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निजी निवेशकों के लिए भूमि बैंक की तैयारी में राज्य, भारत भर में विरोध

भास्कर त्रिपाठी,

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राज्य सरकार के भूमि बैंक में भूमि के  समावेशन  को चिह्नित करने के लिए ओडिशा सरकार द्वारा एक गांव- नुआगांव की परिधि में एक 1,700 हेक्टेयर भूमि के आसपास का निर्माण की गई एक दीवार। इससे स्थानीय लोगों को एक क्षेत्र तक पहुंच के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है, जहां वे पारंपरिक रूप से साग-सब्जियों की खेती, चावल और मछली का उत्पादन करते रहे थे। जुलाई 2017 में, ग्रामीणों ने दीवार के निर्माण के खिलाफ याचिका दायर की थी। यह तस्वीर याचिका के साथ लगाई गई थी।

 

इस साल जून में, भारत के पूर्वी तट के निकट ओडिशा में नुआगांव के लगभग सौ लोगों ने एक दीवार के पास उग्र प्रदर्शन किया, जिस दीवार का निर्माण गांव की परिधि में 1,700 हेक्टेयर के भूमि के टुकड़े पर ओडिशा सरकार द्वारा किया जा रहा था। यह दीवार राज्य सरकार के भूमि बैंक की 1,253 हेक्टेयर वन भूमि को चिह्नित करेगी, जो विवाद में है । और इससे स्थानीय लोगों को उस इलाके तक पहुंच के लिए प्रतिबंधित किया जा सकेगा, जहां वे पारंपरिक साग-सब्जियों, चावल और मछली का उत्पादन करते रहे थे।

 

भारी पुलिस तैनाती के वावजूद ग्रामीणों ने मोर्चा संभाल रखा था। वर्ष 2011 में, उन्होंने दक्षिण कोरियाई इस्पात संयत्र ‘पॉस्को’ की उसी जमीन के टुकड़े पर इस्पात संयंत्र स्थापित करने की योजना के खिलाफ सफलतापूर्वक लड़ा था। जल्द ही पॉस्को ने मार्च 2017 में घोषणा कर दी थी कि वह जमीन को राज्य सरकार को वापस देगी क्योंकि सरकार ने घोषणा की थी कि वह जमीन को भूमि बैंक में वापस कर देगी, लेकिन गांवों को वापस नहीं लौटाएगी। जब मई, 2017 में सरकार ने विवादित जमीन पर दीवार बनानी शुरु की तो असंतोष भड़क उठा।

 

नुआगांव गांव में हुए संघर्ष को देश भर में चल रहे जमीन विवाद के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। राज्य सरकारें, विनिर्माण और बुनियादी ढांचे में निवेश को आकर्षित करने के प्रयास में निजी और आम दोनों जमीन का उपयोग कर, भूमि बैंकों का निर्माण करने की दौड़ में हैं।  2.68 मिलियन हेक्टेयर भूमि-मेघालय के क्षेत्रफल से ज्यादा ही- उन आठ राज्यों में भूमि बैंकों में अलग रखा गया है जो इन आंकड़ों को घोषित करते हैं, जैसा कि राज्य सरकार की वेबसाइटों के आंकड़े बताते हैं।

 

ये राज्य हैं- आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश।

 

कई मामलों में, यह लोगों के अधिकारों की कीमत पर किया गया है: : दिल्ली स्थित डेटा पत्रकारिता में एक पहल  लैंड कंफ्लिक्ट वॉच ने नुआगांव सहित हाल के चार मामलों का दस्तावेजीकरण किया है, जिसमें एक साथ 3,550 हेक्टेयर जमीन से अधिक शामिल है और जिससे 258,000 लोग प्रभावित हो सकते हैं। देखें तो यह संख्या नगालैंड की आबादी से ज्यादा है। इससे विवाद और संघर्ष पैदा हुए हैं, क्योंकि राज्य सरकारों ने उन जमीनों को भूमि बैंक को दे दिया है, जो औद्योगिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए आवंटित किए गए थे लेकिन स्थानीय विरोध के कारण ऐसा हो नहीं पाया। राज्य सरकार ने विवाद और संघर्ष को सुलझाने की बजाय ने इस मामले को बंद कर दिया।

 

हाल के जमीनी संघर्ष

Conflict District State Families Affected Area Affected (hectares)
Odisha Govt. has put forest land in their land bank which earlier belonged to the POSCO project Jagatsinghpur Odisha 700 1200
Chhatisgarh govt. has locked away a chunk of land which was acquired from people to build a steel plant Bastar Chattisgarh 2000 1700
Jharkhand govt. has sealed a chunk of forest land – where a firing range of India army was proposed – in their land bank Latehar Jharkhand 50000 32
Jharkhand govt. has earmarked gram sabha’s common land in their land bank. This land was a part of Koel-Karo dam project, which could not come up due to people’s protest Khunti Jharkhand 100 61

Source: Land Conflict Watch

 

भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना ​​है कि भूमि बैंकों का विचार ही अपने आप में समस्या है। दिल्ली के एक पारिस्थितिक अर्थशास्त्री असीम श्रीवास्तव ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा कि “वे गांवों से भूमि चोरी करते हैं और लंबे समय से जरूरी भूमि सुधारों को उलट देते हैं। ” श्रीवास्तव ‘चर्निंग द अर्थ: द मेकिंग ऑफ ग्लोबल इंडिया’ के सह-लेखक भी हैं। हाल के संघर्षों से यह पता चलता है कि राज्य सरकार की भूमि बैंक बनाने के तरीके सवालों के घेरे में है।

 

भूमि बैंक क्यों?

 

1990 के दशक में राज्य सरकारों ने ‘भूमि बैंक’ शुरू कर दी थी, विशेष रूप से उदारीकरण अवधि के बाद, जैसा कि अमेरिका में ‘जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय’ में समाजशास्त्र के प्रोफेसर और छप कर आ रही किताब ‘ डिसपोसिशन आफ्टर डिवल्पमेंट : लैंड ग्रैब्स इन नियोलिबरल इंडिया’ के लेखक माइकल लेवीन ने इंडियास्पेंड को बताया है।

 

उन्होंने कहा, “सरकार की दृष्टि में भूमि बैंक के निर्माण से उन्हें निजी निवेशकों को जमीन की पेशकश करने की सुविधा मिलती है। हर बार जब निवेशक जमीन चाहते हैं, तो उन्हें भूमि अधिग्रहण की लंबी प्रक्रिया के लिए इंतजार करना पड़ता है। निवेशक यह भी जानना चाहते हैं कि भूमि अधिग्रहण हुआ है और उपलब्ध है, और यह भी कि भूमि के साथ कहीं कोई राजनीतिक समस्या तो नहीं है।” आर्थिक गतिविधियों के लिए आसानी से भूमि उपलब्ध कराना तर्कसंगत कदम की तरह लगता है। लेकिन अगर गौर से देखें तो एक अलग तस्वीर सामने आती है-संघर्ष, और लोगों के उनके अधिकारों हटा देने की तस्वीर।

 

भूमि बैंक

 

Source: State government websites
Note:NA= Not Available in Public Domain

 

विवादित भूमि – नुआगांव का मामला

 

जब पॉस्को ने ओडिशा सरकार के साथ वर्ष 2005 में नुआगांव और आसपास के गांवों में एक इस्पात संयंत्र स्थापित करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, तो उससे प्रभावित 700 परिवार उत्साहित नहीं थे।

 

ज्यादातर दलित या संथाल आदिवासी परिवार प्रभावित परिवार जंगल से अपनी आजीविका अर्जित करना जारी रखना चाहते थे, और उन्हें विश्वास नहीं था कि बदले में दी गई नौकरियों या अन्य मुआवजे से उनके जीवन में सुधार होगा। कानूनी चुनौतियों के साथ एक दशक का लंबा प्रतिरोध चला और अंत में पॉस्को ने 2015 में परियोजना को स्थगित कर दिया। इसी साल मार्च में पॉस्को ने राज्य सरकार को भूमि वापस करने की पेशकश की।

 

ग्रामीणों ने इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन जल्द ही उन्हें एक और दावेदार-राज्य सरकार का सामना करना पड़ा, जो जल्दी से इस जमीन को एक भूमि बैंक से जोड़ना चाहती थी। ओडिशा के औद्योगिक विकास निगम (आईडीसीओ) ने मई के अंत में नुआगांव के निकट 1,700 हेक्टेयर परिधि में एक दीवार बनानी शुरू कर दी। दीवार से पास के धिनकिया और गोबिंदपुर गांवों भी अलग-अलग हो जाएंगे। इन परिवारों में से अधिकांश पीढ़ियां पान के पत्ते की खेती करते हैं, जो उनके आजीविका का साधन भी है। उनके पास आय का और कोई साधन नहीं है।

 

कई पीढ़ियों से स्थानीय लोगों का रिश्ता भूमि और जंगल के साथ अटूट रहा है। जंगल और भूमि से ही उनके गृहस्थी की गाड़ी चलती रही है। पॉस्को के खिलाफ लड़ाई के दौरान परिवारों के साथ मिलकर काम करने वाले कार्यकर्ता प्रशांत पैकरे ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा, “यह बंधन बहुत बड़ा है इसलिए औद्योगिक परियोजनाओं की स्थापना की बात कर लेने भर से ही उनका विऱोध अक्सर उग्र हो जाता है।”

 

उग्र विरोध और पुलिस द्वारा उस विरोध को कुचल डालने के कई प्रयासों के बाद नुआगांव के निवासियों ने कानूनी सहारा लिया। जुलाई 2017 में, उन्होंने राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल के कोलकाता पीठ के साथ एक याचिका दायर की।

 

उनके वकील ऋतविक दत्ता ने इंडियास्पेंड को बताया, “ओडिशा सरकार इस जंगल भूमि को भूमि बैंक में नहीं ला सकती है। 1980 के वन संरक्षण अधिनियम के अनुसार, सरकार को गैर-वन उद्देश्यों के लिए वन भूमि का उपयोग करने के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। हालांकि, अधिनियम के तहत ‘भूमि बैंक’ के लिए वन मंजूरी प्राप्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।”

 

याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2006 के वन अधिकार अधिनियम के तहत पीढ़ियों से रहने वाले या उस पर निर्भर लोगों के भूमि और वन अधिकारों को पहचानने के बिना, सरकार वन भूमि का इस्तेमाल नहीं कर सकती है। नुआगांव, ढिंकिया और गोबिंदपुर गांवों के निवासियों ने राज्य सरकार को अपनी जमीन और वन अधिकारों के दावे का आवेदन दिए हैं, लेकिन 2011 से उनके आवेदन वैसे ही पड़े हैं।

 

ओडिशा में काम कर रहे स्वतंत्र वकील शंकर पनानी ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “सरकार समुदायों को अपने जंगल तक पहुंच से रोकने के लिए वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन कर रही है। ”

 

राज्य सरकार इसका विरोध करती है कि भूमि पहले से ही गैर-वन उद्देश्यों के लिए हटा दी गई थी और यह भारत के औद्योगिक विकास निगम द्वारा आयोजित किया जा रहा था। ओडीशा सरकार के पूर्व उद्योग मंत्री देवी प्रसाद ने इंडियास्पेंड को बताया कि ” यहां वन अधिकारों को व्यवस्थित करने का कोई सवाल ही नहीं है।”

 

दत्ता का तर्क है कि ओडिशा सरकार ने इस वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने के लिए अंतिम आदेश जारी नहीं किया है, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ‘मंजूरी’ के बाद राज्य सरकारों के लिए ऐसा करना जरूरी है।

 

हर जगह संघर्ष

 

ओडिशा के भूमि बैंक में लगभग 40,000 हेक्टेयर भूमि शामिल हैं। ज्यादातर भारतीय राज्यों के पास या तो पहले से ही बड़े आकार के भूमि बैंक हैं या उन्हें बनाने की प्रक्रिया में हैं-मुख्यतः औद्योगिक या बुनियादी ढांचे के विकास के लिए-हालांकि केवल आठ विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है (तालिका 1 देखें)।

 

संघर्ष तब उठता है जब औद्योगिक परियोजनाएं उन भूमि पर प्रस्तावित होती हैं जहां समुदाय निवास करती हैं,  आजीविका अर्जित करती हैं या जहां उनका परंपरागत अधिकार हैं। 200 मिलियन से अधिक भारतीय मूलभूत जरूरतों के लिए वन क्षेत्र पर निर्भर हैं, जबकि 118.9 मिलियन भारतीय 160 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर खेती करते हैं।

 

भूमि संघर्ष निगरानी ने अभी तक 450 से अधिक भूमि संघर्षों की सूचना दी है, जिससे  6 मिलियन से अधिक लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं। इसमें राज्य द्वारा भूमि अधिग्रहण के कारण संघर्ष, जमीन पर समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन, और खनन और बिजली उत्पादन और बुनियादी ढांचे परियोजनाओं जैसे उद्योगों के विरोध शामिल हैं।

 

अक्सर, समुदाय अपनी भूमि से दूर नहीं लेना चाहते, या मुआवजे और पुनर्वास के लिए उनकी मांगों को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं किया जाता है। कुछ मामलों में, परियोजनाएं स्थगित या रद्द कर दी जाती हैं और राज्य सरकारें जमीन ले लेती हैं।

 

वाशिंगटन डीसी स्थित वकीलों के वैश्विक नेटवर्क ‘एन्वाइरन्मन्ट जस्टिस प्रोग्राम ऑफ नमाटी’ के साथ कानूनी अनुसंधान निदेशक, कांची कोहली, ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “जब निवेश-प्रस्तावों में वित्त की कमी, जमीन के टकराव, विनियामक असफलता या इन सभी कारणों से सफलता नहीं मिली तो अधिग्रहित जमीन को वापस करने के बजाय सरकार ने भूमि बैंकों को दे दिया।”

 

झारखंड के निषेधित कदम

 

ओडिशा में नुआगांव की तरह, झारखंड के खुंटी जिले के टोरपा ब्लॉक में भूमि बैंकों के खिलाफ एक आंदोलन तैयार हो रहा है। ग्राम सभाओं (ग्राम परिषद) के सदस्य बैठकें आयोजित कर रहे हैं, जहां वे राज्य के राजस्व विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध भूमि बैंक के आंकड़ों के साथ अपने गांव की जमीन का मिलान करते हैं,जिससे जांच हो सके कि क्या सरकार ने गांव की किसी सामान्य भूमि को जमीन बैंक में गुप्त रखा है। सामान्य भूमि को व्यापक रूप से एक गांव के सभी निवासियों द्वारा साझा भूमि और चराई वाले जमीन, तालाबों और जंगल माना जाता है।

 

उनका संदेह, टोरपा में एक गांव लोहजीमी के अनुभव से आता है, जहां निवासियों को इस साल फरवरी में पता चला कि राज्य सरकार ने उनकी सामान्य जमीन के 60 हेक्टेयर जमीन बैंक में डाल दी थी।

 

लोहजीमी के एक स्थानीय कार्यकर्ता रंजन गुडिया ने इंडियास्पेंड को बताया, “सरकार ने ग्राम सभा से भी परामर्श नहीं किया, यह पीईएसए [पंचायत विस्तार से अनुसूचित क्षेत्र अधिनियम] का उल्लंघन है।” पीईएसए अपने क्षेत्रों में प्रस्तावित सरकारी कार्यक्रमों को स्वीकृति देने, अस्वीकार करने या बदलने के लिए अनुसूचित क्षेत्रों के गांव परिषदों को सशक्त बनाता है। खुंटी एक  अनुसूचित  क्षेत्र है।

 

अब तक, झारखंड ने 40,468 हेक्टेयर भूमि का बैंक किया है, जिनमें से 10 फीसदी खुंटी जिले के टोरपा ब्लॉक में है। लोहजीमी की भूमि के संबंध में जानने के लिए झारखंड सरकार के कई अधिकारियों को हमने फोन और ई-मेल किया लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है। लोहजीमी पहले तीन दशक के आंदोलन का केंद्र था, जो 1973 में बिहार सरकार द्वारा प्रस्तावित 700 मेगावाट कोयल-करो डैम के खिलाफ शुरू हुआ था (तब झारखंड बिहार का हिस्सा था)। बांध से जलमग्न होने वाले 132 गांवों में से एक लोहजीमी था।

 

वर्ष 2001 में आठ लोगों की मौत हुई थी, जब एक संबंधित विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गोली चलाई। सरकार ने वर्ष 2003 में इस परियोजना को वापस ले लिया, और निवासी हर साल 2 फरवरी को शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं। गुडिया बताते हैं, “लोहजीमी से 60 हेक्टेयर भूमि जो कि सरकार ने बैंकिंग की थी, वह उस भूमि का हिस्सा था, जहां बांध का प्रस्ताव था।”

 

एक और कार्यकर्ता ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “अब सरकार उसी जमीन के अधिग्रहण के लिए एक अन्य उपकरण के रूप में भूमि बैंकों का उपयोग कर रही है।”

 

छत्तीसगढ़ में पुराना बनाम नया कानून

 

सामान्य जमीन के अतिरिक्त, भूमि बैंकों ने निजी भूमि की रक्षा के कानूनों का भी उल्लंघन किया है, विशेषकर उन मामलों में जहां रद्द परियोजनाओं से जमीन भूमि बैंकों में डाल दी गई है।

 

ऐसा ही एक उदाहरण छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के लोहंडीगुडा क्षेत्र से है। वर्ष 2007 में, छत्तीसगढ़ सरकार ने 2, 000 परिवारों में से 1,765 हेक्टेयर भूमि हासिल की। इनमें से ज्यादातर किसान  लोहंडीगुडा के 10 गांवों में रह रहे थे। टाटा स्टील के लिए स्टील प्लांट स्थापित करने के लिए भूमि अधिग्रहण की गई थी।

 

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इस जमीन का कुछ हिस्सा जबरदस्ती से हासिल किया गया था, और जारी विरोध  ने अगस्त 2016 में टाटा स्टील को वापस ले जाने के लिए मजबूर किया।

 

कुछ दिनों बाद, छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम (सीएसआईडीसी) ने इस जमीन को अपनी जमीन बैंक में जोड़ा और जमीन करीब 5,665 हेक्टेयर हुई। सीएसआईडीसी में भूमि आवंटन और भूमि बैंक प्रभाग के महाप्रबंधक आलोक त्रिवेदी की पुष्टि की कि “जमीन निगम के साथ है। भूमि को बैंक करने के लिए कागज तैयार किए जा रहे हैं ।”

 

छत्तीसगढ़ और दिल्ली के एक कार्यकर्ता-वकील, सुदीप श्रीवास्तव ने भारत सरकार से कहा कि कानूनी तौर पर, छत्तीसगढ़ सरकार टाटा स्टील के लिए अपनी भूमि बैंक में अधिग्रहण की गई जमीन को तब तक शामिल नहीं कर सकती, जब तक कि सरकार ने इसे लोगों से पुनः हासिल नहीं किया हो। श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है कि जमीन अधिग्रहण को रद्द कर दिया जाए और भूमि लोगों को वापस कर दी जाए।

 

श्रीवास्तव ने बताया कि 2013 के भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्वास अधिनियम (एलएआरआरए) के अनुसार अगर 1894 के पुराने नियम के तहत भूमि अधिग्रहण की गई और अधिग्रहित भूमि पांच वर्षों से अधिक समय तक अनुपयुक्त रही है तो अधिग्रहण रद्द हो सकता है। सरकार उसी जमीन पर एक नया प्रोजेक्ट स्थापित कर सकती है, लेकिन नए भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों का पालन करके इसे लोगों से पुन: प्राप्त करना होगा। इन प्रावधानों में सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करना और प्रभावित व्यक्तियों की सहमति प्राप्त करना शामिल है।

 

एक दशक तक, जब यह स्पष्ट नहीं था कि टाटा स्टील परियोजना शुरु होगी या नहीं, तब लोहांदिगुडा के किसान बीच में झूल रहे थे। कोई भी नौकरियों का वादा किया नहीं था। ज्यादातर पुनर्वास नहीं किए गए थे। हालांकि, कई परिवारों ने विवादित भूमि पर रहना जारी रखा था,  लेकिन वे सहकारी समितियों को अपनी फसलों को नहीं बेच सकते थे या किसान लाभ कार्यक्रमों का लाभ नहीं उठा सकते थे क्योंकि भूमि उनके नाम पर नहीं थी। अगस्त 2017 में इस स्थिति पर राजनेताओं का ध्यान तब गया, जब बस्तर के दौरे के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़ सरकार पर लोगों के साथ झूठ बोलने का आरोप लगाया।

 

नया भारतीय कानून

 

नया भूमि अधिग्रहण कानून भूमि बैंकों को एक स्वतंत्र हाथ देता है। अगर इस कानून के तहत अधिग्रहित भूमि पांच साल से अधिक के लिए अनुपयुक्त है, तो राज्य सरकार इसे अपने भूमि बैंक में रख सकती है या इसे उन लोगों को वापस कर सकती है जिन्हें इसे हासिल किया गया था।

 

संसद सदस्यों के लिए एक शोध समूह ‘पॉलिसी रिसर्च स्टडीज’ द्वारा एक विश्लेषण से पता चलता है कि 2011 में तैयार किए गए ‘एलएआरआरए एक्ट के पहले प्रारूप में अप्रयुक्त भूमि को लोगों को वापस करने का कोई विकल्प नहीं था, और राज्य सरकारों को इसके बदले इसे बैंक करने की अनुमति थी।

 

इसे ‘नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट्स’ (एनएपीएम) सहित कार्यकर्ता निकायों के कठोर विरोध का सामना करना पड़ा। एनएपीएम के राष्ट्रीय निदेशक मधेश कुमार ने बताया, “हमारे संयुक्त प्रयास ने सरकार को यह जोड़ने पर मजबूर किया कि यह जमीन लोगों को वापस भी जा सके। इससे कम से कम यह उन लोगों को कानूनी सहायता मिल पाएगी, जो अपनी अप्रयुक्त भूमि पर दावा करना चाहते हैं।”

 

नए कानून के तहत यदि कोई राज्य सरकार “सार्वजनिक उद्देश्य” के लिए जमीन का अधिग्रहण करती है, जिसमें रक्षा परियोजनाएं और गरीबों के लिए आवास शामिल हैं, तो उन्हें जमीन खोने वाले लोगों की सहमति की आवश्यकता नहीं होती है। इसके विपरीत, निजी परियोजनाओं के लिए, प्रभावित 80 फीसदी जमीन मालिकों की सहमति आवश्यक है और उन मामलों में 70 फीसदी की सहमति, यदि परियोजना में सार्वजनिक-निजी भागीदारी है।

 

कानून सरकार को ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ के लिए भूमि प्राप्त करने और बाद में इसे निजी खिलाड़ी को सौंपने से नहीं रोकता है। लेवेन ने कहा, “यह निजी और सार्वजनिक-निजी-साझेदारी परियोजनाओं के लिए एलएआरआरए के तहत अधिक से अधिक प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं को पूरी तरह से निरोधक बनाने का एक तरीका होगा।”

 

दरअसल, राज्य सरकारें उद्योग को देने या भूमि बैंकों में जमीन देने के लिए जमीन के अधिग्रहण के लिए “सभी प्रकार के कानूनों को तोड़ रहे हैं”, जैसा कि भूमि अधिकारों पर विभिन्न समितियों का नेतृत्व करने वाले एक पूर्व नौकरशाह एनसी सक्सेना ने इंडियास्पेंड को बताया।

 

सक्सेना कहते हैं कि “लंबे समय के लिए भूमि को खाली रखना एक बुरा विचार है। लेकिन भूमि बैंक एक आवश्यकता बन जाते हैं, क्योंकि वर्तमान भूमि कानून में भूमि अधिग्रहण लंबी प्रक्रियाओं के साथ जटिल हैं।”

 

नए भूमि अधिग्रहण कानून को कम से कम इस जटिलता को सुलझाना था और प्रक्रियाओं को कम करना था, लेकिन सक्सेना ने कहा कि उन लक्ष्यों को पूरा नहीं किया गया है और उल्लंघन का प्रचलन है।

 

पारिस्थितिक अर्थशास्त्री श्रीवास्तव ने कहा कि भूमि बैंकों में स्थानांतरण के प्रत्येक मामले की जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हमारे सामाजिक वैज्ञानिकों द्वारा इस घटना का एक भी अच्छा अध्ययन नहीं है।”

 

येल विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर क्रिस्टोफर उडरी कहते हैं कि भूमि बैंक इस तरह से बनाया जाना चाहिए कि जमीन के मालिकों लाभ पहुंचे। 1981 से, उन्होंने घाना में ग्रामीण अर्थशास्त्र और भूमि अधिकारों का अध्ययन किया है। यह एक पश्चिम अफ्रीकी देश है, जिसका आकार उत्तर प्रदेश के बराबर है और जहां 80 फीसदी भूमि प्रथागत भूमि मालिकों, और पारंपरिक परिवारों का है।

 

उडरी ने पारंपरिक बैंकों की तर्ज पर भूमि बैंकों का निर्माण करने का प्रस्ताव दिया है, जहां लोग अपने पैसे जमा करते हैं। लोग अपनी जमीन जमा कर सकते हैं और इससे कमा सकते हैं। उडरी ने इंडियास्पेंड को ईमेल में बताया, “कोई भी इस जमा पर ब्याज के रूप में सोच सकता है। वे इन भूमि बैंकों को वाणिज्यिक या विकास गतिविधियों के लिए जमा की गई जमीन दे सकते हैं।” उडरी आगे कहते हैं कि, “भुगतान इस तरह से विचारित किया जा सकता है कि जो अधिक समय के लिए सुपुर्द करने के लिए तैयार है, उन्हें उच्च भुगतान मिलेगा। जमा का कार्यकाल स्थानीय रूप से तय किया जा सकता है।”

 

ऐसा भारत में संभव होगा या नहीं, इस पर विशेषज्ञों की अलग राय होगी। इस बीच, ओडिशा के ढिंकिया और गोबिंदपुर गांवों में दीवार तेजी से बढ़ रही है। और समुदाय एक नई लड़ाई के लिए तैयार हो रहे हैं।

 

इंडियास्पेंड द्वारा दिए गए कुछ समाधान:

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(इस आलेख में कानन कपूर के इनपुट का इस्तेमाल हुआ है। भास्कर त्रिपाठी, दिल्ली स्थित डेटा पत्रकारिता में एक पहल ‘लैंड कान्फ्लिक्ट वॉच’ के साथ  पर्यावरण पत्रकार हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 19 सितंबर 2017 में indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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