यह है एक छोटी सी लिंक को लागू करें और 5 से 10 वर्षों में उनके परिणाम देखें और फिर आगे के काम पर विचार करें। मैं संतुलित विकास का समर्थन करता हूं। यदि हम प्रतिकूल परिणामों को देखते हैं तो हमें अंतर-बेसिन हस्तांतरण के बारे में बात करना बंद करना होगा।”

 

नदियों को जोड़ने के महंगे परिणाम: ऑस्ट्रेलिया से सबक

 

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के बाबू कहते हैं, जिस तरह केन-बेतवा परियोजना का प्रतिकूल प्रभाव केन की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर पड़ सकता है, भारत भर में अन्य नदी घाटियों के पारिस्थितिकी तंत्र वस्तुओं और सेवाओं पर भी महत्वपूर्ण नुकसान के साथ-साथ सामाज इसे स्वीकार नहीं कर पाएगा और इससे आर्थिक नुकसान भी होगा। वैश्विक अनुभवों के आधार पर पर्यावरणविदों ने प्रस्तावित परियोजना के अन्य संभावित प्रतिकूल परिणामों का पुर्वानुमान किया हैः

 

  • जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एमेरिटस प्रोफेसर वी राजामणी, ने एक भारतीय वैज्ञानिक पत्रिका करंट साइंस में 2006 में लिखा है कि नदी घाटियों को जोड़ने से मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अगर भारत की पूर्व की ओर बहने वाली नदियों का पानी बाँटा जाता है तो बंगाल की खाड़ी की ओर जल स्तर में कमी होगी। इससे समुद्र तल का तापमान बढ़ेगा। यह 28 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो सकता है। साथ ही उप-महाद्वीप में मानसून की तीव्रता बढ़ सकती है।
  • मिहिर शाह समिति की रिपोर्ट में पुर्वानुमान किया गया है कि भारत के पूर्वी तट नदियों के पानी के पश्चिम की ओर ले जाने के लिए बांध बनाने से नीचे की ओर बाढ़ में कटौती होगी और इस तरह से एक प्राकृतिक पोषक तत्व, तलछट की आपूर्ति में भी कटौती होगी। इससे नाजुक तटीय पारिस्थितिक तंत्र नष्ट होंगे और यह और तटीय और डेल्टा कटाव का कारण बनेंगे।

यह अवलोकन ऑस्ट्रेलिया की स्नोई रिवर योजना की विफलता की याद दिलाते हैं। इस परियोजना में एक 145 किलोमीटर कृत्रिम नहरों के जालों और 80 किलोमीटर के एक डैम प्रति वर्ष 1.1 घन किमी पानी स्नोई बेसिन से मुरे-डार्लिंग के बेसिन में स्थानांतरित करता था। योजना 1949 में शुरू की गई थी।

 

जैसे स्नोई का पानी अपने 16 बड़े बांधों से होकर गुजरा तो इसके प्रवाह में 99 फीसदी की कटौती हुई। 2007 डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की रिपोर्ट के अनुसार, कस्बों और गांवों तक इसके पानी भेजने में इसके डिजाइन को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया।

 

स्नोई के प्रवाह को बहाल करने के प्रयासों में 2,381 करोड़ रुपए ( 358 मिलियन डॉलर) की लागत लगी। यह आंकड़े परियोजना के 4191 करोड़ रुपए (630 मिलियन डॉलर) लागत का 57 फीसदी है।

 

भारत का इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर परियोजना के डिजाइन भी दोषपूर्ण हो सकते हैं। मिहिर शाह समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि “भारत की स्थलाकृति और जिस तरह से लिंक परिकल्पना की गई है उन्हें देखते हुए लगता है कि वे पूरी तरह से मध्य और पश्चिमी भारत के मूल शुष्क क्षेत्रों को बाईपास सकता है। यह क्षेत्र समुद्र तल से 300 + मीटर ऊपर की दूरी पर उन्नयन पर स्थित हैं।

 

स्पेन का 286 किलोमीटर टगस-सेगुरा लिंक और दक्षिण अफ्रीका के 200 किलोमीटर वाल-ऑरेंज सेंगु लिंक, मुसिबत में पड़े वैश्विक इंटर बेसिन वाटर ट्रांसफर परियोजनाओं के अन्य उद्हारण हैं।

 

हानिकारक पारिस्थितिक नतीजे के साथ नदी बेसिन आपस में जोड़ने की वैश्विक उदाहरण

 

विशेषज्ञ कहते हैं कि इस परियोजना मूल्य वास्तविक लागत से 262 गुना अधिक है। अर्थशास्त्री और योजना आयोग के पूर्व सदस्य और के आजीविका सुरक्षा के लिए संस्था समाज प्रगति सहयोग (सामाजिक प्रगति सहकारी), के सह-संस्थापक शाह कहते हैं, “अन्य देशों की गलतियों को दोहराने की बजाय भारत को विफल रहे नदी बेसिन लिंक से सीखना चाहिए।”

 

नदियों को जोड़ने का उदेश्य, कृषि विस्तार बेहतर सिंचाई पद्धतियों के माध्यम से संभव है

 

विश्व स्तर और भारत में अंतर-नदी-बेसिन जल स्थानान्तरण से मौजूदा किसानों और अब तक गैर-खेती की भूमि को अधिक पानी उपलब्ध करा कृषि विस्तार करना मुख्य लक्ष्य है। हालांकि, वैश्विक अनुभव से संकेत मिलता है कि सिंचाई की क्षमता में सुधार के लिए अधिक पानी उपलब्ध कराने के और भी बेहतर तरीके हो सकते हैं।

 

मिहिर शाह की रिपोर्ट के अनुसार, पानी का प्रयोग करने में भारत की दक्षता दुनिया में सबसे कम है: मलेशिया और मोरक्को के 40 फीसदी से 45 फीसदी के और इज़राइल, जापान, चीन और ताइवान के 50 से 60 फीसदी की तुलना में महज 25 फीसदी से 35 फीसदी शाह कहते हैं कि, “सिंचाई पद्धतियों में सुधार पर ध्यान केंद्रित करने से काफी कम कीमत पर हर खेत को पानी हासिल करने में मदद मिलेगी।”

 

गोपाल कहते हैं, उदाहरण के लिए बुंदेलखंड में कुशल सिंचाई पद्धतियों और स्थानीय पानी की बचत समाधान से तत्काल लाभ अर्जित होगा।

 

और नए बांध बनाने से पहले भारत को मौजूदा बांधों का बेहतर प्रबंधन करने की जरूरत है। 1947 के बाद से भारत के मौजूदा बांधों पर 400,000 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। शाह कहते हैं, “सिंचाई के तहत बांधों और भूमिगत जल के बेहतर प्रबंधन के द्वारा अतिरिक्त एक हेक्टेयर लाने में 1.5 लाख रुपए का खर्च आएगा जबकि नए बांधों के निर्माण में 5 लाख रुपए का खर्च होगा।”

 

मोटे अनाज या बाजरा और दालों जैसे फसल जिन्हें पानी की दृष्टि से सुघड़ फसल कहा जाता है, उनको बढ़ावा देने से कृषि विस्तार में भी सहायता मिलेगी।

 

मोटे अनाज और दालों की तुलना में  गन्ना और चावल को मोटे तौर पर छह गुना और साढे तीन गुना अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने अगस्त 2016 में विस्तार से बताया है। हमने यह भी बताया है कि चावल की तुलना में बाजरा अधिक पौष्टिक होते हैं।

 

क्यों नदियों को जोड़ने से भूजल पुनर्भरण कम होगी

 

भारत की 80 फीसदी पानी की आपूर्ति भूजल माध्यम से होती है। यह 60 फीसदी सिंचित क्षेत्र को भी पानी देता है। एक संस्था, साउथ एशिया नेकवर्क ऑन डैमस, रिवरस एंड पिपल के समन्वयक हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “भूजल से ही शहरी जल की 60 फीसदी और ग्रामीण जल की करीब 80 फीसदी आपूर्ति होती है।”

 

यह इसका ही परिणाम है कि पूरे भारत में भूजल के स्तर में गिरावट हुई है और गुणवत्ता खराब हुई है। 2016 केन्द्रीय भूजल बोर्ड की इस रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2016 में समाप्त हुए दशक में देश के कुओं में पानी के स्तर में 65 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

ठक्कर कहते हैं, “इंटर-बेसिन लिंक वास्तव में भूजल पुनर्भरण को कम कर सकता है क्योंकि इससे जंगलों नष्ट होंगे, नदी का प्रवाह बंद होगा और स्थानीय प्रणालियों की उपेक्षा होगी। ” एक बेहतर विकल्प जल पुनर्भरण सिस्टम को बढ़ाने और रक्षा के लिए और और समुदाय संचालित भूजल नियमन पर ध्यान देना है।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि, भूमिगत जलभृत भूमि, विस्थापित लोगों को या जंगलों को कम नहीं करता है  और उनका पानी भाप नहीं बनता है जैसा कि नदी-बेसिन जोड़ने की परियोजना के साथ अपरिहार्य है।

 

ठक्कर कहते हैं, “नदी बेसिन जोड़ने के संबंध में वर्षा की स्थानीय संभावना, भूजल रिचार्जिंग, वाटरशेड विकास, बेहतर फसल पैटर्न मिट्टी की नमी धारण क्षमता में सुधार और पानी के भंडारण और बचत के बाद ही सोचना चाहिए।”

 

सरकार के प्रवक्ता हुसैन कहते हैं, “हम स्थानीय समाधान और जल प्रबंधन में भी विश्वास करते हैं। “लेकिन यह अन्य उपायों के साथ हो सकता है जिसमें अंतर-बेसिन जल स्थानान्तरण भी शामिल है। चूंकि भारत की मौजूदा बांधों अपने भविष्य की जरूरतों के लिए अपर्याप्त हैं, इससे पहले हम अतिरिक्त प्रावधान बनाएंगे बेहतर,  पुनर्वास और पुनर्वास के रूप में अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।”

 

(चारू एक स्वतंत्र लेखक और संपादक है। राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं।))

 

यह लेख मूलत: अंग्रज़ी में 08 अक्तूबर 2016 को  indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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