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बिहार के बच्चों पर डायरिया, निमोनिया का कहर, अभिभावकों को बड़ी-बड़ी योजनाओं पर भरोसा नहीं

स्वागता यदवार,

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बिहार में बच्चे लगातार दस्त और निमोनिया की चपेट हैं। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के बीच मृत्यु दर के आंकड़ों में बिहार छठे स्थान पर है। संयुक्त राज्य अमेरिका के ड्यूक एंड स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए मूल्यांकन के अनुसार बिहार में बच्चों को डायरिया और निमोनिया के खतरे से बचाने के लिए ‘बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन’ द्वारा पोषित पांच वर्षीय कार्यक्रम का राज्य पर कुछ खास असर नहीं हुआ है। यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि उस पंचवर्षीय कार्यक्रम की अत्यधिक चर्चा है और इस कार्यक्रम को पुरस्कार भी मिल चुका है। लेकिन 23 मिलियन डॉलर यानी लगभग 153.5 करोड़ रुपये वाले इस कार्यक्रम का बिहार में रोगों के प्रति जागरूकता फैलाने या उपचार के मामले में बहुत कम प्रभाव देखने को मिला है।

 

हालांकि, एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा चलाया जा रहा यह कार्यक्रम अब तक अधूरा है। इस संस्था द्वारा किए गए कार्यों के मूल्यांकन के दौरान यह बात भी सामने आई है कि ग्रामीण बिहार के अभिभावक केवल स्थानीय रूप से अनुपलब्ध सेवाओं के लिए भुगतान करते हैं और दूसरी ओर वे अयोग्य चिकित्सकों के पास चले जाते हैं जो शायद डायरिया और निमोनिया के खतरे को पहचान नहीं पाते। यहां हम बताते चलें कि बिहार देश के कुछ एक राज्यों में से एक है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं की हालत सबसे बद्तर देखे गए हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अगस्त 2015 में विस्तार से बताया है।

 

बिहार में अब तक केवल 3 फीसदी डायरिया और निमोनिया से पीड़ित बच्चे वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर्स (डब्लूएचपी) स्काई प्रोग्राम के तहत प्रशिक्षित चिकित्सा पेशेवरों के पास गए हैं। इस कार्यक्रम का उदेश्य बिहार में दस्त और निमोनिया का बेहतर और प्रभाव ढंग से इलाज के लिए फ्रेंचाइजी नेटवर्क बनाना है। कार्यक्रम के तहत हज़ारों अनौपचारिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी जाती है और टेलीमेडिसिन द्वारा उन्हें मरीजो के साथ जोड़ा जाता है। टेलीमेडिसिन एक ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए दूरदराज के रोगियों का इलाज किया जाता है और इसके लिए बातचीत, वीडियो फुटेज और जांच के दौरान प्राप्त डेटा का उपयोग किया जाता है।

 

ड्यूक युनिवर्सिटीज के सैनफोर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के सहायक प्रोफेसर मनोज मोहनन कहते हैं, “कार्यक्रम के विफल होने के कई कारण हो सकते हैं।” मोहनन उस मूल्यांकन रिपोर्ट के सह लेखक भी हैं जो एक ग्लोबल हेल्थ पॉलिसी जर्नल ‘हेल्थ अपेयर्स’ में बिहार के स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं पर वर्ष 2016 के अक्टूबर महीने में प्रकाशित हुआ है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सेवाओं को जरूरत के आधार पर नहीं, अनुभवहीन लोगों द्वारा और अनुमान पर चलाया जा रहा है। चिकित्सकों को नेटवर्क में शामिल होने के लिए भुगतान की पेशकश के साथ-साथ नेटवर्क के सदस्यों द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं का स्तर भी अनुरूप नहीं है।

 

अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था ‘डब्लूएचपी’ का कहना है कि मूल्यांकन वर्ष  2014 के दिसंबर में पूरा हुआ था। इसी वर्ष कार्यक्रम ने अपने पांच साल में से दो वर्ष पूरे किए थे। डब्लूएचपी की भारत स्थित निदेशक प्राची शुक्ला कहती हैं, तपेदिक प्रसव पूर्व देखभाल और परिवार नियोजन के लिए इसी तरह की परियोजनाएं राजस्थान और बिहार में सफलतापूर्व काम कर रही हैं।

 

“हमारी तरह ही नए स्वास्थ्य जगत के तकनीकी संसाधनों और उसके समुचित इस्तेमाल के लिए विकसित प्रणालियो का इस्तेमाल कर ग्रामीणों की देखभाल की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए बड़े निष्कर्ष यह हैं कि दस्त और निमोनिया जैसे सरल उपचारात्मक सेवाओं के लिए ग्रामीण समुदाय स्थानीय स्तर मिलने वाली चिकित्सा सुविधाओं से खुश हैं। वे ज्यादा पैसे दे कर शहर के डॉक्टरों के पास नहीं जाना चाहते। लेकिन कुछ अन्य सेवाएं जो उन्हें स्थानीय स्तर पर नहीं मिल पातीं, उनके लिए वे अधिक पैसे खर्च करने को तैयार रहते हैं।” यह बात शुक्ला ने ई-मेल के जरिए इंडियास्पेंड को बताया।

 

बच्चों के हुए डायरिया और निमोनिया को रोका जा सकता है और इलाज भी किया जा सकता है, लेकिन  2015 में भारत में पांच वर्ष से कम आयु के करीब 300,000 बच्चों की मौत इन दो बीमारियों से हुई है। जॉन हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की रिपोर्ट की मानें तो यह आंकड़ा डरानेवाला है और विश्व में सबसे ज्यादा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के आंकड़े कहते हैं कि सर्वेक्षण से दो सप्ताह पूर्व बिहार में 10.7 फीसदी बच्चे दस्त से और 6.8 फीसदी तीव्र सांस की बीमारियों से पीड़ित थे।

 

अपनी वेबसाइट पर डब्लूएचपी कहती है कि स्काई कार्यक्रम में 10,000 ग्रामीण चिकित्सक शामिल थे और 2.7 मिलियन डायरिया और 4.1 मिलियन निमोनिया से पीड़ित बच्चों का इलाज किया गया है। इस कार्यक्रम को 2013 विश्व आर्थिक मंच में वैश्विक मान्यता मिली है। कार्यक्रम को श्वाब फाउंडेशन अवार्ड, 2013, स्कॉल अवार्ड 2013, और 2015 के एशियाई पुरस्कार से भी नवाज़ा गया है।

 

चार में से एक अभिभावक ने चिकित्सा डॉक्टर का दौरा किया

 

स्वास्थ्य मामलों के मूल्यांकन में पाया गया कि डायरिया से पीड़ित 2.9 फीसदी और निमोनिया से पीड़ित 2.7 फीसदी बच्चों से अधिक स्काई प्रदाताओं के पास नहीं गए। करीब 40 फीसदी अभिभावक बच्चों को स्थानीय अनौपचारिक स्वास्थ्य सेवा देने वाले लोगों के पास ले गए । दस्त से पीड़ित  37.7 फीसदी और निमोनिया से पीड़ित 42.7 फीसदी बच्चों को एमबीबीएस डॉक्टरों के पास ले जाया गया। अन्य जगहों से जो स्वास्थ्य सेवाएं ली गईं, उनमें दवाई की दुकानों में डायरिया के 12.2 फीसदी और  निमोनिया के 8 फीसदी रोगी पहुंचे। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक डायरिया के 3.6 फीसदी और निमोनिया के 4.4 फीसदी रोगी पहुंचे।

 

आयुष चिकित्सकों तक जिसमें आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी तक शीक हैं, दस्त के 3.3 फीसदी और निमोनिया के 1.9 फीसदी रोगी पहुंचे। सहायक नर्स, मिडवाइफ , सामाजिक मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं , आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तक दस्त के 0.2 फीसदी और निमोनिया के 0.2 फीसदी रोगी सहायता मांगने पहुंचे।

 

दस्त और निमोनिया के लिए बिहार के अभिभावक कहां जाते हैं?

Source: Evaluation by researchers at Duke University, Stanford University and University College of London

 

मूल्यांकन में यह भी पाया गया कि कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों को मिली स्वास्थ्य सेवाओं से डायरिया या निमोनिया जैसी बीमारियों में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ।

 

मोहनन कहते हैं, “ स्तरीय स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के लिए हमें सख्ती से इस बात पर गौर करना होगा कि जरूरत कितनी है और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करनेवाली इन सामाजिक इकाइयों की क्षमता क्या है? यहां यह भी देखना होगा कि क्या अच्छी सेवाओं के लिए रोगी इन एजेंसियों को भुगतान करने के लिए तैयार हैं।

 

ड्यूक एंड स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के शोधकर्ताओंने कार्यक्रम शुरु होने से पहले और बाद में औचक ढंग से 2011 में पांच वर्ष से कम आयु के 36,315 बच्चों पर और 2014 में 31635 बच्चों पर आंकड़े एकत्र किए। शोधकर्ताओं ने ऐसे 153 क्षेत्रों में 2011 और 2014 के बीच बदलाव का अद्ययन किया, जहां कार्यक्रम लागू किया गया था। 209 ऐसे क्षेत्रों में भी स्थिति का अद्ययन किया गया, जहां कार्यक्रम लागू नहीं किया गया था।

 

भारत के वाणिज्य एसोसिएटेड चैंबर्स द्वारा वर्ष 2016 की जारी रिपोर्ट के अनुसार,यह निष्कर्ष टेलीमेडिसिन बाजार के लिए भी प्रासंगिक हैं। 2020 तक यह इसके 200 करोड़ रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है। सरकार ने 2016 में के लिए राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन नेटवर्क का शुभारंभ किया है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो सके और दूर-दराज के लोग इसका लाभ उठा सकें।

 

(यदवार इंडियास्पेंड से जुड़े हैं और प्रमुख संवाददाता हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 07 अक्तूबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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