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पिछले आठ वर्षों में मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा बाघों की मौत

हरिकृष्णन भास्करन और गीता कश्यप,

 

धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश: पिछले आठ वर्षों में, मध्य भारतीय राज्यों, विशेष रुप से महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में होने वाली बाघों की मौत भारत के बाघ संरक्षण प्रयासों के लिए एक झटका हो सकता है।

 

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण एजेंसी (एनटीसीए), टाइगरनेट द्वारा बाघों की मृत्यु के आंकड़ों के अनुसार,  वर्ष 2009 और 2017 के बीच, भारत में 631 बाघों की मौत हुई। इनमें से, सबसे ज्यादा संख्या ( 133 मौतें – 21.1 फीसदी) ) मध्य प्रदेश में दर्ज की गई, जो देश में कुल बाघों की संख्या 2,226 का 13.8 फीसदी है।

 

पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र, जहां कम से कम बाघों के लिए तीन संरक्षित क्षेत्र हैं,  वहां इसी अवधि में कुल बाघों की मौत का 14.4 फीसदी दर्ज किया गया है। 2014 के जनगणना के आंकड़ों में राज्य में भारत में कुल बाघों का 8.5 फीसदी दर्ज किया गया है।

 

100 बाघों की मौत (15.8 फीसदी) के साथ कर्नाटक सूची में दूसरे स्थान पर है। हालांकि, राज्य देश में कुल बाघों की आबादी में 18.2 फीसदी योगदान देता है, जो रिपोर्ट में दर्ज मौतों के अनुपात के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन करता है।

 

2009-2017 के दौरान भारत में बाघों की संख्या और मौत

Source: Tigernet, 2014 Tiger Census

 

दुनिया भर में बाघ के संरक्षण प्रयासों में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है। 13 देशों में, जो जंगली बाघों की प्रजनन आबादी की रक्षा करता है, इनमें से दुनिया के बाघों में से 57 फीसदी भारत में हैं (कुछ अनुमानों के मुताबिक)। टाइगर रेंज (टीआरसी) के देशों 2022 तक दुनिया के बाघों की संख्या को दोगुना करने का वादा किया है। चीनी कैलेंडर में 2022 को बाघ का वर्ष माना गया है।

 

शिवालिक-गंगा मैदान के अधिकांश क्षेत्र प्रभावित

 

एनटीसीए द्वारा किए गए मानक आबादी निगरानी प्रक्रिया और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्लूआईआई) जैसे अनुसंधान निकायों की सहायता से हर चार वर्ष में देश को बाघों के निवास स्थान की प्रकृति और भौगोलिक स्थितियों के आधार पर छह प्रमुख परिदृश्य परिसरों में विभाजित किया जाता है। इनमें से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश शिवलिक-गंगा परिसर में आते हैं, जिसमें मध्य भारतीय इलाका और पूर्वी घाट आते हैं।

 

इस क्षेत्र में 688 बाघ थे, जो 2014 में जनगणना के अनुसार भारत में अनुमानित कुल बाघों की संख्या का 31 फीसदी था। कुल मिलाकर, इस परिदृश्य के लिए बाघ की मृत्यु दर आठ साल की अवधि के लिए 249 है, लगभग 39 फीसदी। हालांकि, शिवालिक-गंगा के मैदानी इलाकों में 91 फीसदी मृत्यु मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में ही दर्ज की गई है जबकि वे इलाके बाघों की कुल संख्या में 72 फीसदी योगदान करते हैं।

 

पश्चिमी घाट लैंडस्केप कॉम्प्लेक्स, जो कि भारत में कुल बाघों की संख्या का 776 (34 फीसदी) को शरण देता है, उनमें कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और गोवा शामिल हैं। इसी अवधि में यहां 277 मृत्यु दर्ज की गई है, जो कुल बाघों की मौत का 28 फीसदी है। इस मृत्यु दर में कर्नाटक का हिस्सा 57 फीसदी (100 मौत) है, जबकि यह क्षेत्र कुल बाघ आबादी में 56 फीसदी योगदान देता है।

 

बाघ की मौत में शिकार एक प्रमुख कारण

 

इस अवधि के दौरान रिपोर्ट की गई 50 फीसदी से अधिक घटनाओं के लिए टाइगरनेट डेटा मृत्यु के किसी भी कारण की पुष्टि नहीं करता है। हालांकि, जिन मामलों में एक निश्चित कारण है, वह बाघ का शिकार है।

 

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र 18 और 17 मामलों के साथ सूचि में शीर्ष स्थान पर हैं। 13 मौतों के साथ कर्नाटक तीसरे स्थान पर है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र भी ऐसे मामलों की सूची में शीर्ष स्थान पर हैं, जहां वन्यजीव तस्करों से बाघों के अंगों को जब्त किया गया था। 2009 के बाद से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में क्रमश: 18 और 17 ऐसी घटनाएं दर्ज की गई हैं।

 

हालांकि, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि ये भारतीय राज्य शिकार आकर्षण के केंद्र हैं।  यदि हम कुल मौतों के संबंध में शिकार से होने वाले मौतों पर विचार करते हैं तो 19 फीसदी के साथ उत्तर प्रदेश सबसे शीर्ष पर है। महाराष्ट्र के लिए ये आंकड़े 18 फीसदी और केरल के लिए 16 फीसदी हैं। कर्नाटक के लिए ये आंकड़े 13 हैं, लेकिन यह मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के बाद तीसरे स्थान पर है, क्योंकि यहां बाघों के अंगों की बरामदगी की 15 घटनाएं दर्ज हैं।

 

अब केवल 6 फीसदी बाघ अपने मूल निवास स्थान पर

 

दुनिया के कई हिस्सों तस्करी और शिकार किए जाने वाले बाघों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) द्वारा इसे लुप्तप्राय जानवर के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। खतरनाक प्रजातियों की आईयूसीएन लाल सूची के अनुसार, बाघ अब अपने मूल निवास स्थान में से केवल 6 फीसदी में निवास करते हैं। 2006 के बाद से इन निवासों में उनकी आबादी 40 फीसदी कम हो गई है।

 

इस गिरावट का ज्यादातर कारण मानव आबादी में वृद्धि और बाघ के इलाकों में अतिक्रमण है। पिछले 8 वर्षों के टाइगरनेट आंकड़ों से पता चलता है कि 328 घटनाओं में, जहां मौत के कारण की पुष्टि हुई है, उनमें से 114 मामले मानव हस्तक्षेप के कारण हुई है- शिकार, सड़क दुर्घटना, और अधिकारियों या अन्य किसी के द्वारा बाघों को हानि पहुंचाने की घटनाएं शामिल हैं।

 

ये आंकड़े टाइगरनेट डेटा पर आधारित हैं लेकिन एक वैश्विक संगठन ‘ट्रैफिक’ ने बताया है कि डेटाबेस हमेशा रिपोर्ट किए गए घटनाओं के अनुसार मृत्यु दर या जब्ती के आंकड़े दर्ज नहीं करता है। इससे पता चलता है कि वास्तविक आंकड़े और भी बदतर हो सकते हैं।

 

वर्ष 2018 के लिए चल रहे बाघ गणना के  बाद अद्यतन आंकड़ों के सामने आने की उम्मीद है। उनकी संख्या की निगरानी के नए तरीकों को अपनाने और उन क्षेत्रों को शामिल करने के साथ, जो अभी तक अभ्यास का हिस्सा नहीं थे, यह संकेत देते हैं कि नवीनतम गणना बाघों की आबादी के आंकड़ों की संख्या में वृद्धि दिखा सकती है। यह धारणा उत्तर-पूर्वी राज्यों से अपेक्षित जानकारी पर आधारित है। पिछली गणना में, उत्तर-पूर्व में ठीक से नमूना नहीं किया गया था।

 

इस बार, 14,000 अत्याधुनिक कैमरे अधिक सटीकता के लिए उपयोग किए जा रहे हैं, जिसमें बाघ पग के आधार पर सर्वेक्षण से जुड़े आंकड़ों और कैमरे की तस्वीरों के माध्यम से आए आंकड़ों के साथ मिलान भी शामिल है। चूंकि इस समय 4,300 अधिक कैमरे का इस्तेमाल किया जा रहा है तो कुल संख्या बढ़ने की उम्मीद है।

 

पिछले 2014 के बाघ गणना में भी 2010 के आंकड़ों के मुकाबले 30 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई थी।

 

(भास्करन सहायक प्रोफेसर हैं और कश्यप सेंट्रल  यूनवर्सिटी ऑफ हिमाचल प्रदेश के ‘स्कूल ऑफ जर्नलिज़म, मास कम्युनिकेशन एंड न्यू मीडिया’ में रिसर्च स्कॉलर हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 17 मार्च 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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