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बिहार में होगी कांटे की टक्कर – एग्जिट पोल

सौम्या तिवारी और अभिषेक वाघमारे,

exit poll 620

 

बिहार विधानसभा चुनाव के आखरी दौर की वोटिंग समाप्त होते ही अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य में किसकी सरकार आएगी। 8 नवंबर को चुनावी नतीजे आने से पहले एग्जिट पोल का अनुमान, चुनाव के दौरान की गई तमाम जनमत सर्वेक्षणों से अलग नज़र आ रहे हैं।

 

सत्ता में आने की दौड़ दो प्रमुख गठबंधनों के बीच है – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी ( भाजपा ) के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ( एनडीए ) एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जनता दल ( यू) के अगुआई वाली महागठबंधन ( ग्रांड एलायंस )।

 

243 सीटों वाली विधानसभा के लिए परिणाम रविवार 8 नवंबर को घोषित किया जाएगा।

 

रविवार को ही यह साफ होगा कि अगले पांच साल के लिए राज्य में जनता ( यू ), आरजेडी और कांग्रेस की महागठबंधन बिहार पर राज करेगा या फिर यहां भी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए का जादू चलेगा?

 

 

एग्जिट पोल के अनुमान के मुताबिक एनडीए गठबंधन एवं महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर नज़र आ रही है।

 

टूडे चाणक्य एग्जिट पोल के अनुसार एनडीए को भारी बहुमत मिल सकता है।

 

हालांकि कुछ सर्वेक्षण में महागठबंधन को बढ़त मिलती दिख रही है लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि दोनों गठबंधन एक-दूसरे को बराबर की टक्कर दे रहे हैं।

 

इंडियास्पेंड द्वारा की गई विश्लेषण में हमने पहले ही बताया है कि विभिन्न एजेंसियों द्वारा की गई जनमत सर्वेक्षण ने दोनों गठबंधनों के लिए मिले-जुले आंकड़ों का अनुमान लगाया है। हालांकि, अधिकतर एजेंसियों ने भाजपा को बढ़त मिलने का अनुमान जताया था।

 

हालांकि, कुछ एजेंसियों के एग्जिट पोल का अनुमान महागठबंधन के पक्ष में किए गए जनमत सर्वेक्षण से अलग हैं।

 

 

तीन एजेंसियों के एक्जिट पोल (सी-वोटर , नीलसन और सिसरो ) ने जनमत सर्वेक्षण के मुकाबले महागठबंधन के लिए अनुमानित सीटों की संख्या में बढ़त दिखाई है।

 

विशेषज्ञों के अनुसार जनमत सर्वेक्षण की तुलना में भाजपा के आंकड़ों में गिरावट एवं महागठबंधन में वृद्धि का कारण एग्जिट पोल का चार कारकों की पहचान करना हो सकता है।

 

1) भागवत के “सामाजिक समीक्षा”

 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा आरक्षण नीति पर उठाए गए सवाल शायद महागठबंधन का पक्ष भारी होने का एक कराण हो सकती है।

 

2) बिहारी बनाम बाहरी

 

बिहार में नीतिश कुमार का बिहार की मिट्टी से जुड़े होने का नारा शायद काम कर गया है। चुनाव के दौरान भाजपा का अगुआई करने वाले अधिकतर नेता बिहारी नहीं थे। भाजपा मोदी के जादू के भरोसे थी जिसका भरपूर फायदा विपक्ष ने बिहारी बनाम बाहरी के ज़रिए उठाया है।

 

3) बिगड़ता सांप्रदायिक सौहार्द

 

 बिगड़ता सांप्रदायिक सौहार्द, गौमंस पर प्रतिबंध एवं हिंसा ने केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी (भाजपा) की लोकप्रियता को प्रभावित करने का काम किया है। यह मुद्दे बिहार चुनाव प्रचार के दौरान भी उठाए गए थे। महागठबंधन के पक्ष भारी होने का एक कारण यह भी हो सकता है।

 

4) बढ़ती तुअर दाल की कीमत

 

अनुमान किया जा रहा है कि तुअर दाल की बढ़ती कीमत ने भी मतदाताओं की भावना को प्रभावित किया है। हालांकि यह पूरी तरह से चुनाव में एक निर्णायक कारक नहीं हो सकता है लेकिन यह आम आदती की बढ़ती कीमतों पर धारणा बता रहा है और सत्तारूढ़ सरकार को प्रभावित कर रहा है।

 

(तिवारी और वाघमारे इंडिस्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 06 नवंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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