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पिछले 2 वर्षों में प्रतिदिन 5,616 भारतीय बने गुलाम

श्रेया मित्तल एवं सुकन्या भट्टाचार्य,

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श्रम विभाग, नई दिल्ली और गैर सरकारी संगठन द्वारा संयुक्त आपरेशन में छुड़ाया गया एक बाल मजदूर। एक नए रिपोर्ट के अनुसार, औसतन, हरेक 100 भारतीयों में से 51 “आधुनिक गुलामी” की चपेट में हैं।

 

“इस तरह के दर्दनाक जीवन की कोई कल्पना नहीं कर सकता है। मुझ पर अत्यधिक यातना की गई है। किसी बच्चे की तरह छोटी से छोटी गलती के लिए मुझे सज़ा दी जाती है। मेरा परिवार हमेशा दहशत में जीता है। मैं और मेरे परिवार शारीरिक हिंसा का भी शिकार हैं।”

-सर्वेक्षण का एक उत्तरदाता,भारत राज्य सर्वेक्षण, ग्लोबल गुलामी सूचकांक, 2016

 

एक नए वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में कम से कम 18.3 मिलियन या 1.83 करोड़ भारतीय ऐसी परिस्थिति में रहते हैं जिसे ‘आधुनिक गुलामी’ के नाम से सूचिबद्ध किया गया है। यह आंकड़े नीदरलैंड की आबादी के बराबर है एवं 2014 से इन आंकड़ों में 4.1 मिलियन या 0.41 करोड़ की वृद्धि हुई है। यदि दूसरे शब्दों में कहा जाए इन दो वर्षों में प्रतिदिन 5,616 भारतीयों को गुलाम बनाया गया है।

 

ऑस्ट्रेलिया स्थित, वॉक फ्री फाउंडेशन संस्था द्वारा संकलित वैश्विक गुलामी सूचकांक 2016 के अनुसार, भारत में औसतन 100 में से 50 लोग आधुनिक गुलामी की चपेट में हैं। इनमें बंधुआ मजदूरी, जबरन भीख, जबरन शादी, घरेलू सेवाएं और व्यावसायिक यौन काम शामिल है।

 

गुलाम बन कर रहने की परिस्थिति के संबंध में भारत चौथे स्थान पर है। पहले तीन स्थानों पर उत्तर कोरिया, उज्बेकिस्तान और कंबोडिया है। रिपोर्ट कहती है कि, 2014 में आधुनिक गुलामी में भारत पांचवे स्थान पर था जिसने अब कतर के साथ अपना स्थान बदला है।

 

वैश्विक गुलामी सूचकांक 2016 रिपोर्ट कहती है कि, “शब्द आधुनिक गुलामी ऐसी परिस्थिति को बयान करता है जहां एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता को छीन लेता है। ऐसी परिस्थिति में किसी व्यक्ति के शरीर को नियंत्रित करने की स्वतंत्रता, चयन करने की स्वतंत्रता, कुछ काम करने से मना करना या काम बंद कराना ताकि उनका शोषण किया जा सके शामिल हे। यह स्वतंत्रता धमकियों, हिंसा, बलात्कार, बल का दुरुपयोग एवं धोखे के ज़रिए छीना जाता है।”

 

आधुनिक गुलामी की परिस्थिति के तहत रहने वाले लोगों की संख्या एशिया प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक है; इस क्षेत्र से मानव तस्करी के लगभग 46 फीसदी मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें से 83 फीसदी पीड़ित पुरुष हैं, जबकि 17 फीसदी महिलाएं हैं।

 

जबरन एवं बाल विवाह के मामले सबसे अधिक भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल और इंडोनेशिया में दर्ज किए गए हैं। लिंग-अनुपात असंतुलन से, जिसके परिणामस्वरुप भारत में दुल्हनों का अभाव हुआ है, महिलाओं की तस्करी एवं जबरन विवाह के मामलों में वृद्धि हुई है।

 

भारत में आर्थिक समृद्धि के साथ यौन गुलामी में वृद्धि हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है।

 

आधुनिक गुलामी के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक प्रकृति का प्रभाव अतिसंवेदशीलता और खातो पर पड़ता है जो आर्थिक, लिंग और जाति असमानताओं से संबंधित है, जैसा कि इस साल मई 2016 की इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है।

 

माओवादी हिंसा से प्रभावित राज्यों में, जैसे कि बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में, छह और 12 वर्ष की उम्र के बीच लड़कों और लड़कियों की भर्ती बच्चों की इकाइयों में की गई थी, जैसा कि इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है।

 

भारत में आधुनिक गुलामी के निम्नलिखित तरीके हैं:

 

बंधुआ मजदूर : भारत में अब भी इस परंपरा का मुख्य कारण कर्ज है और पूरे परिवार पर शारीरिक हिंसा का जोखिम रहता है। लोग अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों के तहत काम करने के लिए मजबूर होते हैं और यदि वो काम करने से मना करते हैं तो उन पर शारीरिक हिंसा का डर भी होता है। 300,000 से अधिक लोगों की पहचन बंधुआ मजदूर के रूप में की गई है। दिसंबर 2015 में लोकसभा में दिए गए एक जबाव के अनुसार, उत्तर प्रदेश में – आधिकारिक – सबसे अधिक संख्या (896301) दर्ज की गई है जबकि महाराष्ट्र में ऐसे लोगों की संख्या 496916 दर्ज की गई है।

 

घरेलू सेवाएं : पुरुषों, महिलाओं और बच्चों सहित करीब 4.2 मिलियन या 0.42 करोड़ लोग माली, सफाई कर्मचारी, ड्राइवरों, रसोइए के रुप में पूरे देश में काम कर रहे हैं। अमेरिका स्थित महिला अनौपचारिक रोजगार: भूमंडलीकरण और आयोजन (WIEGO) द्वारा प्रकाशित 2004 के आंकड़ों के अनुसार, इस तरह की मानव गुलामी के तहत अतिरिक्त काम के घंटे, अपर्याप्त पारिश्रमिक और कभी कभी शारीरिक और यौन हिंसा शामिल है।

 

जबरन भीख : कई भारतीय भिखारी आपराधिक दबाव में हैं। वॉक फ्री फाउंडेशन द्वारा आयोजित प्राथमिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि भिखारी अस्तित्व की बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं और लगातार उनके नियोक्ताओं द्वारा धमकी में जी रहे हैं। सेव द चिल्ड्रेन, एक संस्था द्वारा किए गए पांच शहरों के अध्ययन के अनुसार, सड़कों पर रहने वाले बच्चों के लिए आय का प्रमुख स्रोत कूड़ा बिनना है, यह काम 16 फीसदी बेघर बच्चों द्वारा किया जाता है। 8 फीसदी लड़कों एवं 14 फीसदी लड़कियों के लिए भीख मांगना मुख्य व्यवसाय है लेकिन ज्यादातर लड़कियों को उनके भाई-बहनों की देखभाल एवं अन्य घरेलू काम में शामिल होती हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है।

 

वाणिज्यिक यौन शोषण : हिंसा के डर के तहत महिलाओं के पीटा जाता है या काम करने के लिए मजबूर किया जाता है और वेश्यावृत्ति से मना करने पर उनके परिवार को कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दी जाती है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा इस 2013 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सेक्स वर्कर की अनुमानित संख्या 3 मिलियन या 0.3 करोड़ है, जिनमें से 1.2 मिलियन की उम्र 18 वर्ष से नीचे है।

 

जबरन विवाह: भारत में आधे से अधिक महिलाओं को 18 वर्ष की आयु के पहले विवाह के लिए मजबूर किया जाता है और फिर उनसे अवैतनिक मजदूर के रुप में काम कराया जाता है। ड्रग्स पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय और क्राइम (यूएनओडीसी) द्वारा इस साल मई 2013 के एक अध्ययन के अनुसार, 9,000 से अधिक विवाहित महिलाओं के हरियाणा, असम और पश्चिम बंगाल के राज्यों से खरीदा गया है। अध्ययन – जिसमें 10,000 से अधिक परिवारों को शामिल किया गया है – कहती है कि आमतौर पर जो लोग दुल्हन खरीदते हैं वो इसे स्वीकार नहीं करते हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2014 में भी बताया है।

 

छह वर्षों में मानव तस्करी के मामलों में 92 फीसदी वृद्धि

 

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी ) के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में, मौजूदा मानव गुलामी कानूनों के तहत, भारत भर में करीब 5,500 मामले दर्ज किए गए हैं। पिछले छह वर्षों के दौरान मानव तस्करी के मामलों में 92 फीसदी की वृद्धि हुई है, जैसे कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2015 में बताया है।

 

मानव तस्करी अपराध, 2010 से 2014

Source: National Crime Records Bureau, 2014

 

पिछले पांच वर्षों में, 23 फीसदी मानव तस्करी मामलों में सज़ा सुनाई गई है। कम से कम 45,375 लोगों को गिरफ्तार किया गया है एवं 10,134 लोगों की दोषी ठहराया गया है। दंड के रुप में जुर्माने से ले कर कारावास तक शामिल है। पिछले पांच वर्षों में, आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक गिरफ्तारियां – 7450 – हुई है। इसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का स्थान है।

 

सरकार क्या करने की कोशिश कर रही है

 

सरकार ने ‘घरेलू कामगारों के लिए राष्ट्रीय नीति’ एक मसौदा तैयार किया है जो वर्तमान में कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार कर रहा है।

 

यदि यह अधिनियमित होता है तो नीति, कुशल घरेलू नौकर को 9,000 रुपये की न्यूनतम वेतन,  भुगतान और मातृत्व छुट्टियां, सामाजिक सुरक्षा, और सामूहिक रूप से सौदा करने के अधिकार को सुनिश्चित करता है। इनमें यौन उत्पीड़न और घरेलू कामगारों के लिए बंधुआ मजदूर के खिलाफ प्रावधान भी शामिल होंगे।

 

पीड़ितों की पहचान, नए कानूनी ढांचे के कार्यान्वयन और शिकार केंद्रित जांच के लिए 20,000 से अधिक पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया है।

 

(मित्तल और भट्टाचार्य इंडियास्पेंड साथ इंटर्न हैं। अतिरिक्त रिसर्च रोहन बापट द्वारा किया गया है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 08 जून 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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