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फ्लोरोसिस अपंग बना रहा है असम को

अजेरा परवीन रहमान / द थर्ड पोल,

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उपचार के बाद किसी तरह सबिना ‘फ्लोरोसिस’ के प्रभाव से उबर तो गई है लेकिन सबिना उन 1,000 से ज्यादा बच्चों में से एक है, जो पिछले छह वर्षों में फ्लोरोसिस के प्रभाव से अपंग हुए हैं। पानी में फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा से ‘फ्लोरोसिस’ बीमारी होती है, जो व्यक्ति को न तो जीने देती है और न मरने देती है। छवि सौजन्य: धरानी सैकिया

 

उत्तर-पूर्वी राज्य असम के होजई में पिछले छह वर्षों में पांच वर्ष से कम उम्र के 1,000 से अधिक बच्चे फ्लोरोसिस के प्रभाव से अपंग हुए हैं। इसका सबसे स्पष्ट लक्षण पैरों का टेढ़ा होना और दांतों का तिरछा होना है।

 

असम पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (पीएचडी) के अधिकारियों के मुताबिक फ्लोराइड से दूषित होने पर पानी जहरीला हो जाता है और यही बच्चों को अपंगता के दलदल में धकेल रहा है। असम लोक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग (पीएचईडी) ने सबसे पहले 1999 में प्रदूषण और चिकित्सा प्रभावों के बीच के संबंधों की खोज की थी। राज्य में 11 जिलों में 1 मिलीग्राम / लीटर की स्वीकार्य सीमा से पानी में फ्लोराइड का स्तर ज्यादा पाया गया है। एक आधिकारिक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 356,000 लोग जोखिम में हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि आपातकालीन उपाय नहीं किए गए तो यह संख्या और बढ़ेगी।

 

असम पीएचईडी के पूर्व अतिरिक्त मुख्य अभियंता नजीबुद्दीन अहमद के अनुसार कुछ साल पहले होजई जिले में “पांच साल से कम उम्र के एक हजार से अधिक बच्चे फ्लोराइड प्रदूषण के कारण अपंग हो गए।” जिले का मुख्य शहर, जो होजई के नाम से ही जाना जाता है, असम के सबसे बड़े शहर गुवाहाटी से 170 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व पर स्थित है।

 

 

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Map courtesy: Dharani Saikia

 

हाल ही के वर्षों में भूजल के उपयोग में वृद्धि के परिणामस्वरूप फ्लोराइड प्रदूषण का खतरा बढ़ गया है। यह स्थिति केवल होजई की ही नहीं, बल्कि अन्य जगहों की भी है।

 

अहमद कहते हैं, “अगर पीछे मुड़कर देखा जाए तो लोग अपने दैनिक जरूरतों के लिए सतही जल संसाधनों पर अधिक निर्भर थे। आज केवल आबादी का लगभग 15 फीसदी लोग सतह के जल पर निर्भर हैं और 85 फीसदी मुख्य स्रोत के रुप में भूमि के अंदर के जल का उपयोग करते हैं। चूंकि जल तालिका में गिरावट आई है, इसलिए फ्लोराइड जैसी खनिजों की मात्रा भूजल में बढ़ गई है। इससे फ्लोराइड प्रदूषण का खतरा बढ़ गया है। ”

 

एक दशक से इस मुद्दे पर काम करने वाला स्थानीय गैर-सरकारी संगठन ‘एन्वायरन्मेंट कंजर्वेशन सेंटर ’ के सचिव धरानी सैकिया कहते हैं, “फ्लोराइड पानी में पाए जाने वाला एक प्राकृतिक खनिज है लेकिन इसकी मात्रा बढ़ने के कई कारण हैं। जलवायु पैटर्न में परिवर्तन से भी ऐसा हो रहा है। लंबे समय से सूखे के कारण कम पानी जमीन के अंदर जा रहा है और भूजल की पुन: पूर्ति कम हो रही है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से समस्या और गंभीर हुई है।”

 

सैकिया कहते हैं, “बारिश भरपूर होती है, तो फ्लोराइड की मात्रा सामान्य रहती है, लेकिन बारिश कम होने की वजह से इसका स्तर बढ़ता है।”

 

बोरवेल पंप से समस्या में वृद्धि

 

विशेषज्ञों का कहना है कि पानी के जहर बन जाने की कहानी के पीछे हाथ पंपों और बोरवेल पंपों के लिए ड्रिलिंग में वृद्धि होना भी है। भूजल के गिरते स्तर की वजह से ड्रिलिंग गहराई से की जा रही है। ड्रिलिंग के दौरान चट्टानें टूटती हैं और वे भूजल में मिल जाती हैं. चूंकि ये चट्टानें खनिज से भरपूर होती हैं, इसलिए पानी में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ना स्वाभाविक है।

 

सैकिया कहते हैं, “गुवाहाटी में पहले 150-200 फुट की गहराई में पानी निकल आता था, लेकिन शहर में कुकुरमुत्तों की तरह फ्लैट व हाउसिंग सोसायटी बनने के कारण पानी की खपत बढ़ गई. नतीजतन भूजल स्तर 250-300 फुट नीचे चला गया ।”

 

सैकिया बताते हैं कि इसके अलावा खेती में फॉस्फेट और सल्फेट भारी मात्रा में इस्तेमाल पानी में फ्लोराइड की मात्रा को बढ़ा रहा है।

 

असम में पानी के जहरीले होने के कारण का पता लगाने वाले पीएचईडी विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता ए.बी. पॉल बताते हैं कि उन्होंने दुर्घटनावश इसकी खोज की थी। साल 1999 में वे कार्बी आंगलोंग (फ्लोरोसिस से राज्य के सर्वाधिक प्रभावित जिलों में एक) जिले के तेकेलागुइन गांव के आधिकारिक दौरे पर गए थे, जिस दौरान उन्होंने एक लड़की देखी, जिसके दांतों की संरचना अजीब और धब्बेदार थी।

 

कई दूसरे लोगों में भी डेंटल तथा स्केलेटल फ्लोरोरिस के लक्षण धिखे। जांच करने पर मैंने पानी में फ्लोराइड का स्तर 5-23 मिलीग्राम प्रति लीटर पाया, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, इसका स्तर एक मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए।

 

पॉल ने आर्सेनिक का भी पता लगाया था। जिस पर 2004-05 में पीएचईडी और संयुक्त राष्ट्र के बच्चों के फंड द्वारा सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण में पाया गया कि 18 जिलों के लोग जोखिम में हैं।

 

असम पीएचईडी के नृपेन शर्मा के मुताबिक आर्सेनिक का स्तर फ्लोराइड के समान नहीं है। इसका परभाव सामने आने में तीन से चार साल का समय लगता है और इस समस्या की गंभीरता अब तक सामने नहीं आई है।

 

सैकिया ने कहा, “एक अनौपचारिक सर्वेक्षण के मुताबिक, होजई जिले के 285 गांवों में 50,000 बच्चे फ्लोरोसिस (डेंटल या स्केलेटल) से प्रभावित हैं। असम के नागांव तथा होजई में कुल 485 गांव फ्लोराइड प्रदूषण का शिकार है। नागांव और होजई में कुल 485 गांव फ्लोराइड प्रदूषण से पीड़ित हैं।”

 

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Map courtesy: Dharani Saikia

 

कलर कोडिंग जल स्रोत

 

समस्या से राहत के लिए पीएचईडी ने अत्यधिक मात्रा वाले पानी के स्रोतों (जैसे ट्यूवेल) को लाल रंग के साथ चिह्नित किया है। जिससे लोग इसे पीने या खाना पकाने के काम में न लें। चार जिलों में पानी के नमूनों के परीक्षण के लिए प्रयोगशाला को आधुनिक बनाया गया है। ये जिले हैं कार्बी अंगलांग, नागौन, होजई और कामरूप। करबी अंगलांग, नागौन और कामरूप जिलों में सुरक्षित पानी के लिए रिंग कुएं का निर्माण किया गया है।

 

नागौन जिले में ग्यारह गांव पंचायतों को पहले ट्यूबवेल के लिए धन दिए गए थे, अब उन्हें कहा गया है कि वे रिंग वेल बनाएं।

 

होजई में बीमारी का इलाज करने के लिए सैकिया दवाएं बांट रहें है। उनका ध्यान आकाशगंगा गांव पंचायत पर ज्यादा है। इस पंचायत के पांच गांव फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं।

 

वैसे यह समस्या एक बड़ी  चुनौती है।  स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत फ्लोरोसिस की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम के दिशा-निर्देश पर गौर करें तो उसमें भी इस बात को प्रमुखता से स्वीकार किया गया है कि  उच्च स्तर के फ्लोराइड के संपर्क के कारण शरीर की हड्डियों में क्षति की भरपाई संभव नहीं।

 

सैकिया कहते हैं, “ कैल्शियम, विटामिन डी, मैग्नीशियम और जिंक का सरल संयोजन बना कर मैं सात साल से कम उम्र के बच्चों को दे रहा हूं। परिणाम सकारात्मक देखे गए हैं। ”

 

सैकिया इस समस्या से निजात के लिए बहुत गंभीर हैं-“मैंने वर्ष 2005 में 20 बच्चों के साथ शुरू किया था और अब वहां 40 बच्चे हैं। इनमें से पांच पूरी तरह से ठीक हो गए हैं, और बाकी के जो लक्षण दिख रहा है, उससे लगता है कि वे भी जल्द ही स्वस्थ हो जाएंगे।”

 

सैकिया कहते हैं कि लोग शुरू में दवा पर विश्वास नहीं करते थे। उन्हें  यह मजाक लगता था। लेकिन अंततः जब उन्हें राहत मिली तो लोगों का भरोसा बढ़ा।

 

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जकीर फ्लोरोसिस से प्रभावित था। उसकी ये तस्वीरें चाल साल की हैं। फ्लोरीओसिस के कुछ प्रभावों को ठीक करने के लिए वर्षों तक दवा खानी पड़ती है। (छवि सौजन्य: धरानी सैकिया)

 

पॉल कहते हैं, “ इस मामले में शुरुआत में डॉक्टरों को पोलियो या रिकेट्स के लक्षणों का भ्रम हुआ था। पॉल ने पहली बार गांवों में विटामिन गोलियों के साथ उपचार शुरू किया था। लोगों को और सरकार को समझाने के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी है।

 

सैकिया कहते हैं, “ मुझे विश्वास है कि इस समस्या का अंतिम समाधान प्रकृति में वापस जाने में निहित है। हम निर्माण और कृषि के लिए जल निकायों को समाप्त कर रहे हैं। सतह जल थोड़े बहुत उपचार के बाद मनुष्य के लिए सबसे सुरक्षित है। ”

 

(रहमान एक स्वतंत्र पत्रकार है और असम में रहते हैं। यह लेख thethirdpole.net के सौजन्य से है। यह वेबसाइट एशिया के जल संकट पर आधारित है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 11 मई 2017 को indiaspend.com पर प्रकशित हुआ है।

 

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