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नोटबंदी के बाद बैंकों में आ गया है पर्याप्त पैसा, लेकिन कंपनियां कर्ज लेने की हालत में नहीं

प्रथमेश मुले,

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कोलकाता में एक मेटल वर्कशॉप के अंदर काम करता कर्मचारी। हालांकि, बैंकों के पास नोटबंदी के बाद 12 लाख करोड़ रुपए आ गए हैं, लेकिन कंपनियों को ऋण देने की गति धीमी है।

 

ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल, 26 नवंबर, 2016 को कहा – “विमुद्रीकरण से बैंकों में रुपया पर्याप्त मात्रा में आया है और इसे उत्पादक क्षेत्रों को कर्ज में दिया जाएगा।”

 

लेकिन शायद यह इतना आसान नहीं होगा, जितना गोयल ने कहा है।

 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, पिछले छह वर्षों के दौरान गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में वृद्धि और सुस्त आर्थिक विकास से कॉर्पोरेट उधार में 60 फीसदी की गिरावट हुई है। ये आंकड़े नोटबंदी के बाद, बैंकों से कंपनियों को ऋण देने में बाधा बनते हैं।

 

अब जब भारत सरकार ने देश के 86 फीसदी मुद्रा को बंद कर दिया है, मूल्य के अनुसार आगे बढ़ते मंदी के संकेतक मिल रहे हैं।

 

ऑटोमोबाइल कंपनियां द्वारा डीलरों को गाड़ी वितरण करने में काफी परेशानी हो रही है। ऐसी स्थिति पिछले 16 सालों में पहली बार हुई है, जैसा कि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट में बताया गया है। पिछले छह वर्षों में घर की बिक्री सबसे निचले स्तर पर है, जैसा कि ‘एनडीटीवी प्रॉफिट’ की इस रिपोर्ट में बताया गया है। 10 जनवरी, 2017 को रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए आंकड़ों का हवाला देते हुए ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2016-17 के पहले आठ महीनों में बुनियादी ढांचे वाली कंपनियों के लिए बैंक ऋण में लगातार गिरावट आई है और नवंबर में यह 6.7 फीसदी संकुचित हुआ है।

 

तो, 12.44 लाख करोड़ , जो बैंकिंग प्रणाली में अब वापस आए हैं, वह कॉर्पोरेट क्षेत्र को उधार देने में मुश्किलें आ सकती हैं।

 

विचार मंच ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ के अर्थशास्त्री निलंजन घोष कहते हैं, “जमा को केवल तभी कर्ज के रूप में वितरित किया जा सकता है, जब ब्याज दरों में कटौती हो। ब्याज दरों में कटौती के बगैर मांग में वृद्धि नहीं होगी। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि नोटबंदी से जमा ज्यादा हुए हैं। परिणामस्वरुप ज्यादा नकदी भंडार में आया है, जो बैंकों को अग्रिम ऋण और ब्याज कमाने की इजाजत देता है। बदले में इसका प्रभाव लाभ पर पड़ेगा और बैंकों की कोर पूंजी मजबूत होगी।”

 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के एक पूर्व जनरल मैनेजर आर महेश्वरण कहते हैं, “जाहिर है, नोटबंदी से बैंकों में जमा राशि में वृद्धि हुई है लेकिन सरकार की ओर से प्रोत्साहित करने के बावजूद बैंकों को कर्ज के रूप में राशि वितरित करने में 9 से 12 महीने का समय लग सकता है।”

 

भारतीय रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड के पूर्व निदेशक विपिन मलिक कहते हैं कि केवल दरों को कम करने से मदद नहीं मिलेगी, क्योंकि बैंकों को ऋण देने से पहले पूंजी आवश्यकताओं को पूरा करना होगा।

 

मलिक कहते हैं, “जमा में वृद्धि लंबे समय में मददगार हो सकती है। लेकिन बैंक मार्च 2017 के पूंजी ट्रिगर को भंग करेगी, अगर तब तक सरकार पूंजी नहीं डालती है।  इन बैंकों ने पूंजी पर्याप्तता के संदर्भ, में उधार की सीमा का उल्लंघन किया है।”

 

बैंकों में काले धन आने की बात कहते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने हाल ही में कहा है कि इन जमा राशि से बैंकों की ऋण देने की क्षमता में वृद्धि होगी।

 

कॉर्पोरेट ऋण में गिरावट क्यों?

 

हालांकि नई जमा राशि पर केंद्र सरकार के बैंकों के ऋण देने की क्षमता पुनर्जीवित होगी, लेकिन कॉरपोरेट सेक्टर (विनिर्माण और सेवा) के लिए ऋण में 60 फीसदी की गिरावट आई है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों के दौरान ये आंकड़े 4.7 लाख करोड़ रुपए (71.5 बिलियन डॉलर) से कम हो कर 1.9 लाख करोड़ रुपए (28.6 अरब डॉलर) हुए हैं।

 

उद्योग और सेवा को ऋण, वर्ष 2011-16

Source: Reserve Bank of India

 

दो क्षेत्रों में से विनिर्माण क्षेत्र के लिए शुद्ध ऋण में 77 फीसदी की गिरावट हुई है। 31 मार्च 2011 के अंत में ये आंकड़े 3.1 लाख करोड़ रुपए (47.19 बिलियन डॉलर) थे, जो 31 मार्च, 2016 के अंत में गिर कर 72,454 करोड़ रुपए (10.81 बिलियन डॉलर) हुए हैं।

 

सबसे ज्यादा प्रभाव बड़े पैमाने पर विनिर्माण इकाइयों पर पड़ा है। पिछले छह वर्षों में इस क्षेत्रों में ऋण में 69 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

सेवा क्षेत्र के लिए ऋण में 46 फीसदी की गिरावट हुई है। इस संबंध में ये आंकड़े 31 मार्च 2011 में 1.62 लाख करोड़ रुपए (24.29 बिलियन डॉलर) से गिर कर 31 मार्च, 2015 को 87,689 करोड़ रुपए (13.08 बिलियन डॉलर) हुए हैं।

 

हालांकि, पिछले वित्त वर्ष की तुलना में मार्च 2016 में क्षेत्र के लिए दिए गए ऋण में मामूली रुप से बढ़ोतरी हुई है और यह 1.1 लाख करोड़ रुपए (16.4 बिलियन डॉलर) तक पहुंचा है।

 

पिछले छह वर्षों में, परिवहन क्षेत्र और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए ऋण में 56 फीसदी की गिरावट हुई है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च, 2016 तक कॉरपोरेट जगत को 42 लाख करोड़ रुपए (637.57 बिलियन डॉलर)  या भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 30 फीसदी बैंकों को देने हैं।

 

सेक्टर के अनुसार बैंको के लिए कुल बकाया, वर्ष 2011-16

Source: Reserve Bank of India

 

हालांकि, एनपीए में वृद्धि कॉर्पोरेट उधारी में गिरावट का एक कारण है। जबकि आर्थिक मंदी और मौजूदा औद्योगिक क्षमता के ठहराव की वजह से मांग में गिरावट से ऋण देने में गिरावट आई है।

 

भारतीय रिजर्व बैंक ने दिसंबर 2016 के इस रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि, “संपत्ति की गुणवत्ता में लगातार गिरावट,  कम लाभप्रदता और तरलता के कारण बैंकिंग क्षेत्रों का जोखिम बढ़ा  है।”

 

जेटली ने लोकसभा को बताया कि मार्च 2016 तक सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों का एनपीए लगभग 6 लाख करोड़ रुपए (89.5 बिलियन डॉलर) था।

 

पंजाब नेशनल बैंक कर्मचारी संघ के महासचिव, अनित प्रभु कहते हैं कि, “एनपीए में वृद्धि से, पूंजी का क्षरण हो जाता है, जिससे बैंक कम ऋण देने के लिए मजबूर होते हैं।”

 

घोष कहते हैं, “बैंकों के एनपीए का एक बड़ा हिस्सा बड़े उद्यमों से है। इसमें उच्च जोखिम शामिल है। इसलिए बैंकरों ने उन्हें कम ऋण देने के लिए सचेत निर्णय लिया होगा।”

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आठ प्रमुख उद्योगों (बिजली, स्टील, रिफाइनरी उत्पाद, कच्चे तेल, कोयला, सीमेंट, प्राकृतिक गैस और उर्वरक) की वृद्धि दर अप्रैल 2012 में 6.5 फीसदी से गिरकर अप्रैल 2016 में 2.8 फीसदी हुआ है।

 

जुलाई 2016 में, सरकार ने लोकसभा में घोषणा की कि यह ” इन उद्योगों में विकास को बढ़ावा देने के लिए लगातार उठाए गए कदम हैं।”

 

हालांकि, ज्यादातर एनपीए का संबंध बड़े आकार के उद्योगों से है लेकिन ऋण वितरण पर प्रभाव छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों (एसएमई) के द्वारा महसूस की गई है।

 

इसके अलावा, विमुद्रीकरण ने लघु उद्योगों के संकट को और बढ़ा दिया है। अखिल भारतीय निर्माता संगठन द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, विमुद्रीकरण के पहले 34 दिनों में अत्यंत छोटे एवं लघु उद्योगों 35 फीसदी नौकरियों का नुकसान हुआ है और राजस्व में 50 फीसदी की गिरावट हुई है, जैसा कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की 9 जनवरी, 2017 की इस रिपोर्ट में बताया गया है।

 

तिरपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट धंजय सुब्रमण्यम कहते हैं, “बड़े आकार के उद्योगों के बढ़ रहे जोखिम भरे ऋण की पृष्ठभूमि में  बैंकर एसएमई को भी ऋण देने से सावधानी बरत रहे हैं। बैंकों में अधिक रुपए जमा होने से एसएमई द्वारा ऋण की पहुंच में आसानी होगी।”

 

यदि अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ावा देना है तो एसएमई का फिर से मुद्रीकरण होना चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक के सेंट्रल बोर्ड के पूर्व निदेशक विपिन मलिक कहते हैं, “मांग में वृद्धि के लिए संगठित और छोटे उद्योगों का समर्थन करना महत्वपूर्ण है।”

 

पूंजी को बढ़ाने के लिए बोली से बैंकों को मिलेगी सहायता

 

बैंकों को नकदी का एक न्यूनतम आधार देने के लिए, अगस्त 2015 में वित्त मंत्रालय ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अगले चार साल में 1,80,000 करोड़ रुपए (26.8 बिलियन डॉलर) पूंजी की आवश्यकता होगी।

 

अगले चार सालों में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 70,000 करोड़ रुपए (10.4 बिलियन डॉलर ) डालने के लिए सरकार ने इंद्रधनुष योजना का प्रस्ताव किया है, हालांकि इसके लिए बैंकों को बाजार से अतिरिक्त धन जुटाना होगा।

 

अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ (एआईबीईए) के सचिव, विश्वास उतगी कहते हैं, “पूंजी के लिए राज्य के बैंक सरकार पर निर्भर हैं, लेकिन सरकार की ओर से दी जाने वाली राशि पूंजी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। बाजार में गिरावट के साथ बाजार से पूंजी जुटाने की संभावना कमजोर लग रही है।”

 

पूंजी के लिए बढ़ावे के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अपने हिस्से बेचें

 

वर्ष 2015 में बजट पेश करते हुए जेटली ने कहा था कि पूंजी के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अपने हिस्से बेचने होंगे।

 

‘सहारा: द अनटोल्ड स्टोरी एंड द बैंक फॉर द बक’ के लेखक थमल बंद्योपाध्याय ने मिंट में अगस्त, 2015 के कॉलम में लिखा कि, “जेटली के पुनर्पूंजीकरण की घोषणा अस्थायी राहत प्रदान करता है।”

 

“सरकार को सरकार बुनियादी मुद्दों को संबोधित करना चाहिए औऱ इन बैंकों में सही कौशल और विशेषज्ञता प्रदान करनी चाहिए। इनकी अनुपस्थिति में, पूंजी निवेश अकेले ही ‘चेपदार पट्टी’ की समस्याओं का समाधान करती है।”

 

विमुद्रीकरण से बैंकों को पूंजी कटाव से निपटने में मिलेगी मदद

 

‘इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च क्रेडिट’ एजेंसी इस रिपोर्ट के अनुसार, विमुद्रीरण के कारण जमा हुई राशि में वृद्धि से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए 38,000 करोड़ रुपए (5.7 बिलियन डॉलर) का राजकोष जमा हुआ है, जो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अपने न्यूनतम पूंजी जरूरतों को पूरा करने की अनुमति देगा।

 

‘इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च’ के एसोसिएट डायरेक्टर सौम्याजीत नियोगी कहते हैं, “हमें आगे पैदावार में 6.25 फीसदी की गिरावट की उम्मीद है। 11 नवंबर, 2016 तक बैंकों के पास 29 ट्रिलियन मूल्य की सरकार और उच्च दर कॉरपोरेट बॉन्ड हैं। उपज की 6.25 फीसदी तक नरमी से राजकोष को लाभ होगा।”

 

रिपोर्ट कहती है कि, “जमा में वृद्धि से सरकार और उच्च दर्जा वाले कॉरपोरेट बॉन्ड के लिए मांग में वृद्धि होगी।इससे वर्तमान अनमने से कर्ज के माहौल में कम पैदावर से उपजा तनाव कम हो सकता है।

 

वैसे बैंकों की ऋण देने की क्षमता में वृद्धि की संभावनाओं पर सरकार और विशेषज्ञों की आशापूर्ण दृष्टि भारतीय रिजर्व बैंक को प्रभावित करने में नाकाम रही है।

 

भारतीय रिजर्व बैंक ने दिसंबर 2016 की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में कहा, “जैसा कि बैंक बैलेंस शीट बता रही है, कर्ज के विस्तार का समर्थन करने के लिए उनकी पूंजी की स्थिति अपर्याप्त रह सकती है।”

 

नोट: रूपांतरण 67 रुपये प्रति डॉलर पर आधारित है।

 

(मुले 101Reporters.com से जुड़े हैं, दिल्ली में रहते हैं। 101Reporters.com जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का राष्ट्रीय नेटवर्क है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 13 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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