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बेटे की वरियता को कम करने के लिए शिक्षा के साथ महिला सशक्तिकरण भी है आवश्यक

चारु बाहरी,

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24 वर्षीय नेत्रा जनगम दक्षिण-मध्य महाराष्ट्र के सतारा जिले में गोव गांव की रहने वाली हैं। कई गावों की तरह नेत्रा के गांव में भी ज्यादातर महिलाएं दो बेटे और एक बेटी की चाहत रखती हैं। लेकिन आम लोगों के विपरीत, नेत्रा,जो अब पुणे में रहने लगी हैं, एक ही बच्चा चाहती हैं। बेटा हो या बेटी, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनकी इस सोच में बदलाव के पीछे केवल शिक्षा या डिग्री ही कारण नहीं है। इस बदलाव का एक बड़ा कारण गांव के बाहर की दुनिया से उसका संपर्क और शादी से पहले और बाद में काम करने का अवसर मिलना है।

 

माउंट आबू, राजस्थान: मैं आज यह कहानी नहीं लिख रही होती यदि बाहरी समुदाय ने 1900 के प्रारंभ से कन्या भ्रूण हत्या पर रोक नहीं लगाई होती। मैं बाहरी समुदाय से हूं। यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से आए हिंदुओं का एक समुदाय है। लेकिन एक सदी बीतने के बाद भी ऐसा लगता है कि इस कन्या भ्रूण हत्या का प्रभाव गहरा पड़ा है।

 

नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि 1951 के बाद से  भारत में बाल लिंग अनुपात सबसे कम है। वर्तमान में यह अनुपात 914 है। समग्र लिंग अनुपात की तुलना में आज भी बेटे को श्रेष्ठ मानने का यह एक संकेत है।

 

2011 में देश भर में बाल लिंग अनुपात

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Source: Declining Child Sex Ratio in India: Trends, Issues and Concerns

 

एक तथ्य यह भी है कि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 फीसदी बढ़ गई है और इससे बच्चे के लिंग अनुपात में अधिक से अधिक समता होनी चाहिए। इसका मतलब है कि लिंग अनुपात में सुधार करने के लिए सिर्फ महिलाओं का साक्षर होना पर्याप्त नहीं है। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान द्वारा सुझाव और जोर दिया जा रहा है।

 

जैसा कि इस लेख के पहले भाग में हमने बताया है कि शिक्षित लोग लिंग चयन के प्रति ज्यादा उत्सुक रहते हैं और गर्भपात के साधनों तक ज्यादा जल्दी पहुंच पाते हैं।

 

बेटियों के खिलाफ पक्षपात तभी समाप्त किया जा सकता है यदि महिलाओं की शिक्षा के साथ उनका सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण किया जाए। यह निष्कर्ष ओटावा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कैरल व्लासोफ द्वारा महाराष्ट्र के गोव में 30 साल की अवधि के दौरान किए गए अध्ययन में सामने आई है।

 

शिक्षा से लिंग मानदंडों में बदलाव नहीं

 

लैंगिक समानता को प्राप्त करने में शिक्षा की भूमिका के संबंध में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी 2013 की रिपोर्ट ‘मेकिंग एजुकेशन ए प्राइरिटी इन द पोस्ट-2015 डेवलप्मेंट एजेंडा’ में कहा कि, “ इतना ही नहीं शिक्षा के बिना लैंगिक समानता को प्राप्त  करना असंभव है, हर किसी तक शिक्षा की पहुंच बनाने से गरीब परिवारों के आर्थिक जोखिम को कम किया जा सकता है और उत्पादकता को प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है।”

 

लेकिन भारत के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र की मान्यताओं से कुछ अलग दिखते हैं। युवा ग्रैजुएट माताओं ने प्रति 1,000 लड़कों पर 899 लड़कियों को जन्म दिया है। यह संख्या 943 के राष्ट्रीय औसत से कम है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मई 2016 में विस्तार से बताया है।

 

पिछले 20 वर्षों में हरियाणा में महिला साक्षरता दर में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2011 में यह 65 फीसदी तक पहुंचा है और और यह राज्य अब भी सबसे कम लिंग अनुपात के लिए जाना जाता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने नवंबर 2015 में बताया है।

 

इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च एंड वुमेन के एशिया क्षेत्रीय कार्यालय में सोशल एंड इकोनॉमिक डेवलपमेंट की समूह निदेशक प्रिया नंदा कहती हैं, “यह स्पष्ट है कि बेटों के लिए वरीयता बदलने के लिए महिलाओं की शिक्षा पर्याप्त नहीं है। हालांकि, शिक्षा से महिलाओं की क्षमताओं का विकास होता है लेकिन लिंग मानदंडों को बदलने के लिए अन्य पूरक प्रयासों की आवश्यकता है।”

 

चुनने का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण, जितनी की डिग्री

 

पश्चिमी महाराष्ट्र के सतारा जिले में गोव गांव की 24 वर्षीय नेत्रा जनगम कॉमर्स से ग्रैजुएट हैं। नेत्रा की मां ने केवल कक्षा सात ही पढ़ाई की है।

 

नेत्रा ने डिग्री प्राप्त करने के साथ और बहुत कुछ किया है। नेत्रा ने खूब यात्रा की है और स्वतंत्र रुप से निर्णय लिया है। वह कहती हैं, “अपने रिश्तेदारों के साथ रहते हुए सतारा के पास मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त की है। सप्ताहांत में मैं माता-पिता से मिलने आती थी। माता-पिता से दूर रहते हुए मैंने सीखा है कि कैसे खुद की देखभाल करनी चाहिए। साथ ही मेरी सोच का भी विस्तार हुआ है। मेरी मां ने शादी से पहले शायद ही कभी अकेले यात्रा की थी।”

 

नेत्रा की मां सिलाई का काम करके कुछ पैसे कमाती है और इससे ही नेत्रा को आर्थिक स्वतंत्रता के मूल्य का एहसास हुआ। नेत्रा कहती हैं, “ मैंने अपने पति से पहले ही यह बात कह दी थी कि मैं शादी के बाद भी काम करुंगी। मैं हमेशा आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहनी चाहती थी। उन्होंने मेरे फैसले का समर्थन किया है।”

 

अच्छी जिंदगी के लिए खर्च को देखते हुए नेत्रा केवल एक ही बच्चा चाहती हैं । उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि बेटा होगा या बेटी। उन्हें भरोसा है कि उनके पति उनके इस फैसले का समर्थन करेंगे।” हमें अपने बुढ़ापे में पर निर्भर रहने के लिए बच्चा नहीं चाहिए; हम अपने भविष्य के लिए निवेश करेंगे।”

 

लिंग धारणाएं और सशक्तिकरण

 

शिक्षा, यात्रा, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और पुरुषों की तरह शिक्षा का उपयोग करने के अवसर लिंग धारणाओं को बदलने के लिए महत्वपूर्ण तत्व हैं, न की केवल शिक्षा या आर्थिक विकास। यह निष्कर्ष व्लासोफ और अन्य साथियों द्वारा  2014 के एशियन पॉपुलेशन जर्नल के एक अध्ययन, ‘इकोनॉमिक डेवलपमेंट,वुमेन्स सोशल एंड इकोनॉमिक इमपावरमेंट एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ इन रूलर इंडिया’ में सामने आया है।

 

व्लासोफ का मानना है, “सामाजिक सशक्तिकरण और आर्थिक सशक्तिकरण का आर्थिक विकास की तुलना में महिला प्रजनन स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।”

 

अपने 30 साल की अध्ययन में व्लासोफ ने गोव के सामाजिक सशक्तीकरण के संकेतकों में बड़ा परिवर्तन देखा है: वर्ष 1975 में  केवल 8 फीसदी की तुलना में 2008 में 58 फीसदी महिलाओं ने आठ या इससे ज्यादा साल की पढ़ाई की है। 2008 में 65 फीसदी उत्तरदाताओं ने महीने में कम से कम एक बार जिला राजधानी तक यात्रा करने की बात की, जबकि 1975 में ये आंकड़े 25 फीसदी थे।

 

इन सब का प्रभाव: 2008 में तीन बेटियां होने के बाद 86 फीसदी महिलाओं ने बेटे की कोशिश बंद कर दी, जबकि 1975 में यही आंकड़े 24 फीसदी थे। व्लासोफ की राय है, “ महिलाएं सामाजिक रूप से जितनी ज्यादा सशक्त होंगी, कम बच्चों की संभावना उतनी ज्यादा होगी। ” व्लासोफ का मानना है कि सामाजिक परिवर्तन को गति प्रदान करने के लिए, आत्मविश्वास और आजादी हासिल करने के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि अधिक महिलाएं औपचारिक रोजगार की ओर जाएं और खुद के संबंध में सोचें।

 

बेटा अब भी महत्वपूर्ण

 

1970 में, परिवार नियोजन के लिए हिंदी में प्रचलित हुआ नारा, हम दो हमारे दो, से बच्चों की संख्या दो रखने में काफी प्रोत्साहन मिला है। लेकिन जेंडर एक्वालिटी एंड इनएक्वालिटी इन रुरल इंडिया, ब्लेस्ड विद ए सन, लिखने वाली व्लासोफ ने पाया कि महिलाओं के बीच एक आदर्श परिवार की धारणा में काफी हद तक बदलाव नहीं आया है। यह धारणा सरकार के ‘हम दो-हमारे दो यानी चार’ से भिन्न है।

 

व्लासोफ कहती हैं, “1975 में महिलाएं दो बेटे और एक बेटी चाहती थीं, जबकि 2008 में महिलाएं दो या एक बेटा चाहती हैं।  हालांकि, 2008 में ज्यादातर महिलाओं ने कहा कि वे एक बेटी भी चाहती हैं, करीब-करीब बोनस की तरह।”

 

वांछित बच्चों की औसत संख्या 1975 व 2008

Source: Gender Equality and Inequality in Rural India, Blessed with a Son

 

एक बेटे की चाहत में महिलाएं तीन बेटियों को जन्म देने को तैयार दिखती हैं। एक इच्छा से, दो अनिच्छा से।

 

वह कहती हैं, “ अधिक बच्चों के साथ वाली महिलाओं के पास कम से कम उतने लड़के थे, जितनी उनकी चाहत थी, लेकिन बेटियों की संख्या एक या दो ज्यादा थी । स्पष्ट है कि बेटों की तुलना में बेटियों की संख्या से महिलाओं के वांछित परिवार का आकार बड़ा हो जाता है।”

 

एक बार जब महिलाएं वांछित बेटों की संख्या को जन्म दे देती हैं तो उनमें बंध्याकरण करा लेने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। बंध्याकरण ग्रामीण भारत में परिवार नियोजन की आम विधि है।

 

अब भी बेटों के लिए जान जोखिम में क्यों डालती हैं महिलाएं

 

दक्षिण-पश्चिम राजस्थान के सिरोही जिले की 35 वर्षीय सीमा अलिका ने दो बेटी और एक बेटा होने के बाद परिवार नियोजन करा लिया है। वह कहती हैं, “मैं एक बेटे के साथ खुश हूं और तीन बच्चे काफी होते हैं।”

 

तीन साल पहले सीमा ने अपने एक बेटे को खो दिया। बेटे की उम्र 15 वर्ष थी, जबकि बेटियां 12 और 9 वर्ष की थीं।

 

सीमा के साथ हुए इस हादसे के बाद से पड़ोस की महिला परिवार  नियोजन कराने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें डर है कि भविष्य में अगर उनके साथ ऐसा हादसा होता है तो वे फिर बेटे को जन्म नहीं दे पाएंगी।

 

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दक्षिण-पश्चिम राजस्थान के सिरोही जिले की 35 वर्षीय सीमा अलिका ने दो बेटियां और एक बेटा होने के बाद बंध्याकरण करा लिया है। तीन साल पहले सीमा ने अपने एक बेटे को खो दिया। इसके बाद से वे बेटे की चाहत में लगातार गर्भ धारण करने की कोशिश कर रही हैं।

 

एक साल के बाद बेटे की चाहत में सीमा ने ट्यूब के बंधन को उलट दिया। उसे उम्मीद है कि वह फिर गर्भ धारण कर पाएंगी।

 

हालांकि वह यह नहीं मानती कि बुढ़ापे में बेटा उनका समर्थन करगा। वह कहती हैं, “ऐसा नहीं है कि बेटे हमेशा मददगार होते हैं।

 

मेरे पति शायद ही अपने परिवार में कोई मदद करते है। लेकिन अगर एक भाई होगा तो मेरी बेटियों के लिए यह अच्छा होगा और हमारे लिए हमारा बेटा ही परिवार के नाम को आगे बढ़ाएगा।”

 

महिलाओं को एक या दो बेटे की चाहत विभिन्न आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक कारणों से होती है। बेटे की प्रबल चाहत में कुछ लोग लिंग-चयन दवाओं का उपयोग करते हैं और उन्हें विश्वास होता है कि दवाओं की मदद से वे बटे को जन्म दे सकते हैं।

 

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ से जुड़े मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य विशेषज्ञ सुतापा बंदोपाध्याय नेओगी कहते हैं, “हरियाणा में अविश्वसनीय स्रोतों द्वारा बनाया गया लिंग चयन दवाएं धड़ल्ले से किराने की दुकान पर बिकती हैं।” याद रहे, हरियाणा अपने कम लिंग अनुपात के लिए भी जाना जाता है । वर्ष 2011 में यहां लिंग का अनुपात 879 अनुपात दर्ज किया गया है, जो कि भारत में तीसरा सबसे बद्तर आंकड़ा है और मलावी और सोमालिया जैसे गरीब देशो से भी कम है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने नवंबर 2015 में बताया है

 

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ, दिल्ली के साथ अनुसंधान सलाहकार, सपना चोपड़ा, जिन्होंने सुतापा के साथ रिसर्च किया है, कहती हैं, “यहां तक कि भरोसे को डॉक्टर भी ऐसी दवा उपलब्ध कराते हैं। वे पूछते हैं कि क्या अपका पहला तिमाही चल रहा है और अगर आपका जवाब हां है जो वे आपको बेटा होने का विश्वास दिलाते हैं। ”  2007 में एक समुदाय आधारित अध्ययन में जिसकी निओगी सह लेखक थी, में पाया गया है कि हरियाणा में सभी गर्भवती महिलाओं में से करीब आधी या तो अपने मौजूदा गर्भावस्था या पहले गर्भावस्था के दौरान  लिंग-चयन दवाएं लेती रही हैं। वह कहती हैं कि दिलचस्प बात यह है कि इनमें से किसी के पास बेटे नहीं थे।

 

निओगी और उनके साथियों  द्वारा वर्ष 2015 हरियाणा सरकार प्रायोजित अध्ययन के अनुमान के अनुसार, लिंग-चयन दवाएं लेने वाली पांच में से एक महिला का बच्चा मृत पैदा हो सकता है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है क्योंकि पिछले वर्ष भारत में 592,000 मृत बच्चों के जन्म की रिपोर्ट दर्ज की गई है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने फ़रवरी 2016 में बताया है।

 

निओगी कहती हैं,“यदि मृत जन्म न भी हो तो ऐसी दवाओं के सेवन से बच्चों में विकासात्मक विकार होने की संभावना तीन से चार गुना बढ़ जाती है।”

 

अब भी बड़े पैमाने पर हो रहे हैं चयनात्मक लिंग गर्भपात

 

जब सब कोशिश विफल हो जाता है तो समृद्ध और शिक्षित परिवार कन्या भ्रूण हत्या की ओर जाते हैं। बच्चों के लिए 24 × 7   हेल्पलाइन चलाने वाली एक गैर सरकारी संगठन ‘जालंधर वेलफेयर सोसायटी’ की संस्थापक, सुरिंदर सैनी,  कहती हैं, “ कन्या भ्रूण हत्या में डॉक्टरों की मिलीभगत होती है।” गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) अधिनियम, 1994 के तहत सैनी के एनजीओ ने कई चिकित्सकों को दोषी पाया है।

 

1981 में, जब से उन्होंने लैंगिक समानता के लिए प्रचार शुरू किया है, तब से 100 नवजात कन्याओं को बचाया हैं, जिन्हें एक प्लसाटिक के बैग में रख कर कूड़े के ढेर में फैंक दिया जाता है।

 

सैनी कहते हैं, “इससे यह पता चलता है कि परिवार की बहूओं पर बेटा पैदा करने के लिए ससुराल में भारी दबाव है।”

 

दूसरे बच्चे के साथ, महिलाओं पर बेटे को जन्म देने का दबाव और बढ़ता है। वर्ष 2011 के पेपर ‘डिक्लाइनिंग चाइल्ड रेशिओ इन इंडिया:ट्रेंडर, इशु एवं कंसर्नस’ में उल्लेख किया गया है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) III के अनुसार पहले जन्म के समय लिंग अनुपात 843 था, जबकि दूसरे बच्चे के जन्म के समय यह गिर कर 762 हुआ है।

 

जन्म अनुक्रम के अनुसार जन्म के समय लिंग अनुपात

Source: Declining Child Sex Ratio in India: Trends, Issues and Concerns

 

तिरुपति के एसवी विश्वविद्यालय में जनसंख्या अध्ययन और सामाजिक कार्य विभाग के तेनेपल्ली चंद्रशेखरय्या, जो ‘डिक्लाइनिंग चाइल्ड रेशिओ इन इंडिया:ट्रेंडर, इशु एवं कंसर्नस’ पेपर के सह-लेखक भी है, कहते हैं “दूसरे बच्चे के जन्म का लिंग अनुपात पहले जन्में बच्चे के लिंग से संबंधित होता है, विशेष रूप से मध्य से ऊपरी आय वाले परिवार दो या अधिकतम तीन बच्चे चाहते हैं।”

 

2006 के एक लैंसेट अध्ययन के अनुसार, यदि पहला जन्मा बच्चा बेटा है तो  दूसरे जन्मे बच्चे का अनुपात 871 से बढ़ कर 1,102 हुआ है। यह आंकड़ा दिखाता है कि किस प्रकार बेटे को जन्म देने के बाद मांओ पर दबाव कम हो जाता है।

 

दूसरे जन्म के बाद लिंग अनुपात

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Source: Lancet study: Low male-to-female sex ratio of children born in India: national survey of 1·1 million households

 

हालांकि, यदि पहला जन्मा बच्चा बेटी है तो अनुपात गिर कर 759 हुआ है।

 

क्या दंड ही समाधान है?

 

2011 में भारत के सबसे कम बाल लिंग अनुपात को देखते हुए हरियाणा सरकार को शिशुओं की मौत के कारणों की जांच शुरू करने के लिए प्रेरित किया है। इससे लिंग-चयन दवाओं और ग्राहकों और लिंग-चयन प्रदाताओं के बीच मिलीभगत और गर्भपात सेवाओं का दुरुपयोग शुरु हुआ है।

 

राज्य के निराशाजनक बाल लिंग अनुपात में सुधार लाने का कार्य बड़े स्तर पर हुआ है। हम बता दें कि 2011 में यह आंकड़ा 879 था।

 

हरियाणा के मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव, राकेश गुप्ता कहते हैं, “हरियाणा में, महिलाओं को बेटे जन्म देने के लिए सक्षम बनाने का बड़ा अवैध उद्योग था, उद्योग की लागत करीब 200 करोड़ सालाना होने का अनुमान है।”

 

स्वास्थ्य विभाग, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, पुलिस और जिला प्रशासन से कर्मियों से जुड़े सम्मलित प्रयासों की निगरानी के लिए मुख्यमंत्री ने अपने कार्यालय में एक विशेष सेल बनाया है। गुप्ता के अनुसार, पीसीपीएनडीटी अधिनियम और गर्भावस्था की मेडिकल टर्मिनेशन अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के परिणामस्वरुप मई 2015 के बाद 376 प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दायर की गई है।

 

पीसीपीएनडीटी प्रावधानों के तहत दायर की गई 176 प्राथमिकियों में से 69 पड़ोस के दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान से हैं। अन्य 39 मामले लिंग-चयन दवाओं के वितरण के लिए दर्ज किया गया है।

 

दिसंबर 2015 में, हरियाणा का जन्म के समय लिंग अनुपात 900 के पार हुआ है, ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ है। तब से, हरियाणा का औसत अनुपात 898 है। हाल के महीनों में गुप्ता के मन में उम्मीद जगी है। क्योंकि वर्ष 2016 के अंत तक औसत वार्षिक लिंग अनुपात 900 के ऊपर हुआ है।

 

यह श्रृंखला यहां समाप्त होती है। पहला भाग आप यहां पढ़ सकते हैं।

 

(बाहरी स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं। राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 21 दिसंबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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