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बिहार में अपराध से लड़ने का तरीका – रिपोर्ट दर्ज नहीं करना

अमित भंडारी,

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बिहार – देश के सबसे गरीब तबके के लोगों के साथ तीसरा सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य – का अपराध दर, कम आबादी वाले अधिक समृद्ध राज्यों, जैसे कि गुजरात , केरल, राजस्थान और मध्य प्रदेश, की तुलना में कम है। यह राष्ट्रीय अपराध डेटा पर इंडियास्पेंड द्वारा की गई विश्लेषण में सामने आई है।

 

इस विश्लेषण के निष्कर्ष पर यकीन करना मुश्किल है – विशेष रुप से हाल ही रोड रेज में हुई एक किशोर की हत्या एवं एक पत्रकार की हत्या के बाद राज्य के  “जंगल राज” की छवि पर बहस छिड़ गई है – क्योंकि वास्तविक रुप से आंकड़े वह है नहीं जो दिखाई दे रहे हैं।

 

जैसे हमने आंकड़ों को अलग-अलग करना शुरु किया, यह स्पष्ट हो गया कि कुछ अपराध जैसे कि बलात्कार और हमले जैसे मामलों को छुपाया जाता है एवं इनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती है लेकिन अन्य अपराध जिसका परिणाम शरीर पर दिखता है – जैसे कि हत्या या दहेज हत्या – छुपाना मुश्किल है। ऐसा प्रतीत होता है कि 104 मिलियन या 10.4 करोड़ लोगों वाला राज्य, बिहार आंकड़ों को जोड़-तोड़ कर ही अपराध से लड़ रहा है। यही हाल बिहार के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश का भी है जहां अपराध को नीचे करने का तरीका – रिपोर्ट दर्ज न करना है – इंडियास्पेंड की जांच द्वारा पिछले वर्ष बताया गया था।

 

दावे और आंकड़े : कैसे बेहतर शासित , अमीर राज्यों से बेहतर साबित हुआ बिहार

 

बिहार के मुख्यमंत्री, नीतिश कुमार ने पहले ही यह दावा किया है कि, अपराध के मामले में बिहार कि स्थिति भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों जैसे कि गुजरात एवं मध्यप्रदेश की तुलना में बेहतर है। शासन के अन्य समर्थकों का दावा है कि नीतिश कुमार और उनके गठबंधन सहयोगी लालू प्रसाद के शासन के तहत अपराध के दर में गिरावट हुई है।

 

राज्य में हाल में हुए अपराध को देख पता चलता है कि पिछले पांच वर्षों में अपराधियों को सज़ा मिलने की दर में 68 फीसदी की गिरावट हुई है, जैसे कि इंडियास्पेंड ने पहले ही बताया है।

 

लोगों में बढ़ते अपराध का भय, राज्य के अपराध के आंकड़ों में परिलक्षित नहीं है । 2014 में, नवीनतम वर्ष जिसके लिए आंकड़े उपलब्ध हैं, बिहार में 177,595 संज्ञेय अपराधिक मामले – न्यायिक निरीक्षण के बिना पुलिस द्वारा जांच की जा सकती है – दर्ज किए गए हैं जबकि हिंदी बेल्ट, मध्य प्रदेश (मध्य प्रदेश) और राजस्थान में ऐसे 272,423 और 210,418 मामले दर्ज हुए हैं।

 

हालांकि 2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार की जनसंख्या 104 मिलियन या 10.4 करोड़ है एवं मध्यप्रदेश की 72.6 मिलियन (7.26 करोड़) और राजस्थान की 68.5 मिलियन (6.85 करोड़) है।

 

इसका मतलब है कि बिहार में, 44 फीसदी अधिक आबादी के साथ, मध्यप्रदेश से 35 फीसदी कम अपराध होते हैं। बिहार में प्रति 100,000 की आबादी पर 174 संज्ञेय अपराधों की रिपोर्ट दर्ज हुए है जबकि मध्यप्रदेश में 358.5 मामले दर्ज हुए हैं – करीब दोगुना।

 

इसी तरह, बिहार की स्थिति मध्य प्रदेश और राजस्थान, गुजरात और केरल जैसे उच्च आय वाले राज्यों से बेहतर बताई गई है; सभी राज्यों में संज्ञेय अपराधों की उच्च दर रिपोर्ट की गई है।

 

क्या अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में होते हैं कम अपराध?

Source: NCRB Crime in India 2014, Table 1.4

 

बिहार का कम अपराध दर आश्चर्यजनक है क्योंकि क्योंकि यह भारत की सबसे कम प्रति व्यक्ति आय के साथ वाला एक गरीब राज्य है और भारतीय राज्यों के मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) पर नीचे से तीसरे नंबर पर हैं। मानव विकास सूचकांक एक सूची है कि जिसमें जीवन प्रत्याशा, शिक्षा और आय शामिल है। भारत के मानव विकास सूचकांक में केरल पहले स्थान पर है।

 

बिहार : कम प्रति व्यक्ति आय,  मानव विकास सूचकांक रैंकिंग में नीचे

 

Source: Press Information Bureau, India Human Development Report, 2011Per Capita Income is as of 2013-14. Human Development Index (HDI) ranking is as of 2007-08 among 23 states.

 

हमने बिहार के अन्य आपराधिक आंकड़ों को टटोला और इन विसंगतियों के लिए स्पष्टीकरण प्रकट हुआ है।

 

शव जो बिहार छुपा नहीं सकता – हत्या एवं दहेज हत्या

 

2014 में, बिहार में हत्या के 3,593 मामले दर्ज हुए हैं। मध्यप्रदेश में 2,310 और राजस्थान में 1,688 मामले दर्ज किए गए हैं। यह आंकड़े जनसंख्या और विकास के साथ बेहतर संबंध स्थापित करते प्रतीत होते हैं।

 

बिहार का हत्या दर – या प्रति 100,000 लोगों पर हत्या – मध्य प्रदेश, राजस्थान , गुजरात या केरल की तुलना में अधिक है। इसका एक संभवित स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि आमतौर पर बिहार में कम अपराध होते हैं लेकिन कुछ कारणवश हत्या का खतरा अधिक है।

 

एक अन्य स्पष्टीकरण यह हो सकता है कि बिहार में अन्य अपराध के मामले दर्ज नहीं होते हैं – एक प्रक्रिया जिसे रोकना कहते हैं – सिवाय हत्या के, जहां बगैर किसी खास प्रक्रिया के शरीर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। बिहार का हत्या दर अन्य बड़े राज्यों की तुलना में बद्तर है और राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है।

 

अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में होती है अधिक हत्याएं

Source: NCRB, Crime in India 2014 – Table 1.6, Page 1/22. Figures for 2014.

 

इसी प्रकार की प्रवृति महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए भी स्पष्ट है। उद्हारण के लिए, 2014 में, बिहार में महिलाओं पर “शील भंग करने के इरादे के साथ” हमला करने के 574 मामले दर्ज हुए हैं। मध्यप्रदेश में ऐसे ही 9618 मामले दर्ज हुए हैं जबकि राजस्थान में 6,015 मामले हुए हैं। बिहार की एक-तिहाई आबादी वाले राज्य केरल में महिलाओं के खिलाफ होने अपराध के 4,412 मामले दर्ज हुए हैं जो कि बिहार की तुलना में आठ गुना अधिक हैं।इसी प्रकार की प्रवृति महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए भी स्पष्ट है। उद्हारण के लिए, 2014 में, बिहार में महिलाओं पर “शील भंग करने के इरादे के साथ” हमला करने के 574 मामले दर्ज हुए हैं। मध्यप्रदेश में ऐसे ही 9618 मामले दर्ज हुए हैं जबकि राजस्थान में 6,015 मामले हुए हैं। बिहार की एक-तिहाई आबादी वाले राज्य केरल में महिलाओं के खिलाफ होने अपराध के 4,412 मामले दर्ज हुए हैं जो कि बिहार की तुलना में आठ गुना अधिक हैं।

 

बिहार में मध्य प्रदेश, राजस्थान या यहां तक कि केरल की तुलना में काफी कम बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं।

 

तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि बिहार, कम आय एवं जीवन स्तर के बावजूद, महिलाओं के लिए बेहतर राज्य है? लेकिन आंकड़े एक बार फिर इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

 

महिलाओं के लिए बेहतर राज्य है बिहार?

 

Source: NCRB, Crime in India 2014 – Table 1.6. Figures for 2014.

 

मध्य प्रदेश, राजस्थान, केरल और गुजरात में होने वाले दहेज हत्या के संयुक्त आंकड़ों से भी अधिक बिहार में मामले दर्ज हुए हैं। इससे राज्य में महिलाओं के लिए सामाजिक सम्मान मिलने का संकेत नहीं मिलता है। एक स्पष्टीकरण यह है कि महिलाएं वास्तव में हिंसा का लक्ष्य होती हैं लेकिन उनके खिलाफ हुई अपराधों की रिपोर्ट नहीं की जाती है। हत्या के साथ ही दहेज हत्या के शव को भी छुपना मुश्किल होता है।

 

(भंडारी एक मीडिया  अनुसंधान और वित्त पेशेवर है। उन्होंने  आईआईटी- बीएचयू से एक बी-टेक और आईआईएम- अहमदाबाद से एमबीए किया है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 24 मई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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