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बिहार चुनाव के साथ बढ़ता प्याज का भाव मात्र संयोग?

ऋतिका कुमार,

Vegetable stand. Mumbai, India

 

प्याज़ के दाम एवं शेयर बाज़ार इन दिनों काफी सुर्खियों में हैं। लेकिन दोनों ही उल्टे कारणों से चर्चा का विषय बन रही हैं। एक तेज़ी से उपर जा रहा है जबकि दूसरा तेज़ी से नीचे गिर रहा है।

 

हाल ही में भारतीय शेयर बाज़ार में एक हज़ार अंक से अधिक गिरावट दर्ज होने के बाद सोशल नेकवर्क साइटों पर एक चुटकुला काफी लोकप्रिय हो रहा है जिसमें एक पत्नी अपने पति को मारने की धमकी दे रही है क्योंकि उसने पत्नी की प्याज़ में निवेश करने की सलाह न मानते हुए शेयर बाज़ार में निवेश किया है।

 

राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड  ( National Horticulture Board )के अनुसार सबसे अधिक खपत होने वाली सब्ज़ी, विशेष कर गरीब तबको में , प्याज़ ही है। प्याज़ की सालाना खपत करीब 15 मिलियन टन है। इसलिए प्याज़ की बढ़ती कीमत पर इस तरह के चुटकुले बनना लाज़मी है।

 

देश के अधिकतर घरों में मुख्य सब्ज़ी रहने वाले प्याज़ की कीमत में भारी उछाल आया है। इस वर्ष जनवरी में जहां एक क्विंटल प्याज़ की कीमत 1,325 रुपए थी वहीं अब यह बढ़ कर प्रति क्विंटल 3,300 रुपए हो गई है। आंकड़ों से साफ ज़ाहिर है कि पिछले कुछ समय में प्याज़ की कीमतों में 150 फीसदी से भी अधिक का उछाल आया है एवं साथ ही कीमतें कुछ और बढ़ने की संभावना भी की जा रही है।

 

प्याज़ की बढ़ती कीमतों के काफी कारण दिए जा रहे हैं जैसे कि मानसून की कमी के कारण खरीफ फसलों पर प्रभाव पड़ना, बेमौसम बरसात से सर्दियों की फसल क्षतिग्रस्त होना, आपूर्ति पर प्रभाव पड़ना इत्यादि। हालांकि अंग्रेज़ी अखबार, मिंट में छपे इस लेखके मुताबिक न तो इस वर्ष प्याज़ उत्पादन में कमी थी न ही प्याज़ की गुणवत्ता में कुछ भी असामान्य था। प्याज़ व्यापारियों की सांठगांठ बढती कीमतों का संभवत: एक कारण हो सकता है।

 

लेकिन प्याज़ की बढ़ती कीमतों के लिए कुछ और ही संयोग दिखाई देते हैं जैसे कि बिहार के हर चुनावी चक्र के दौरान इनकी कीमते बढ़ती देखी गई हैं। भारत एक ऐसा देश है जहां हर वर्ष चुनाव होते हैं – सामान्य या राज्य चुनाव या दोनों ही। यदि आंकड़ों पर एक नज़र डालें तो पिछले एक दशक में प्याज की बढ़ती कीमतों का पता चलता है।  बिहार देश का चौथा सबसे अधिक प्याज़ खपत वाला राज्य है। गौरतलब है किबिहारमें सितंबर में चुनाव होने वाले हैं। इसलिए हमने वर्ष 2004 के बाद से पटना में प्याज़ की थोक कीमतों की पड़ताल की है।

 

वर्ष 2005 में, अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक छह महीने पहले प्याज़ की राष्ट्रीय औसत कीमत में लगभग 240 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी। प्याज़ की कीमत 1,060 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गई थी। इसी प्रकार वर्ष 2010 में भी चुनाव से ठीक छह महीने पहले प्याज़ की कीमतों में 155 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी।

 

इस वर्ष भी बिहार में होने विधान चुनाव से ठीक छह महीने पहले पटना के थोक बाज़ार में प्याज़ की कीमतों में तेज़ी से वृद्धि होने का संयोग दिखाई दे रहा है। इस साल के शुरुआत में प्रति क्विंटल प्याज़ की कीमत 1,488 रुपए दर्ज की गई थी। आज छह महीने बाद, पटना में प्याज़ की कीमतों में 142 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। पिछले दो महीनों में प्याज़ की कीमतों में तीव्र गति में वृद्धि के साथ वर्तमान में प्याज़ की कीमत प्रति क्विंटल 3,603 रुपए दर्ज की गई है। हालांकि अगले दो महीनों में कीमतों में और उछाल आने की संभावना जताई जा रही है।
 
पटना बाज़ार में थोक मूल्य, वर्ष 2015
 

Source: National Horticulture Board

 

हमनें अपनी पड़ताल में पाया कि वर्ष 2005 एवं 2010 में भी अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में इसी तरह की प्रवृति दिखाई दी थी। दोनों ही वर्षों में चुनाव के ठीक छह महीने पहले प्याज़ की थोक कीमतों में भारी वृद्धि हुई थी। आंकड़ों की बात करें तोवर्ष 2005 में 230 फीसदी एवं वर्ष 2010 177 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी।
 
पटना बाज़ार में थोक मूल्य, वर्ष 2005
 

 
पटना बाज़ार में थोक मूल्य, वर्ष 2010
 

Source: National Horticulture Board

 

हालांकि प्याज़ की कीमतों में कई बार उतार-चढ़ाव होते रहे हैं और यह मात्र एक अवलोकन है। किसी परिकल्पना को साबित करना या खंडित करने के लिए कोई ठोस विश्लेषण नहीं किया गया है। बिहार में विधानसभा चुनाव एवं प्याज़ की बढ़ती कीमतों के बीच का संबंध 100 फीसदी पहेलीनुमा है।

 

यदि हम मिंट के लेख में दिए तर्क को मान लेते हैं जो कि कहता है कि प्याज़ की कीमते व्यापारियों की साठ-गांठ से बढ़ती हैं तो हर बार चुनाव के दौरान प्याज़ की कीमतों का बढ़ जाना निश्चित तौर से एक जिज्ञासापूर्वक मामला है।

 

( ऋतिकाकुमार आईडीएफसी संस्थान में एक विश्लेषक है । प्रवीण चक्रवर्ती द्वारा अतिरिक्त सहयोग दिया गया है। चक्रवर्ती आईडीएफसी संस्थान में विज़िटिंग फैलो हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 27 अगस्त 15 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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