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बिहार में महागठबंधन के जीत के पांच कारण

अभिषेक वाघमरे,

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बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन के भारी पड़ने के पांच मुख्य फैक्टर हैं – मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का प्रभाव, उच्च मतदान,  भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा) के खिलाफ वोट होना, भाजपा के वोट शेयर में गिरावट, भाजपा नेताओं द्वारा आरक्षण एवं पाकिस्तान के संबंध में बयानबाज़ी।

 

243 सीटों के लिए, बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल ( यू ), आरजेडी एवं कांग्रेस के महागठबंधन ने 178 सीटों  पर जीत हासिल कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ( एनडीए ) को  करारी हार दिलाई है।

 

 

पिछले एक दशक में विकास के साथ-साथ आजेडी एवं कांग्रेस द्वारा प्रदान किया गया सामाजिक आधार भी नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन को जीत दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

 

शरद यादव , जनता दल (यू) के अध्यक्ष ने एनडीटीवी से बात करते हुए कहा कि, “राष्ट्र ने विकास के लिए एक वैकल्पिक रास्ता चुना है।” एग्जिट पोल द्वारा किए गए सभी अनुमान में से केवल लालू प्रसाद यादव ने खुद 190 सीट जीतने की भविष्वाणी की थी।

 

आरजेडी नेता, लालू प्रसाद यादव ने कहा, “ महागठबंधन की जीत , राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल देगा। “

 

2015 बिहार विधानसभा में गठबंधन- वार स्थिति
 

 
2015 में बिहार विधानसभा में पार्टी – वार स्थिति
 

 

2010 में जनता दल ( यू ) ने 141 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से 115 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि भाजपा ने 102 सीटों पर चुनाव लड़ा एवं 91 सीटों पर जीत हासिल की थी।

 
 2010 बिहार विधानसभा में पार्टी वार स्थिति 
 

 

2013 में नरेंद्र मोदी की भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद, बिहार में एनडीए विभाजित हो गया था। इस विभाजन में भजपा एवं जनता दल ( यू ) का 17 वर्ष पुराना गठबंधन टूट गया था।

 

जनता दल ( यू ) एनडीए का सबसे बड़ा सहयोगी था। शिवसेना, तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) और शिरोमणि अकाली दल (एसएडी)  जैसे अन्य बड़े सहयोगी दल एनडीए के साथ बने हुए हैं।

 

हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए का विरोध नगण्य था लेकिन नीतिश कुमार का नरेंद्र मोदी के खिलाफ विरोध तब भी था और अब भी है।

 

बिहार में राजनीतिक पुणनिर्माण में मोदी विरोधी पार्टियां, आरजेडी, जनता दल ( यू ) एवं कांग्रेस महागठबंधन के रुप में एक हुईं एवं अधिक वोट अपने पक्ष में करने में सक्षम रही हैं।

 

फैक्टर 1 – नीतिश की छवि

 

नीतिश कुमार ने, जोकि जल्द ही बिहार के तिसरी बार मुख्यमंत्री बन सकते हैं, मीडिया से बात करते हुए कहा कि “विपक्ष का सम्मान करेंगे, उनका मजाक नहीं उड़ाएंगे।”

 

बिहार उन कुछ ही राज्यों में से एक है जहां पिछले 25 सालों में कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं बना है। बिहार में क्षेत्रिय नेता एवं क्षेत्रिय राजनीति की हमेशा से मुख्य भूमिका रही है।

 

भाजपा के खिलाफ एकजुट विपक्ष के रूप में ही महागठबंधन का गठन किया गया था जिसे 11 राज्यों में सत्ता साझा करने के साथ  अब लोकसभा में बहुमत प्राप्त है।

 

हिंदी भाषी राज्य, झारखंड, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में पहले ही भाजपा की सरकार है।

 

पिछले एक दशक में नीतिश कुमार बदलते बिहार का चेहरा बन गए हैं। बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 के अनुसार बिहार में विकास,  निर्माण, संचार , व्यापार और आतिथ्य और बैंकिंग और वित्त उद्योग में वृद्धि से प्रेरित था।

 

नीतिश के नेतृत्व वाले गठबंधन ने आर्थव्यवस्था में प्रगति के साथ सामाजिक क्षेत्रों जैसे कि महिला सशक्तिकरण और बाल विकास पर भी बराबर ध्यान दिया है।

 

पिछले दशक में नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण ( पहले 33 फीसदी था ) लागू किया था। इसके साथ मुखिया के पद के भी आरक्षण लागू किया गया था।

 

आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्रों में सुधार सुनिश्चित करने के लिए मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना एवं मानव विकास मिशन 2013-17 की शुरु की गई है।

 

फैक्टर 2 – मतदाताओं की संख्या में वृद्धि

 

बिहार की जनता ने इस विधानसभा चुनाव में एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। यदि आंकड़ों की बात करें तो इस बार के मतदाताओं की संख्या 2014 के लोकसभा चुनाव को पार कर गई है।

 
 2015 में मतदान का रिकॉर्ड 
 

 

उच्च मतदान ने ( जोकि 60 फीसदी के पार गया ) महागठबंधन की जीत सुनिश्चत की है। यह इतिहास दोहराने जैसा साबित हुआ है जैसा कि पिछले तीन चुनाव में 60 फीसदी मतदान के बाद आरजेडी ने जीत हासिल की थी: जब मंडल आयोग लागू किया गया था, ओबीसी आरक्षण लागू की गई थी एवं झारखंड का अस्तित्व में आने से पहले।

 

लालू यादव के सत्ता से निष्कासन के  बाद मतदाताओं की संख्या में लगातार कमी हुई थी।

 

लालू प्रसाद के एक प्रतिद्वंद्वी , नीतिश कुमार ने रणनीतिक रूप से भाजपा के साथ हाथ मिलाया एवं वाजपयी मंत्रीमंडल (1998-99 एवं 2002-04 ) में दो बार रेल मंत्री बने थे ।

 

इसके बाद से ही लालू यादव के विपरीत, जिन्हे मुसलमानों और यादवों ( मतदाताओं का 31 फीसदी ) से लगातार समर्थन प्राप्त हुआ है, नीतिश कुमार की छवि साफ नेता के रुप में उभरी है।

 

भाजपा की ओर से चुनावी समर्थन एवं बुनियादी ढांचे और प्रति व्यक्ति आय में आए बदलाव के रुप में चमचमाते प्रशासन के साथ नीतिश कुमार ने एक मजबूत ग्रामीण एवं शहरी , बहु स्तरीय, बहु जातीय मतदाता आधार समेकित किया है।

 

नीतिश कुमार की छवि बिहार के विकास के रुप में उभरी है एवं जनता के मतदान से साफ है कि बिहार ने एक बार फिर नीतिश पर भरोसा जताया है।

 

फैक्टर 3: अस्थिर वोट शेयर की भूमिका

 

लोकसभा चुनाव में भाजपा का स्वतंत्र रुप से सामना करते हुए एक तरफ जनता दल ( यू ) एवं दूसरी तरफ आरजेडी एवं कांग्रेस को 45 फीसदी वोट शेयर मिला लेकिन 40 में से केवल 9 सीटें ही जीत पाई थी।

 

दूसरी तरफ एनडीए को 39 फीसदी वोट प्राप्त हुए लेकिन सीटों की संख्या की बात की जाए तो एनडीए के खाते में 30 सीटे आई थी।

 

वर्तमान महागठबंधन को 2015 के विधानसभा चुनाव में 45 फीसदी वोट शेयर एवं 178 सीटें मिली हैं। जबकि एनडीए ने केवल 58 सीटे मिली हैं एवं वोट शेयर 34.3 फीसदी रहा है।
 
वोट शेयर की तुलना, 2014 और 2015
 

 
सीटों पर जीत की तुलना, 2014 और 2015
 

 

इंडियास्पेंड ने पहले ही अपनी खास रिपोर्ट में बताया है कि महागठबंधन की तीनों प्रमुख पार्टियों की लोकसभा 2014 के चुनाव में कम हिस्सेदारी करने वाली सीट गुणक दर्ज की गई है।

 

2010 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने 19 फीसदी वोट शेयर के साथ 22 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि 2014 में 20 फीसदी वोट के साथ चार संसदीय सीटों पर जीत हासिल की है।

 

2010 में जनता दल ( यू ) ने 22 फीसदी वोटों के साथ 115 सीटें जीती थी जबकि 2014 में 16 फीसदी वोट शेयर के साथ सिर्फ दो सीटों पर ही जीत हासिल किया था। 2014 के आम चुनाव में महागठबंधन 40 में से केवल नौ सीटें जीती थी।

 

इस चुनाव में तीन दलों की संयुक्त हिस्सेदारी ने वोट शेयर कोपलट दिया है।

 

जैसा कि इस लेख में पहले भी बताया गया है विधानसभा चुनाव में उसी वोटिंग पैटर्न का आयोजन किया गया जिससे महागठबंधन को 2014 के लोकसभा चुनाव के 145 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी।

 

पूरे भारत में 31 फीसदी वोट शेयर के साथ भाजपा ने लोकसभा में पूर्ण बहुमत  जीता था लेकिन वोट शेयर में 38 फीसदी की वृद्धि के साथ एनडीए बहुमत प्राप्त करने में असफल रही ।

 

सत्ता में महागठबंधन

 

बिहार में पिछले दो बार से जनता दल ( यू ) एवं भाजपा गठबंधन शासन था। संयुक्त वोट शेयर निश्चित रूप से महागठबंधन की ओर आ गया है। राज्य के दो शीर्ष नेताओं के एक-साथ होने एवं कांग्रेस के साथ होने से स्पष्ट चुनावी लाभांश जीता है।

 

चुनाव पर्यवेक्षक / शोधकर्ताओं के मुताबिक घटक दलों के उम्मीदवारों के बीच सही तालमेल एवं विद्रोह के कम घटनाएं होना महागठबंधन के जीत में बड़ी भूमिका निभाई है। नीतिश कुमार को सत्ता में लाने में पारंपरिक आरजेडी  मतदाताओं ( मुस्लिम यादव ( एमवाई ) समुदायों ) की भी खास भूमिका रही है।

 

फैक्टर 4: भाजपा के वोट शेयर में गिरावट
 
 2014 लोकसभा के पूर्ववर्ती विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन 
 

 
2014 लोकसभा के सफलता के बाद विधानसबा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन
 

राज्यों में लोकसभा चुनाव ( 2013-2014 ) तक भाजपा के वोट शेयर में वृद्धि हुई है। पार्टी को 2013 में राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में अच्छी खासी  वोट शेयर प्राप्त हुई है जैसे कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की सरकार का गठन हुआ। दूसरी तरफ इन्हीं राज्यों में बाद में हुई लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने खासा वोट शेयर प्राप्त किया है।

 

दूसरी ओर, लोकसभा चुनाव के बाद, विधानसभा चुनाव में भाजपा के वोट शेयर में गिरावट होती दिख रही है।

 

महाराष्ट्र के अलावा सभी राज्य के विधानसभा चुनाव में भाजपा के वोट शेयर में गिरावट हुई है।

 

महाराष्ट्र में शिवसेना से समर्थन भाजपा के लिए अपरिहार्य था। झारखंड में भाजपा की अल्पमत की सरकार है जबकि जम्मू-कश्मिर में वे क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी को पार नहीं कर सके हैं।

 

जम्मू-कश्मीर में सत्ता में आना भाजपा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन कम वोट शेयर के कारण इन्हें  सत्तारूढ़ गठबंधन में एक छोटे भागीदार के रूप में संतोष करना पड़ा है।

 

लोकसभा चुनाव के बाद बिहार विधानसभा में भी भाजपा के वोट शेयर में गिरावट हुई है। 2014 लोकसभा चुनाव में वोट शेयर 30 फीसदी से गिरकर 2015 के चुनाव में 25 फीसदी पर आ गया है। पार्टी के केवल 53 सीटें मिली हैं।

 

फैक्टर 5 : आरक्षण एवं विवादास्पद बयान

 

संख्यात्मक कारकों और चुनावी आंकड़ों के अलावा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अंतर्धारा ने भी बिहार के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

बिहार अभियान की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आरएसएस ) द्वारा आरक्षण पर बयानबाजी से हुई थी।

 

दादरी में हुई सांप्रदायिक घटना से असहिष्णुता के मुद्दे को भी हवा मिली।

 

प्रधानमंत्री एवं बिहार के स्टार प्रचारक, नरेंद्र मोदी ने प्रदायिक तनाव को शांत करने के बजाय अभियान के मध्य में पाकिस्तान को जोड़ कर एक नया विवाद खड़ा कर दिया।

 

लालू और नीतिश की जोड़ी ने इन्हीं बातों का फायदा उठाते हुए जनता के वोट को अपने पक्ष में किया है।

 

महागठबंधन ने जनता के साथ सीधे तरीके से स्वंय को बांध कर बेहतर प्रदर्शन दिखाया है। रिपोर्ट के अनुसार नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के चुनाव न लड़ने का निर्णय लेना, राज्य में लगभग हर विधानसभा क्षेत्र की यात्रा करना करीब 200 से भी अधिक रैलियों का आयोजन करना, यह सब महागठबंधन के पक्ष में सही सबित हुआ है।

 

जबकि एनडीए ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों के साथ राम विलास पासवान, जितेन राम मांझी , भाजपा नेता सुशील मोदी और अमित शाह की स्थानीय रैलियों सम्मलित किया जबकि महागठबंधन ने केवल दो नेताओं द्वारा स्थानीय रैलियों पर ध्यान केंद्रित किया था।

 
सभी पार्टियों एवं नेताओं द्वारा संबोधित की गई रैलियां
 

 
( अभिषेक वाघमारे इंडियास्पेंड के साथ नीति विश्लेषक हैं। )
 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 08 नवंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 
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