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‘बुजुर्गों की देखभाल के लिए राज्य को लेनी होगी जिम्मेदारी

अक्षी चावला,

India Economic Summit 2008

 

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 60 वर्ष से अधिक आयु के करीब 10 करोड़ लोग इस देश में रहते हैं। लगभग 60 फीसदी लोग आर्थिक रूप से निर्भर हैं, और 60 वर्षों से अधिक आयु के करीब 50 फीसदी लोग अपने अपने घर में शारीरिक या मौखिक दुर्व्यवहार का सामना करते हैं। एक लंबी बातचीत में संसद के पूर्व सदस्य और पूर्व कानून मंत्री 64 वर्षीय अश्विनी कुमार ने हमें इस समस्या के बारे में विस्तार से बताया । वे इसके लिए वरिष्ठ नागरिकों के लिए सरकार से ज्यादा मदद लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक सार्वजनिक हित के मुकदमे भी लड़ रहे हैं। उस साक्षात्कार के कुछ अंश:

 

पीआईएल दाखिल करने के लिए आपको किस बात ने प्ररित किया?

 

मैं पंजाब से आया हूं। मैंने देखा कि पंजाब जैसे प्रगतिशील राज्य में संयुक्त परिवारों की एक बहुत मजबूत परंपरा रही है, जहां बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल करते रहे हैं। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। मैंने देखा कि वहां मैंने ऐसे बुजुर् उपेक्षा देखी है, जो अपने परिवार में कमजोर हैं और जो आर्थिक रूप से अपने बच्चों पर निर्भर हैं।

 

बहुत से लोग और परिवार मेरे पास विभिन्न अनुरोधों के साथ आते हैं। ये वे लोग हैं, जो अपने ही घरों में उपेक्षा और दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं। बहुत से लोग अपने बच्चों से, खासकर बेटों और बहूओं से दूर रहना चाहते हैं, और मुझे एहसास हुआ कि यह एक गंभीर मानवीय मुद्दा है।

 

इसलिए मैंने पंजाब के गुरदासपुर जिले में बुजुर्गों के रहने के लिए एक ‘ओल्ड एज होम’ निर्माण के लिए अपने सांसद लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड (एमपीएलएडी) फंड से 2.15 करोड़ रुपए से अधिक का आवंटन किया। बुजुर्गों के लिए यह उन पहले कुछ स्थान में से एक है, जहां 50 लोग एक साथ रह सकते हैं। ‘हेल्पएज इंडिया’ इसे चला रहा है। मैंने जोर दिया कि ज्ञात विश्वसनीयता और व्यावसायिकता के साथ एक स्वतंत्र संगठन को इसे चलाना चलाने चाहिए, ताकि कोई शोषण न हो।

 

मैं बहुत संतुष्ट हूं कि मैं ऐसा करने में सक्षम था। लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि हमें पूरे देश में ऐसे कई बुजुर्ग लोगों को घर की जरूरत है। जब मैंने इस विषय पर जानकारी इकट्ठा की तो मुझे एहसास हुआ कि सुप्रीम कोर्ट से निर्देश के बिना यह मुमकिन नहीं कि हमें बुजुर्ग लोगों के पुनर्वास और देखभाल के लिए एक कार्यक्रम बन सके।

 

कृपया याद रखें कि हमारे पास वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 60 साल से अधिक 10 करोड़ से अधिक बुजुर्ग लोग हैं। लगभग 60 फीसदी लोग आर्थिक रूप से निर्भर हैं, और 60 साल के आधिक आयु के 50 फीसदी लोग अपने घरों में शारीरिक और मौखिक दुर्व्यवहार का शिकार हैं। 2026 तक, यह आबादी 17 करोड़ से अधिक हो जाएगी।

 

बुजुर्गों की समस्याओं की तुलना में राज्य का वित्तीय और नैतिक समर्थन निराशाजनक है और यह हमारे सामाजिक न्याय प्रणाली पर एक दुःखी और हताश करने वाला सवाल है।

 

हालांकि अब हम कुछ राज्यों को छोड़कर 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना रहे हैं। वृद्ध पेंशन के लिए आवंटित धन हर माह प्रति व्यक्ति 200 रुपए से लेकर प्रति व्यक्ति 1,500 रुपए के बीच है।  200 रुपए की पेंशन साल पहले तय की गई थी, और आज के समय में इसकी प्रासंगिकता नहीं बची है।

 

इसलिए, सुप्रीम कोर्ट को दी गई  मेरी अपील में सभी बुजुर्गों के लिए प्रति व्यक्ति 2,000 रुपए प्रति माह की न्यूनतम पेंशन है। यह विचार बुजुर्गों को एक न्यूनतम वित्तीय सहायता प्रदान करना है, जो अपने जीवन की सांझ में गरिमा और अच्छा जीवन सुनिश्चित कर सकते हैं। मैंने बुजुर्गों की चिकित्सा देखभाल के लिए चिकित्सा और वृद्धाश्रम केंद्रों के लिए भी अपील की है।

 

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, ऐसे केवल दो केंद्र हैं। ( एक चेन्नई में और एक दिल्ली के एम्स में, और मुझे लगता है कि 3-4 अन्य क्षेत्रीय केंद्र हैं) जरा समस्या के पैमाने की कल्पना करें और उस तरह की उदासीनता जो मानवीय समस्या के लिए सरकार के दृष्टिकोण को परिभाषित करती है।

 

यह एक द्विदलीय मुद्दा है; इसमें कोई राजनीति नहीं है। यह विशुद्ध रूप से मानवीय है और इसका उद्देश्य उन लोगों के प्रति एक छोटा भाव प्रदर्शन करना है, जो हमें लाने के लिए जिम्मेदार हैं, और उनके जीवन के इस समय में हमारी देखभाल की आवश्यकता है।

 

बुजुर्गों की चिंता वाले अधिकांश मुद्दे राज्यों के डोमेन में हैं। देश के संघीय संदर्भ में बुजुर्गों की देखभाल के बारे में आपके क्या विचार हैं?  

 

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किए हैं । राज्य सरकारें आए और उनकी प्रतिक्रियाएं दर्ज की जाए। राज्य सरकारों को उनके प्रयासों में कमी का मुख्य कारण संसाधनों की कमी है। मैंने सुप्रीम कोर्ट से कहा है,“वृद्धावस्था पेंशन योजना (इंदिरा गांधी पेंशन योजना) एक केंद्रीय योजना है और यह केंद्र सरकार के ऊपर है कि वे यथार्थवादी स्तर पर धन उपलब्ध कराएं, न कि इसे मजाक के रुप से लें।”

 

केंद्र सरकार का मानना ​​है कि इन चीजों में से कई राज्य प्रशासन का मामला है। ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारें केंद्र सरकार से धन नहीं उठा रही हैं। लगभग 5-6 राज्य अच्छे तरीके से काम कर रहे हैं। अन्य राज्य बुजुर्गों की गरिमा के कारण आगे बढ़ने के लिए कम काम कर रहे हैं।

 

यह एक प्रतिकूल मुकदमेबाजी नहीं है। केंद्र और राज्यों मिलकर काम करना चाहिए । उन्हें वास्तव में कुछ उद्धार का काम करना चाहिए। चाहे वह बुजुर्ग पेंशन के मुद्दे हों, या बुजुर्गों के लिए हर जिले घरों की कमी का मामला हो या वृहद और चिकित्सा देखभाल या स्वास्थ्य बीमा के मामले हों। इन सब पर राज्य सरकार और केंद्र सरकार विफल है।

 

पुराने गैर-सरकारी घरों को चलाने वाले गैर-सरकारी संगठनों का समर्थन करने के लिए जब केंद्र सरकार राशि देती है तो उसेक विश्लेषण में असमानता दिखती है। लगभग 40-50 फीसदी धन दक्षिण में सिर्फ 4-5 राज्यों में जाते हैं। इस पर आपके क्या विचार हैं?

 

मैंने जो पिछली समिति की रिपोर्ट पढ़ी है, उससे पता चला है कि वृद्धाश्रमों की स्थापना के लिए केवल 25 करोड़ रूपए केंद्रीय सहायता के रूप में दिए गए थे और यहां तक ​​कि इसका इस्तेमाल भी नहीं किया जा सका। दिए गए कारण यह हैं कि राज्य सरकारों से राशि के लिए अनुरोध वित्तीय वर्ष के अंत तक आते हैं और उन्हें संसाधित नहीं किया जा सकता है और धनराशि समाप्त हो सकती है। कोई कैसे इतना उदासीन हो सकता है? मेरा मतलब है कि यह किस तरह का बहाना है?

 

केंद्र सरकार निश्चित रूप से निर्देश दे सकती है कि हमें किसी विशेष तिथि को सहायता के लिए अनुरोध चाहिए।

 

यहां तक ​​कि अगर समय पर सहायता दी गई, तो भी 25 करोड़ रूपए की अपनी कहानी है। सिर्फ 25 करोड़ के साथ 100 मिलियन से अधिक उम्र के 60 फीसदी लोगों की आप कैसे सेवा कर सकते हैं?

 

यहां तक ​​कि यह आंकड़ा बढ़ने के बजाय नीचे जा रहा है, जैसा कि अधिक से अधिक लोगों को 60+ श्रेणी में जोड़ा जाता है, आंकड़े बढ़ने के बजाय, हमें आवंटन में गिरावट दिखाई दे रही है।

 

पीछे जाने की यह एक अनोखी कहानी है। हमें पता लगाना है कि वास्तव में जमीनी स्तर पर क्या हो रहा है?

 

आप कुछ समय से इस मामले पर लड़ रहे हैं। राज्यों और केन्द्रों की प्रतिक्रिया के संबंध में अनुभव कैसा रहा है?

 

राज्यों ने अभी तक अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत नहीं की है। भारतीय केंद्र सरकार की ओर से विरोधी रुख की उम्मीद नहीं है, लेकिन इससे  राज्यों पर बोझ जा रहा है। तो, यह वास्तव में पिंग-पोंग का एक गेम है मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट में जो प्रस्तुत किया गया है, उसकी असलियत सबको पता चलेगी और अदालत उचित फैसला लेगी।

 

(चावला इंडिया स्पेंड-आईसीएफजे से जुड़ी हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 8 अक्टूबर 2017 को indiaspend.com  पर प्रकाशित हुआ है।

 

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