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बढ़ती उम्र में भारतीय चाहते हैं सरकार से सर्वभौमिक पेंशन

किंजल संपत और नंदिनी डे,

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भारत की 86 करोड़ मजबूत कामगार आबादी (15-64 वर्ष) लगातार उम्र की ओर बढ़ रही है।अगले 33 वर्षों में यानी वर्ष 2050 तक 3.24 करोड़ भारतीय या आबादी का 20 फीसदी  60 साल से ऊपर हो जाएगा।

 

मौजूदा स्थिति के तरह यदि पेंशन केवल 35 फीसदी वरिष्ठ नागरिकों को देना जारी रहता है तो वर्ष 2050 तक भारत के 2 करोड़ या 61.7 फीसदी बुजुर्ग आबादी किसी भी आय सुरक्षा के बिना होगी।

 

60 साल से अधिक उम्र और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले हर भारतीय को केंद्र सरकार ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना’ (आईजीएनओएपीएस) के तहत प्रति माह 200 रुपए का भुगतान करती है। हम बता दें कि तेंदुलकर समिति के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति दिन 33 रुपए और शहरी क्षेत्रों में प्रति दिन और 27 रुपए खर्च करने की क्षमता को गरीबी रेखा के रुप में वर्णित किया गया है। राज्यों को इस राशि में जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और वे कवरेज के विस्तार के लिए स्वतंत्र हैं। वर्तमान में, राज्य सार्वजनिक पेंशन के रूप में 200 से 2,000 रुपए के बीच भुगतान करते हैं।

 

क्या सार्वजनिक पेंशन सार्वभौमिक होना चाहिए? एक सार्वजनिक, गैर-अंशदायी पेंशन द्वारा क्या न्यूनतम पेशकश की जानी चाहिए? किस उम्र से यह दी जानी चाहिए? वृहद लोगों के विचारों के माध्यम से इन सवालों के जवाब पाने के लिए, अगस्त-नवंबर 2016 में नई दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज’ (सीईएस) द्वारा गुजरात और राजस्थान में एक अध्ययन किया गया।

 

अध्ययन अब तक प्रकाशित नहीं किया गया है। इसमें गुजरात और राजस्थान के 14 स्थानों से 55 साल की आयु से ऊपर 1,505 लोगों के विचार और अनुभव को एकत्र किया गया है। इस राज्यों को इसलिए चुना गया, क्योंकि वे सार्वभौमिकता के बहस में स्पेक्ट्रम के दो सिरे का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) रैंकिंग में गुजरात, भारत का 10 वीं सबसे अमीर राज्य है।

 

अध्ययन किए जाने वाले समय में गुजरात गरीबों को केवल 400 रुपए का एक लक्षित पेंशन प्रदान कर रहा था। अब इसे 500 रुपए में संशोधित किया गया है। राजस्थान जीडीपी सूची में 23 वें स्थान पर है और सभी वरिष्ठ नागरिकों को लगभग 500 रुपए का भुगतान किया जाता है।

 

अध्ययन में पेंशन नीति और जनमत के बीच एक व्यापक और निर्णायक अंतर पाया गया है। दोनों राज्यों में राय सर्वसम्मत थी कि सार्वजनिक पेंशन को सभी बुजुर्गों तक बढ़ाया जाना चाहिए और 60 वर्ष की आयु से पहले शुरू किया जाना चाहिए। लोकप्रिय दृष्टिकोण 2,000 रुपए की एक पर्याप्त पेंशन राशि थी, जो उनके वर्तमान राशि से चार से छह गुना अधिक है।

 

लिंग, जाति, पारिवारिक पृष्ठभूमि के भीतर लोगों को सार्वभौमिक पेंशन चाहिए

 

गुजरात में केवल गरीब वरिष्ठ नागरिक सार्वजनिक पेंशन के हकदार होते हैं। राजस्थान में लगभग सार्वभौमिक पेंशन के अधिकार हैं, जिसमें 55 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं और 58 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों को पेंशन प्राप्त होती है, जब तक कि वे किसी अन्य स्रोत से पेंशन के हकदार नहीं होते हैं या करदाता नहीं होते हैं।

 

सार्वभौमिकता के खिलाफ तर्क ये बताते हैं कि इसकी लागत आम तौर पर उन लोगों के लिए पात्रता कम कर रही है, जिनके लिए इसे सबसे अधिक आवश्यकता है। लक्ष्यीकरण उन लोगों के लिए सार्वजनिक निधियों का उपयोग करने की अनुमति देता है, जिनके लिए उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता है।

 

स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर तर्क हैं, जो सार्वभौमिकता को नैतिक-राजनीतिक दावे की मजबूती और जनता की अच्छी सेवा के साथ जोड़कर देखते हैं।

 

पेंशन सर्वभौमिक हो या लक्षित?

Source: Centre for Equity Studies

Note: Respondents in Rajasthan = 791; in Gujarat = 714. Decimals are rounded off.

 

सर्वेक्षण के परिणाम से पता चलता है कि सार्वभौमिकरण के मुद्दे पर जनमत नीति से अलग है।
 

गुजरात से जहां लक्षित सार्वजनिक पेंशन योजना का अनुभव है, अधिकांश उत्तरदाताओं (83 फीसदी) राजस्थान (81 फीसदी) के उन लोगों के साथ समझौते में थे जिन्होंने करीब पांच साल तक एक सार्वभौमिक पेंशन योजना का अनुभव किया है। सार्वभौमिकरण के समर्थन में जनता की राय स्पष्ट रूप से तिरछी है।

 

अकेले रहने वाले बुजुर्गों के साथ परिवारों के साथ रहने वाले बुजुर्ग भी पेंशन के सार्वभौमिकरण का समर्थन करते हैं।  यह एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष है, क्योंकि 2007 तक, राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना में अभावग्रस्तता को सार्वजनिक पेंशन के लिए हकदार होने के लिए एक कारण और एक शर्त दोनों के रूप में माना गया है। गुजरात में अभावग्रस्तता को शर्त के रुप में माना जाना जारी है। जिन वरिष्ठ नागरिकों को 21 साल से अधिक उम्र के बेटे हैं, वे सार्वजनिक पेंशन के लिए योग्य नहीं माने जाते हैं।

 

महिलाओं और पुरुषों, दोनों में सार्वभौमिकरण के लिए समर्थन समान पाया गया है। यह समर्थन अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्गों और अन्य जातियों के बीच भी सुसंगत था। इनमें से प्रत्येक समूह में लगभग 82 फीसदी लोग सार्वभौमिकता का समर्थन करते हैं। अनुसूचित जातियों से संबंधित लगभग 95 फीसदी लोगों ने सार्वभौमिकता का समर्थन किया।

 

पारिवारिक संरचना / समर्थन अनुसार पेंशन के सार्वभौमिकरण पर विचार

Source: Centre for Equity Studies

Note: Respondents in Gujarat = 631; in Rajasthan = 765. ‘No Opinion’ set as missing. Decimals are rounded off.

 

2,000 रुपए हैं पर्याप्त, वर्तमान पात्रता से चार से छह गुना

 

आय में कमी और तुलनात्मक रूप से आय-पैदा करने के अवसरों के प्रतिबंधित होने के कारण  एक अच्छे जीवन जीने के लिए पेंशन मिलना आवश्यक है।  अध्ययन के समय, गुजरात में लाभार्थी 400 रुपए प्रति माह और राजस्थान, 500 रुपए के हकदार थे।

 

75 वर्ष की आयु से अधिक लाभार्थी प्रति माह 750 रुपए के हकदार थे। दिए जाने वाले इन पेंशन में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले वृद्ध भारतीयों को अनुमति नहीं दी गई है। इन क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को रिटायर होने के बाद सार्वजनिक पेंशन की सबसे ज्यादा जरुरत है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 20अप्रैल,2017 की रिपोर्ट में बताया है। ये अधिकार तेंदुलकर समिति के अनुसार ग्रामीणों में सबसे कम आधिकारिक गरीबी रेखा खपत स्तर 27 रुपए और शहरी प्रति दिन 33 रुपए का समर्थन नहीं करते हैं।

 

राजस्थान और गुजरात के सभी लोगों ने राशि के बारे में चिंता जताई है। राजस्थान में 3 फीसदी से कम और गुजरात में 13 फीसदी ने प्रति माह 750 रुपए या उससे कम के बराबर आंकड़ा पर्याप्त बताया है। एक तिहाई से कम ने 1,000 रुपए प्रति माह से कम आंकड़े का उल्लेख किया है।

 

लोगों के अनुसार, एक सम्मानित जीवन सुनिश्चित करने के लिए कितनी राशि मिलनी चाहिए? अध्ययन में पाया गया कि राजस्थान में औसत मासिक ‘पर्याप्त’ पेंशन राशि 1,875 रुपए थी जबकि गुजरात में यह 2,494 रुपए था। सबसे अक्सर होने वाली प्रतिक्रिया, मोडल वैल्यू राजस्थान में 1,000 रुपए और गुजरात में 2,000 रुपए थे। इस गणना में पुरुषों और महिलाओं के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था।

 

पर्याप्त मासिक पेंशन क्या है?

Source: Centre for Equity Studies

Note: Respondents in Gujarat = 714; in Rajasthan = 791

 

लिंग के अनुसार- पर्याप्त मासिक पेंशन पर विचार

Source: Centre for Equity Studies

Note: Respondents in Rajasthan = 751; Gujarat = 698. ‘No Opinion’ set as missing. Decimals are rounded off.

 

यह राशि वर्तमान न्यूनतम वेतन के आधे से कम है। नागरिक समाज समूह पेंशन परिषद ने पात्रता की राशि के संबंध में ऐसी ही मांग की है।

 

बोलीविया एक देश है जिसकी छोटी अर्थव्यवस्था है, लेकिन अन्य आर्थिक संकेतकों पर भारत के बराबर है। यह देश, अपने पेंशन कार्यक्रम रेंटा डिनिग्दाद के हिस्से के रुप में 38 डॉलर प्रति महीने यानी 2,400 रुपए से थोड़ा अधिक की पेशकश करता है।

 

बोलीविया जैसे सभ्य पेंशन कार्यक्रमों की तरह अधिकांश देश प्रति व्यक्ति जीडीपी का 15 से 25 फीसदी के बराबर एक पात्रता राशि सुनिश्चित करते हैं।
 

पारिवारिक / सामाजिक समर्थन और एक लाभार्थी द्वारा इच्छित पेंशन की राशि एक प्रतिकूल ज्ञान युक्त संबंध साझा करते हैं।  खुद का ख्याल रखने वाले बुजुर्ग उत्तरदाताओं ने परिवार की देखभाल की तुलना में लगातार छोटी राशि का उद्धरण किया। यह फ़ील्ड अवलोकन के साथ फिट बैठता है-बहुत पुराने नागरिकों ने नोटबुक या पोते के लिए एक फल के रूप में क्षुद्र जरूरी चीजें खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी या बीमार परिवार के सदस्य के चिकित्सा व्यय का भुगतान करने के लिए इच्छा बताई। उन्होंने व्यक्तिगत रुप इन छोटे खर्चों का भुगतान करने मे अक्षमता बताई।

 

पारिवारिक संरचना / समर्थन अनुसार एक पर्याप्त मासिक पेंशन पर राय

Source: Centre for Equity Studies

Note: Respondents in Rajasthan = 781; in Gujarat = 700. ‘No Opinion’ is set as missing. Decimals are rounded off.

 
पहले पेंशन शुरु करने की सबकी इच्छा
 

ऐसे कई कारक जैसे औसत जीवन प्रत्याशा, समाज की आयु संरचना और शारीरिक शोष, जिस पर पेंशन शुरू की जाती है, उसे सूचित करना चाहिए। कई औद्योगिक रूप से उन्नत देशों की तरह आईजीएनओएपीएस ने 60 साल की उम्र में पेंशन शुरू की है। लेकिन औद्योगिक रूप से उन्नत देशों की तुलना में भारत में औसत आयु -68 वर्ष-बहुत कम है। हमने अपने शोध के दौरान लोगों से पूछा कि क्या उन्होंने सोचा कि पेंशन को पहले या बाद में पॉलिसी द्वारा निर्धारित नीतियों के अनुसार शुरू किया जाना चाहिए।

 

अधिकांश लोगों को लगा कि पहले की उम्र में पेंशन शुरू की जानी चाहिए। राजस्थान में एक-चौथाई उत्तरदाताओं और गुजरात के उत्तरदाताओं के करीब एक-पांचवे उत्तरदाताओं ने कहा कि पेंशन के अधिकार प्रदान करने वाली आयु के साथ कोई समस्या नहीं है। पहले के प्रश्नों के मुताबिक, लिंग, राय पर महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं डालता, लेकिन दोनों राज्यों में महिलाओं की मामूली उच्च संख्या पेंशन के पहले दिए जाने का समर्थन करती है।

 

किस उम्र में शुरु की जानी चाहिए पेंशन?

Source: Centre for Equity Studies

Note: Respondents in Rajasthan = 791; in Gujarat = 714. Decimals are rounded off.

 

लिंग अनुसार, पेंशन की शुरु करने की उम्र

Source: Centre for Equity Studies

Note: Respondents in Rajasthan = 741; in Gujarat = 630. ‘No Opinion’ set as missing. Decimals are rounded off.

 

नीति और जनमत के बीच विचलन सभी तीन मापदंडों में पाया गया है- सार्वभौमिकरण, पर्याप्तता और साथ ही जिस आयु में पेंशन शुरू की जाती है। यह सार्वभौमिकता और पर्याप्तता के मुद्दे पर है कि पेंशन की आयु शुरु होने की तुलना में पॉलिसी से उच्च स्तर की विचलन है। हम मानते हैं कि नीति निर्माताओं द्वारा व्यावहारिक बाधाओं के कारण जनमत पूरी तरह से संरेखित करना संभव नहीं हो सकता है, लेकिन यह लोगों की राय और बुजुर्गों की आवाज़ के साथ जनमत के आधार पर उम्र-आधारित पेंशन पर बहस शुरू करने का  एक प्रयास है।

 

यह अध्ययन राजस्थान में अस्था संस्थान, उन्नति और मजदूर किसान शक्ति संगठन के साथ साझेदारी और गुजरात में आनंदी और महिला आवास सेवा ट्रस्ट के साथ शुरु किया गया था। संदीप घूसले ने गुजरात के मालिया में सर्वेक्षण का समन्वय किया। वृद्धों के लिए पेंशन पर अधिक विस्तृत चर्चा सीईएस और यदा प्रेस द्वारा मई 2017 में जारी की गई इंडिया एक्सक्लुशन रिपोर्ट 2016 में देखा जा सकता है।

 

(संपत एक शोधकर्ता है और दिल्ली में रहते हैं। नंदिनी एक शोधकर्ता हैं और दिल्ली के ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज’ के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 14 जून 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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