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पेटेंट में देरी से ‘मेक इन इंडिया’ को खतरा

इंडियास्पेंड टीम,

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पिछले दस वर्षों में दीये गये 68,000 पेटेंट पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण के अनुसार भारत में एक पेटेंट आवेदन को अनुमोदित करने के लिए औसतन छह वर्ष का समय लगता है- एक प्रक्रिया जो प्रधानमंत्री द्वारा औद्योगीकरण में नवीनता की ओर दिए जा रहे ज़ोर के लिए खतरा है।

 

2015 में प्रदान किये पेटेंट में से 98 फीसदी आवेदन पांच वर्ष या उससे भी पहले के थे। इसकी तुलना में वर्ष 2009 में प्रदान किये गये 42 फीसदी पेटेंट के लिए आवेदन पांच वर्ष पूर्व या उससे भी पहले के  थे। यहां तक कि 2015 में प्रदान एक पेटेंट के लिए आवेदन 19 वर्ष पहले दीया गया था।

 

अमरिका एवं ब्रिटेन में पेटेंट के लिए औसत अनुमोदन का समय तीन वर्ष है।

 

पेटेंट के लिए अनुमोदन अवधि, 2006-15

 

pt2_graphic2Source: Controller General of Patents, Designs and Trademarks; Note: Data for 2015 up to Dec. 15; View data.

 

पेटेंट अनुमोदन में लगने वाली देरी से प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी की “मेक इन इंडिया” अभियान के तहत भारत में अधिक बहुराष्ट्रीय निगमों (एमएनसी) को लाने की भव्य योजना प्रभावित हो सकती हैं।

 

(इस लेख के पहले भाग में हमने चर्चा की है कि किस प्रकार भारत को केवल मेक इंडिया पर ही नहीं बल्कि इन्वेंशन यानि कि नवीन आविष्कारों पर भी ध्यान देना चाहिए।)

 

नीचे दिए गए ग्राफ से स्पष्ट होता है कि किस प्रकार पेटेंट कार्यालय के काम का बोझ बदल रहा है और किस प्रकार इसका ध्यान पुराने आवेदनों का समाशोधन करने पर है।

 

भारतीय पेटेंट कार्यालय एवं आवेदन का बैक्लॉग

 

pt2_graphic1_repl 2Source: Controller General of Patents, Designs and Trademarks; Note: Data for 2015 up to Dec. 15; View data.

 

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “पेटेंट दाखिल करने की प्रक्रिया के निरीक्षण एवं आवश्यक प्रपत्रों की संख्या में भारी कमी ” की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।

 

कम देरी से क्या होगा प्रभाव

 

पेटेंट अनुमोदन में होने वाली देरी से कंपनियों को उत्पादों के व्यावसायिकरण करने में भी देरी होती है।

 

पेटेंट से अभिनव उत्पादों के साथ कंपनियों को, आमतौर पर 20 वर्ष की अवधि के लिए,  इन उत्पादों को बनाने के लिए विशेष अधिकार देकर अपने अनुसंधान और विकास से लाभ की अनुमति देता है।

 

यदि पेटेंट अनुमोदन में देरी होती है तो इन कंपनियों की अपने उत्पादों के साथ भारतीय बाज़ार में प्रवेश होने में भी देरी होती है।

 

‘मेक इन इंडिया ‘ एवं देश में निवेश प्रोत्साहन के लिए सबसे पहले कदम के रुप में पेटेंट में होने वाली देरी को कम करने की ज़रुरत है।

 

मिंट की इस रिपोर्ट के अनुसार, इस संबंध में होने वाली देरी का मुख्य कारण पेटेंट परीक्षकों की कमी है। जून 2015 में परीक्षकों के लिए 337 पद उपलब्ध थे जिनमें से केवल 130 या 37 फीसदी पद ही भरे हुए थे।

 

पेटेंट अनुमोदन की प्रक्रिया

 

approval_processSource: Controller General of Patents, Designs and Trademarks.

 

क्या कर रही है सरकार

 

कई कंपनियों को देरी का सामना करना पड़ रहा है- तेजी से निरीक्षण की अनुमति देते हुए सरकार ने पेटेंट नियम 2003 में संशोधन का प्रस्ताव दिया है। इसके लिए एक शर्त यह है कि पेटेंट अनुमोदन के दो वर्षों के भीतर कंपनी भारत में विनिर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। इससे उन लोगों को अधिक लाभ हो सकता है जो और अधिक भुगतान कर कतार कूदने के लिए तैयार हैं लेकिन वास्तव में इससे कमी की पूर्ति नहीं होगी।

 

भारतीय पेटेंट कार्यालयों में जनशक्ति बढ़ाना लंबे समय से पांच साल की योजना का चिंता का विषय रहा है।

 

इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट के अनुसार, 12 वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17 ) के तहत  “बौद्धिक संपदा कार्यालयों के आधुनिकीकरण एवं सुदृढ़ीकरण ” की योजना से पेटेंट परीक्षकों की संख्या में वृद्धि की उम्मीद है, 337 से बढ़ कर 589 एवं और 263 परीक्षकों अस्थायी तौर पर कॉंट्रैक्ट पर रखा गया है।

 

इसके अलावा, पर्यवेक्षी अधिकारियों या “नियंत्रक” की संख्या 94 से बढ़ा कर 170 की जाएगी।

 

राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (NIPR) नीति के लिए प्रस्तावित मसौदा संस्करण, पेटेंट, डिजाइन और ट्रेडमार्क महानियंत्रक के कार्यालय ठीक करने और पंजीकरण के अनुदान के लिए समयसीमा का पालन करने के साथ इस संबंध की ओर ध्यान देता है लेकिन इसके आगे कोई कोई विवरण प्रदान नहीं करता है।

 

डीएनए की रिपोर्ट के अनुसार, जल्द ही सरकार द्वारा एनआईपीआर (NIPR) नीति घोषित की जा सकती है।

 

यह दो लेख श्रृंखला का दूसरा भाग है। पहला भाग आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 12 जनवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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