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बाल स्वास्थ्य पर खर्चे में बढ़ोतरी के बाद भी 40 मिलियन भारतीय बच्चे अविकसित

प्राची सालवे एवं सौम्या तिवारी,

620 nutrition

 

पांच वर्ष या कम आयु के भारतीय बच्चों से संबंधित स्वास्थ्य आंकड़े इस प्रकार है : 38.7 फीसदी बच्चे अविकसित हैं (सामान्य कद से कम वाले बच्चे), 19.8 फीसदी बच्चे कमज़ोर हैं (कम वज़न एवं कम कद वाले बच्चे) एवं 42.4 फीसदी बच्चे सामान्य वज़न से कम वाले हैं।

 

यह स्थिति ऐसे देश की है जो 40 वर्षीय राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की शेखी बघारता है एवं एक दशक में बच्चों के स्वास्थ्य खर्च में 200 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

हालांकि बच्चों की कुपोषण दर में गिरावट दर्ज की गई है लेकिन अब भी भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के अविकसित बच्चों की संख्या करीब 4 मिलियन है। इंडियास्पेंड ने पहले ही बताया है कि यह आंकड़े किसी अन्य देश के मुकाबले काफी अधिक है। रिपोर्ट भारत पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन (पीएचएफआई) द्वारा हाल ही में  जारी किए गए पोषण सुरक्षा के लिए भारत स्वास्थ्य रिपोर्ट, 2015 पर आधारित है।

 

पीएचएफआई अध्ययन, हाल ही में हुए स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए बच्चों पर हुए रैपिड सर्वे (RSoC) से कुपोषित बच्चों के आंकड़ों की जांच करती है। अध्ययन सांस्कृतिक प्रथाओं, पीने के पानी की कमी, स्वच्छता सुविधाएं एवं गरीबी का भी विश्लेषण करता है।

 

इंडियास्पेंड रिपोर्ट के निष्कर्षों का तीन भाग के श्रृंखला में विश्लेषण करेगा:

 

1) बाल स्वास्थ्य और पोषण पर खर्च के बीच की कड़ी;

 

2) स्वस्थ्य माताओं को रखने वाले राज्यों में किस प्रकार बच्चे भी स्वस्थ्य हैं;

 

3) किस प्रकार पीने के पानी और स्वच्छता, पोषण को प्रभावित करता है;

 

पिछले एक दशक में शिशु स्वास्थ्य खर्चे में तीन गुना वृद्धि

 

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का कहना है कि भारत 25 वर्ष आयु की औसत आबादी के साथ एक युवा देश है लेकिन खराब स्वास्थ्य आर्थिक प्रगति में बाधा हो सकती है।

 

पिछले दो दशकों में स्वास्थ्य पर केंद्र सरकार के खर्चे में संरचनात्मक रूप से बदलाव हुआ है – केवल पोषक तत्वों जैसे कि विटामिन ए की खुराक उपलब्ध कराने से अधिक समग्र दृष्टिकोण तक, एवं मातृ स्वास्थ्य से स्वच्छता तक।

 

वर्ष 2001-02 और 2004-05 के बीच सरकार की ओर से बच्चों के लिए स्वास्थ्य खर्चे में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ है; यह कुल सरकारी खर्चे का 0.28 फीसदी से 0.31 फीसदी के बीच है और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.06 फीसदी एवं 2.5 फीसदी के बीच है। यह आंकड़े संयुक्त राष्ट्र बाल राहत कोष (यूनिसेफ) एवं केंद्र बजट और सरकार के जवाबदेही (सीबीजीए), एक नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक की संयुक्त अध्ययन में सामने आए हैं।

 
बाल स्वास्थ्य के लिए आवंटन, 2001 से 2007
 

 
बाल स्वास्थ्य के लिए आवंटन, 2001 से 2007 (% में)
 

 

वर्ष 2005-06 में, बच्चे के विकास के लिए आवंटन में, कुल खर्च (सकल घरेलू उत्पाद का 4.17 फीसदी) के 0.56 फीसदी की वृद्धि हुई थी। यह वृद्धि संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों (एमडीजी) की चुनौतियों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करने के कारण हुई थी।

 

इंडियास्पेंड ने पहले ही बताया है कि एकीकृत बाल विकास योजना के बावजूद भारत एमडीजी लक्ष्यों के पूरा नहीं कर पाया है। (आईसीडीएस, 1975 के बाद से केंद्र सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम और दुनिया के सबसे बड़े बच्चे की देखभाल और विकास में से एक : पिछले 40 वर्षों में  छह वर्ष से कम आयु के कम से कम 82.9 मिलियन बच्चे लाभान्वित हुए हैं।)

 

वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के शुरु होने से पहले, पिछले तीन दशकों तक बच्चों की स्वास्थ्य और समग्र विकास के लिए केवल आईसीडीएस योजना ही थी

 

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को 20013 में उन्नत कर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) बनाया गया है। इस योजना के तहत प्रजनन और बाल स्वास्थ्य (आरसीएच) के रूप में जाना जाने वाले एक उप – मिशन के साथ ग्रामीण क्षेत्रों, विशेष कर कमजोर वर्ग के लिए सुलभ , सस्ती और गुणवत्ता स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना है।

 
प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य के लिए राशि: 2005 से 2015
 

 

लोकसभा के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक से 2014-15 तक स्वास्थ्य और पोषण पर ध्यान देने के साथ, बच्चों के स्वास्थ्य के लिए अलग राशि में तीन गुना वृद्धि हुई है।

 

क्यों बिहार है नाइजर की तरह और गोवा बेलीज की

 

स्वास्थ्य के लैंसेट पत्रिका से शोध निष्कर्षों पर आधारित मिंट की इस रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर भारत की आबादी अब भी 17.5 फीसदी है, भारत में रोग का 20 फीसदी वैश्विक बोझ है, देश में 27 फीसदी नवजातों एवं 21 फीसदी छोटे बच्चों (पांच वर्ष से कम) की मृत्यु होती है।

 

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री, जेपी नड्डा, ने पीएचएफआई रिपोर्ट के रिलीज के दौरान कहा “भारत महत्वपूर्ण मुद्दे के प्रति वचनबद्ध है और कुपोषण उन्मूलन के लिए सभी हितधारकों के साथ काम करने के लिए तैयार है।”

 

राज्यों में कमजोर या कम वजन या छोटे क़द के बच्चों के संबंध में राज्यों में आंकड़ों के अंतर का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट कहती है कि स्वास्थ्य नीतियों के स्थानीय त्वरण पोषण में सुधार करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

 

पांच वर्ष से कम उम्र के अविकसित बच्चे, राज्य अनुसार

 

 
पांच वर्ष से कम उम्र के कमज़ोर बच्चे, राज्य अनुसार
 

 
पांच वर्ष से कम उम्र के कम कद के बच्चे, राज्य अनुसार
 

 

कम वज़न के बच्चों के उच्च अनुपात वाले कुछ राज्य जैसे कि झारखंड, 42 फीसदी, एवं बिहार,37 फीसदी के साथ कम आय वाले देशों जैसे कि तिमोर लेस्ते (45 फीसदी) और नाइजर (37 फीसदी), के बराबर या उनके अधिक हैं।

 

इसी तरह, 19 फीसदी के साथ केरल एवं 21 फीसदी के साथ गोवा, (दोनों राज्यों में भारत के स्वास्थ्यप्रद बच्चे हैं) मध्यम आय वाले देशों के बराबर हैं जैसे कि 19 फीसदी के साथ मालदीव और 22 फीसदी के साथ बेलीज

 

14 वें वित्त आयोग की हस्तांतरण सिफारिशों के तहत, राज्यों की विभाज्य कर राजस्व हिस्सेदारी 32 फीसदी से बढ़ 42 फीसदी हुई है। लेकिन इससे स्वास्थ्य और शिक्षा के खर्च को प्रभावित करते हुए समाज कल्याण योजनाओं के लिए केंद्र द्वारा आवंटित धनराशि में गिरावट हुई है।

 

सिद्धांत रूप से, राज्यों को विशिष्ट जरूरतों के लिए न्यागत पैसे का उपयोग करना चाहिए । नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं, “लेकिन हमें कैसे पता चलेगा कि राज्य, अतिरिक्त धन का विवेकपूर्ण उपयोग करने के लिए पर्याप्त रूप से जिम्मेदार हैं?”

 

यह तीन भाग श्रृंखला का पहला भाग है।

 

(सालवे एवं तिवारी इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं।)

 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 4 जनवरी 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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