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बेटी बचाओ अभियान के बावजूद भारतीय शहरों में लिंग अनुपात चिताजनक

तरुण अमरनाथ,

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एक आम धारणा है कि देश में लड़कियों को लेकर पूर्वाग्रह, जो लिंग अनुपात में दिखाई देती है, की गहरी जड़ें ग्रामीण क्षेत्रों में है। लेकिन सरकारी आंकड़े ऐसा नहीं कहते। सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली और मुंबई सहित भारत के कुछ सबसे बड़े शहरों में वर्ष 2011 में लिंग अनुपात असंतुलित था।

 

तरुण अमरनाथ द्वारा शुरु की गई एक पहल, Kanya.Life द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 में, मुंबई में  0-6 वर्ष आयु वर्ग के हर 1,000 लड़कों पर 852 लड़कियों, दिल्ली में 832 लड़कियों, और हैदराबाद में 942 लड़कियों का अनुपात था। तरुण संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित हाई स्कूल के छात्र हैं और रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के भारत सरकार के कार्यालय द्वारा प्रदान किए गए लिंग आंकड़ों पर उन्होंने बड़े पैमाने पर विश्लेषण किया है। भारतीय शहरों के लिंग अनुपातों पर नवीनतम आंकड़े वर्ष 2011 से उपलब्ध हैं।

 

आंकड़ों के अनुसार, सबसे बद्तर लिंग अनुपात गुजरात के महेसाणा में था। यहां प्रति 1000 लड़कों पर 762 लड़कियों का अनुपात दर्ज किया गया है। जबकि उत्तर प्रदेश के आगरा में 772, उत्तर प्रदेश के मोदीनगर में 778 का अनुपात दर्ज हुआ है। पश्चिम बंगाल के अंग्रेजी बाजार में प्रति 1,000 लड़कों पर 781 लड़कियों का आंकड़ा रहा है।  वहीं पश्चिम बंगाल के बैली में प्रति 1000 लड़कों पर अधिक लड़कियों (1,185) का आंकड़ा रहा है। जबकि असम के नगांव में प्रति 1,000 लड़कों पर 1,043 लड़कियों और तमिलनाडु के ताम्बरम में 1,019 लड़कियों का अनुपात रहा है।

 

लैंगिक मुद्दों पर काम कर रहे संगठनों की एक रिपोर्ट के मुताबिक जन्म के समय सामान्य लिंग अनुपात प्रति 100 लड़कियों पर 102 से 106 लड़कों के बीच रहता है, जो प्रति 1,000 लड़कों पर 943- 980 लड़कियों के बराबर होगा।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक यह अनुपात प्रत्येक 1,000 लड़कियों पर 1000 लड़कों का नहीं है, क्योंकि बड़े होने पर लड़कों के लिए मृत्यु के उच्च जोखिम को सहना कुदरती रूप से ज्यादा आसान है।

 

जनगणना के समय 0 से 6 वर्ष की आयु के बीच लड़कों और लड़कियों की दर्ज संख्या को बाल लिंग अनुपात कहते हैं। बाल लिंग अनुपात से पता चलता है कि किस तरह का लिंग चयन देश में प्रचलित है।

 

प्रति 1,000 लड़कों पर 943-980 लड़कियों का सामान्य अनुपात लड़कियों के प्रति भेदभाव और कन्या भ्रूण हत्या की मौजूदगी का संकेत देता है।

 

एक प्रतिकूल बाल लिंग अनुपात पूरी आबादी के विकृत लिंग बदलाव में भी परिलक्षित हो सकता है। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, 2031 में, भारत में प्रति 1,000 पुरुषों पर 936 महिलाएं होंगी, जो 1951 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 946 महिलाओं के अनुपात से कम है।

 

500 भारतीय शहरों में प्रति 1000 लड़कों (0-6 वर्ष) पर औसत 902 लड़कियां, ग्रामीण भारत में 923 से कम लड़कियां

Source: Census 2011

 

इस आलेख के लिए Kanya.Life ने भारत के प्रत्येक राज्य और 500 सबसे अधिक आबादी वाले शहरों के लिए आंकड़े वर्ष 2011 के जनगणना से लिया है, जो नवीनतम उपलब्ध शहर-स्तर डेटा है। जनगणना के समय में सबसे बड़ी नगरपालिका ग्रेटर मुंबई की आबादी 12 मिलियन थी, जबकि सबसे छोटी, मध्य प्रदेश में नागदा की आबादी 100,000 थी।

 

500 भारतीय शहरों में औसत बाल लिंग अनुपात 902 दर्ज है। बड़े शहरों की कुल आबादी 221 मिलियन है, जो ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन के आबादी के बराबर है। भारतीय शहरों में अनुपात वर्ष 2011 के ग्रामीण भारत में पाए गए आंकड़ों के समान ही बद्तर थे। इन ग्रामीण इलाकों में प्रति1,000 लड़कों पर लगभग 923 लड़कियों का औसत बाल लिंग अनुपात है।

 

ग्रामीण की तुलना में शहरी भारत का औसत लिंग अनुपात बद्तर

Source: Census 2011

NOTE: Data For Telangana is not available

 

विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक,  वर्ष 2011 के बाद से भारत में जन्म के समय लिंग अनुपात में मामूली सुधार हुआ है। ये आंकड़े वर्ष 2011 में प्रति 1,000 लड़कों पर 902 लड़कियों की थी, जो 2015 में 903 हुआ है। लेकिन यह अनुपात अभी भी दुनिया में पांचवां सबसे खराब है। भारत के आंकड़े केवल लिकटेंस्टीन (794), चीन (867), अजरबैजान (897) और आर्मेनिया (883) से बेहतर है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत का लिंग अनुपात पाकिस्तान (920), दक्षिण कोरिया (952), नाइजीरिया (944) और नेपाल (939) से भी बदतर है।

 

वर्ष 2015 में विश्व स्तर पर भारत में पांचवा सबसे बद्तर लिंग अनुपात

Source: World Bank

 

शहर स्तर के आंकड़ों के विश्लेषण से कैसे मिल सकती है सहायता ?

 

शहर और कस्बों के स्तर का विश्लेषण लिंग भेदभाव पर प्रवृत्तियों की पहचान करने में मदद कर सकता है, जिससे सरकार और गैर-सरकारी संगठनों को कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है।

 

इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर अध्ययन का इस्तेमाल समुदायों को इस समस्या के बारे में जागरूक बनाने के लिए भी किया जा सकता है । उन्हें कार्य करने के लिए सशक्त बना सकता है।

 

इन मुद्दों पर काम करने वाली सरकार और संगठन उन शहरों से भी सीख सकते हैं, जहां स्वस्थ लिंग अनुपात हैं। उदाहरण स्वरूप पुडुचेरी (पुडुचेरी), आइजोल (मिजोरम), कोलार (कर्नाटक), कुंबकोणम (तमिलनाडु) और नागरकोइल (तमिलनाडु) जैसे जगहों से बहुत कुछ ग्रहण किया जा सकता है, यहां लिंग को लेकर कोई भेदबाव नहीं दिखता।

 

भ्रूणहत्या के खिलाफ भारत की लड़ाई क्यों हुई विफल ?

 

जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत का राष्ट्रीय बाल लिंग अनुपात वर्ष 1991 में  प्रति 1,000 लड़कों पर 945 था। यह गिरकर वर्ष 2011 में प्रति 1,000 लड़कों पर 918 हुआ है।

 

हरियाणा, पंजाब, जम्मू और कश्मीर, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड और महाराष्ट्र के राज्यों में प्रति 1,000 लड़कों पर 900 से कम लड़कियों का आंकड़ा है, जो देश के भावी लैंगिक संतुलन और जनसांख्यिकी को प्रभावित कर सकता है।

 

1960 के दशक के मध्य में, भारत में जन्मपूर्व लिंग निर्धारण की वाली नई तकनीक की अनुमति दी गई थी। इससे लिंग-चयन की सुविधा के साथ गर्भपात की घटनाएं बढ़ी हैं। अक्टूबर 2011 में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट में इस पर विस्तार से बताया गया है।

 

जर्मनी के ‘इन्स्टिटूट फॉर द स्टडी ऑफ लेबल’ (आईजेएए) के शोधकर्ताओं द्वारा वर्ष 2012 के एक चर्चा पत्र के मुताबिक, वर्ष 1990 में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने अल्ट्रासाउंड तकनीक को और आसानी से उपलब्ध कराया है। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 1988 से 2003 के बाद भारत में निर्मित अल्ट्रासाउंड मशीनों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई, विशेष रूप से 1994 के बाद से ।

 

अल्ट्रासाउंड का प्रारंभिक इस्तेमाल लिंग-चयन करने के लिए चला गया था, लेकिन इससे गर्भपात की दर 2000 के दशक में प्रौद्योगिकी के तेजी से विस्तार के साथ अधिक नहीं हुई थी। “

 

भारत सरकार ने इन नई प्रौद्योगिकियों के कारण उत्पन्न होने वाली कन्या भ्रूण को रोकने के लिए नियम लागू किए हैं। इस संबंध में एक मुख्य कानून ‘प्री-कॉन्सेप्शन’ और 1994 की ‘प्री-नेटाल डायग्नॉस्टिक टेक्निक्स एक्ट’ (पीसी एंड पीएनडीटी) गर्भ धारण करने से पहले या बाद में लिंग अवधारणा पर प्रतिबंध लगाता है और लिंग निर्धारण तकनीकों के दुरुपयोग को रोकने के लिए नैदानिक ​​तकनीकों को विनियमित करता है।

 

लेकिन इन कानूनों को अक्सर ठीक तरीके से लागू नहीं किया जाता है। उदाहरण के लिए, ‘नियंत्रक और महालेखा परीक्षक’ (सीएजी) ने पाया कि वर्ष 2014-15 में  महाराष्ट्र के अधिकारी, सोनोग्राफी केंद्रों की 55 फीसदी निरीक्षणों को पूरा करने में विफल रहे हैं। इस बारे में इंडियास्पेंड ने जून 2015 में रिपोर्ट किया है। गुजरात में 73 फीसदी सोनोग्राफी केंद्रों के निरीक्षण में कमी थी।

 

इसके अलावा, पीसी और पीएनडीटी अधिनियम के तहत छह महीने के भीतर, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन करने पर महाराष्ट्र और गुजरात में एक से 12 साल तक मामले चले हैं।

 

कैग के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार ने कन्या भ्रूणहत्या को रोकने के लिए आबंटित राशि में से आधा खर्च नहीं किया है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने अक्टूबर 2016 की अपनी रिपोर्ट में बताया है। कैग ऑडिट में पाया गया कि गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासोनोग्राफी के दौरान किए गए इमेज रिकॉर्ड या बैकअप के संरक्षण के किसी भी नैदानिक ​​केंद्र ने सभी अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया है। 68 फीसदी मामलों में, महिलाओं ने अपने डॉक्टरों से आवश्यक ‘रेफरल स्लिप’ भी नहीं लिए थे।

 

लिंग चयन का कारण महिलाओं का सशक्त न होना, दहेज की संस्कृति और  छोटे परिवार की चाह

 

आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले कुछ दशकों में महत्वपूर्ण आर्थिक और वैज्ञानिक विकास के बावजूद, भारत में बालिकाओं की हत्या और कन्या भ्रूणहत्या अब भी बड़े मुद्दे हैं।

 

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष से जानकारी के अनुसार, बालिकाओं की हत्या में महिला विरोधी पूर्वाग्रह शामिल हैं, क्योंकि महिलाओं को अक्सर पुरुषों की तुलना में कम आंका जाता है। इसके अलावा, माता-पिता का मानना ​​है कि पुरुषों द्वारा उनकी बुढ़ापे में उनकी देखभाल बेहतर होगी, क्योंकि परिवार के मुख्य आय स्रोत पुरुष होते हैं। आमतौर पर लड़कियों के माता-पिता को दहेज की भारी रकम का भुगतान करने की चिंता होती है। लड़के के होने पर दहेज चिंता नहीं होती है।

 

बेटा की वरीयता के साथ मिलकर, छोटे परिवार की चाह भी लिंग चयन का कारण हो सकती हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

अमरिका के ‘नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस’ द्वारा प्रकाशित वर्ष 2006 के एक लेख के अनुसार “जन्म के समय लिंग अनुपात लड़कों के पक्ष तब हो जाते हैं, जब प्रजनन दर ‘पसंद से या किसी कारण कम हो जाते हैं।तब अक्सर पारिवारिक आकार के मानक के भीतर वांछित पुत्रों की अनुमति के लिए महिला जन्म को रोका जाता है। “

 

सरकारी आंकड़ों पर इंडियास्पेंड के विश्लेषण अनुसार, जन्म के समय भारत का लिंग अनुपात घट गया, जबकि पिछले 65 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय लगभग 10 गुना बढ़ी है। इसका कारण आय में वृद्धि हो सकती है, जो जो साक्षरता में वृद्धि का कारण बनती है और परिवारों को एनीओसेंटिस जैसे लिंग-चयनात्मक प्रक्रियाओं तक पहुंच आसान बनाता है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने जून 2015 में विस्तार से बताया है।

 

एक रिसर्च के मुताबिक, हालांकि, भारत में, शिक्षा बेटे की वरीयता को कम करने में मदद कर सकती है, लेकिन महिलाओं को अधिक व्यापक रूप से सशक्त होने की जरूरत है। इस बारे में इंडियास्पेंड ने मई 2016 में विस्तार से बताया है। शिक्षा, यात्रा,  निर्णय लेने की स्वतंत्रता और महिलाओं में पुरुषों की तरह से शिक्षा का उपयोग करने के अवसर  लिंग धारणा बदलने के लिए महत्वपूर्ण तथ्य हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने दिसंबर 2016 की रिपोर्ट में बताया है।

 

(अमरनाथ हाई स्कूल के छात्र हैं और Kanya.Life  के संस्थापक हैं। समाज में समस्याओं के समाधान के लिए डेटा विज्ञान को लागू करने में उनकी गहरी दिलचस्पी है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 2 अगस्त 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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