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फातिमा की कहानी में जो दर्द है, वह कश्मीर अनाथालयों में रह रहे कई हजार बच्चों का है !

सफीना नबी,

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मार्काजी फलाही मस्तूरत- अनंतनाग जिले के मटन क्षेत्र में केवल अनाथ लड़कियों के लिए एक आश्रय घर।

 

जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 56 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व, अनंतनाग में लड़कियों के लिए मार्काजी फलाही मस्तूरत नाम का एक आश्रय घर है। वर्ष 2017 के अप्रैल में बरसात भरी एक दोपहर में इस आश्रय घर के एक मध्यम आकार का कमरा, 25 लड़कियों से भरा हुआ है।

 

दो चकोर खिड़कियों के माध्यम से कमरे में रोशनी आ रही है और लड़कियां को रोशनी खत्म होने से पहले अपने स्कूल का काम खत्म कर लेने की जल्दी है।

 

सलवार-कमीज पहने और सिर पर दुपट्टा लिए हुए 11 वर्षीय फातिमा, बड़े ध्यान से दूसरी लड़कियों के साथ हो रही मेरी बातचीत को सुन रही है। लेकिन हमारी बातचीत में शामिल होने में वह सकुचा रही है। जब धीरे-धीरे वह सहज हुई तो उसने अपनी कुछ बातें हमारे सामने रखी। तब जाकर हमें पता चला कि आखिर उसमें क्या खास है कि उसकी आवाज अनाथालय या आश्रय घर के बच्चों और कर्मचारियों को प्रेरित करती है ।

 

मैंने फातिमा से पूछा कि “क्या आप हमारे लिए गाना सकती हैं?” आनाथालय की वार्डन लातीफा अख्तर ने फातिमा को प्रोत्साहित किया। अख्तर ने बताया कि, “जब वह गाती है तो दूसरे भी साथ गाते हैं और हर रात गाना कोरस में बदल जाता है।”

 

संस्था में चार से 16 वर्ष की आयु के बच्चे हैं और उनके बीच फातिमा ही बेहतरीन गायिकी है। वह बहुत से कश्मीरी लोक गीत जानती हैं। उनमें तो कई गीत ऐसे हैं, जिनको गाने और जानने वाले बहुत कम हैं।

 

फातिमा के सभी गीत खुशी से भरे नहीं होते। कुछ उदास हैं और जीवन की त्रासदियों को प्रतिबिंबित करते हैं-“ मियल वजन मियल चे, यवन नजारे / यस ने आसन स्यू चे रोजन नजारे।”

 

यानी अपनी बेटियों से मिलने आते हैं पिताजी, जिनके पिता खो गए हैं, वे बस इंतजार करते रहते हैं।

 

परेशान बचपन के बावजूद, फातिमा ने अपनी जिंदगी में उत्साह बचा रखा है। मौसम में बहुत ठंडक थी, लेकिन फातिमा ने फीरन पहनने से इनकार कर दिया। वह कहती हैं,“ हवा जब मेरे शरीर और चेहरे को छूती है तो मुझे अच्छा लगता है। इससे मुझे खुशी होती है। मैं खुद को तरोताजा महसूस करती हूं।”

 

मैंने फातिमा से पूछा कि उसे और क्या-क्या पसंद है? किन-किन चीजों से उसे खुशी मिलती है? वह चहक के बोली, “क्रिकेट खेलना और गाना गाना।”

 

अपने पिता की मौत के बाद फातिमा तीन साल पहले इस अनाथालय में आई थी। उसके पिता, हिजबुल-मुजाहिदीन के आतंकवादी थे और एक गोली-बारी में मारे गए थे। उसे संस्था में लाया गया, क्योंकि उसकी मां देखभाल करने में असमर्थ थी। उसके साथ रहने वाली बच्चियां बताती हैं कि अनाथालय में आने के बाद, कुछ हफ्तों तक वह हर शाम रोया करती थी।

 

16 वर्षीय सायमा जन, जिसके पिता की मृत्यु एक हिंसक घटना में हुई थी, याद करते हुए बताती है कि फातिमा हर शाम रोती थी और रोते-रोते ही सो जाया करती थी।

 

अभी अनाथालय में सबसे बड़ी लड़की सायमा ही है। सायमा कहती हैं, “मुझे गुनगुना पसंद है और एक दिन जब फातिमा रो रही थी, मैंने उसे अपनी गोद में ले लिया और गुनगुना शुरू कर दिया। वह शांत हो गईं। समय के साथ, वह हमलोगों के साथ घुल-मिल गई और हमें पसंद करने लगी।”

 

प्रसिद्ध समाजशास्त्री बशीर अहमद दब्ला द्वारा वर्ष 2012 के एक शोध पत्र ‘ए सोसीअलाजिकल स्टडी ऑफ विंडोज एंड औरफन्स’ को अगर आपने पढ़ा होगा तो आपको पता होगा कि कश्मीर और अनाथ बच्चों का रिश्ता कैसा है?  इस शोध पत्र के अनुसार कश्मीर में 214,000 अनाथ बच्चे हैं।

 

समाजशास्त्री बशीर अहमद दब्ला वर्ष 2015 में नहीं रहे। उन्होंने वर्ष 1989 में कश्मीर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग का गठन किया था। उनके पेपर को कश्मीरी सामाजिक उद्यमी और विद्वान राव फरणान अली द्वारा लिखी किताब, कश्मीर: ऑरफन में उद्धृत किया गया है। लेकिन राज्य सरकार ने अनाथों की संख्या करीब 100,000 होने का अनुमान लगाया है।

 

‘जम्मू कश्मीर कोलिशन सिविल सोसाइटी’ द्वारा किए गए अनुमान के अनुसार, कश्मीर में सशस्त्र संघर्ष के 26 सालों में 70,000 मौतें हुईं हैं। इससे ढेर सारे बच्चे अनाथ हुए हैं।

 

कश्मीर के अनाथों को सिर्फ खाना और आश्रय ही नहीं चाहिए, उनकी जरूरतें और भी हैं !

 

जम्मू और कश्मीर सरकार का समाज कल्याण विभाग राज्य के अनाथों के लिए कल्याणकारी संस्थाएं चलाता है – मर्कज-ए-फलाह-ए-इताफाल (एमएफआई) या लड़कों के लिए बाल आश्रम और मार्कज-ए-फलाह-मस्तूरात (एमएफएम) या नारी निकेतन।

 

वहां ऐसे 17 अनाथालय हैं। लड़कियों के लिए छह और लड़कों के लिए 11। इनमें से सबसे पहला वर्ष 1996 में स्थापित किया गया था। यहां रहने वाले मुफ्त रहने, खाने और दवा के हकदार हैं। इसके अलावा, उन्हें मुफ्त किताबें, ड्रेस, ट्यूशन और 25 रुपये का मासिक खर्च दिया जाता है। आमतौर पर अनाथालय चार या पांच कर्मचारियों द्वारा चलाए जाते हैं।

 

जिला अनुसार लड़कों के लिए कल्याण संस्था का इस्तेमाल दर

जिला अनुसार लड़कियों के लिए कल्याण संस्था का इस्तेमाल दर

Source: Department of Social Welfare Government of J&K

 

जब इनका गठन हुआ था, तब घाटी करीब सात वर्षों से सशस्त्र हिंसा से संघर्ष कर रही थी। तब बच्चों की हिफाजत खान-पान, शिक्षा और सहज विकास के लिए पुराने अनाथालयों को नए ढंग से तैयार किया गया था। विशेषज्ञों के मुताबिक, कई वर्षों से हिंसा में हो रही वृद्धि के कारण बच्चों द्वारा अनुभव किए जाने वाली गंभीर आघात की स्थिति में एक परंपरागत अनाथालय की भूमिका सीमित हो सकती है।

 

कश्मीर विश्वविद्यालय के मनोचिकित्सक विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर अरशद हुसैन कहते हैं, “कश्मीर में चीजें बहुत तेजी से घटित हुईं। हमने कभी इसके बारे में सोचा नहीं था कि कभी अनाथालय हमारे समय की जरूरत हो जाएंगे।  लेकिन अब यह मूल्यांकन करने का समय है कि क्या ये आश्रयघर अनाथ बच्चों का जीवन शारीरिक और मानसिक स्तर पर बेहतर बना रहे हैं? “

 

इसके अलावा अन्य समस्याएं भी हैं। वर्ष 2013 के बाद से इस अनाथालय में कोई भी एक मेडिकल परिक्षण शिविर नहीं लगा है। यहां के बच्चे अगर बीमार पड़ते हैं तो अनाथालय के अधिकारी उन्हें लेकर स्थानीय अस्पताल जाते हैं। इस संबंध में जब इंडियास्पेंड ने राज्य के सामाजिक कल्याण निदेशक हश्मत अली यातु से संपर्क करना चाहा तो उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

 

बड़ी चुनौती उन बच्चों को परामर्श और चिकित्सा प्रदान करना है, जिन्होंने हिंसक घटनाओं में माता-पिता में से किसी एक को या दोनों को खो दिया है।

 

उनमें से अधिकांश को मनोचिकित्सा की जरूरत है। उन पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है और यह सरकार द्वारा चलाए जाने वाले अनाथालय में उपलब्ध नहीं है।

 

राव फरणान अली अपनी किताब में लिखते हैं “सशस्त्र संघर्ष में हुए अनाथों में, एक अलग भय है जो बाद में घृणा में बदल जाता है। इस पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है – जैसे ग्रुप थेरेपी और  उन्हें समुदाय से जोड़ना ना।  इन अनाथों को खेल गतिविधियों की आवश्यकता होती है ताकि इन्हें भयों से बाहर आने में मदद मिल सके। “

 

अली ने इंडियास्पेंड को बताया कि, “ये बच्चे विभिन्न भय से पीड़ित हैं-अंधेरे का डर सबसे आम है। उन्हें अक्सर यह ख्याल आता है कि उनके माता-पिता अंधेरे में कब्र में हैं। “

 

यहां पर बच्चों को अन्य भय भी होता है, जैसे ऊंचाइयों से, आवाज से आदि।

 

पढ़ाई के साथ संघर्ष जारी

 

हालांकि इन बच्चों को अलग-अलग निजी और सरकारी स्कूलों में भर्ती कराया गया है, लेकिन उनमें से लगभग सभी को पढ़ाने की ज़रूरत है। यहां तक ​​कि फातिमा जैसे बच्चे, जो उनमें सबसे प्रतिभाशाली हैं उन्हें भी और पढ़ाने की आवश्यकता है।

 

“फातिमा का गणित और विज्ञान अच्छा है, लेकिन कभी-कभी उसमें  भी कठिनाइयां आती हैं”, सायमा बताती है। सायमा अपनी पढ़ाई के बाद फातिमा को पढ़ने में मदद करती है।

 

फातिमा कहती है, “हमें विज्ञान और गणित पसंद है, लेकिन जब सायमा मदद करने में असमर्थ होती है तो फिर मेरी मदद के लिए कोई और नहीं होता है।”

 

राज्य के सामाजिक कल्याण विभाग ने दो शिक्षकों को अनाथालय में नियुक्त किया था, लेकिन उन्होंने आतंकवादी कमांडर बुहरन वानी की हत्या के बाद हुए 2016 के विद्रोह के बाद से काम पर आना बंद कर दिया है।

 

वार्डन अख्तर ने कहा, “वे यहां पास के गांव से आते थे और इन बच्चों को आर्ट पढ़ाने और होमवर्क कराने में उनकी मदद करते थे।”

 

विशेषज्ञों का कहना है कि अब पुराने जमाने वाले अनाथालयों को आधुनिक बोर्डिंग स्कूलों में परिवर्तित किया जाना चाहिए, जहां युवाओं को शिक्षा, चिकित्सा देखभाल के साथ-साथ परामर्श भी दिया जाता है ताकि उन्हें पिछली जिंदगी भूल कर आगे के समय को बेहतर बनाने में मदद मिल सके।

 

अनाथालय से जब हम वापस लौटने के ल्ए तैयार हो रहे थे, तभी फातिमा ने मेरा चेहरा छुआ। उसने अपनी मां को याद किया, और कहा, “हम सभी दोस्त हैं, लेकिन मैं सायमा और शबनम के नजदीक हूं।”

 

(नबी स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहती हैं। वह लैंगिक समस्या, संस्कृति, मानव अधिकार और विकास से संबंधित मुद्दों पर लिखती रहती हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 02 सितंबर 2017 में indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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