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बीमारु राज्यों में 2 वर्षों में सीखने के स्तर में प्रगति कम, लाखों छात्रों के लिए सीखने का संकट बरकरार

प्राची सालवे एवं एलिसन सलदनहा,

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देश के बीमारु राज्यों में स्कूली छात्रों के सीखने के स्तर में लगातार गिरावट देखी जा रही है। जनवरी 2017 में शिक्षा पर 2016 की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, यदि वर्ष 2014 के आंकड़ो से तुलना की जाए तो वर्ष 2016 में, बीमारु राज्यों में 6 से 15 वर्ष के 11.1 करोड़ स्कूली बच्चों के सीखने के नतीजों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। यहां बीमारु राज्य का मतलब बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से है।

 

अगर इन 11.1 करोड़ बच्चों के गणित और पठन कौशल में सुधार नहीं किया जा सकता है तो भारत के लिए यह संभव नहीं कि यह देश वर्ष 2020 तक 86.9 करोड़ की अपनी काम करने लायक आबादी से पूरी तरह से जनसांख्यिकीय लाभांश लेने के लिए सक्षम हो सके। भारत में काम करने वाली आबादी किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक है।

 

नई रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

 

  • उत्तर प्रदेश में, सरकारी स्कूलों के कक्षा 3 के केवल 7.2 फीसदी बच्चे ही कक्षा 2 की किताबें पढ़ सकते हैं। दो अंकों का घटाव करने वाले छात्रों के आंकड़े केवल 7.9 फीसदी हैं (राष्ट्रीय औसत: पढने के लिए 25.2 फीसदी और गणित के लिए 27.7 फीसदी है।)
  • बिहार में वर्ष 2016 में, कक्षा 8 के 75.2 फीसदी छात्र कक्षा 2 की किताबें ठीक प्रकार पढ़ सकते थे। जबकि वर्ष 2010 में ये आंकड़े 87.2 फीसदी थे। कक्षा 3 के छात्रों की बात करें तो केवल 20.8 फीसदी बच्चे ही कक्षा 2 की किताबे पढ़ सकते थे। जबकि 27.3 फीसदी छात्र दो अंकों का घटाव कर सकते थे।
  • राजस्थान में 23.7 फीसदी कक्षा 3 के बच्चे कक्षा 2 के स्तर की किताबे पढ़ पाने में सक्षम थे। ये आंकड़े पिछले पांच सालों में दर्ज हुए आंकड़ों से सबसे ज्यादा हैं।
  • बीमारु राज्यों में मध्यप्रदेश में सीखने का स्तर सबसे कम है। कक्षा 3 के 16.6 फीसदी बच्चे और कक्षा 8 के 64.3 फीसदी बच्चे ही कक्षा 2 की किताबें पढ़ने में सक्षम थे।

उच्च प्राथमिक विद्यालय में अंकगणित स्तर

Source: Annual Status of Education Report, 2016

 

प्राथमिक विद्यालय में सुधार, उच्च प्राथमिक में गिरावट

 

हालांकि बीमारु राज्यों में सीखने का स्तर कम है लेकिन, वर्ष 2016 में कक्षा 3 के 16.6 फीसदी बच्चे कक्षा 2 के स्तर की किताबें पढ़ पाने में सक्षम हैं। वर्ष 2014 में यही आंकड़े 14 फीसदी और वर्ष 2010 13.3 फीसदी थे।

 

इसी तरह के सुधार राजस्थान और उत्तर प्रदेश में देखे जा सकते हैं। वर्ष 2016 में राजस्थान में कक्षा 3 के 23.7 फीसदी छात्र कक्षा 2 की किताबें पढ़ने में सक्षम हैं। वर्ष 2010 में ये आंकड़े 15.6 फीसदी थे। उत्तर प्रदेश में बच्चों का प्रतिशत 15.4 फीसदी से बढ़ कर 22.6 फीसदी हुआ है।

 

मध्यप्रदेश में प्राथमिक विद्यालय के गणित के स्तर में भी सुधार हुआ है। वर्ष 2016 में निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूलों में और अधिक सुधार के साथ, कक्षा 3 के 13.6 फीसदी छात्र गणित का घटाव करने में सक्षम थे। वर्ष 2014 में ये आंकड़े 10.6 फीसदी थे।

 

वर्ष 2016 में कक्षा 8 के कुछ ही बच्चे करीब 64.3 फीसदी, कक्षा 2 की किताबें पढ़ पाने में सक्षम थे। वर्ष 2014 में ये आंकड़े 65.8 फीसदी थे। हालांकि वर्ष 2010 की तुलना में इन आंकड़ों में गिरावट हुई है। वर्ष 2010 में 90.1 फीसदी छात्र कक्षा 2 की किताबें पढ़ सकते थे।

 

वर्ष 2016 में बिहार में कक्षा 3 के 20.8 फीसदी बच्चे कक्षा 2 की किताबें पढ़ने में सक्षम हैं। यही आंकड़े वर्ष 2014 में 21.9 फीसदी थे। इस गिरावट का मुख्य कारण निजी स्कूल के छात्रों के सीखने के स्तर में गिरावट होना है।

 

उत्तर प्रदेश में निजी और सरकारी दोनों स्कूलों में आठवीं कक्षा के बच्चों का प्रतिशत, जो कक्षा 2 के अंग्रेजी पाठ्यपुस्तक की 8-10 लाइन पढ़ सकते थे, उनमें गिरावट हुई है। ये आंकड़े वर्ष 2010 के 77.7 फीसदी से गिरकर 2016 में 67.8 फीसदी हुए हैं।

 

प्राथमिक स्कूलों में पठन स्तर

Source: Annual Status of Education Report, 2016

 

स्कूलों में कम शिक्षक, शौचालय भी नहीं हैं पर्याप्त

 

एएसईआर केंद्र के निदेशक विलिमा वाधवा ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि सीखने के स्तर में सुधार या गिरावट के कारणों को बता पाना मुश्किल है। अलग-अलग राज्यों में इसके भिन्न कारण होते हैं। फिर भी छात्र-अध्यापक अनुपात जैसे संकेतकों को बेहतर सीखने के नतीजों के साथ जोड़ा जाता है।

 

हालांकि, शिक्षा के अधिकार अधिनियम के (आरटीई), के अनुसार, प्राथमिक स्कूलों के लिए निर्धारित छात्र-अध्यापक अनुपात 30:1 और उच्च प्राथमिक स्कूलों के निए 35: 1 है। लेकिन बिहार के केवल 11.7 फीसदी स्कूल ही इन दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं। वर्ष 2014 में ये आंकड़े 12.7 फीसदी थे। हम बता दें कि बिहार के मौजूदा आंकड़े देश में सबसे कम हैं।

 

हालांकि, उत्तर प्रदेश में आरटीई के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए पीटीआर सुधार हुआ है। इस संबंध में वर्ष 2016 में ये आंकड़े 30.9 फीसदी रहे, जबकि 2010 में 16.1 फीसदी दर्ज किए गए थे। लेकिन उत्तर प्रदेश अब भी देश के सबसे कम अनुपात वाले स्कूलों के साथ वाले राज्यों में से एक है।

 

अपेक्षित अध्यापक-छात्र अनुपात के साथ स्कूल

Source: Annual Status of Education Report, 2016

 

सीखने के स्तर में गिरावट का एक मुख्य कारण इस्तेमाल करने योग्य शौचालयों का अभाव होना भी है। द हिन्दू में सितंबर 2014 में ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ द्वारा इस टिप्पणी के अनुसार, छात्रों को शौचालय का इस्तेमाल करने के लिए स्कूल से बाहर जाना पड़ता है। और अक्सर एक बार कक्षा से बाहर जाने के बाद वे वापस नहीं आते हैं।

 

एएसईआर के आंकड़ों के अनुसार, बीमारु राज्यों में कई स्कूलों के शौचालयों में या तो ताले बंद हैं या फिर वे इस्तेमाल करने योग्य नहीं हैं।

 

कुल मिलाकर देखें तो उत्तर प्रदेश के स्कूलों में इस्तेमाल करने योग्य शौचालयों की संख्या सबसे कम है, मात्र 54.8 फीसदी।

 

मध्यप्रदेश में 54 फीसदी स्कूलों में इस्तेमाल करने योग्य और लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था है। ये आंकड़े बीमारु राज्यों में सबसे कम हैं। हम बता दें कि वर्ष 2015 में गुजरात के बाद मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा शौचालयों का निर्माण किया गया है।

 
बीमारु राज्यों में उपलब्ध, इस्तेमाल करने योग्य और लड़कियों के लिए अलग शौचालय

 

(सालवे विश्लेषक हैं, इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।  सलदहा इंडियास्पेंड में सहायक संपादक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 20 जनवरी 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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