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पंजाब में फीकी होती समृद्धि, राज्य में बढ़ती बेरोजगारी और अशांति

बिलाल हंडु,

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वर्ष 2015 में देश भर में सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए सभी तरह के विरोध प्रदर्शनों में से एक तिहाई पंजाब में हुए हैं। इस साल राज्य में सरकारी कर्मचारियों द्वारा कम से कम 5764 विरोध प्रदर्शन हुए हैं। अपनी मांग को लेकर सड़कों पर उतरने वालों में स्कूल कर्मचारियों से लेकर सफाई कर्मचारी तक शामिल हैं।

 

ज्यादातर मामलों में मांगें एक जैसी ही हैं। ठेका श्रमिकों का ‘नियमितीकरण’, पेंशन, बीमा और छुट्टी भत्ता जैसे सहायक लाभ के साथ स्थायी कर्मचारी बनाए जाने की मांग भी है।

 

एक समय में भारत का सबसे समृद्धि और तेजी से बढ़ता राज्य रहा  पंजाब, सकल राज्य घरेलू उत्पाद के मामले में  12 वें स्थान पर है। कभी हरित क्रांति में अगुआ रहे इस प्रदेश में कृषि क्षेत्र सिकुड़ गया है। दूसरी ओर जालंधर खेल के सामानों से जुड़े विनिर्माण उद्योग भी सिकुड़ रहे हैं, क्योंकि चीन के सस्ते आयात के साथ प्रतिस्पर्धा करने में और देश में कहीं भी अनुकूल कारोबारी माहौल ढूंढ़ने में निर्माता असमर्थ हैं।

 

ऐसे युवा लोगों लोगों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है, जो कृषि या उद्योग में खप नहीं सकते हैं और सरकारी नौकरी चाहते हैं।

 

18 से 29 आयु वर्ग के बीच, युवा पंजाबियों की बेरोजगारी दर 16.6 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 10.2 फीसदी है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने जनवरी 2017 में बताया है।

 

वर्ष 2015-16 में ग्रामीण पंजाब की बेरोजगारी दर 16.5 फीसदी रही है। ये आंकड़े ग्रामीण भारत के 9.2 फीसदी आंकड़ों की तुलना में सात प्रतिशत अंक अधिक हैं।

 

इसका परिणाम यह है कि बेहतर भविष्य की आशा में पंजाब के युवा अपना गांव छोड़ रहे हैं । नशे की लत में वृद्धि पर लोगों का गुस्सा, फूट रहा है। बेरोजगारी और आकांक्षाओं की विफलता अब एक चुनावी मुद्दा है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने फरवरी 2017 में विस्तार से बताया है।

जाहिर है, लोगों का यह गुस्सा सड़कों पर उतर रहा है।

 

सड़कों पर गुस्सा

 

राष्ट्रीय एजेंसी ‘पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो’ ( बीपीआरडी ) द्वारा एकत्र आंकड़ों के अनुसार पिछले सात सालों से वर्ष 2015 तक पंजाब भर में 25,000 से अधिक विरोध प्रदर्शन हुए हैं। यानी हर दिन 15 से 18 प्रदर्शन हुए हैं।

 

सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन की घटनाएं: टॉप 10 राज्य

Source: Bureau of Police Research & Development

 

श्रम संबंधी विरोध प्रदर्शन के मामले में पंजाब दूसरे स्थान पर रहा है। वर्ष 2015 में 1,388, वर्ष 2014 में 2,854 और वर्ष 2015 में 1,388 विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जैसा कि बीपीआरडी के आंकड़े बताते हैं। राज्य में श्रम संबंधी आंदोलन की घटनाओं में, वर्ष 2013 से 2014 के बीच 3.5 गुना वृद्धि हुई है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने नवंबर 2016 में विस्तार से बताया है।

 

श्रमिकों द्वारा प्रदर्शन की घटनाएं: टॉप 10 राज्य

Source: Bureau of Police Research & Development

 

मिड-डे मील कुक वर्कर्स यूनियन, सर्व शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत काम कर रहे लोगों ने घोषणा की कि वे 27,000 संविदात्मक पारिश्रमिक नियमित करने के अधिनिय को कानून बना कर लागू करने में पंजाब सरकार द्वारा की गई देरी के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने दावा किया कि राज्य विधानसभा द्वारा विधेयक पारित होने के 2 महीने बाद भी सरकार ने उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं दिया है।

 

18 नवंबर, 2016 को स्वास्थ्य विभाग के कार्यकर्ताओं ने शिक्षा, सिंचाई, औद्योगिक प्रशिक्षण और ट्रेजरी के विभागों के श्रमिकों के साथ मिलकर धरना प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन सरकार द्वारा वर्ष 2012 में सेवानिवृत्ति की आयु 58 से बढ़ा कर 60 करने के वादे को पूरा करने की मांग को लेकर की गई थी।

 

इसी दिन, सफाई, सीवेज कार्यकर्ता, माली और ड्राइवर सहित  पंजाब सफाई मजदूर संघ के 300 सदस्यों ने जालंधर में नगर निगम कार्यालय के बाहर धरना दिया। शहर भर में कचरा फैला रहा। वे 2000 ‘सफाई’  कार्यकर्ताओं और 500 सीवेज कार्यकर्ताओं की भर्ती और 180 स्वच्छता और 65 सीवेज श्रमिकों के नियमितीकरण करने की मांग कर रहे थे।

 

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की एक कार्यकर्ता अमरजीत कौर कहती हैं, “पिछले दो दशकों में ठेकाकरण पंजाब सरकार के लिए एक आदर्श बन गया है। जब सरकार ठेके नवीनीकृत करने के लिए मना करती है तो श्रमिक प्रदर्शन करते हैं। यह दिलचस्प है कि यह आउटसोर्सिंग एजेंसियां (जो सरकार के लिए ठेका श्रमिकों की नियुक्ति करती हैं) मजदूरों के गुस्से का सामना न करना पड़े इसलिए अपना नाम बदलती रहती हैं और एक नए नाम के साथ नवीनीकरण करती हैं और नए कामगारों की नियुक्ति कर बचती रहती हैं”।

 

वर्ष 2011 में, शायद बढ़ते असंतोष को देखते हुए पंजाब के तत्कालीन मुख्य सचिव, एस सी अग्रवाल ने सभी सरकारी विभागों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि अनुबंध कर्मचारियों को कानून के अनुसार न्यूनतम मजदूरी, भविष्य निधि और कर्मचारी राज्य बीमा लाभ मिले। अपने पत्र में उन्होंने कहा था कि ठेकेदार अनुबंध वाले कर्मचारियों के लिए सरकार की ओर से जारी वेतन की पूरी राशि का भुगतान नहीं कर रहे हैं। अनुबंधित कर्मचारियों को उनके बोनस, ग्रेच्युटी, मातृत्व अवकाश और मंजूर छुट्टियां भी नहीं दी जा रही हैं।

 

अक्टूबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब से संविदात्मक कार्यकर्ताओं द्वारा कई अपीलों पर फैसला सुनाया कि संविदात्मक परिश्रमिक, स्थायी कर्मचारियों के बराबर मजदूरी के हकदार हैं और ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत लागू करना चाहिए।

 

धीमी अर्थव्यवस्था, कम नौकरियां

 

अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में रोजगार में गिरावट से सरकारी नौकरियों की मांग में वृद्धि हुई है। वर्ष 2015-16 में पंजाब की बेरोजगारी दर 16.8 फीसदी थी, जो 11.6 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से अधिक था।

 

अन्य प्रमुख कारणों में एक यह भी है राज्य में रोजगार का सबसे ज्यादा अवसर पैदा कने वाला कृषि क्षेत्र सिकुड़ रहा है। यहां अवसर कम हुए हैं। वर्ष 1971 में पंजाब में कुल श्रमिकों में से कृषि श्रमिकों की हिस्सेदारी 62 फीसदी थी। लेकिन 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, इसी वर्ष श्रम-शक्ति में कृषि श्रमिकों की हिस्सेदारी केवल 36 फीसदी रही है, यानी 26 प्रतिशत अंक की गिरावट हुई है।

 

इस गिरावट के कारणों में कृषि का मशीनीकरण और खेती क्षेत्र में विकास दर की गिरावट शामिल है। पिछले नौ वर्षों में कृषि विकास दर में गिरावट हुई है। पंजाब के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2005-06 में 0.95 फीसदी से गिरकर वर्ष 2014-15 में (-)3.40 फीसदी हुआ है।

 

इसी समय, राज्य कृषि-प्रोसेसर जैसे अनुषंगी इकाइयों को प्रोत्साहित करने में असमर्थ रहा है, जिनसे रोजगार का सृजन किया जा सकता था। इसे नीति और परिचालन दोनों स्तर पर विफलता के रूप में देखा जा सकता है।

 

एक तथ्य यह भी है कि ग्रामीण युवा खेतों पर काम करने में हिचकते हैं। इसके बजाय वह विदेश जाना पसंद करते हैं। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में पंजाब स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के प्रोफेसर विक्रम चड्डा कहते हैं, “ग्रामीण युवाओं का प्रवासन पंजाब के लिए आम बात है। युवा अपने परिवार पर विदेश जाने का खर्चा जोड़ने के लिए जमीन बेचने का दवाब डालते हैं इस कारण राज्य के कृषि गतिविधियों में काफी कमी आई है। ”

 

वह बताते हैं कि इस खालीपन को बिहार और उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी श्रमिकों द्वारा भरा जा रहा है।

 

इस बीच, विनिर्माण नौकरियों को खेतों पर काम करने से अधिक प्रतिष्ठित और आकर्षक माना जाने लगा, जहां अब धीमे और लंबे समय तक बाजार गिरावट के कारण नौकरी के मौके लगातार कम होते जा रहे हैं।

 

प्रोफेसर चड्डा कहते हैं, “क्षेत्र में खालिस्तान की मांग के बाद पंजाब के विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई है। यूनिट धारक राज्य से दूर हो रहे हैं…इसी समय में पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि निवेशकों को आकर्षित कर रही है। ”

 

उन्होंने आगे कहा कि 1990 और 2000 के दशक के दौरान भारी कला धन से इस क्षेत्र में और भी गिरावट हुई।

 

वर्तमान दशक में भी पंजाब में फैक्ट्रियों की संख्या में गिरावट होना जारी है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, यह आंकड़े वर्ष 2010-11 में 12,770 से गिरकर वर्ष 2013-14 में 12,278  हुए हैं। वर्ष 2000-01 से वर्ष 2010-11 के बीच राज्य में गैर ऑपरेटिंग कपड़ा इकाइयों की संख्या 11 से बढ़ कर 227 हुई है, जैसा कि उद्योग संगठन एसोचैम का यह अध्ययन कहत है।

 

रोजगार की इस निराशाजनक स्थिति में सरकारी नौकरियों की मांग में वृद्धि हुई है। पंजाब पुलिस में कांस्टेबल के 7418 पदों के लिए 7 लाख से ज्यादा लोगों ने आवेदन दिया था, जैसा कि सितंबर 2016 की आउटलुक की यह रिपोर्ट कहती है। इनमें से 1.5 लाख स्नातक, स्नातकोत्तर थे या व्यवसाय प्रशासन या लेखा जैसे स्नातकोत्तर डिग्री वाले थे।

 

वर्ष 2011-12 के दौरान आयोजित  राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के 68 वें दौर के सर्वेक्षण के अनुसार, पंजाब में नौकरी की तलाश करने वालों में से 72 फीसदी “शिक्षित” हैं, यानी जो 10वीं पास कर चुके हैं।

 

हालांकि, सरकार भी कम लोगों को ही रोजगार दे पा रही है। जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी कर्मचारियों की संख्या वर्ष 2004 में 3.7 लाख से गिरकर वर्ष 2015 में 3.1 लाख हुआ है, यानी 15 फीसदी की गिरावट हुई है। ग्रामीण एवं औद्योगिक विकास अनुसंधान केंद्र ( सीआरआरआईडी ) में प्रोफेसर रणजीत सिंह घुमन ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि ” वर्ष 2006 से 2013 के बीच सरकार ने पंजाब भर में 18,000 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश दिया है।” घुमन ने आगे बताया कि हाल ही में सरकार ने थर्मल संयंत्रों जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बंद किया है जिससे 3,500 संविदात्मक कर्मचारी बेरोजगार हुए हैं। वह कहते हैं, “इस मुद्दे को हल करने की बजाय सरकार इसे बढ़ा रही है।”

 

हमेशा की तरह राजनीति?

 

राज्य में हुए चुनावों के तहत देखा जाए तो सत्तारूढ़ शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी (शिरोमणि अकाली दल-भाजपा) सरकार ने 19 दिसंबर, 2016 को 39 मिनट के अंतराल में, मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की गैरमौजूदगी में, नौ बिल को मंजूरी दे दी थी। बिल में संविदात्मक नौकरियों को नियमित करने का उद्देश्य था।

 

आम आदमी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया है कि  वे “संविदात्मक नियुक्त प्रणाली को समाप्त करेंगे, सरकारी विभागों और बोर्ड निगम के कर्मचारियों के लिए पेंशन को पुनर्जीवित करेंगे। ” कांग्रेस ने युवा बेरोजगारों को नौकरी देने का वादा किया है।

 

हालांकि, पंजाब के लिए जो किसी पार्टी ने वादा नहीं किया है, वह है अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने, कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए एक स्पष्ट नीति- रोडमैप।

 

(हंडु स्वतंत्र पत्रकार हैं और नई दिल्ली में रहते हैं। वह 101Reporters.com के सदस्य भी हैं। 101Reporters.com जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का राष्ट्रीय नेटवर्क है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 02 मार्च 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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