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प्रधानमंत्री के वित्तीय समावेशन सपने की प्रगति धीमी

हिमाद्री घोष,

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राजस्थान के अजमेर के  एक गांव में निजी बैंक द्वारा बैंक खाते खुलवाने के लिए आयोजित एक कैंप में पहचान पत्र के साथ खड़े गांववाले। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में प्रधानमंत्री जन धन योजना सभी परिवारों तक पहुंच चुका है। योजना के तहत 200 मिलियन अतिरिक्त परिवार बैंकिंग प्रणाली से जुड़े हैं।

 

28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) की शुरुआत करते हुए कहा, “इससे पहले कभी भी आर्थिक इतिहास में, एक ही दिन में 15 मिलियन बैंक खाते नहीं खोले गए हैं। इससे पहले भारत सरकार ने इस पैमाने पर किसी कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया है।”

 

सत्रह महीने बाद, जनवरी 2016 में, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार हर परिवार तक यह योजना पहुंच चुकी है। योजना के तहत 200 मिलियम अतिरिक्त परिवार बैंकिंग प्रणाली से जुड़े हैं।

 

पीएमजेडीवाई योजना के तहत जुड़े परिवार

 

 

लेकिन, लोगों तक सरकारी सब्सिडी के सीधे हस्तांतरण करने का प्राथमिक लक्ष्य, दो चुनौतियों को पूरा नहीं कर पाया है: विशिष्ट पहचान कार्ड (आधार) को पीएमजेडीवाई से जोड़ना; एवं लाभार्थियों के बैंक खाते का उपयोग करना। जैसा कि इंडियास्पेंड ने पहले भी बताया है कि खातों को जोड़ने की गति, लाभ के वितरण को पीछे छोड़ रहा है एवं 2014 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रघुराम राजन ने केवल संख्या पर ध्यान केंद्रित करने के खिलाफ बैंकों को आगाह किया है।

 

आंकड़ों से पता चलता है कि 31 जनवरी, 2016 तक आधे से भी कम 210 मिलियन जन धन खाते, आधार कार्ड के साथ खोले गए हैं। इनमें, 30 फीसदी से अधिक खातों में “शून्य बैंलेस” है, जिसका अर्थ हुआ कि खातों का उपयोग नहीं हो रहा है।

 

राज्य जो आधार कार्ड को पीएमजेडीवाई से जोड़ने का संघर्ष कर रहें हैं, उनमें कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, केरल और झारखंड शामिल हैं। इन सभी राज्यों में कुल खातों को आधार से जोड़ने के आंकड़े 40 फीसदी हैं।

 

राज्य अनुसार वित्तीय समावेशन

 

 

सरकार कहती है कि, इन राज्यों का एक लाइन में आना महत्वपूर्ण है क्योंकि खाना पकाने का ईंधन, ऑटो ईंधन और खाद्यान्न पर सब्सिडी, कई मिलियन डॉलर सब्सिडी का बोझ डालती है।

 

सरकार ने 2015 में सब्सिडी पर 266,700 करोड़ रुपए (45 बिलियन डॉलर) खर्च करने का अनुमान लगाया है जिसमें से 122,700 करोड़ रुपए (20 बिलियन डॉलर) भोजन पर खर्च किया गया है, 71,000 करोड़ रुपए (12 बिलियन डॉलर) उर्वरक पर, और 60,300 करोड़ रुपए (9 बिलियन डॉलर) तेल पर खर्च किया गया है।

 

सब्सिडी पर अनुमानित व्यय, 2015

 

 

विभिन्न अनुमानों के अनुसार, इनमें से करीब आधी सब्सिडी अनुचित है।

 

कोटक रणनीति रिपोर्ट कहती है कि, “भारत द्वारा आरंभ किए सबसे बड़े सुधारों में से एक विभिन्न उत्पादों जैसे कि खाना पकाने के ईंधन, ऑटो ईंधन, खाद्यान्न और उर्वरक, तक बाजार मूल्य निर्धारण तंत्र को बढ़ाना है।”

 

‘नीति अपने-आप काम नहीं करता…लोगों को पता होना चाहिए कि इसका उपयोग कैसे होना है’

 

संतोष कुमार, फ्लेम विश्वविद्यालय, पुणे में सार्वजनिक नीति और प्रशासन के प्रोफेसर कहते हैं, “भारत में नीतियों को लागू करने में समय लगता है और पीएमजेडीवाई जैसे योजनाओं के लिए और अधिक समय लगता है क्योंकि कई लोग बैंक, ऋण, सब्सिडी जैसे शब्दों से अनजान हैं।”

 

पीएमजेडीवाई, आधार कार्ड और मोबाइल (जेएएम) का एकीकरण, संरचनात्मक सुधारों का एक महत्वपूर्ण घटक हो सकता है। 2015 आर्थिक सर्वेक्षण और आम बजट में प्रतिपादित, जेएएम का उदेश्य लाभार्थियों की पहचान करना एवं सब्सिडी सीधे उनके खातों में पहुंचाना है।

 

कुमार कहते हैं कि, “नीति अपने आप काम नहीं करती है। नीति को ठीक तरह से लागू करने के लिए सरकार की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए।”

 

सी रंगराजन प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष, द हिंदू में कहते हैं कि, “वित्तीय समावेशन के दो पहलू होते हैं: एक बैंक खाते और दूसरा ऋण के लिए पहुंच। प्रधानमंत्री द्वारा आरंभ की गई योजना, पहली समस्या को संबोधित करता है। छोटे उधारकर्ताओं के लिए ऋण उपलब्ध कराने का मुद्दा वैसा ही बना हुआ है।”

 

मई 2013 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित एक लेख से पता चलता है कि 42 फीसदी से अधिक ग्रामीण ऋण का स्रोत गैर-संस्थागत एजेंसियां हैं। सर्वेक्षण के चार दौर के बाद आरबीआई ने निष्कर्ष निकाला है कि, “भारत में ग्रामीण ऋण बाजार वित्त के औपचारिक और अनौपचारिक दोनों स्रोतों के साथ साथ मौजूदगी द्वारा बनाता है एवं बाजार खंडित होता है।”

 

संस्थागत और गैर – संस्थागत ग्रामीण ऋण का ब्रेक –अप

 

Click here for state-wise break-up of credit sources.

 

अनिंदिता रॉय साहा, दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर कहती हैं, “यह योजना एक कदम आगे है लेकिन इस योजना को सफल कहने के लिए काफी कुछ करना होगा। ग्रामीण और शहरी इलाकों से लोगों को अलग-अलग देखना होगा। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए लोगों को वित्तीय प्रणाली के संबंध में शिक्षित करना होगा।”

 

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ( यूपीए ) सरकार ने करीब 60 मिलियन सीमित सुविधाओं वाले खाते खोले थे लेकिन आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि आधे से अधिक खाते निष्क्रिय रहे हैं।

 

कुमार कहते हैं, “वित्तीय समावेशन का मूल उदेश्य, बैंकिंग प्रणाली में समाज के कमजोर वर्गों को शामिल करना है। लोगों को इस योजना की क्षमता एवं जो दस्तावेज़ उनके पास हैं, उस संबंध में जानने की आवश्यकता है अन्यथा वे अपने अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकते हैं।”

 

(घोष 101reporters.com के साथ जुड़े हैं। यह  जमीनी पत्रकारों के एक भारतीय नेटवर्क है। घोष राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव के मुद्दों पर लिखते हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 20 फरवरी 2016 को प्रकाशित हुआ है।

 

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