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बुनियादी ऊर्जा पहुंच से नहीं खुलते हैं सामाजिक-आर्थिक लाभ के रास्ते

मुक्ता पाटिल,

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उत्तर प्रदेश के बारबंकी जिले में एक घर के छत पर लगा सौर पैनल। एक नए अध्ययन के अनुसार सौर प्रकाश व्यवस्था स्थापित करने से काम पर बिताए समय के घरेलू पैटर्न, प्रकाश, व्यय, बचत या व्यापार स्वामित्व पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है।

 

जिन घरों में बिजली नहीं है, उन घरों में अगर विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाता है तो मिट्टी के तेल पर खर्च में बचत जरूर होती है। लेकिन इससे बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक लाभ नहीं हो सकता है। यह निष्कर्ष एक ऑनलाइन विज्ञान पत्रिका ‘साइंस ऐडवांस’ में प्रकाशित अध्ययन का है।

 

इस अध्ययन के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से से लगभग 75 किलोमीटर दूर बाराबंकी जिले के सुरतगंज ब्लॉक को चुना गया था। वहां के 81 गैर-विद्युतीकृत ग्रामीण समुदायों के 1,281 घरों का 12 महीने के लिए अवलोकन किया गया।

 

आधे लोगों को क्रम में नहीं चुना गया और उन्हें ‘निदान’ समूह में डाला गया। इस समूह को सौर सेवा प्रदाता मीरा गाओ पावर द्वारा लागत प्रभावी सौर माइक्रोग्रीड दी गई थी। जबकि बाकि आधे ‘नियंत्रण’ समूह को बिजली नहीं दी गई थी।

 

शोधकर्ताओं ने अध्ययन के दौरान पाया कि माइक्रोग्रिड के माध्यम से बुनियादी ऊर्जा की पहुंच व्यापक रुप से सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रदान नहीं करते हैं। सौर प्रकाश व्यवस्था स्थापित करने से काम पर बिताए समय के घरेलू पैटर्न, प्रकाश, व्यय, बचत या व्यापार स्वामित्व पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है।

 

हालांकि, ‘निदान’ और ‘नियंत्रण’ समूहों की तुलना करने के बाद अध्ययन में पाया गया कि पहले की तुलना में विद्युतीकरण दर (बिजली तक पहुंच वाले घरों का प्रतिशत) में 29 से 36 फीसदी की वृद्धि हुई है।

 

विद्युतीकृत घर प्रति माह मिट्टी के तेल के काला बाजार पर 47 से 49 रुपए कम खर्च करने लगे, जबकि पहले यह खर्च प्रति माह औसत 73 रुपए का था।

 

इस अध्ययन के लेखकों में से एक माइकल अकलिन ने इंडियास्पेंड से ई-मेल के जरिए बात करते हुए कहा कि “हमने बहुत ही छोटे और हाशिए पर पड़े समुदायों के बीच में काम किया, यहां तक ​​कि उत्तर प्रदेश के मानकों से भी कम ।”

 

माइकल अकलिन लिखते हैं, ” अन्य समुदायों में यह काफी भिन्न हो सकता है कि वे कितने धनी हैं या ग्रिड के कितने निकट हैं। इसी तरह, यदि हम अन्य देशों के बारे में बात करें तो हमें केरोसिन की कीमत के बारे में भी सोचने की आवश्यकता होगी। माइक्रोग्रिड के प्रभाव उन जगहों में बड़े हो सकते हैं, जहां मिट्टी का तेल अधिक महंगा है। खासकर उन स्थानों में जहां सरकारी सब्सिडी नहीं है। “

 

नई और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग 9 करोड़ घरों में अब भी खाना पकाने और रोशनी की आवश्यकताओं के लिए मिट्टी के तेल का उपयोग किया जाता है। मेरा गाओ पावर जैसी कंपनियां छोटे ऊर्जा ग्रिड का निर्माण करती हैं, जो कुछ घरों या गांवों को बिजली देती हैं। यह भारत के 7.3 मिलियन गैर-विद्युतीकृत घरों तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं, जो अब भी  उर्जा के प्राथमिक स्रोत के रूप में मिट्टी के तेल का इस्तेमाल करते हैं। मिट्टी के तेल से कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड जैसे हानिकारक गैसें उत्सर्जित होती हैं। यह प्रदूषण फैलाने वाला उर्जा स्रोत है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 7 जनवरी, 2017 को विस्तार से बताया है।

 

भारत में 30 करोड़ लोगों तक बिजली की पहुंच नहीं

 

एक अनुमान के अनुसार विश्व में वर्ष 2015 तक 116 करोड़ लोगों तक बिजली की पहुंच नहीं थी। हम बता दें कि यह आंकड़ा विश्व की आबादी का 17 फीसदी है। इनमें से 61.5 करोड़ एशिया और उनमें से भी अधिकांश ( 30.6 करोड़ ) के भारत में होने का अनुमान है, जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (आईआरएनएए) द्वारा 2015 के इस वर्किंग पेपर में बताया गया है।

 

वर्ष 2014 में शुरू की गई सभी के लिए ऊर्जा पहल के तहत, भारत सरकार का उद्देश्य 2019 तक अपने सभी नागरिकों को 24 × 7 ऊर्जा प्रदान करना है।

 

आईआरईएनए द्वारा जारी इस पत्र के अनुसार, बिजली प्राप्त करने वाले लोगों के लिए, ऑफ-ग्रिड नवीकरणीय सिस्टम, जो नेशनल ग्रिड से सस्ता है और बिजली पाने का सबसे किफायती तरीका है। आईआरईएनए के पेपर के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए शुरू किए गए आठ मिशनों में से एक जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय सौर मिशन (जेएनएनएसएम), ऑफ ग्रिड उर्जा विकास सहित सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख नीतिगत पहल है।

 

जेएनएनएसएम के तहत भारत का उद्देश्य वर्ष 2022 तक 2,000 मेगावाट ऑफ ग्रिड सौर अनुप्रयोगों को जोड़ना है। ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए 2015 पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के तहत यह 2022 तक 175 जीडब्ल्यू (1 गीगावॉट 1000 मेगावाट) अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता स्थापित करने के लिए भारत के बड़े लक्ष्य का एक हिस्सा है। ऑफ-ग्रिड इंस्टालेशन इस बड़े लक्ष्य का एक बहुत छोटा हिस्सा होगा। इस बारे में इंडियास्पेंड ने पहले भी रिपोर्ट किया था।

 

भारत का ऑफ-ग्रिड नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता

Source: Ministry of New & Renewable EnergyNote: Figures as of October 31, 2016

 

इस मिशन के तहत वर्ष 2013-17 के बीच लगभग 10 लाख सौर उर्जा एप्लीकेशन लगाने की संभावना है। एमएनआरई द्वारा इस अध्ययन के अनुसार मार्च 2017 तक सरकार ने ऑफ ग्रिड प्रणाली के  तहत 462.54 मेगावाट ‘सौर फोटोवोल्टेइक सिस्टम’ स्थापित किया है।

 

सरकार ने वर्ष 2001 से ग्रामीण विद्युतीकरण के लिए ये विकेंद्रीकृत ऊर्जा प्रणाली प्रदान किए हैं। हालांकि हाल ही में इस क्षेत्र में निजी कंपनियों की मौजूदगी में बढ़ोतरी हुई है।

 

‘ग्लोबल नेटवर्क ऑन एनर्जी फॉर सस्टेनेबल डेवेलपमेंट’ (जीएनईएसडी) के इस पत्र में ऐसी बातें कही गई हैं। हम बता दें कि ‘जीएनईएसडी’ यूनाइटेड नेशन्स इन्वाइरन्मन्ट प्रोग्राम के तहत एक एक सूचना नेटवर्क है।

अकलिन कहते हैं, “परिवार केवल रात में बिजली का इस्तेमाल कर सकते हैं, सूर्यास्त के बाद से रात के 11 बजे तक। मुख्य समस्या ‘कितने घंटे’ नहीं हैं। समस्या उर्जा की उपलब्ध मात्रा है। हमने जिस माइक्रो-ग्रिड का अध्ययन किया,  वे केवल लोगों को मोबाइल चार्जिंग और दो एलईडी लाइट्स तक पहुंच प्रदान करते हैं। ”

 

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पेपर के एक लेखक, माइकल अकलिन ने इंडियास्पेंड को बताया, “हमने बहुत ही छोटे और सीमांत समुदायों में काम किया है, यहां तक ​​कि उत्तर प्रदेश के मानकों से भी कम। हमने जिस माइक्रो-ग्रिड का अध्ययन किया वे केवल लोगों को मोबाइल चार्जिंग और दो एलईडी लाइट्स तक पहुंच प्रदान करते हैं। ”

 

अकलिन कहते हैं, “बड़े सिस्टम, जो अधिक ऊर्जा दे सकते हैं, उनकी पूंजीगत लागत अधिक होगी। एक चुनौती, इन प्रणालियों की लागत और संभावित ग्राहकों की जेब से संबंध का भी है। सार्वजनिक नीति विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, ताकि ग्राहकों को (या किराए पर) अधिक शक्तिशाली ऑफ-ग्रिड तकनीक खरीदने के लिए पैसे उधार लेने में सहायता मिल सके। ”

 

एक वैश्विक शोध संगठन वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (डब्लूआरआई) द्वारा 2015 के इस पत्र के मुताबिक, सबसे गरीब लोग अक्सर मूलभूत बिजली सेवाओं के लिए उच्चतम दरों का भुगतान करते हैं ।

 

बिजली का इस्तेमाल हो सकता है बहुआयामी, लेकिन ऐसा होता नहीं

 

हर किसी के लिए बिजली की पहुंच बहुआयमी नहीं है और इसका जवाब सिर्फ हां या ना के साथ नहीं दिया जा सकता है। डब्लूआरआई पेपर के मुताबिक, समुदायों का बिजली पर अनुभव को विश्वसनीयता, सामर्थ्य, और विभिन्न सेवाओं को शक्ति देने की क्षमता जैसे गुणों के द्वारा आकार दिया गया है। 16 मई, 2017 तक, भारत के 73 फीसदी गांवों तक बिजली पहुंच गई है, लेकिन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक, केवल 8 फीसगी गांवों के सभी घरों तक बिजली पहुंची है। ये आंकड़े प्रदान की गई ऊर्जा की गुणवत्ता के बारे में कोई जानकारी नहीं प्रदान करता है।

 

(पाटिल विश्लेषक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 मई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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