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पिछले 3 सालों में जम्मू-कश्मीर में आंतकवादी हिंसा में ज्यादा जानें गईं, उत्तर-पूर्व की मिली-जुली तस्वीर

अभीत सिंघ सेठी,

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मार्च 2014 में जम्मू-कश्मीर के पुलवामा शहर में आतंकवादी हमले के बाद सुरक्षा बढ़ाई गई। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के दूसरे कार्यकाल के अंतिम तीन वर्षों की तुलना में भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में अब तक जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से संबंधित 42 फीसदी अधिक मौतें हुई हैं।

 

कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए -2) के दूसरे कार्यकाल के आखिरी तीन साल की तुलना में मई 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार (भाजपा) के सत्ता में आने के बाद से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद संबंधित मौतें 42 फीसदी ज्यादा हुई हैं।

 

नई दिल्ली स्थित गैर लाभकारी संस्था ‘इन्स्टटूट फॉर कान्फ्लिक्ट मैनेजमेंट’ द्वारा संचालित दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल (एसएटीपी) पर संकलित आंकड़ों पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि आतंकवादी हिंसा में मारे गए सुरक्षाकर्मियों की संख्या 72 फीसदी बढ़ी है। ये आंकड़े यूपीए-2 के अंतिम तीन वर्षों में 111 थे। भाजपा के पहले तीन वर्षों में 191 हुए हैं।

 

एसएटीपी मीडिया रिपोर्टों से आतंकवाद से हुई मौतों के आंकड़ों को संकलित करता है। डेटा अस्थायी है और 24 मई 2017 को संकलित किया गया है।

 

हाल ही में भाजपा ने अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे किए हैं।  इंडियास्पेंड ने भाजपा के पांच मुख्य चुनावी वादे – रोजगार, स्वच्छ भारत, सड़क, बिजली और आतंकवाद के खात्मे- का विश्लेषण किया है। इस पर पांच लेखों की श्रृंखला के इस अंतिम भाग में हम आतंकवाद से निपटने पर भाजपा सरकार के प्रदर्शन की समीक्षा करेंगे।

 

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से संबंधित मौतें अधिक

 

भाजपा ने 16 मई 2014 को लोकसभा चुनाव जीता था। नरेंद्र मोदी ने 26 मई, 2014 को भारत के प्रधान मंत्री के रूप में शपथ ली थी। इस विश्लेषण में 1 जून, 2014 से 21 मई 2017 तक, करीब 36 माह की अवधि और 1 जून, 2011 से 31 मई, 2014 तक यूपीए -2 की सरकार के अंतिम तीन साल के समय को शामिल किया गया है।

 

भाजपा ने 7 अप्रैल, 2014 को जारी अपने चुनावी घोषणापत्र में आतंकवाद पर एक ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात कही थी।

 

कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के दूसरे कार्यकाल के अंतिम तीन वर्षों की तुलना में भारतीय जनता पार्टी के तीन साल के शासनकाल के तहत जम्मू-कश्मीर में 42 फीसदी अधिक आतंकवाद से संबंधित मौतें हुई हैं। इनमें नागरिक, सुरक्षाकर्मी और आतंकवादी शामिल हैं।

 

जम्मू-कश्मीर में आंतकवाद से हुई मौतें

Source: South Asia Terrorism Portal
Note: *Data for 2017 up until May 21. One year is counted from June 1 until May 31 of the subsequent year.

 

राज्य में आतंकवादी हिंसा में मारे जाने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में 72 फीसदी वृद्धि हुई है। यह संख्या यूपीए -2 के अंतिम तीन सालों में 111 थी। भाजपा के पहले तीन वर्षों में 191 हुई है। जम्मू-कश्मीर में नागरिक मौतों की संख्या में 37 फीसदी की वृद्धि हुई है, जबकि आतंकवादी मौतों में 32 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

आतंकवाद से संबंधित अधिकांश मौतें पिछले एक साल में हुई हैं। विशेषकर 8 जुलाई, 2016 के बाद से जब सुरक्षा बलों ने आतंकवादी बुरहान वानी को मार गिराया था। वानी की मौत के बाद राज्य में हिंसक विरोध, कई महीने कर्फ्यू और राज्य की सुरक्षा स्थिति बिगड़ी थी। इस बारे में इंडियास्पेंड ने 16 दिसंबर, 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

केंद्र में भाजपा सरकार के तीसरे वर्ष में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से संबंधित मौतों की संख्या 293 हुई है। यह अपने कार्यकाल के दूसरे वर्ष में दर्ज 191 मौतों से 53 फीसदी ज्यादा हैं। इस अवधि में मारे गए सुरक्षा कर्मियों की संख्या में 61 फीसदी की वृद्धि हुई है । 18 सितंबर, 2016 को उरी शहर में एक सेना की छावनी पर आतंकवादी हमले में मारे गए 18 सैनिकों सहित भाजपा शासनकाल के तीसरे वर्ष में 98 लोग मारे गए।

 

भारत ने उरी हमले का जवाब 19 सितंबर, 2016 को पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक कर के दिया था।

 

उत्तर-पूर्व में नागरिक की कम और सुरक्षाबलों की ज्यादा हुई है मौत

 

यूपीए -2 के आखिरी तीन सालों में हुई 874 मौतों की तुलना में बीजेपी के पहले तीन वर्षों में उत्तर-पूर्व में आतंकवादी हिंसा में मौतों की संख्या 12 फीसदी कम हो कर 765 हुई है। ये आंकड़े सुरक्षा स्थिति में समग्र सुधार का संकेत देते हैं।

 

उत्तर-पूर्व में आतंकवाद से मौत

Source: South Asia Terrorism Portal
Note: *Data for 2017 up until May 21. One year is counted from June 1 until May 31 of the subsequent year.

 

हालांकि, भारत की सुरक्षा बलों के लिए यह क्षेत्र अत्यधिक असुरक्षित हो गया है। क्षेत्र में रैंकों में हताहतों की संख्या 62 फीसदी अधिक दर्ज की गई है। हताहत के मामले यूपीए -2 के तहत 55 के मुकाबले भाजपा के तहत 89 दर्ज किए गए हैं।

 

भाजपा शासन में नागरिक मौतों की संख्या 15 फीसदी घटकर 287 हुए हैं, जबकि सिक्युरिटी ऑपरेशनों में आतंकवादी मौतों की संख्या 19 फीसदी गिरकर 389 हुई है।

 

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 16 मई, 2016 को पूर्वोत्तर सुरक्षा समीक्षा बैठक में कहा कि ” उत्तर-पूर्व में संगठित आतंकवाद गिरावट पर है।” सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ावा देने और पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की पहल की है। इससे सुरक्षा की स्थिति में सुधार की गति तेज हुई है।

 

माओवादी हिंसा के कारण कम मौतें

 

भारत में माओवादी हिंसा की वजह से हुई मौतों में 9 फीसदी कमी आई है। भाजपा के शासन काल में  यह संख्या 1,016 है जबकि यूपीए-2 के शासन काल के अंतिम तीन वर्षों में यह संख्या 1,112दर्ज की गई थी।

 

माओवादी हिंसा के कारण हुई मौतें

Source: South Asia Terrorism Portal
Note: *Data for 2017 up until May 21. One year is counted from June 1 until May 31 of the subsequent year.

 

भाजपा शासन काल में सुरक्षाकर्मियों की मौत में 43 फीसदी की गिरावट हुई है। भाजपा शासन काल में ये आंकड़े  216 रहे हैं, जबकि यूपीए-2 शासनकाल में यह संख्या 380 थी।

 

नागरिकों की मौतों की संख्या में भी 27 फीसदी की गिरावट हुई है। इस संबंध में आंकड़े 328 दर्ज किए गए हैं, जबकि सिक्युरिटी ऑपरेशन में माओवादियों की मौतों में 34 फीसदी की वृद्धि हुई है। इस संबंध में आंकड़े 472 हैं।

 

हालांकि, माओवादी हिंसा में हुई कुल मौतों की संख्या में 60 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। यह संख्या वर्ष 2014-15 में 259 थी। वर्ष 2016-17 में बढ़ कर 414 हुई है। 24 अप्रैल, 2017 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में 26 केंद्रीय रिजर्व अर्धसैनिक बलों (सीआरपीएफ) के जवानों की हत्या कर दी गई थी। इस माओवादी हमले ने वर्ष 2017 को भारतीय सुरक्षा बलों के लिए सबसे घातक वर्ष बना दिया। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 24 अप्रैल, 2017 को अपनी खास रिपोर्ट में विस्तार से बताया है।

 

पिछले 12 महीनों में मौतों की संख्या में बढ़ोतरी और सुकमा जैसे हमले से भारत के माओवाद प्रभावित इलाकों में सुरक्षा की खराब स्थिति का पता चलता है।

 

(सेठी स्वतंत्र लेखक और रक्षा विश्लेषक हैं । मुंबई में रहते हैं।)

 

‘भाजपा सरकार के वादों की स्थिति’ का विश्लेषण करते पांच लेखों की यह श्रृंखला अब समाप्त होती है। पहले के लेख आप यहां, यहां, यहां और यहां पढ़ सकते हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 27 मई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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