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बजट में स्कूली शिक्षा के लिए अवसर और संकट से उबरने का रास्ता

श्रेया शाह,

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वर्ष 2017-18 का बजट सरकार के लिए स्कूली शिक्षा में सुधार लाने के लिए एक अच्छा मौका हो सकता है। हम बता दें कि वर्ष 2015-16 में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में 26.05 करोड़ बच्चों ने दाखिला लिया है। ये वे बच्चे हैं, जिनसे वर्ष 2030 तक भारत की 100 करोड़ की कामकाजी आबादी बनेगी। ये आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा होंगे।

 

भारत के वित्त मंत्रालय के साथ बजट पूर्व परामर्श बैठक में गैर लाभकारी संस्था ‘प्रथम’ ने सुझाव दिया है कि “हमेशा की तरह व्यवसाय” जैसे नजरिया से समस्या का समाधान नहीं होगा। ‘प्रथम’ द्वारा दिए गए परामर्श नोट के अनुसर, “जब तक बच्चों में मूलभूत दक्षता के विकास के लिए तत्काल बड़े बदलाव नहीं किए जाएंगे, तब तक हमें यह मान लेना चाहिए कि इस देश में बच्चों और युवाओं की एक पूरी पीढ़ी के जीवन में अवसरों के वर्ष कम हो रहे हैं।”

 

इंडियास्पेंड ने वर्ष 2017-18 के बजट पर टिप्पणी के लिए शिक्षा मंत्रालय से संपर्क किया, लेकिन यह लेख प्रकाशित होने तक हमें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।

 

वर्ष 2015-16 बजट की तुलना में पिछले साल के बजट में 13 फीसदी वृद्धि के साथ पिछले साल के शिक्षा बजट में उच्चतर शिक्षा का प्रभुत्व रहा है। साथ ही शिक्षा से संबंधित संवाद जैसे कि उच्च शिक्षा की रैंकिंग गुणवत्ता में सुधार, उच्च-शिक्षा के वित्त पोषण एजेंसी का सृजन, और नए उच्च शिक्षा संस्थानों की मंजूरी भी की गई है। यहां हम यह भी बताते चले कि 2014-15 में केवल 3.42 करोड़ छात्रों ने या स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की तुलना में सातवें हिस्से ने उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिला लिया है।

 

इसके विपरीत, केंद्रीय बजट के आंकड़ों के अनुसार स्कूल शिक्षा और साक्षरता बजट 2015-16 के संशोधित बजट अनुमान की तुलना में वर्ष 2016-17 में 3.2% की वृद्धि हुई।

 

वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान, केंद्र सरकार ने, स्कूल शिक्षा और साक्षरता के लिए 43,554 करोड़ रुपए और उच्च शिक्षा के लिए 28,840 करोड़ रुपए आवंटित किए थे।

 

2016-17 में कुल यूनियन शिक्षा बजट में 7.1 फीसदी की वृद्धि

Source: Union Budget 2016-17: School Education & Literacy, Higher Education

 

स्कूलों के नतीजों से प्राथमिक शिक्षा त्रस्त

 

वर्ष 2014 में, हालांकि  प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ने, लिखने और गणित में सुधार करने के लिए सरकार ने ‘पढ़े भारत, बढ़े भारत’ कार्यक्रम लागू किया है, लेकिन सीखने के नतीजों के आंकड़े ग्रामीण स्कूलों में सुधार नहीं दर्शाते है। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक और निजी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा कम नतीजों से त्रस्त है। शिक्षा पर वार्षिक स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में कक्षा 1 के 46.1 फीसदी ग्रामीण बच्चे अक्षर पढ़ना नहीं जानते थे, जबकि 39.9 फीसदी 1 से 9 की संख्या पहचान नहीं सकते थे।

 

यदि बच्चों के पास पढ़ने, लिखने, समझने और गणित कौशल जैसे बुनियादी शिक्षा नहीं हैं तो भारत के पास एक ऐसे लोगों की जमात होगी, जिनका विकास में योगदान नहीं के बराबर होगा, वे काम पर रखे जाने के योग्य नही होंगे और उच्च शिक्षा या कौशल विकास के लिए तैयार नहीं होगा।

 

सही कक्षा के स्तर पर भारतीय स्कूलों में बच्चे नहीं सीख रहे हैं

Source: Annual Status of Education Report 2016

 

संस्था ‘प्रथम’ की मुख्य कार्यकारी अधिकारी, रुक्मिणी बनर्जी ने इंडियास्पेंड को लिख एक ई-मेल में कहा है कि, “यह स्पष्ट है कि उच्च शिक्षा में सुधार और गुणवत्ता के लिए प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में अधिक ध्यान केंद्रित करने और निवेश की आवश्यकता है।”

 

शिक्षा का निम्न स्तर, उच्च माध्यमिक स्कूल के नामांकन में गिरावट के रुप में भी दिखाई देता है। एकीकृत शिक्षा जिला सूचना प्रणाली के आंकड़ों के अनुसार, 2015-16 में, प्राथमिक स्कूल उम्र के 88.94 फीसदी छात्रों ने प्राथमिक स्कूल में दाखिला लिया है, जबकि माध्यमिक स्कूलों में माध्यमिक उम्र के 51.26 फीसदी छात्रों ने दाखिला लिया है।

 

स्कूल नतीजों में सुधार पर केंद्रित हो वर्ष 2017-18 का बजट

 

बजट का फोकस शिक्षा पर खर्च राशि में वृद्धि के साथ-साथ सीखने के नतीजे और गुणवत्ता की निगरानी पर भी होना चाहिए।

 

नई दिल्ली की एक गैर लाभकारी संस्था ‘अकाउन्टबिलिटी इनिशटिव’ की शोधकर्ता अवनि कपूर कहती हैं, “सीखने की जरूरत पर काफी कम अनुपात में खर्च किया जाता है, जबकि स्कूल और किताबों पर ज्यादा खर्च होता है।” उन्होंने बताया कि नीति आयोग ने स्कूल शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक का इस्तेमाल करते हुए राज्यों में रैंकिग शुरु करने की योजना बना रही है। स्कूल शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक स्कूल में सीखने के नतीजे को दर्शाएगा। वह कहती हैं कि, “सीखने के नतीजों के तरफ बजट को मोड़ने से यह एजेंडा और प्रभावी होगा।”

 

इसके अलावा, निर्णय लेने में देरी और फंड के मिलने में देरी का असर कार्यक्रम कार्यान्वयन में हुआ है, जैसा कि ‘प्रथम’ द्वारा वित्त मंत्रालय को दिए गए नोट में कहा गया है। हालांकि अधिकांश स्कूलों में अध्ययन वर्ष अप्रैल में शुरु होता है, लेकिन सीखने को रोचक बनाने का कार्यक्रम अक्सर सितंबर और नवंबर के बीच लागू किया जाता है, जिससे समय बर्बाद होता है।

 

सरकार नियमित रुप से सीखने के नतीजों की निगरानी नहीं रखती है। उदाहरण के लिए, स्कूलों के वार्षिक रिपोर्ट में नामांकन से संबंधित जानकारी और शिक्षकों की संख्या शामिल होती है। उसमें शिक्षा की गुणवत्ता शामिल नहीं की जाती है।

 

सरकार ने वर्ष 2013 में स्कूल स्टैन्डर्ड एंड इवैल्यूऐशन प्रोग्राम शुरू किया था, जो कि स्कूलों द्वारा आत्म मूल्यांकन और स्कूल की परीक्षा पर आधारित था। कार्यक्रम के साथ काम करने वाले व्यक्ति के अनुसार, अब तक कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की गई है, क्योंकि सरकार अब तक राज्यों से जानकारी एकत्र  नहीं कर पाई है।

 

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, “सीखने का एक सरकारी पैमाना ‘राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण’ अब हर तीन वर्ष की बजाय हर साल किया जाएगा।”

 

लेकिन शिक्षा मंत्रालय को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य अच्छी तरह से माप का संचालन करे और उपलब्ध आंकड़ों को सीखने में सुधार के लिए उपयोग में लाए। ऐसा सुझाव ‘प्रथम’ ने वित्त मंत्रालय को दिए गए पूर्व बजट नोट में लिखा है।

 

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वर्ष 2016-17 के लिए गतिविधियों ,नामांकन, लैंगिक समानता इत्यादी पर प्रभाव को देखते हुए एक परिणाम बजट तैयार किया है। लेकिन वहां सीखने के स्तर पर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है। बजट में बिना किसी विशेष उपायों के साथ  “अधिकतम सीखने के स्तर और प्रतिधारण” को रेखांकित किया गया है।

 

‘अकाउन्टबिलिटी इनिशटिव ’ की शोधकर्ता अवनि कपूर का सुझाव है कि एक रास्ता बजट के माध्यम से सीखने के नतीजों में सुधार का हो सकता है। उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार राज्यों को 10 फीसदी सहायता केवल तभी प्रदान करे, जब वे पहले से तय कुछ नतीजों को हासिल करे या सीखने के लक्ष्य को हासिल करे।

 

अन्य ब्रिक्स देशों की तुलना में भारत में शिक्षा पर कम खर्च

 

वर्ष 2016-17 में, स्कूल शिक्षा पर केंद्रीय सरकार का कुल शिक्षा खर्च भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 2.68 फीसदी था। यह जानकारी नई दिल्ली स्थित बजट अनुसंधान और वकालत संगठन, ‘सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउन्टबिलिटी’ (सीबीजीए) द्वारा किए गए गणना में सामने आई है।

 

वर्ष 2015-16 में, स्कूल और उच्च शिक्षा पर भारत का खर्च अन्य ब्रिक्स देशों की तुलना में कम था। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3 फीसदी शिक्षा पर खर्च किया गया था, जबकि रुस में 3.8 फीसदी, चीन में 4.2 फीसदी और दक्षिण अफ्रिका में 6.9 फीसदी खर्च किया गया है।

 

सीबीजीए की प्रमुख शोधकर्ता प्रोतिवा कुंडू कहती हैं, “स्कूल की शिक्षा के लिए वित्तीय संसाधन बढ़ाने की तत्काल जरुरत है।” 10 राज्यों के शिक्षा बजट के विश्लेषण के आधार पर उनका मानना है कि सभी राज्यों के लिए शिक्षा प्राथमिकता नहीं है।

 

वर्ष 2017-18 का केंद्रीय शिक्षा बजट पिछले साल के बजट से 10 से 12 फीसदी ज्यादा हो सकता है, जैसा कि जनवरी 2017 की लाईव मिंट की यह रिपोर्ट कहती है।

 

इंडियास्पेंड के बजट प्राइमर का यह पहला लेख है। हम अपने ट्वीटर टाइमलाइन पर यहां 01 फरवरी, 2017 को बजट के दौरान दिए गए बयानों की तथ्यात्मक समीक्षा करेंगे।

 

(शाह लेखक / संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 25 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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