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पशुओं को सजाना या रंगना अब होगा गुनाह, नए पशु नियमों को लागू करने में कई चुनौतियां

श्रेया शाह,

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पशुओं के साथ क्रूरता और अवैध पशु व्यापार पर रोक लगाने नए पशु नियम जारी किए गए हैं। नए नियम में पशु चिकित्सकों की उपस्थिति के बिना पशुधन की सजावट, पहचान के लिए नाक या कान काटना अपराध की श्रेणी में आता है। लेकिन इंडियास्पेंड के विश्लेषण के अनुसार इन कानून को लागू करने में चुनौतियां का सामना करना पड़ सकता है।

 

23 मई, 2017 को पशु बाजारों के विनियमन और प्रबंधन के उद्देश्य से एक नई अधिसूचना ” पशु क्रूरता निवारण कानून-2017 ” जारी किया गया है। इसके तहत जानवरों की बिक्री और बिक्री के लिए इस्तेमाल किए जा रहे स्थान की निगरानी और विनियमित करने करने के लिए कृषि बाजार समितियों का निर्माण अनिवार्य है। नियम में पशुओं के साथ होने वाली ‘क्रूर और हानिकारक’ प्रथाओं जैसे शरीर के हिस्सों पर रसायनों का उपयोग, सींगो को काटना और रंगना, स्तनपान से बछड़े को रोकना जैसे कृत्यों पर पाबंदी लगाई गई है।

 

ये नियम बैल, बधिया, गाय, भैंस, बधिया बैल, बछिया, बछड़ों और ऊंटों पर लागू होते हैं। वर्ष 2012 के पशुधन जनगणना के आधार पर यह नया कानून भारत में लगभग 3000 लाख मवेशियों और उनके मालिकों को प्रभावित करेगा।

 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के एक सर्वेक्षण के मुताबिक जनवरी से जून 2013 के बीच ग्रामीण भारत में, 43.58 फीसदी परिवारों ने पशु पालने की सूचना दी थी। सर्वेक्षण में पाया गया कि भूमिहीन, सीमांत और छोटे किसान प्रति 1000 घरों पर क्रमश: 1,586, 1,518 और 2,575 पशुधन हैं।

 

भूमि रहित, सीमांत और लघु किसान भी पालते हैं मवेशी

Source: National Sample Survey Office

 

मवेशियों की पहचान के लिए कुछ प्रथाओं को प्रतिबंधित किया जाता है, कुछ विकल्प की होगी जरूरत

 

पशुओं के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था ‘पीपुल्स फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल’ (पेटा) के पब्लिक पॉलिसी से जुड़े निकुंज शर्मा कहते हैं, “इस नियम द्वारा पशु बाजारों में आम क्रूर प्रथाओं पर रोक लगेगी। इस कानून के पीछे मजबूत वैज्ञानिक आधार और पशुओं का कल्याण का लक्ष्य है। ”

 

ई-मेल के जरिए शर्मा ने इंडियास्पेंड को पशु क्रूरता के कई चेहरे बताए। उदाहरण के लिए, जानवरों की पहचान का एक तरीका ‘हॉट ब्रांडिंग’ है। इससे बाल स्थायी रुप से झड़ जाते हैं और त्वचा इतना जल जाता है कि निशान बन जाते हैं। सींग काटने और रंगने में रसायन का इस्तेमाल किया जाता है । इससे मवेशियों में कैंसर का खतरा बढ़ता है । गहने और सजावटी सामग्री डालने से बहुत अधिक परेशानी होती है और जानवरों को असुविधा होती है।

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध भारतीय किसान संघ के अध्यक्ष, प्रभाकर केलकर कहते हैं, “पशुओं पर हानिकारक रसायनों के इस्तेमाल को रोकना महत्वपूर्ण है जो उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। ”

 

उन्होंने उन नियमों का भी समर्थन किया जो जानवरों के बाजारों में उनके बेहतर इलाज को सुनिश्चित करेंगे और जहां अक्सर उन्हें पर्याप्त भोजन भी नहीं दिया जाता है।

 

नया नियम कहता है कि पशु बाजार में पशुओं के प्रभारी व्यक्ति को सुनिश्चित करना होगा कि पशुओं को किसी प्रकार का चोट न पहुंचे या मौसम के संपर्क में होने या अपर्याप्त वेंटिलेशन से पशुओं को अनावश्यक पीड़ा न सहना पड़े।

 

साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि जानवरों को किसी उपकरण से मारा न जाए और न ही नाक में रस्सियों के जरिए बांधा जाए । नियम के अनुसार अनुचित अवधि के लिए एक छोटी रस्सी से बांधना, पशुओं को प्यासा या भूखा रखना अपराध है।

 

लेकिन केलकर कहते हैं, “ इन प्रावधानों में से कुछ हास्यास्पद भी है। मवेशियों को सजाना क्रूरता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह दीवाली जैसे कुछ त्योहारों से संबंधित परंपरा है और यह पशु मालिक के प्रेम और स्नेह को दर्शाता है। जब मवेशियों को इतनी अच्छी तरह से सजाया जाता है, तो आप उन पालतू जानवरों की तस्वीर लेना पसंद करते हैं!”

 

केलकर इस नए नियम पर सवाल भी उठाते हैं, “ कुछ किसान मवेशियों की पहचान करने के लिए उन्हें रंगते हैं। यदि गांव में 1,000 मवेशी हैं तो किसी एक मवेशी के गुम होने पर उसकी पहचान कैसे हो पाएगी? यदि आप कहते हैं कि ये नहीं किया जाना चाहिए तो हमें आप एक विकल्प दें और हमें बताएं कि और क्या किया जा सकता है।”

 

केलकर इस नए नियम पर सवाल भी उठाते हैं, “ कुछ किसान मवेशियों की पहचान करने के लिए उन्हें रंगते हैं। यदि गांव में 1,000 मवेशी हैं तो किसी एक मवेशी के गुम होने पर उसकी पहचान कैसे हो पाएगी? यदि आप कहते हैं कि ये नहीं किया जाना चाहिए तो हमें आप एक विकल्प दें और हमें बताएं कि और क्या किया जा सकता है।”

 

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में आवश्यकता से अधिक पशु चिकित्सक हैं। आंकड़ों के मुताबिक 67,200 की तुलना में पंजीकृत पशु चिकित्सकों की संख्या 67,784 है। लेकिन वर्तमान में काम कर रहे पशुचिकित्सकों की संख्या अनुपलब्ध है।

केलकर कहते हैं, “पशु मालिकों को पशु चिकित्सक तक पहुंचने के लिए पैसा और समय चाहिए। ये नियम अव्यावहारिक हैं। कागज पर रहने से क्या फर्क पड़ेगा। क्या हमारे पास ऐसा सब कुछ करने के लिए सिस्टम है? “

 

निषिद्ध प्रथाएं: नए नियम और जानवरों के लिए क्रूरता अधिनियम- 1960

Prohibited Practices: New Rules and The Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960
New Rules Added to the old law The 1960 law
Prohibited Practices That Are Cruel And Harmful Makes it a punishable offence if a person
Animal identification methods such as hot and cold branding Beats, kicks, over-rides, over-drives, over-loads, tortures or otherwise treats any animal so as to subject it to unnecessary pain or suffering or causes, or being the owner permits, any animal to be so treated
Shearing and painting of horns (Employs in any work or labour or for any purpose any animal which, by reason of its age or any disease) infirmity; wound, sore or other cause, is unfit to be so employed or, being the owner, permits any such unfit animal to be employed
Bishoping in horses and ear cutting in buffaloes Wilfully and unreasonably administers any injurious drug or injurious substance to (any animal) or wilfully and unreasonably causes or attempts to cause any such drug or substance to be taken
Casting animals on hard ground without adequate bedding during farriery Conveys or carries, whether in or upon any vehicle or not, any animal in such a manner or position as to subject it to unnecessary pain or suffering
Use of any chemicals or colours on body parts of animals Keeps or confines any animal in any cage or other receptacle which does not measure sufficiently in height, length and breadth to permit the animal a reasonable opportunity for movement
Sealing teats of the udder using any material such as adhesive tapes to prevent the calf from suckling Keeps for an unreasonable time any animal chained or tethered upon an unreasonably short or unreasonably heavy chain or cord
Any person forcefully drenching any fluids or liquids or using steroids or diuretics or antibiotics, other than by a veterinarian for the purpose of treatment Being the owner, neglects to exercise or cause to be exercised reasonably any dog habitually chained up or kept in close confinement
Forcing animals to perform any unnatural acts, such as dancing Being the owner of (any animal) fails to provide such animal with sufficient food, drink or shelter
Putting any ornaments or decorative materials on animals And more
Use of any type of muzzle to prevent animals from suckling or eating food But the Act specifies that:
Injecting Oxytocin into milch animals Nothing in this section shall apply to – (a) the dehorning of cattle, or the castration or branding or noseroping of any animal in the prescribed manner, or (b) the destruction of stray dogs in lethal chambers 20[by such other methods as may be prescribed] or (c) the extermination or destruction of any animal under the authority of any law for the time being in force; or items that come under section IV on “EXPERIMENTATION OF ANIMALS”
Castration of animals by quacks or traditional healers The commission or omission of any act in the course of the destruction or the preparation for destruction of any animal as food for mankind unless such destruction or preparation was accompanied by the infliction of unnecessary pain or suffering
Nose-cutting or ear slitting or cutting by knife or hot iron marking for identification purposes other than by veterinarian
Castration of equines by quacks
Tying rope around penis
Tying nose bags as feeding troughs

Source: Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 and Prevention of Cruelty to Animals (Regulation of Livestock Markets) Rules

 

“ हालात को बदलने का एकमात्र तरीका कानून बनाना और उम्मीद कि राज्य इसे अपनाए ”

 

वकील और भारत में ह्यूमैन सोसाइटी इंटरनेशनल के प्रबंध निदेशक, नुग्घहल्ली जयसिंह्मा कहते हैं, “कानूनों का नवीनीकरण करने या नया कानून बनाने के संबंध में सरकारी निष्क्रयता किसी से छिपी नहीं है। वर्ष 2001 में अंतिम बार इस कानून का नवीनीकरण किया गया था।”

 

जयसिंह आगे बताते हैं,”जब हम मसौदे लिख रहे थे, हमने सोचा था कि हमें इसे प्रगतिशील बनाना चाहिए, ऐसा कानून कतई नहीं जो जल्द ही अप्रचलित हो जाए।”

 

जयसिम्हा आगे कहते हैं, “भारत में चीजों को बदलने का एकमात्र तरीका कानून बनाना है और हमें यह उम्मीद होती है कि बुनियादी ढांचे और राज्य की मशीनरी उसे अपना ले। हम सही हैं या गलत, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।”

 

पशु बाजारों को नियंत्रित और विनियमित करने के लिए दो नई समितियां गठित

 

पशु क्रूरता अधिनियम – 1960 में पहले से ही अनिवार्य रूप से मौजूद राज्य पशु कल्याण बोर्ड के अलावा नए नियम में दो नई समितियों के निर्माण की बात की गई है। एक पशु बाजार का विनियमन और दूसरा उसका प्रबंधन।

 

जिला पशु बाजार की निगरानी समिति अन्य बातों के अलावा यह  सुनिश्चित करेगी कि कोई भी पशु बाजार तब तक पंजीकृत न हो, जब तक कि वहां पर्याप्त बिजली, छाया, प्रकाश व्यवस्था, शौचालय, गैर-फिसलन फर्श जैसी सुविधाएं न हो।

 

हम बता दें कि इसके सदस्य जिला कलेक्टर या मजिस्ट्रेट, प्रमुख पशु चिकित्सा अधिकारी, न्यायिक विभागीय वन कार्यालय, पशु कल्याण संगठनों के दो प्रतिनिधि और सोसाइटी फॉर प्रेवेंशन ऑफ क्रूएलीटी टू एनीमल्स ( एसपीसीए ) के प्रतिनिधि होंगे।

 

दूसरी समिति, जिसे पशु बाजार समिति कहा जाता है, उसमें स्थानीय प्राधिकरण के अध्यक्ष,  मुख्य नगरपालिका अधिकारी, एक तहसीलदार सदस्य, क्षेत्राधिकार नीति निरीक्षक, एक पशु चिकित्सा अधिकारी, एसपीसीए के एक प्रतिनिधि और पशु कल्याण संगठन के दो प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति ‘बाजार का रखरखाव या वहां निश्चित सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए और जानवरों के कल्याण ’ को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होगी ।

 

पेटा के शर्मा कहते हैं, “इस नियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए, इन दोनों समितियों को कुशलता से काम करना होगा।”

 

यह नियम राज्य बोर्ड और स्थानीय समितियों को किसी भी समय किसी भी बाजार में प्रवेश करने के लिए सशक्त बनाते हैं। इसके साथ ही वे बाजार के संबंध में किसी भी व्यक्ति से किसी भी रिकॉर्ड के लिए पूछ सकते हैं। किसी भी जानवर  का क्रूरता के साथ इलाज करने के गुनाह पर उन्हें जब्त कर सकते हैं और जानवरों की क्रूरता के सबूत के लिए फोटो और वीडियो ले सकते हैं।

 

वैकल्पिक कानून फोरम जुड़े वकील दर्शन मित्रा कहते हैं, “समिति द्वारा नियमों का कुछ दुरुपयोग हो सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि कानून कैसे कार्यान्वित होगा।  इसके अलावा, पशु बाजारों के पैमाने और विविधता से उन्हें विनियमित करना और बाजार की निगरानी करना कठिन हो सकता है।”

 

जयसिम्हा कहते हैं, “निर्वाचित प्रतिनिधियों की मौजूदगी और विभिन्न विभागों के सदस्य इस आशंका को कम कर देते हैं कि उनमें से कोई भी कानून का दुरुपयोग कर सकता है। ”

 

कानून की संवैधानिकता पर सवाल

 

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम-1960 के तहत लाए गए नए नियमों पर केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में तीखा विरोध देखने को मिला है। नए नियमों के खिलाफ याचिका दायर की गई है। तमिलनाडु हाईकोर्ट  ने केंद्र सरकार के नए नियमों पर रोक लगा दी है। जैसा कि फाइनैन्शल एक्सप्रेस के इस लेख में बताया गया है। मित्रा कहते हैं, “केंद्र को पशुधन बाजारों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है। यह एक राज्य का विषय है।”

 

जयसिम्हा बताते हैं कि जानवरों के खिलाफ क्रूरता की रोकथाम समवर्ती सूची के अंतर्गत आता है, और जैसा कि नई अधिसूचना के तहत सभी नियम क्रूरता की रोकथाम से संबंधित हैं  और वे राज्य के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करते हैं।

 

‘नया कानून बड़े बूचड़खानों और बड़े बाजारों पर दबाव बनाने के लिए है, गांव के बाजार के लिए नही।’

 

सरकार ने कहा कि नए दिशानिर्देश एक पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलखी द्वारा दायर एक मामले में पारित किए गए एक उच्चतम न्यायालय के आदेश पर आधारित हैं। यह दिशा-निर्देश भारत में तस्करी कर नेपाल में आयोजित गधिमी महोत्सव के लिए पशु बलि देने के रोकथाम के लिए तैयार किए गए हैं।

 

ह्यूमन सोसाइटी इंटरनेशनल के जयसिम्हा कहते हैं, “इन जानवरों को अगर पुलिस या सीमा सुरक्षा बल द्वारा रोका जाता है तो किसी को नहीं पता होता है कि आखिर करना क्या है? क्योंकि जानवरों की देखभाल सुरक्षा बलों की भूमिका नहीं है। जयसिम्हा भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के सदस्य के हिस्से के रूप में नियमों के प्रारूप तैयार करने में भी शामिल थे- “इस समस्या का समाधान पशुधन बाजारों को विनियमित करने में है।”

 

जयसिम्हा  आगे कहते हैं- “ कानून का मुख्य उद्देश्य बड़े बूचड़खानों पर दबाव बनाना है। ऐसे बाजारों पर रोक लगाना है, जहां जानवरों का दुरुपयोग होता है, उनके साथ क्रूरता होती है।

 

(शाह रिपोर्टर / लेखक हैं और इंडियास्पेंड से साथ जुड़ी हैं। इस आलेख के लिए ‘सिम्बॉयसिस सेंटर फॉर मीडिया एंड कम्युनिकेशन’ से जुड़े डेल्ना इब्राहीम ने भी योगदान किया है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 02 जून 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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