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पाकिस्तान के भूजल में मिले आर्सनिक से भारत की चिंता बढ़ी

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बाएं: पाकिस्तान में कुओं के परीक्षण से पता चला है कि वे आर्सेनिक से दूषित होते जा रहे हैं। यह नक्शा पाकिस्तानी पंजाब में सिंधु घाटी और इसके उपनगरीय इलाकों में भूजल में आर्सेनिक के स्तर को दर्शाता है, जहां लगभग 5 से 6 करोड़ लोगों पर संभवत:  आर्सेनिक-प्रदूषण का खतरा है। ‘ईवाग-स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ एक्वाटिक साइंस एंड टेक्नोलॉजी, ने इस अध्ययन की शुरुआत की है।
दाएं : यह नक्शा पाकिस्तान में बढ़े आर्सेनिक सांद्रता की संभावना को दर्शाता है। यह नक्शा पाकिस्तान की सीमा से लगे लगे भारत के कई हिस्सों में खासकर भारतीय पंजाब में कुओं के परीक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। हाल ही के एक अध्ययन में पाया गया कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का आर्सेनिक-दूषित भूजल भारत के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को भी प्रभावित कर सकता है।

 

‘ईवाग -स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ एक्वाटिक साइंस एंड टेक्नोलॉजी’, में भूजल मूल्यांकन समिति परियोजना समन्वयक, जोएल पॉडॉर्स्की कहते हैं, “ उच्च जोखिम का क्षेत्र सीमा तक फैला है, इसलिए खतरा भारतीय पंजाब में भी है। ” जोएल पॉडॉर्स्की इस अध्ययन के प्रमुख लेखक हैं।

 

यह अध्ययन दो प्रतिनिधि मानचित्रों में पाकिस्तान में आर्सेनिक के केंद्र को दर्शाता है। यह भूजल परीक्षण में आर्सेनिक का स्तर और यह पाकिस्तान भर में आर्सेनिक की बढ़ती सांद्रता की संभावना को दिखाता है।

 

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (डब्ल्यूएचओ) द्वारा सार्वजनिक स्वास्थ्य की चिंता के रूप में वर्गीकृत 10 रसायनों में से एक आर्सेनिक है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि धीरे-धीरे शरीर में आर्सेनिक फैलता है, जिससे त्वचा का नुकसान, परिधीय तंत्रिकाओं, जठरांत्र संबंधी बीमारियां, मधुमेह, गुर्दे की विषाक्तता, हृदय रोग और कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।

 

इस नए तथ्य के सामने आने के बाद, दुनिया भर में आर्सेनिक-दूषित जल से प्रभावित लोगों की संख्या में लगभग एक-तिहाई की वृद्धि हुई है। यह संख्या 15 करोड़ से बढ़ कर 20 करोड़ हुई है। अब तक आर्सेनिक प्रदूषण के खतरे से जूझ रहे लोगों में कम से कम आधे बांग्लादेश और भारत (पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, असम, मणिपुर और छत्तीसगढ़) के गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में रहते हैं।

 

पंजाब का कैंसर संकट और आर्सेनिक

 

हाल के वर्षों में, भारत को आर्सेनिक और भारी धातुओं जैसे यूरेनियम और पारा के साथ पंजाब के जलवाही स्तरों के प्रदूषित होने की जानकारी मिली है। यह संकेतक दक्षिण पश्चिम पंजाब के उपजाऊ मालवा क्षेत्र में कैंसर के मामलों में खतरनाक वृद्धि दर्शाते हैं, जिसमें मनसा, फरीदकोट, मोगा और अन्य जिले भी शामिल हैं।

 

पंजाब में वर्ष 2007 के एक क्षेत्रीय भूजल अध्ययन में, आर्द्रिक पश्चिमी क्षेत्र के जलवाही स्तर से लिया गया हरेक नमूने में आर्सेनिक एकाग्रता  डब्ल्यूएचओ द्वारा पीने के पानी के लिए निर्धारित 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर (µg/l) से अधिक थी।

 

आर्सेनिक सांद्रता 11.4 µg/l  से  688 µg/l और औसतन 76.8 μg / l थी, जो भारत के केन्द्रीय भूजल बोर्ड द्वारा पीने के पानी के लिए निर्धारित ऊपरी अनुमेय सीमा (50 µg/l) से 53 फीसदी अधिक है।

 

पंजाब के अन्य हिस्सों में शामिल दो अन्य क्षेत्रों में 23.4μg / l और 24.1μg / l औसत आर्सेनिक सांद्रता थी, लेकिन पीने के प्रयोजनों के लिए पानी की गुणवत्ता में शायद ही बेहतर प्रदर्शन था। उन क्षेत्रों से केवल 3 फीसदी और 1 फीसदी नमूने डब्लूएचओ द्वारा निर्धारित सुरक्षित मानदंड के अनुसार थे।

 

लेकिन पंजाब के केंद्रीय भूजल बोर्ड के राज्य भूजल प्रोफाइल में आर्सेनिक प्रदूषण के लिए चिंता के क्षेत्रों में अमृतसर, तरण तारण, कपूरथला, रोपीर और मानसा को सूचीबद्ध किया गया है। इसलिए पॉडगॉर्स्की का अध्ययन महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें राज्य के दूसरे हिस्सों में भूजल का सावधानी पूर्वक निगरानी के लिए दबाव और सुरक्षित पीने के पानी के अभियानों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है।

 

पॉडगॉर्स्की का मानना है कि कुएं के पानी के नमूनों का परीक्षण करना ही यह जानने का एकमात्र तरीका है कि पाकिस्तान या भारत के कौन से क्षेत्र प्रभावित हैं।

 

रोकथाम महत्वपूर्ण है – स्थायी विषाक्तता का कोई इलाज नहीं

 

मानव गतिविधियों के कारण होने वाले आर्सेनिक प्रदूषण के स्रोत को नियंत्रित करना, मनुष्यों या पर्यावरण में आर्सेनिक प्रदूषण का समाधान करने की कोशिश करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है, जैसा कि अमृतसर के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर सरोज अरोड़ा कहते हैं।

 

प्रोफेसर सरोज ने पंजाब में आर्सेनिक प्रदूषण का अध्ययन किया है। गंभीर आर्सेनिकोसा या आर्सेनिक विषाक्तता का कोई इलाज नहीं है, हालांकि स्वच्छ पानी में परिवर्तन करने से आर्सेनिक से होने वाले त्वचा विकारों को सुधारा जा सकता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल सरकार के लिए आर्सेनिक पर टास्क फोर्स की कोर कमेटी के एक सदस्य देबेदरनाथ गुहा मजूमदार बताते हैं।

 

असम के जोरहाट जिले के एक गांव कछारी के एक छोटे ठेकेदार, चाय उत्पादक और पंचायत के सदस्य टोफिजुल अली का उदाहरण लें। अली बार-बार गैस्ट्रिक दर्द से पीड़ित थे, जो आर्सेनिक संक्रमण का एक प्रारंभिक लक्षण है। अपने परिवार या गांव में अकेले अली ही पीड़ित नहीं हैं। मेलामती सरकार के स्कूल में पढ़ाई करने वाली उनकी बेटी और कई अन्य बच्चे इसी तरह के लक्षणों के साथ बीमार हैं। स्कूल के हेडमास्टर अनंत खानकर ने जब एक स्थानीय इंजीनियर और आर्सेनिक नॉलेज एंड एक्शन नेटवर्क की मदद से इस मामले की जांच की तो उन्होंने पाया कि उनके विद्यार्थियों और कई ग्रामवासियों ने ट्यूबवेल का पानी पी रहे थे और आर्सेनिक से दूषित हो गए थे।

 

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असम के जोरहाट जिले के एक गांव कछारी के छोटे से ठेकेदार, चाय उत्पादक और पंचायत के सदस्य 39 वर्षीय टोफिजुल अली गैस्ट्रिक पीड़ा से ग्रसित हैं, जो आर्सेनिक संक्रमण का एक प्रारंभिक लक्षण है। उनकी बेटी को भी यही समस्या थी। उन्होंने एक डॉक्टर से संपर्क किया । उन्होंने दवा ली लेकिन दर्द तब तक जारी रहा, जब तक कि उन्होंने पीने का पानी नहीं बदला। आर्सेनिक विषाक्तता का कोई इलाज नहीं है।

 

वर्ष 2012 में अलि ने वर्षा का पानी पीना शुरु किया औऱ जल्द ही वे और उनकी बेटी इस बीमारी से बाहर आ गए।

 

अली ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा, “एक डॉक्टर ने हमारे दर्द का इलाज किया था, लेकिन फायदा नहीं हुआ। जब मैंने फसल के लिए इक्ट्ठा किए वर्षा का पानी पीना शुरु किया तो उसके बाद 3 से 4 महीनों में ही हमें काफी आराम मिला।”

 

जोरहट भारत के उन कई जिलों में से एक है, जहां लोग यह नहीं जानते कि उन्हें धीरे-धीरे आर्सेनिक से जहर मिल रहा है।

 

अरोड़ा के अनुसार, एक उच्च प्रोटीन आहार और सेलेनियम, विटामिन (ए, बी कॉम्प्लेक्स, सी, ई) और एंटीऑक्सिडेंट अनुपूरण आर्सेनिक के प्रभाव से हुए त्वचा विकार को तेजी से सुधार सकता है।

 

भोजन श्रृंखला में आर्सेनिक

 

बैक्टीरिया से ग्रसित पानी की सतह ने 1970 में बांग्लादेश को पानी के प्रयोजनों के लिए ट्यूबवेल की स्थापना के लिए प्रेरित किया गया था।

 

पश्चिम बंगाल में इसी तरह के कदम के बाद भारत में आर्सेनिक विषाक्तता का पहला ज्ञात मामला सामने आया। 1983 में कोलकाता में एक शख्स  त्वचा के विकार से ग्रसित हो गया था।

 

लेकिन अरोड़ा कहते हैं कि, अगर आप सिर्फ पीने के पानी को शुद्ध करते हैं, और आर्सेनिक वाले भूजल का इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है, जो खाद्य श्रृंखला में अपना रास्ता बना सकता है।

 

पंजाब में, भूजल में आर्सेनिक के लिए कीटनाशकों, उर्वरक और कृषि-रसायनों और उर्जा संयंत्रों जैसे कृषि संबंधी इनपुट भी दोषी ठहराए गए हैं। अरोड़ा कहते हैं कि औद्योगिक कृषि क्षेत्रों में सुरक्षित कृषि-रसायनों और कड़े नियंत्रण के बारे में किसानों को शिक्षित करने के लिए जागरूकता अभियान की जरुरत है।

 

कुएं को गहरा खोदना समाधान नहीं

 

एन्वाइरन्मन्ट एशिया, जुलाई 2017 और फ्रंटियर ऑफ एनवाइरन्मन्ट साइंस, 2014 जैसे अध्ययनों में पाया गया है कि गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटियों में कम गहरे सतह ( जमीन में लगभग 12 मीटर से 35 मीटर नीचे ) से निकलने वाले पानी के नमूनों में आर्सेनिक की उच्च सांद्रता मिली है। अनिवार्य रूप से, उन घाटियों में गहरे कुएं से साफ और सुरक्षित पानी पा सकते हैं, लेकिन पर्यावरण के परिप्रेक्ष्य से इसे गहरा खोदना उचित नहीं है।

 

मुंबई के ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज’, ‘जमशेदजी टाटा स्कूल ऑफ़ डिस्टरटरी स्टडीज’, ‘सेंटर फॉर जिओनफॉरमैटिक’ के अध्यक्ष और ‘फोर्मेन्शन्ड फ्रंटियर इन्वाइरन्मेनल स्टडी’ के सह-लेखक गुरु बालामुर्गन कहते हैं, “भूजल प्रणालियों का सही ढंग से हम इस्तेमाल नहीं कर पाते , क्योंकि अलग-अलग तलछटी परतों के गठन के कारण भूजल तक बारिश के पानी का सीधा भराव नहीं होता है। ”

 

कुएं को गहरा खोदना पाकिस्तान में एक अस्थायी समाधान भी नहीं है। पॉडगॉर्स्की कहते हैं, “पाकिस्तान में आर्सेनिक समस्या एक अलग भौगोलिक वातावरण में है। उदाहरण के लिए, आर्सेनिक मुक्त पानी तक पहुंचने के लिए गहरी खुदाई ठोस रास्ता नहीं है। लेकिन इसके लिए आगे जांच की जरूरत है। ”

 

आर्सेनिक युक्त पानी को शुद्ध करना बंगाल बेसिन की तुलना में पंजाब में आसान

 

असम और बिहार में, कुछ समुदायों ने पानी शुद्ध करने के लिए लकड़ी का कोयला, ईंट और रेत की परतों से बने पारंपरिक फिल्टर का उपयोग किया है।

 

बिहार के पश्चिम चंपारन में अपने अध्ययन के अनुभव के बालमुरुग्न कहते हैं, “हमने यह दिलचस्प तथ्य पाया। फिल्टर में लकड़ी का कोयला कुछ आर्सेनिक को अवशोषित कर लेता है। लेकिन आर्सेनिक को हटाने के लिए फिल्टर की क्षमता  समय-समय पर परिवर्तित होने वाले कोयला पर निर्भर है।”

 

पूरे समुदायों की सुरक्षा के लिए एक बड़ी मात्रा में पानी फिल्टर करने के लिए प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होगी।गुहा मजूमदार कहते हैं कि कई प्रौद्योगिकियां मौजूद हैं, जो कि आर्सेनिक को भूजल से हटाने के लिए हाथ पंप ट्यूबवेल या बड़े व्यास टयूबवेल से जुड़े सामुदायिक संयंत्र के साथ जोड़ी जा सकती है। वह कहते हैं, “इन तकनीकों के आधार पर घरेलू फ़िल्टर भी विकसित किए जा सकते हैं।”

 

इसलिए, वह कम लागत वाले फिल्टर जैसे बांग्लादेश में इस्तेमाल किए जाने वाले सोनो घरेलू फिल्टर का अनुमान लगाते हैं। अनुमानतः केवल 35 डॉलर की लागत से लोगों को वहां मदद मिल सकती है।

 

भारतीय वैज्ञानिकों ने भी कम लागत वाली आर्सेनिक फिल्टर विकसित किया है, जो कि अभी तक पश्चिम बंगाल में सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया है। जाहिर है, लाखों की अब भी ज़रूरत है।

 

इंडियास्पेंड के समाधान

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नोट – लीड इमेज के नक्शे अमेरिका के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किए गए थे और वे भारत की सीमाओं का उस तरह से वर्णन नहीं करते जैसा कि भारत उन्हें दर्शाता है।

 

(बाहरी स्वतंत्र पत्रकार और संपादक हैं और राजस्थान के माउंटआबू में रहती हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 14 सितंबर 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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