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बदहाल उत्तर प्रदेश- 11 साल में जलस्तर 9 गुना नीचे

मनीष मिश्रा, गांव कनेक्शन एवं सौम्या तिवारी,

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उत्तर प्रदेश में भूजल स्तर गिरने एवं जल संकट बढ़ने का संकेत, चित्र: गांव कनेक्शन / शुभम सिंह

 

अलीगढ़ ज़िला ( उत्तर प्रदेश ) : पिछले तीन सालों से 57 वर्षीय सुखदेव गर्ग के रोज़ाना दो घंटे अपने खेत के बाहर पानी निकालने की जदोजहद में बीतते हैं। सुखदेव गर्ग पश्चिम उत्तर प्रदेश के बिरौला गांव में रहते हैं जो कि राज्य की राजधानी से मात्र 350 किलोमीटर की दूरी पर है। सुखदेव गर्ग के रोज़ दो घंटे खेतों की सिंचाई के लिए बोरवेल से पानी निकलने के इंतज़ार में निकलते हैं।

 

सुखदेव गर्ग के बढ़ते इंतज़ार का कारण जल स्तर का काफी नीचे गिर जाना है। पिछले तीन सालों में बिरौला का जल स्तर 8 फीट नीचे गिर गया है। इसलिए बोरवेल के ज़रिए ज़मीन के भीतर से पानी निकालने में घंटों लग जाते हैं।

 

सुखदेव गर्ग की हालत से पूरे उत्तर प्रदेश की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पानी के लगातार खपत एवं बढ़ती मांग से जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। साल 2000 से 2011 के बीच भू-जल संकट में नौ गुना की वृद्धि दर्ज की गई है। केन्द्रीय भू-जल समिति के अनुसार साल 2000 में जहां उत्तर प्रदेश के 20 ब्लॉक पानी के सकंट से जूझ रहे थे वहीं साल 2011 में ऐसे ब्लॉकों की संख्या 179 हो गई है। भू जल के गिरते स्तर एवं पानी के गहराते संकट पर लखनऊ क्षेत्रीय कार्यालय ने भी चिंता जताई है।

 

ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश में भूजल की कमी है। मिट्टी और पत्थरों के नीचे का जल नदी-झील और बारिश के पानी से भरता है। लेकिन पानी के अंधाधुन खपत से समस्या बढ़ती जा रही है। जिस रफ्तार से पानी का उपयोग किया जा रहा है उस तेजी से जल की पूर्ती नहीं हो पा रही है।

 

Groundwater Availability In Uttar Pradesh (In Billion Cubic Metres)
Annual replenishable groundwater Natural discharge during non-monsoon season Net annual ground- water availability Annual groundwater draft Projected demand for domestic and industrial uses upto 2025 Ground- water availability for future irrigation
Monsoon season Non – monsoon season Total Irrigation Domestic and industrial uses Total
Recharge from rains Recharge from other sources Recharge from rains Recharge from other sources
42 12 5 18 77 6 72 49 4 53 7 20

Source: Central Ground Water Board

 

उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के अनुसार राज्य 4.2 मिलियन नलकूप, 2,500 गहरे कुएं, 30,000 सरकारी नलकूप सिंचाई के लिए ज़मीन के अंदर से लगातार पानी निकाल रहे हैं। यही वजह है किभू-जल बोर्ड रिपोर्ट में आज के मुकाबले सिंचाई के लिए भू-जल 59 फीसदी कम मिलने का अंदेशा लगाया गया है।

 

सिंचाई विभाग कहता  है कि सिंचाई के लिए 70 फीसदी पानी भू-जल श्रोत से मिलता है। इंडियास्पेंड ने उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से अपनी खास रिपोर्ट में पहले ही बताया है कि यदि पानी का संकट इसी प्रकार बरकरार रहा तो किसानों की स्थिति और बद्तर हो जाएगी।

 

लखनऊ से जारी किए गए केन्द्रीय भू-जल समिति ने एक बयान में कहा है कि “ यदि पानी की बढ़ती मांग वर्तमान रफ्तार से चलती रही तो भू-जल संसाधन सामरिक रुप से खनीज एवं पेट्रोलियम संसाधन जैसे हो जाएंगे। अंधाधुन वनों की कटाई और जलग्रहण क्षेत्रों में पहाड़ी ढलानों के रुपान्तर से इलाके के जल चक्र पर काफी प्रभाव पड़ा है”।

 

विकास से कैसे बढ़ रहा है संकट

 

इंडियास्पेंड से हाल ही विस्तार रुप में बताया था कि कैसे उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में कृषि के लिए पानी की अंधाधुन बढ़ती मांग एवं राज्यों की बढ़ती आबादी भूजल का स्तर लगातार नीचे गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसग्राफिक्स से साफ है कि देश का लगभग आधा हिस्सा ‘अत्यधिक’ पानी की समस्या से जूझ रहा है। एक अध्ययन के अनुसार गंगा-ब्रह्मपुत्रा बेसिन की उपजाऊ मैदानी इलाकों केअधिकांश क्षेत्रों में सिंचाई के लिए ‘तीव्रता से भूजल’ निकासी की जा रही है।

 

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उत्तर प्रदेश में सूखे हुए सिंचाई नहरें। नहरे सूखने से भूजल की मांग बढ़ रही है। चित्र: गांव कनेक्शन / शुभम श्रीवास्तव

 

देश के उत्तरी राज्यों के हिस्से में मिट्टी के कम पानी रिसने का एक कारण अत्यधिक उर्वरक एवं ट्रैक्टर का इस्तेमाल करना है। अत्यधिक उर्वरक एवं ट्रैक्टर के उपयोग से मिट्टी सुराखदार बन जाती है। विशेषज्ञ झील एवं नदी के किनारे की ज़मीन पर खेती करने की सलाह देते हैं ताकि बारिश के पानी से आसानी से सिंचाई किया जा सके।

 

हिमांशु ठक्कर , साउथ एशिया नेटवर्कस ऑन डैम्स, रिवर एवं पिपल के समन्वयक , के अनुसार “जैविक खाद का अधिक से अधिक उपयोग और रासायनिक उर्वरकों का कम उपयोगकरने से मिट्टी का संकुचना कम एवं संरधता बढ़ा सकते हैं। पानी के संकट से उबरने के लिए हमें भूजल पुनर्भरण तकनीक भी सीखने की आवश्यकता है”।

 

ठक्कर का मानना है कि जल नीतियों, कार्यक्रमों और प्रथाओं को भूजल पुनर्भरण एवं निकासी को विनियमित करने की ओर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। शायद कम पानी और कम रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करने वाले व्यवस्थित फसल पैटर्न और विधियों को प्रोत्साहन की पेशकश करने से स्थिति में सुधार लाया जा सकता है। स्थिति और संकटमय लगती है जब ऐसा कोई प्रमाण सामने देखने को नहीं मिलता कि राज्य या उत्तर प्रदेश के किसान इस दिशा में कोई काम कर रहे हैं या पानी के इस गहराते संकट पर थोड़ा ध्यान दे रहे हों।

 

यदि पानी के इस संकट से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो शायद सुखदेव गर्ग की तरह कईयों को समय सिर्फ इंतज़ार में ही बीतेगा।

 

 

( मिश्रा, लखनऊ से प्रकाशित होने वाले हिंदी ग्रामीण अखबार गांव कनेक्शन के साथ बतौर सहायक संपादक काम कर रहे हैं। तिवारी इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं )

 

 

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यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 22 जुलाई 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 


 
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