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प्रारंभिक जीवन में बेहतर पोषण से भारत को मिल सकते हैं 3.17 मिलियन अधिक ग्रैजुएट

चारु बाहरी,

Nutrition@Anganwadi_620

 

माउंट आबू (राजस्थान): 0-3 साल की उम्र में बच्चों के लिए पूरक पोषण सुनिश्चित करने से भारत को 3.17 मिलियन ज्यादा ग्रैजुएट मिल सकते हैं। यह जानकारी एक नए शोध में सामने आई है।

 

उन बच्चों की तुलना में, जिन्होंने तीन से छह वर्ष की आयु में अतिरिक्त पोषण प्राप्त किया था, जिन बच्चों ने गर्भ में रहने से लेकर तीन वर्ष की आयु तक सरकार द्वारा संचालित कार्यक्रमों के माध्यम से अतिरिक्त पोषण प्राप्त किया गया था, उन बच्चों में  ग्रैजुएट डिग्री हासिल करने की 11 फीसदी ज्यादा संभावना थी, जैसा कि ‘जर्नल ऑफ़ न्यूट्रीशन’ में 1 जनवरी, 2018 को प्रकाशित एक नए अध्ययन में बताया गया है।

 

एक अध्ययन बताता है कि एकीकृत बाल विकास सेवाओं (आईसीडीएस) के माध्यम से आपूर्ति की जाने वाली खुराक के इन प्रारंभिक जीवन लाभार्थियों की माध्यमिक शिक्षा को पूरा करने की 9 फीसदी, नौकरी करने या या युवा वयस्कों के रूप में उच्च शिक्षा में दाखिला लेने की 5 फीसदी और 25 साल की उम्र तक अविवाहित रहने की अधिक संभावना थी।

 

1,000 दिन की विंडो ऑफ आपर्टूनिटी ( गर्भावस्था और एक बच्चे के दूसरे जन्मदिन के बीच का समय ) वाला समय पर्याप्त पोषण बच्चों को स्टंटिंग और संज्ञानात्मक कमियों से बचाने के लिए जाना जाता है। आंगनवाड़ी ( सरकारी केन्द्र जो स्वास्थ्य और पोषण सेवाएं प्रदान करते हैं ) में बच्चों और मां के जीवन अनुसरण करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया कि किशोरावस्था तक सकारात्मक स्वास्थ्य प्रभाव मौजूद रहते हैं।

 

जब 13-18 साल की उम्र में आंगनवाड़ी बच्चों का अध्ययन किया गया, तो यह पाया गया कि स्वस्थ कार्डियोवास्कुलर सिस्टम के साथ, 14 मिलीमीटर लंबे थे और उनकी स्कूल में दाखिला होने की संभावना अधिक है और दूसरों से आगे ग्रेड में हैं, जैसा कि अध्ययन में पाया गया है। नया अध्ययन निर्णायक साक्ष्य प्रदान करता है कि अजन्में शिशुओं और छोटे शिशुओं के लिए पर्याप्त पोषण लाभ पैदा करता है जो बाद में जीवन में उनकी शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं को बढ़ाता है।

 

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि प्रारंभिक जीवन पोषण के शिक्षा लाभ के साथ कॉलेज तक इस तरह के दैनिक अनावरण  से देश के 20 से 24 वर्षों की आयु के  73.8 मिलियन ग्रैजुएट की संख्या 7.5 फीसदी से 11.8 फीसदी तक पहुंचेगा। बदले में, कॉलेज की ग्रैजुएट दर में वृद्धि उच्च मजदूरी से महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ प्रदान करेगा।

 

पांच वर्ष के आयु के भीतर 156 मिलियन स्टंड बच्चों में चार में से एक के साथ यह एक देश के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक उपलब्धि होगी। 2016 में, यह अनुमान लगाया गया था कि भारत के पांच-वर्षीय बच्चों के बीच कम होती विकास दर की लागत, स्कूली शिक्षा और आर्थिक उत्पादकता में कमी के माध्यम से, भविष्य में 37.9 डॉलर आएगी।

 

लाभार्थियों के विवाह की उम्र में देरी करके, जीवन के पहले 1,000 दिनों में बेहतर पोषण से स्वस्थ और दिमागदार बच्चों की एक नई पीढ़ी को बढ़ावा मिलेगा। 2017 में ‘जर्नल ऑफ डेवलेप्मेंट इकोनोमिक्स’ के अध्ययन अनुसार शादी में एक साल की देरी ने घर पर जन्म देने वाली एक महिला की संभावना को 2.2 फीसदी कम किया है, स्तनपान दर 5.5 फीसदी की वृद्धि हुई और 4.6 फीसदी बच्चों में पूरी तरह से टीका लगाए जाने की संभावना है।

 

खराब पर्यवेक्षण से आईसीडीएस भोजन की गुणवत्ता कवरेज कम

 

आईसीडीएस एक 33 वर्षीय कार्यक्रम है, इसलिए सवाल यह है कि भारत पहले से ही इन लाभों का अनुभव क्यों नहीं कर रहा है?

 

अध्ययन के प्रमुख लेखक और ‘टाटा सेंटर फॉर डिवैलपमेंट’, ‘शिकागो विश्वविद्यालय’ और ‘सेंटर फॉर  डीजीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी’ में शोधकर्ता, अरिंदम नंदी ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “ अब तक अनुभव न होने वाले संभावित शैक्षणिक लाभों के लिए गुणवत्ता सबसे बड़ा कारक है। ”

 

नंदी ने कहा, “1987 और 1990 के बीच आयोजित किए गए बेस अध्ययन को बेहद नियंत्रित सेटिंग में किया गया था, जिसमें सेवा और भोजन की गुणवत्ता का करीब से निरीक्षण किया गया था।”

 

हैदराबाद के पास के गांवों में आयोजित किए गए अध्ययन में शामिल आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने सख्त पर्यवेक्षण के तहत सोयाबीन तेल में मक्का और सोया का मिश्रण तैयार किया, जिससे गर्भवति महिलाओं और आधा बच्चों को 500 ​​किलो कैलोरी ऊर्जा और 20-25 ग्राम प्रोटीन प्रदान की जा सके।

 

1.36 मिलियन आंगनवाड़ी का एक नेटवर्क आईसीडीएस के पूरक पोषण कार्यक्रम को लागू करता है। यह विकेन्द्रीकृत डिलीवरी दृष्टिकोण देश भर के दूरदराज के समुदायों तक पहुंचने के लिए आवश्यक है। हालांकि, इसका विस्तार भी पर्यवेक्षण को चुनौती दे रहा है।

 

नंदी आगे कहते हैं, “क्योंकि कार्यक्रम (आईसीडीएस) बहुत स्थानीय स्तर पर संचालित होता है (गांव में), गुणवत्ता में सुधार और कवरेज बहुत मुश्किल काम है। जहां स्थानीय पर्यवेक्षण अच्छा है, भोजन की गुणवत्ता बेहतर है और सेवा की समझ अधिक है।”

 

उदाहरण के लिए, 2017 के एक अध्ययन के मुताबिक, दिल्ली की झुग्गी में आंगनवाड़ी के साथ पंजीकृत 10 दूध पिलाने वाली माताओं और गर्भवती महिलाओं में छह और 6 माह से 6 वर्ष की उम्र के 10 बच्चों में से पांच ने पूरक पोषण प्राप्त किया था। यह सेवा से 40 फीसदी न्यूनतम उम्मीद की की तुलना में अधिक था।

 

अध्ययन के सह-लेखक और सामुदायिक दवा विभाग, गीतांजलि मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, उदयपुर में सहायक प्रोफेसर, जितेंद्र कुमार मीणा ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि “दिल्ली सरकार द्वारा खाना पकाने का केंद्रीकरण और आंगनवाड़ी की सख्त निगरानी ने गुणवत्ता बनाए रखने में मदद की है। “

 

हालांकि, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और उत्तर प्रदेश में आंगनवाड़ी का दौरा करने वाले मीणा ने कहा कि उन आंगनवाड़ियों में भोजन की गुणवत्ता खराब थी और बारीकी से निगरानी नहीं हो रहा था।

 

उन्होंने कहा, “कई आंगनवाड़ी के कम कवरेज के लिए भोजन की खराब गुणवत्ता का एक बड़ा कारण है।” देश भर में, जरुरतमंद बच्चों और महिलाओं में से आधे से कम आंगनवाड़ी के पूरक पोषण का उपयोग करते हैं, जैसा कि 2013-14 की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

बच्चे और महिलाएं जिन्होंने आंगनवाड़ी पूरक पोषक का उपयोग किया

सरकारी अधिकारियों ने जाहिरा तौर पर भोजन की खराब गुणवत्ता पर विचार-विमर्श किया है, लेकिन अभी तक कोई हल सार्वजनिक नहीं हुआ है। आईसीडीएस, महिला और बाल विकास मंत्रालय के डायरेक्टर के. बी. सिंह ने इंडियास्पेंड को बताया कि, ” एक समिति आंगनवाड़ी द्वारा प्रदत्त भोजन की खराब गुणवत्ता के मुद्दे पर विचार कर रही है।”

 

आंगनवाड़ी पोषण संबंधी पूरक सेवाओं के बारे में शिकायतों में वितरण में अनियमितता भी शामिल है, जो व्यक्तिगत अध्ययनों का सुझाव भी खराब पर्यवेक्षण के कारण एक स्थानीय घटना है।

 

गुजरात के 12 जिलों और केंद्रशासित प्रदेश दीव में 2016 के अध्ययन में सर्वेक्षण में पाया गया कि 130 आंगनवाड़ी के आधे से ज्यादा में वितरण में रुकावट की सूचना दर्ज की गई है। इसके विपरीत, मीणा ने पाया कि दिल्ली की शहरी झुग्गी में आंगनवाड़ी को नियमित आपूर्ति मिली थी।

 

बिहार के लिए 10,000 नए आंगनवाड़ी, लेकिन पूरे भारत में सेवाओं को वित्तीय मदद की जरूरत

 

भारत की नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2013 की एक रिपोर्ट में खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और सेवाओं के संबंध में बताया गया है, जिसमें आंगनवाड़ी केंद्रों और आईसीडीएस योजना को एक “विफल योजना” के रूप में वर्णित किया गया है।

 

2017 में बिहार में आईसीडीएस की स्थिति की कैग की समीक्षा में बताया गया है कि “लाभार्थियों को प्रदान की जाने वाली गुणवत्ता सेवाओं से समझौता किया गया, क्योंकि आंगनवाड़ी केंद्रों में शौचालय, पेयजल, रसोई, बर्तन इत्यादि जैसी मूलभूत सुविधाएं गायब हैं। इसके अलावा, 72 फीसदी कार्यात्मक एडब्लूसी के पास बिहार में अपनी खुद की इमारत नहीं थी।”

 

नंदी ने कहा कि, “आईसीडीएस को बदलने के लिए, और देश भर में गुणवत्ता और कवरेज में बदलाव के लिए, कार्यक्रम को संभवतः नए आंगनवाड़ी बनाने और मौजूदा लोगों के बुनियादी ढांचे में सुधार करने के लिए, प्रति भोजन बजट, कार्यकर्ता वेतन और प्रोत्साहन बढ़ाने और प्रणालीगत अक्षमताओं को कम करने के लिए एक बड़े वित्तीय मदद की जरूरत है। “

 

भारत के अधिक आबादी वाले राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा नए आंगनवाड़ी की जरूरत है। वहां 40 फीसदी से अधिक बच्चे स्टंड हैं। इसके अलावा, इन राज्यों में मौजूदा बुनियादी ढांचा 2012-13 की कैग रिपोर्ट में निर्दिष्ट 40 बच्चों / केंद्र सीमा से ज्यादा है।

 

उदाहरण के लिए, बिहार में 2014 में एक आंगनवाड़ी से 193 बच्चों को पूरक पोषण प्रदान मिल रहा था, जो  प्रति केंद्र में 68 बच्चों के राष्ट्रीय औसत के करीब तीन गुना है। उत्तर प्रदेश में, संबंधित आंकड़ा 101 का था।

 

सिंह ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “भारत में 13.60 लाख संचालित आंगनवाड़ी हैं, जबकि 14 लाख मंजूर किए गए हैं। शुरु होने वाले 40,000 से ज्यादा आंगनवाड़ी में से  चालू वर्ष में 10,000 की शुरुआत होने की उम्मीद है, इनमें से ज्यादातर बिहार में। “

 

कम मानदेय से गुणवत्ता प्रभावित, प्रेरणा की कमी

 

हाल के महीनों में, मानदेय बढ़ाने के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा भारत को व्यापक विरोध प्रदर्शन देखा गया है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायकों को वर्तमान में 3,000 रुपये और 1,500 रुपये का मासिक मानदेय दिया जाता है।

 

1 अप्रैल 2011 को केंद्र सरकार ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायकों के मानदेय को बढ़ाया था, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 23 फरवरी, 2018 को रिपोर्ट दी थी।

 

मानदेय का भुगतान अक्सर देर से किया जाता है। छह वर्ष के बच्चों की प्रगति रिपोर्ट- 2016 के अनुसार छह राज्यों के एक सर्वेक्षण के अनुसार करीब 40 फीसदी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अपने निजी केंद्रों को चलाने के लिए अपने निजी धन का इस्तेमाल करना पड़ा था और उनमें से 35 फीसदी मामले में समय पर भुगतान नहीं किया गया था।

 

मीणा ने कहा, “खराब बुनियादी ढांचा और कम वेतन काम करने वालों  के मनोबल को कम करते हैं और कभी-कभी यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।”

 

कुपोषित बच्चों के लिए वितरण के लिए भोजन में सेंध आम है और सरकार इसे एक समस्या मानती है। प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा पिछले साल एक सुझाव में इससे बचने के लिए बार कोड टेक्नोलॉजी का प्रस्ताव दिया गया था।

 

इस पर कार्य करते हुए, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए स्मार्टफोन पेश किए हैं। छह राज्यों में एक पायलट अध्ययन के दौरान ( आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और राजस्थान ) 62,000 आंगनवाड़ी केंद्रों पर कार्यकर्ताओं को स्मार्टफोन दिया गया था। इससे नौकरी चार्ट तैयार करने, बच्चों की उपस्थिति को चिह्नित करने, तैयार भोजन के फोटो अपलोड करने, (जैसे कि कितने बच्चे भोजन प्रदान किए गए थे, कितने वजन थे आदि) के लिए आवश्यक 11 रजिस्टरों में चीजों को दर्ज करने से मुक्ति मिली और इससे कुपोषित बच्चों की प्रगति की निगरानी करने में मदद मिली थी।

 

सिंह कहते हैं, “आंगनवाड़ी सेवाओं की निगरानी में टेक्नोलोजी मददगार होगी।”उन्होंने आगे कहा कि, “पहचान और निगरानी करने के साथ कुपोषित बच्चों की प्रगति और अपने आप उत्पन्न होने वाले  एसएमएस का प्रावधान से हम आंगनवाड़ी की स्वास्थ्य परिणाम में सुधार की उम्मीद करते हैं। ”

 

बारकोड  से चोरी और कार्यकर्ताओं द्वारा वितरण से पहले घर ले जाने वाले राशन पर निगरानी में मदद मिलेगी।

 

आंगनवाड़ी सेवाओं के बारे में जागरुक हैं माताएं, लेकिन प्रारंभिक जीवन पोषण की जरुरतों के संबंध में नहीं

 

अब तक, सरकार के संदेश ने 2013-14 में, 10 छोटे बच्चों की माताओं या गर्भवती महिलाओं में से नौ को आंगनवाड़ी की पूरक पोषण सेवा सुनिश्चित करने में मदद की है। हालांकि, यह विचार करते हुए कि केवल 40-50 फीसदी माताओं और गर्भवती महिलाओं ने वास्तव में इस सेवा का लाभ उठाया, मीणा ने संदेश के फोकस में बदलाव का सुझाव दिया है।

 

उन्होंने कहा, “आईसीडीएस सेवाओं के व्यापक पैकेज को बढ़ावा देने के मुकाबले सरकार ने आईसीडीएस के पूरक पोषण घटक पर जोर दिया है। और तब क्या होता है कि पूरक पोषण कवरेज कम रहता है क्योंकि हर परिवार को अतिरिक्त भोजन में दिलचस्पी नहीं है।”

 

उन्होंने आगे कहा कि “अधिक बच्चे पोषण का लाभ उठा सकते हैं, यदि उनके माता-पिता आंगनवाड़ी द्वारा उपलब्ध सेवाओं पर गौर करते हैं।( उपचार और स्वास्थ्य और शिक्षा )। “

 

पूरक पोषण में एक परिवार की कम रुचि, लाभों के प्रति कम जागरूकता का प्रतिबिंब है, और यह तथ्य कि आप खराब प्रारंभिक जीवन पोषण की भरपाई नहीं कर सकते हैं।

 

नंदी कहते हैं कि, “भारतीय नीतियों में 1,000 दिन की अवधि तक बहुत अच्छी तरह से स्वास्थ्य, पोषण और युवा बच्चों के पोषण के उद्देश्य से कई कार्यक्रमों पर जोर दिया गया है, लेकिन इसके  लिए विकास के इस महत्वपूर्ण समय में लोगों के बीच जागरूकता बढ़नी चाहिए, जिससे ये मुफ्त या सब्सिडी कार्यक्रम लोगों तक अच्छी तरह से पहुंच सके। “

 

(बाहरी स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं और माउंट आबू, राजस्थान में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 31 मार्च, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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