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प्राथमिक शिक्षा की चुनौतियां: बीमारू राज्यों में संकट ज्यादा

खुशबू बलानी,

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वर्ष 2020 तक विश्व भर में भारत की कामकाजी आबादी सबसे ज्यादा होगी, करीब 86.9 करोड़, लेकिन चार राज्यों में साक्षरता, स्कूल में नामांकन, सीखने के परिणामों, और शिक्षा के खर्च के संकेतक पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण से पता चलता है कि युवा आबादी को शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए भारत तैयार नहीं है। हम बता दें कि चार राज्यों में 5 से 14 वर्ष की उम्र के बीच भारत में स्कूल जाने का प्रतिशत 43.6 फीसदी है।

 

कुल मिलाकर,जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2001 से वर्ष 2011 के बीच भारत की साक्षरता दर 8.66 प्रतिशत अंक बढ़ कर 74.04 फीसदी हुआ है, लेकिन राज्यों में व्यापक रूप से असमानताएं मौजूद हैं।

 

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, शिक्षा के क्षेत्र में संकट, विशेष रुप से चार बीमारू राज्यों -बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश- में साफ है। भारत की 1.2 बिलियन आबादी में से बीमारु राज्यों की आबादी 445.1 मिलियन है और इनमें से कुछ राज्यों में साक्षरता दर देश में सबसे कम है। वर्ष 2011 में बिहार की साक्षरता दर 61.8 फीसदी, राजस्थान में 67.1 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 67.7 फीसदी और मध्याप्रदेश में साक्षरता दर 70.6 फीसदी था, जो 74 फीसदी के राष्ट्रीय दर से कम है। केरल की साक्षरता दर 94 फीसदी है, जो देश में सबसे ज्यादा है।

 

चार बीमारु राज्यों में ‘स्कूल परिणाम’ भी कम हैं।

 

एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 में उत्तर प्रदेश में 79.1 फीसदी बच्चों ने स्कूल छोड़ा औरकक्षा 5 से कक्षा 6 में कुछ ही बच्चे गए हैं।

 

एनअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) – वर्ष 2014 के अनुसार, मध्यप्रदेश में कक्षा 5 के केवल 34.1 फीसदी बच्चे कक्षा दो के पाठ ठीक से पढ़ सकते थे। इस संबंध में हिमाचल प्रदेश के लिए आंकड़े 75.2 फीसदी रहे हैं। इसी तरह, राजस्थान में कक्षा पांच के 45.9 फीसदी बच्चे गणित में घटाव कर सकते हैं, जबकि मिजोरम के 87.4 बच्चे घटाव कर सकते हैं।

 

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, वर्तमान में पांच से 14 वर्ष की आयु के केवल 2.5 स्कूली बच्चे चार राज्यों (केरल, मिजोरम, त्रिपुरा और गोवा)  में रहते हैं, जहां भारत में सबसे ज्यादा साक्षरता है। हम बता दें कि चार बीमारु राज्यों की साक्षरता दर 43.6 फीसदी है। बीमारू राज्यों में शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी तरह के सुधार होने से भारत पर निश्चित रूप से बड़ा प्रभाव पड़ेगा।

 

‘द इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ द्वारा प्रकाशित वर्ष 2003 के एक अध्ययन के अनुसार, अगली सदी के दौरान भारत में 60 फीसदी जनसंख्या वृद्धि मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के चार राज्यों से होगी, जबकि केवल 22 फीसदी केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे अधिक विकसित राज्यों से होंगे।

 

अगले 10 वर्षों में उत्तर प्रदेश और बिहार में देश की सबसे बड़ी युवा आबादी होगी, जैसा कि इंडियास्पेंड ने सितंबर 2016 में बताया है। इन दो राज्यों में 5 से 14 वर्ष के बीच भारतीयों की 31 फीसदी की हिस्सेदारी होगी।

 

‘एशिया एंड पैसिफिक पालिसी स्टडीज’ में प्रकाशित वर्ष 2013 के इस अध्ययन के अनुसार, भारत की युवा आबादी की उत्पादकता इन राज्यों के स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के अवसरों में सुधार पर निर्भर करेगा।

 

वर्ष 2005 विश्व बैंक के इस अध्ययन के अनुसार, उदाहरण के लिए, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा, भारत में साक्षरता को प्रभावित करने वाले कारकों में से एक है। यह कारक राज्यों में भिन्न होता है।‘पॉपुलेशन रेफ्रन्स व्यूरो’ द्वारा इस रिपोर्ट के आधार पर महाराष्ट्र के लिए वर्ष 2011 में 82.3 फीसदी की साक्षरता दर के साथ वर्ष 2011-16 के लिए जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 70.4 वर्ष का अनुमान है। इसकी तुलना में मध्यप्रदेश, जहां की साक्षरता दर 70.6 फीसदी है, में भी वर्ष 2011-16 के लिए जन्म पर 61.5 वर्ष की जीवन प्रत्याशा का अनुमान किया गया है।

 

जन्म के समय उच्च जीवन प्रत्याशा के साथ वाले राज्य अधिक साक्षर हैं

 

Source: Census 2011, Population Reference Bureau

 

स्कूल में नामांकन माता-पिता की शिक्षा,  परिवार में धन, दोपहर का भोजन, बुनियादी ढांचा सहित कई अन्य कारकों से प्रभावित होती हैं।

 

अब भी,अधिक साक्षर समकक्षों की तुलना में बीमारु राज्य शिक्षा पर कम खर्च करते हैं। उदाहरण के लिए, मध्यप्रदेश प्रति छात्र पर 11,927 रुपए खर्च करता है, जबकि तमिलनाडु प्रति छात्र 16,914 रुपए खर्च करता है, जैसा कि ‘द इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ ने सितंबर 2016 में बताया है। बिहार में प्रति छात्र 5298 रुपए खर्च किया जाता है।

 

बिहार का प्रति छात्र खर्च निम्नतम

Source: Census 2011, Economic and Political Weekly

 

रिव्यू ऑफ डेवल्पमेंट इकोनोमिक्स में प्रकाशित 2001 के इस पेपर के अनुसार, माता-पिता की शिक्षा एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है जो स्कूली शिक्षा को प्रभावित करता है।

 

एएसईआर के अनुसार, वर्ष 2014 में, देश के उच्चतम साक्षरता वाले राज्य, केरल में कम से कम 99.1 फीसदी माताओं ने स्कूली शिक्षा प्राप्त की है जबकि राजस्थान में स्कूली शिक्षा प्राप्त माताओं के लिए आंकड़े 30.3 फीसदी रही है।

 

अधिक साक्षरता दर वाले राज्यों में माताओं को अधिक मिली है स्कूली शिक्षा

Source: Census 2011, Annual Status of Education Report (Trends Over Time)

 

इसके अलावा, गरीब राज्यों में धन जैसे कारकों का स्कूल में नामांकन पर एक बड़ा प्रभाव पड़ता है।

 

‘जर्नल डेमोग्राफी’ में देओन फिल्में और लैंट प्रिचेट्ट द्वारा वर्ष 2001 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत में गरीब परिवारों की तुलना में अमीर परिवारों के बच्चों का स्कूल में भर्ती होने की संभावना ज्यादा होती है। लेकिन केरल की तुलना में उत्तर प्रदेश और बिहार में अंतर ज्यादा है।

 

इंडिया स्पेंड की ओर से पांच भागों वाली श्रृंखला का यह पहला लेख इस श्रृंखला में हम बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति पर चर्चा कर रहे हैं। दूसरे भाग में बिहार में शिक्षा की स्थिति पर नजर डालेंगे।

 

(बलानी स्वतंत्र लेखक हैं और मुंबई में रहती हैं। बलानी की दिलचस्पी  विकास के विभिन्न मुद्दों में है। )

 

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