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परिवार की आर्थिक हैसियत तय करती है श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी

देवानिक साहा,

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वर्ल्ड बैंक की ओर से मार्च 2017 की एक रिपोर्ट ‘रिएसेसिंग पैटर्न ऑफ फीमेल लेबर फोर्स पार्टीसिपेशन इन इंडिया’ के अनुसार आय में वृद्धि और परिवार में स्थिरता की वजह से श्रम-शक्ति में महिलाओं की भागीदारी कम हो रही है। इस रिपोर्ट में वर्ष 2004-05 से वर्ष 2011-12 तक के सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अवधि में कम से कम 19.6 महिलाएं श्रम शक्ति से बाहर हुई हैं। हम बता दें कि यह संख्या रोमानिया की आबादी के बाराबर है। रिपोर्ट कहती हैं कि श्रम शक्ति से बाहर हुई महिलाओं में 53 फीसदी ग्रामीण महिलाएं हैं।

 

23 अप्रैल, 2017 को जारी अपने तीन साल के(2017-20) ‘एक्शन एजेंडा मसौदे‘ में सरकारी विचार मंच नीति आयोग ने भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं की समान भागीदारी को पर बल दिया है।

 

केवल 27 फीसदी भारतीय महिलाएं श्रम बल में हैं। यह संख्या ब्रिक्स देशों में सबसे कम है । जी -20 देशों में यह केवल सऊदी अरब से बेहतर है। इंडियास्पेंड ने 9 अप्रैल 2016 की एक रिपोर्ट में इस पर विस्तार से बात की है।

 

श्रम शक्ति में उन महिलाओं के कामों को शामिल नहीं किया जाता है जो “अवैतनिक देखभाल कार्य” करती हैं। इसमें लोगों की देखभाल, घरेलू काम और स्वैच्छिक समुदाय के काम तथा अवैतनिक सेवाएं शामिल हैं।

 

दक्षिण एशिया में भारत की महिलाओं की दूसरी सबसे कम श्रम शक्ति भागीदारी है

Source: World Bank

 

परिवार की आय श्रम शक्ति में भाग लेने से महिलाओं को रोकती है

 

अध्ययन में पाया गया कि श्रम बल में शामिल होने का निर्णय सामाजिक मानदंड, शैक्षणिक योग्यता और उम्र की बजाय मुख्य रूप से घर की आर्थिक स्थिरता से प्रभावित होता है। अध्ययन में घर की कामकाजी आयु की आबादी में स्वयं-नियोजित, नियमित मजदूरी अर्जक और आकस्मिक श्रम के अनुपात का मूल्यांकन किया गया है।

 

यह पाया गया कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वर्ष 2004-05 से वर्ष 2011-12 के बीच, जहां घरों में नियमित मजदूरी के अनुपात में वृद्धि हुई है, वहीं स्व-नियोजित व्यक्तियों और आकस्मिक श्रम के अनुपात में गिरावट हुई है। यह निश्चित रुप से पारिवारिक आय में बढ़ती स्थिरता दर्शाता है। शहरी क्षेत्रों में नियमित वेतन अर्जक का अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक है, जो इसकी कम एफएलएफपी दरें बताता है।

 

एक परिवार में सदस्यों की रोजगार की स्थिति

Source: World Bank; Figures in percentage; for all ages for the year 2013

 

साफ है कि घरेलू आय स्थिर हो जाने के कारण कम महिलाएं श्रम शक्ति में शामिल हो रही हैं।

 

पहले किए गए एक अध्ययन से ( यहां और यहां ) इसकी तुलना की जा सकती है, जिससे पता चलता है कि घरेलू आय के बढ़ते स्तर के साथ, ग्रामीण भारत में महिलाएं भुगतान श्रम से वापस लौट रही हैं और घरो में अपनी सामाजिक हैसियत को बरकरार रखने के लिए काम कर रही हैं।सामाजिक हैसियत को बरकरार रखने के लिए किए गए कामों में कपड़ों की साफ सफाई, घर के सदस्यों के भोजन और देखभाल शामिल है।

 

श्रम शक्ति में गिरावट का संबंध शैक्षिक योग्यता में वृद्धि से

 

वर्ल्ड बैंक के विश्लेषण में पाया गया कि भारत में माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा श्रम-शक्ति में महिलाओं की भागीदारी को तय नहीं करती हैं।

 

एफएलएफपी दर का सबसे कम आंकड़ा उन लोगों के बीच है, जिन्होंने माध्यमिक (दसवीं कक्षा ) प्राप्त किया था। इसके बाद ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में माध्यमिक स्तर से नीचे शिक्षा के स्तर वालों का स्थान हैं।

 

एफएलएफपी दर ग्रामीण और शहरी क्षेत्र, दोनों में निरक्षर और कॉलेज स्नातकों के बीच सबसे ज्यादा है। अशिक्षित लोगों और महाविद्यालय की शिक्षा वाले लोगों ने भी इस अवधि के दौरान एफएलएफपी दर में सबसे ज्यादा गिरावट का अनुभव किया है।

 

उच्च साक्षरता का महिलाओं के लिए अधिक निर्णय लेने की शक्ति में ज्यादा योगदान नहीं होता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 13 फरवरी, 2017 की रिपोर्ट में बताया है।

 

प्रति 1,000 पुरुषों पर केवल 691 महिलाओं के कॉलेज जाने का अनुपात है। यह अनुपात 19 वर्ष की आयु पर 825: 1,000 से गिरकर 25 से 29 वर्ष की आयु में  531:1,000 हुआ है। प्रति 1,000 पुरुषों की तुलना में कम से कम 1,403 महिलाएं ऐसी हैं जो किसी शैक्षणिक संस्था में नहीं गई हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 28 नवंबर, 2015 को अपनी रिपोर्ट में विस्तार से बताया है। वर्ष 2007 से वर्ष 2014 के बीच उच्च शिक्षा में लड़कियों का नामांकन 39 फीसदी से बढ़कर 46 फीसदी तक होने के बावजूद श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी कम हो रही है।  इंडियास्पेंड की 27 जुलाई, 2016 की रिपोर्ट आप देख सकते हैं।

 

वर्ष 2004-05 और वर्ष 2011-12 के बीच, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों दोनों में सभी शैक्षणिक श्रेणियों में एफएलएफपी में गिरावट हुई है। इससे पता चलता है कि एक अवधि के दौरान शिक्षा में बढ़ोतरी के बावजूद, श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी में गिरावट आई है।

 

शैक्षिक स्तर के अनुसार श्रम शक्ति में महिलाओं भागीदारी

Source: World Bank; Figures in percentage

 

अध्ययन में कहा गया है, “सभी शैक्षणिक श्रेणियों के लिए एफएलएफपी (फीमेल लेबर फोर्स पार्टिसपेशन) दर में कमी और माध्यमिक और उच्च माध्यमिक ( 12वीं कक्षा ) स्तरों की शिक्षा वाले छात्रों की विशेष रूप से खराब प्रदर्शन के कारणों को जानना होगा।”

 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के दक्षिण एशिया के  उप निदेशक, शेर सिंह वेरिक ने दिसंबर 2016 में वायर को दिए गए साक्षात्कार के दौरान बताया है, “नौकरियों की गुणवत्ता के मामले में महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि आप कमा सकते हैं। यदि आप उचित मजदूरी प्राप्त करने में सक्षम हैं, तो यह आपके लिए श्रम बाजार तक आना आसान हो जाता है। एक महिला के रूप में यदि मजदूरी बहुत कम रहती है तो आपका उत्साह कम हो जाता है। ”

 

आयोग के 2017-20 एजेंडा का कहना है कि महिलाओं को कम भुगतान किया जाता है, कम उत्पादक नौकरियों में काम करना होता है और अवैतनिक देखभाल कार्य में अधिक प्रतिनिधित्व होता है और रोजगार के कमजोर रूपों में शामिल होने से  घर में उनकी अधीनस्थ स्थिति प्रतिबिंबित होती है।

 

विश्व बैंक के अध्ययन पर ग्रामीण श्रम बाजार की मांग और आपूर्ति दोनों का एक व्यवस्थित विश्लेषण जरूरी है।

 

शहरी क्षेत्रों से विपरित ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक विवाहित महिलाएं कार्यबल में शामिल

 

विश्व बैंक के अध्ययन में कहा गया है कि, विवाह दो तरीकों से महिलाओं की श्रम भागीदारी को प्रभावित करता है।

 

  • विवाह के बाद, महिलाएं आमतौर पर परिवार में देखभाल करनेवाले की भूमिका निभाती हैं, जो उनके समय के आवंटन को महत्वपूर्ण रूप से बदल देता है।
  •  

  • विवाह महिला की सामाजिक स्थिति को बदलती है। एक विवाहित महिला केवल श्रम शक्ति में शामिल होती है जब श्रम भुगतान से जुड़े सामाजिक मानदंड पारिवारिक प्रतिष्ठा के अनुरूप होता है।

 

हालांकि, विवाह के औसत आयु में वृद्धि हुई है, लेकिन इसका कम होना जारी है। जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण पर ‘द हिंदू’ द्वारा 29 जून, 2016 की रिपोर्ट यही कहती है। वर्ष 2011 में महिलाओं के लिए यह उम्र 19.2 वर्ष है। हम बता दें कि वर्ष 2001 में 18.2 वर्ष था। वर्ष 2011 में पुरुषों के विवाह की आयु 23.5 वर्ष थी जबकि वर्ष 2001 में यह 22.6 वर्ष थी।

 

ग्रामीण क्षेत्रों में, विवाहित महिलाओं की एफएलएफपी  दर अविवाहित महिलाओं की तुलना में अधिक थी। शहरी क्षेत्रों में, अविवाहित महिलाओं की भागीदारी की दर विवाहित महिलाओं की तुलना में अधिक थी।

 

शहरी इलाकों में वर्ष 2004-05 और वर्ष 2011-12 के बीच महिलाओं की भागीदारी की दर में गिरावट हुई है। जिससे विवाहित और अविवाहित महिलाओं दोनों के लिए एफएलएफपी दर में कुल गिरावट आई है।

 

साफ है कि श्रम बाजार में वैवाहिक स्थिति का महिलाओं की भागीदारी दर पर असर पड़ा है। यह अध्ययन शहरी इलाकों में वर्ष 1993-94 से वर्ष 2011-12 के दौरान हुई गिरावट पर बात नहीं नहीं करता है।

 

अध्ययन में पाया गया कि उनकी जाति -अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग या सामान्य- के बावजूद विवाहित महिलाओं की एफएलएफपी दर ग्रामीण क्षेत्रों में अविवाहित महिलाओं की तुलना में अधिक है।

 

नीतियों में महिला रोजगार की स्वीकार्यता को प्रोत्साहन मिले

 

विश्व बैंक के अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि केवल महिलाओं की शिक्षा और कौशल में वृद्धि से ही एफएलएफपी में वृद्धि नहीं होगी। लाभ तब तक नहीं होगा, जब तक कि महिलाओं (या पुरुष) के काम के बदले सामाजिक मानदंडों में भी बदलाव न हो। लाभ के लिए साथ ही इस बात पर भी गौर करना होगा कि ग्रामीण श्रम बाजारों में रोजगार के जिन रूपों की पेशकश होती है, वह महिलाओं और उनके परिवारों के लिए स्वीकार्य और आकर्षक हो।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं के रोजगार की स्वीकार्यता और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक क्षेत्रों में निवेश करने के लिए नीतियां चाहिए, जो महिला रोजगार के मामले में आकर्षक हों।

 

घर के पास नौकरियां महिलाओं आकर्षित करती हैं। 93 फीसदी बेरोजगार महिला युवाओं  ने कहा कि वे एक ऐसी नौकरी करना पंसद करेंगे जो घर या गांव के पास हो। यह आंकड़ा वर्ष 2015 में भोपाल के आसपास के क्षेत्रों में नीचे-गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले ग्रामीण युवाओं के बीच किए गए एक पायलट सर्वेक्षण के हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 8 मार्च 2016 को विस्तार से बताया है।

 

वेरिक ने वायर को दिए साक्षात्कार में बताया गया कि “आने वाले वर्षों के लिए वास्तविक परीक्षा यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार कैसे बढ़ाए जा सकते हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाएं उन तक पहुंच सकें। उस मामले में स्थानीय रोजगार सृजन सबसे महत्वपूर्ण बात है। आप  वहां अधिक नौकरियां सृजित करें, जहां अधिक महिलाएं हैं। अधिकांश आबादी अब भी ग्रामीण इलाकों में रहती है। भारत में 65 फीसदी लोग अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। ”

 

(साहा एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वह ससेक्स विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज़ संकाय से वर्ष 2016-17 के लिए जेंडर एवं डिवलपमेंट के लिए एमए के अभ्यर्थी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 04 मई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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