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फिलहाल अवैतनिक कूड़ा बिनने वालों पर ही टिका है भारत का कचरा प्रबंधन

राजन्या बोस और अनिरबन भट्टाचार्य,

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नई दिल्ली के एक डंप यार्ड में कचरों से फिर से उपयोग किए जाने वाले सामामों को एकत्र करते रैग पिकर्स यानी कूड़ा बिनने वाले । वर्ष 2050 तक, भारत प्रति वर्ष 450 मिलियन टन कचरा पैदा करेगा। कचरा प्रबंधन योजनाओं में कूड़ा बिनने वालों का महत्वपूर्ण भूमिका होगी। कूड़ा बिनने वाले लोगों को पास न तो कोई रोजगार सुरक्षा है, न ही इस पेशे से जुड़ी कोई गरिमा और न ही काम के दौरान खतरों से निपटने का कोई सामान। रैग पिकर्स के स्वास्थ्य पर हमेशा जोखिम बना रहता है।

 

हर रात करीब ग्यारह बजे नई दिल्ली स्टेशन पर अजमेर शताब्दी एक्सप्रेस आती है। अजमेर से दिल्ली तक छह घंटे की यात्रा के दौरान ट्रेन में  यात्रियों को चाय, स्नैक्स, सूप, रात का खाना और मिठाई परोसी जाती है। यानी छह घंटे के लिए एक व्यक्ति की औसत क्षमता से अधिक खाना परोसा जाता है।

 

स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही यात्री उतरना शुरु करते हैं और कूड़ा बिनने वाले छोड़े हुए खाने, कूड़े की सामग्री, प्लास्टिक की खाली बोतलें आदि  चुनने के लिए ट्रेन में चढ़ जाते हैं। वे भारत के कूड़ा बिनने वालों के विशाल समुदाय के हिस्से हैं। एक अनुमान के मुताबिक उनकी संख्या 15 लाख से 40 लाख के बीच है। केवल दिल्ली में ही इनकी संख्या 500,000 है।

 

ये लोग कूड़ा इकट्ठा करते हैं। फिर से इस्तेमाल में लाए जा सकने वाले सामानों की छंटनी करते हैं और उसे बेच कर जीवन यापन करते हैं। इससे वे भारत में सालाना उत्पन्न 620 लाख टन कूड़े को साफ करने में हमारी मदद करते हैं

 

हालांकि कूड़ा बिनना पूरी तरह से एक अव्यवस्थित क्षेत्र है। यहां इस बात को मापना कठिन है कि इस तरीके से कितना कचरा एकत्र किया गया है। लेकिन इसके मोटे तौर पर कुछ संकेतक हैं – भारत में उत्पन्न कचरे का केवल 75-80 फीसदी नगरपालिका निकायों द्वारा एकत्र किया जाता है। और 90 फीसदी से अधिक भारत के पास उचित अपशिष्ट निपटान प्रणाली नहीं है।

 

इस प्रकार काफी कचरा अनौपचारिक रुप से कूड़ा बिनने वालों द्वारा इकट्ठा किया जाता है। कचरा प्रबंधन योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इन कूड़ा बिनने वाले लोगों के पास न तो कोई रोजगार सुरक्षा है, न ही इस पेशे से जुड़ी कोई गरिमा और न ही काम के दौरान खतरों से निपटने का कोई सामान।  उनके स्वास्थ्य पर हमेशा जोखिम बना रहता है। उन पर संक्रमण, सांस की बीमारियों और तपेदिक जैसी बीमारी होने का खतरा तो रहता ही है, साथ ही उन्हें गरीबी, अपमान और  उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अपनी पड़ताल में पाया है।

 

पूर्व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने वर्ष 2015 में नई दिल्ली में कचरा प्रबंधन के एक कार्यक्रम में कहा था, “इस अव्यवस्थित और अनौपचारिक क्षेत्र ने देश को बचाया है। वे काफी अच्छा काम कर रहे हैं और मैंने उनके प्रयासों को पहचानने का फैसला किया है। हम उन्हें नेशनल अवार्ड (ए) प्रदान करेंगे। ”

 

यह घोषणा की गई थी कि  150,000 रुपए ( 2,330 डॉलर) का नकद पुरस्कार तीन कूड़ा बिनने वालों  और अभिनव कचरा प्रबंधन में शामिल तीन संगठनों को दिया जाएगा। लेकिन इस घोषणा के एक वर्ष से भी अधिक समय के बाद भी इसके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

 

भारत के कचरा संकट में वृद्धि तय – वर्ष 2050 तक 4500 लाख टन

 

पर्यावरण मंत्री ने कहा है कि आने वाले कुछ दशकों में भारत वर्तमान की तुलना में तीन गुन ज्यादा कचरा उत्पन्न करेगा। वर्ष 2030 तक 165 मिलियन टन और वर्ष 2050 तक 450 मिलियन टन। लेकिन वर्तमान में केवल एकत्रित 22-28 फीसदी कचरा संसाधित किया जाता है।

 

यह समस्या शहरों में विशेष रूप से बड़ी है। भारतीय शहरों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन कचरा उत्पन्न दर 200 से 870 ग्राम के बीच है। यह दर बढ़ ही रही है। वर्ष 2001 और 2011 के बीच  बढ़ती शहरी आबादी और प्रति व्यक्ति कचरा उत्पन्न में वृद्धि के परिणामस्वरूप भारतीय शहरों में कूड़े में 50 फीसदी की वृद्धि हुई है। सरकार इसे उपभोग के बदलते तरीकों और रहन सहन की आदतों में बदलाव से जोड़कर देख रही है।

 

क्यों कचरा उठाना एक महत्वपूर्ण नागरिक सेवा है?

 

अखिल भारतीय कबाड़ी मजदूर महासंघ के संचालक शशि भूषण पंडित ने मार्च 2016 के इस साक्षात्कार में बताया कि कूड़ा बिनने वाले वास्तव में नागरिक निकायों के काम के पूरक हैं।

 

पंडित कहते हैं, “जिस कानून के तहत एक नगर पालिका स्थापित की गई है, उसमें जनसंख्या के आकार के अनुसार कूड़ेदान का स्थान है। यह माना जाता है कि कूड़ा उत्पन्न करने वाले कूड़े को कूड़ेदान में डालेंगे। उसके बाद, नगरपालिका की यह जिम्मेदारी है कि वह उसे वहां से इकट्ठा करे और लैंडफिल में उसे उपचारित करे। हालांकि स्रोत से कचरा लेने के लिए नगरपालिका की जिम्मेदारी नहीं है। इसलिए इस अनौपचारिक क्षेत्र ने दूरी को भर दिया है। ”

 

नई दिल्ली स्थित एक पर्यावरणीय गैर सरकारी संगठन ‘टॉक्सिक लिंक’ ने कचरा बिनने वालों को चार श्रेणी में बांटा है । एक तो वे हैं, जो बोरियों में खुले नाले और रेलवे डिब्बे से कचरा इकट्ठा करते हैं। दूसरे कबाडी वाले हैं, जो साइकिल से घरों पर जा कर बेकार सामान इकट्ठा करते हैं और फिर ग्लास, कागज और प्लास्टिक से बोतल अलग करते हैं। तीसरे वे हैं , जो तिपहिया वाहनों से आते हैं प्रत्येक दिन लगभग 50 किलो कचरा इकट्ठा करते हैं और उन्हें बेचने के लिए लंबी दूरी की यात्रा करते हैं। और अंत में वे जो स्क्रैप डीलर के रूप में काम करते हैं।

 

‘इंटरनेशनल आर्काइव ऑफ आक्यपेशनल एंड इन्वाइरन्मेन्टल हेल्थ’ से पता चलता है कि यह व्यवसाय इन कूड़ा बिनने वालों की जिंदगी में जहर घोल रहा है।

 

कहीं कोई सम्मान नहीं, सिर्फ अवमानना

 

‘डार्कनेस अंडर द लैंप’ वर्ष 2011 में किया गया एक अध्ययन है, जिसे दक्षिण दिल्ली के एक शहरी गांव मदनपुर खादर में किया गया था। यह अध्ययन ‘सेंटर ऑफ इक्विटी स्टडीज’ के हर्ष मंदर और वी माणिकंद द्वारा किया गया था। उन्होंने पाया कि “रैग पिकर्स यानी कचरा बिनने वालों को अक्सर संदेह के साथ देखा जाता है। उनका उपहास उड़ाया जाता है। सिर्फ इसलिए कि वे गरीब हैं और कचरा बिनने का काम करते हैं।अल्पसंख्यक होने पर अक्सर उनपर बांग्लादेशी होने का भी संदेह किया जाता है।”

 

कचरा बिनने वाले के बच्चे भी अक्सर उसी व्यवसाय में जाते हैं और शायद ही कभी स्कूल जा पाते हैं। सरकार का व्यवहार भी उनके साथ अलग नहीं है। पंडित ने कूड़ा बिनने वालों के लिए समावेशी अधिकार, स्वास्थ्य लाभ, सेफ्टी गियर और सामाजिक सुरक्षा की मांग की है क्योंकि वे सेवाएं प्रदान करते हैं जो पर्यावरण को लाभ पहुंचाते हैं।

 

पंडित कहते हैं, “ कोलंबिया के में हर कूड़ा बिनने वाले को नगरपालिका द्वारा प्रतिदिन $ 2 का भुगतान किया जाता है। ब्राजील ने यह सुनिश्चित किया है कि स्रोत से केवल रैग पिकर्स ही कचरे को उठा सकें । क्या भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता? ”

 

कूड़ा बिनने वाले निर्वासित प्रवासी, ज्यादातर गरीब राज्यों से

 

सितंबर 2016 में  ‘कचरा कामगार यूनियन’ के सहयोग से हम दिल्ली हवाई अड्डे से सटे वसंत कुंज के पास एक कचरा बिनने वालों की कॉलोनी में गए थे। वहां के 250 से अधिक परिवार जीवन यापन के लिए कचरा बिनते हैं।

 

वे लोग सुबह कचरा गाड़ियों के साथ अपने घर से निकलते हैं। उनमें से कुछ लोग वहां काम करते हैं, जहां नगरपालिका निगम कूड़ा जमा करती है। कुछ सड़कों पर जाते हैं और अन्य लोग कबाड़ की तलाश में आस- पड़ोस के इलाके में जाते हैं।

 

प्रत्येक कूड़ा बिनने वाले के पास कहने के लिए अलग कहानी है। लेकिन उन सभी जिंदगी निराशा से भरी हुई है।

 

रणजीत बिहार के भूमिहीन मजदूर हैं । वह दिल्ली रोजगार की तलाश में आए थे। कभी कुंदन दक्षिण दिल्ली के छतरपुर के खेतों में मवेशी चराते थे। एक और शख्स मिला जो दिल्ली हवाईअड्डे पर शौचालय साफ करने का काम करता था।

 

चंद्रिका बिहार में एक बंधुआ मजदूर थी। उसे महीने के काम के लिए डेढ़ किलो सब्जियां मिलती थी। 1985 में वह दिल्ली आई। वह कहती है, “केवल असहाय लोग इस काम में शामिल है। हममें से कुछ ऐसे ठेकेदारों द्वारा अनुबंधित हैं, जो एक ही कमरे में कई लोगों को भर देते हैं । काम के बदले पैसे देते हैं। ”

 

हालांकि, इस कॉलोनी में अधिकांश रैग पिकर्स स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। हमसे बात करने वाले ज्यादातर लोगों ने स्वीकार किया कि उन्होंने कई अन्य कामों में हाथ आजमाया था, लेकिन कूड़ा बिनने के काम में वापस आ गए, क्योंकि यहां पैसा बेहतर है। यहां रहने वाले प्रवासी अपने परिजनों को दिल्ली आने और व्यापार में शामिल होने में भी मदद कर पाते हैं। इसका मतलब था कि बस्ती (पड़ोस) में अधिकांश लोग दो राज्यों से आए थे- बिहार और पश्चिम बंगाल।

 

जिन महिलाओं से हमने बात की वे कूड़ा बिनने बाहर नहीं जाती हैं। वे घर पर ही कूड़े को अलग करने में मदद करती हैं। यहां तक ​​कि 8 से 10 वर्ष की उम्र के बच्चे भी कचरे को छांटने में अपने माता-पिता की मदद करते हैं।

 

इस पेशे से कुंदन कुछ नाराज सा नजर आते हैं, “यदि आप प्रति दिन 12-14 घंटे काम करते हैं तो आप जीवन ठीक से गुजार सकते हैं। लेकिन अब दरें काफी नीचे चली गई है। पांच साल पहले एक बोरी कचरे के लिए हमे 300 रुपए मिलते थे । अब 175 से 200 रुपए तक ही मिलते हैं। आज की तारीख में चावल और सब्जियों की कीमत देखिए… अब गुजारा करना मुश्किल है।”

 

पुलिस उत्पीड़न एक आम शिकायत है। युवा लड़के झूठे आरोपों पर उठाए जाते हैं और उन्हें थाने में पीटा जाता है। कभी-कभी वे मोबाइल फोन या अन्य खोए या चोरी किए गए माल लेते हैं और फिर इस अपराध में गिरफ्तार होते हैं। हालांकि, इस कॉलोनी के लोगों ने कहा कि उनका संघ यह सुनिश्चित करता है कि उन्हें ज्यादा परेशान नहीं किया जाए।

 

“हां, हम कचरा चुनते हैं, लेकिन हम साफ-सुथरी जगह में रहना चाहते हैं !”

 

बाल और प्लास्टिक के सबसे ज्यादा दाम मिलते हैं। लेकिन कचरा छांटना एक कठिन और खतरनाक काम है। एक कचरा बिनने वाला कहता है, “हम बोरियां खोलते हैं और अख़बारों में गंदे सेनेटरी नैपकिन होते हैं, पॉलीथीन में मानव मल, ग्लास, सिरिंज बंधे होते हैं। हमें संक्रमण होता है। सड़ा हुआ भोजन हमें बीमार बना देता है। लेकिन हमारे पास कोई पेंशन नहीं है, कोई मान्यता नहीं, कोई मेडिकल सुविधाएं नहीं हैं। ”

 

जब एक परिवार में मुख्य कमाऊ सदस्य बहुत बीमार हो जाता है, तो उसे ठीक होने के लिए फौरन गांव भेज दिया जाता है। वे आरोप लगाते हैं कि सरकारी अस्पताल उनका इलाज नहीं करना चाहते हैं और महंगा अस्पताल चुनने का विकल्प उनके पास नहीं है।

 

जब भारत में अपशिष्ट यानी कचरे का निपटान होता है, तो यह उन लोगों के लिए बहुत कठिन हो जाता है जो बाद में इसे संभालेंगे। उदाहरण के लिए गंदे डायपर और सैनिटरी नैपकिन दोनों को मेडिकल नजरिये से बेकार माना जाना चाहिए। जैव-चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम- 1998 के अनुसार मल, रक्त, शरीर तरल पदार्थ के साथ किसी भी कचरे को अलग से उपचारित करना चाहिए।  लेकिन आम तौर पर इन्हें एक ही कूड़ेदान में डाल दिया जाता है।

 

वन भूमि पर निर्मित इस कॉलनी में  कोई ठोस घर नहीं हैं । जमीन के मालिक स्थायी निर्माण की अनुमति नहीं देते हैं। केवल एक तिहाई घरों में एक राशन कार्ड है। कॉलोनी में कोई निजी या सार्वजनिक शौचालय नहीं है  और न ही कोई विद्युत मीटर लगाया गया है।

 

उत्तर प्रदेश से आने वाली महिलाओं से हमने कहा कि वे सरकार से कोई सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि छंटाई के बाद बचे हुए कचरे के लिए डब्बों का इंतजाम होना चाहिए। डब्बों के बिना सारा कचरा या तो उनके घरों में जाता रहता है या फिर जमीन के अंदर।

 

एक महिला ने कहा, “पीने के पानी तक हमारी पहुंच होनी चाहिए। हम हर दूसरे दिन पानी की दो बाल्टी खरीदते हैं और प्रति माह 1,000 रुपए का भुगतान उसे करते हैं जिनके पास हैंड पंप है। अगर हमें टैंकर मिले तो हम ठीक से नहा पाएंगे। हां, हम लोग कचरा जरूर चुनते हैं, लेकिन हम उन जगहों पर रहना चाहते हैं, जो जगह साफ-सुथरी हो। ”

 

(बोस और भट्टाचार्य वरिष्ठ शोधकर्ता हैं और नई दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज’से जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 12 मई 2017 को indiaspennd.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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