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नष्ट किए वनों के लिए केवल 6% क्षतिपूरक का इस्तेमाल

हिमाद्री घोष,

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उड़ीसा में एक खनन परियोजना के विरोध में नियमगिरि पहाड़ की चोटी पर इकट्ठा हुए डोंगरिया कोंध जनजाति के लोग। केंद्र द्वारा राज्यों को वनों के पुण: निर्माण के लिए मिलने वाली राशि में से 20 फीसदी से अधिक जारी नहीं किया गया है और इसमें से प्रतिपूरक वनीकरण के लिए 6 फीसदी से अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया है।

 

बेंगलुरु: एक सरकारी आंकड़े के अनुसार, विकास परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल वन भूमि के पुन: निर्माण के लिए सरकारी कोष – 6 वर्षों में कंपनियों और संस्थाओं द्वरा एकत्र की गई राशि – का 6 फीसदी से अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि किस प्रकार कानून का उल्लंघन किया जा रहा है एवं वनों के कटने के बाद, उनके पुन:निर्माण के लिए किए गए वादों की अनदेखी की जा रही है।

 

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यहां तक की वन भूमि के पुण: निर्माण के लिए निर्धारित राशि का दुरुपयोग भी किया गया है। राशि का एक-तिहाई हिस्सा “गैर वृक्षारोपण गतिविधियों जैसे कि सांस्कृतिक गतिविधियों, कंप्यूटर, फर्नीचर, लैपटॉप, वाहन और ईंधन” के लिए इस्तेमाल किया गया है।

 

आंकड़ों से “तदर्थ” प्रतिपूरक वनीकरण प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (सीएएमपीए) के व्यापक विफलताओं का पता चलता है। यह पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की एक एजेंसी है। सरकार के स्वयं के लेखा परीक्षक ने कहा कि यह लागू करने की असफल रहा था, जैसा कि लेख के पहले भाग में बताया गया है।

 

राज्यसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 10 मार्च 2015 तक, प्रतिपूरक वनीकरण कोष, 35,853 करोड़ रुपए थी। केंद्र द्वारा राज्यों को इस राशि में 20 फीसदी (7,298 करोड़ रुपए) से अधिक नहीं सौंपा गया है। और इसमें से 6 फीसदी (2,357 रुपये) से अधिक “प्रतिपूरक वनीकरण” के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है।

 

खर्च किया गया प्रतिपूरक वनीकरण कोष, टॉप पांच राज्य

Source: Compensatory Afforestation Management and Planning Authority

 

वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के अनुसार रक्षा, औद्योगिक और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की गई वन भूमि का – पिछले 30 वर्षों में 23,716 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है – उतने ही या उससे अधिक क्षेत्र में पुन: निर्माण किया जाना चाहिए। पुन: निर्माण, परियोजना बिल्डरों द्वारा भुगतान किए गए क्षतिपूर्ति द्वारा पोषित किया जाता है, एक प्रक्रिया जो सरकार ने केवल सुप्रीम कोर्ट के कहने के बाद स्वीकार किया है।

 

अक्टूबर 2002 में, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद,  सरकार ने सीएएमपीए का अधिसूचना जारी किया – यानि आधिकारिक तौर पर घोषणा की – जो वास्तव में स्थापित नहीं किया गया। मई 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने, मई 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को “तदर्थ” सीएएमपीए स्थापित करने के निर्देश दिया है। इसके बाद अदालत ने आदेश दिया  कि प्रतिपूरक राशि, जोकि देश भर में राज्य के पर्यावरण विभागों में जमा किया गया था, “तदर्थ” सीएएमपीए को हस्तांतरित किया जाए।

 

राशि के दुरुपयोग से स्थिति बद्तर

 

प्रतिपूरक वनीकरण के लिए एकत्र हुई राशि का अनुपयोग, 6 फीसदी वितरित राशि के दुरुपयोग से और बद्तर हुआ है।

 

व्यय का करीब 37 फीसदी, लगभग 879 करोड़ रुपए, पेड़ लगाने के अलावा अन्य प्रयोजनों के लिए दिया गया था, जैसा कि हमने पहले बताया है।

 

टी वी रामचंद्र, एसोसिएट फैक्लटी सेंटर फॉर इकोलोजिकल साइंस एवं  बंगलौर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कहते हैं, “अधिकांश वनीकरण केवल कागज़ों तक ही सीमित है। भ्रष्ट और अक्षम प्रणाली के कारण वास्तिव प्रगति नहीं हो पा रही है।”

 

सबसे बड़ी मात्रा में प्रतिपूरक वनीकरण राशि ओडिसा राज्य (1,145.9 करोड़ रुपए) को दिया गया है। दूसरे एवं तीसरे नंबर पर  छत्तीसगढ़ (774.2 करोड़ रुपए) और आंध्र प्रदेश (750.7 करोड़ रुपए) का स्थान रहा है।

 

राज्यों को दी गई प्रतिपूरक वनीकरण राशि, टॉप पांच राज्य

 

Source: Compensatory Afforestation Management and Planning Authority

 

अजय कुमार सक्सेना, कार्यक्रम प्रबंधक (वानिकी), सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट,का कहना है, “सीएएमपीए राशि का गलत उपयोग किया गया है एवं यह बुरे प्रवर्तन और वन कानूनों के धीमें कार्यान्वयन के कारण हुआ है।”

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 36 वर्षों में विकास के लिए “परिवर्तित” 14,000 वर्ग किलोमीटर वन भूमि में से करीब 6747 वर्ग किलोमीटर में वनरोपण किया गया है, जैसा कि हमने लेख के पहले भाग में बताया है। यह वनीकरण दर का 48 फीसदी है।

 

वनीकरण लक्ष्य हासिल, टॉप पांच राज्य

Source: Lok Sabha

 

मध्य प्रदेश में सबसे अधिक भूमि (1,601 वर्ग किमी) को पुनर्जीवित किया गया है। जबकि महाराष्ट्र (962 वर्ग किमी) दूसरे स्थान पर है। अन्य राज्यों में वनीकरण नगण्य है।

 

सक्सेना कहते हैं कि, “इन वनीकरण परियोजनाओं का पर्यावरण और सामाजिक प्रदर्शन बुरा और गैर उत्पादक रहा है। यह खतरनाक है और पर्यावरण और इन क्षेत्रों की पारिस्थितिकी पर विनाशकारी प्रभाव डाल रहा है।”

 

ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि, “प्रतिपूरक वनीकरण” अपने मौजूदा स्वरूप में एक त्रुटिपूर्ण और अवैज्ञानिक अवधारणा है क्योंकि हज़ारों अन्योन्याश्रित प्रजातियों के साथ जटिल, विविध पारिस्थितिक तंत्र को  मोटे तौर पर निर्जीव मोनोकल्चर से नहीं बदला जा सकता है, जो कि वनीकरण है।

 

सरकार केवल वनीकरण के लिए राशि जारी करने की रफ्तार बढ़ाने का इरादा रखती है; प्रतिपूरक वनीकरण कोष (सीएएफ) विधेयक, 8 मई, 2015 को लोकसभा में पेश किया गया था।

 

प्रवीण भार्गव और शेखर दत्तात्री, पूर्व वन्यजीव बोर्ड के सदस्य, ने इस वर्ष पहले द हिंदू में लिखा था,“एक नज़र में यह प्रगतिशील कदम लग सकती है लेकिन विधेयक का त्रुटिपूर्ण और अवैज्ञानिक आधार देखते हुए, यह विकास के नाम पर जंगलों में बढ़ते परिवर्तन को ढकने के लिए एक बड़ा पत्ता प्रतीत होता है।”

 

(घोष 101reporters.com  के साथ जुड़े हैं। 101reporters.com  जमीनी पत्रकारों का भारतीय नेटवर्क है। घोष राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेख लिखते हैं।)

 

यह दो श्रृंखला लेख का दूसरा भाग है। पहला भाग आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 04 जून 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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