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बैक्टीरिया खाइये, डॉक्टर से दूर रहिए

चारु बाहरी,

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प्रोबायोटिक्स (पेट के लिए मददगार जीवाणु, जो आम तौर पर समृद्ध पदार्थों में पाए जाते हैं ) ने भारत में डायरिया से लड़ने में कमाल की मदद की है। गौर हो कि भारत में डायरिया एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। जून 2011 के एक अध्ययन के मुताबिक, 12 सप्ताह के दौरान प्रोबायोटिक पेय की दैनिक खुराक से कोलकाता के झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों में डायरिया होने की घटनाओं में 14 फीसदी की गिरावट हुई है।

 

पारंपरिक चिकित्सा विज्ञान का मानना ​​है कि विभिन्न खाद्य पदार्थ रोग को रोकने और ठीक करने में मदद कर सकते हैं। अब नए शोधों में इसकी पुष्टि हो गई है कि जिन खाद्य में पदार्थों में प्रोबायोटिक्स (स्वास्थ्य-उन्नत सूक्ष्मजीवों जैसे कि  जीवाणु और यीस्ट) और प्रीबायोटिक्स (गैर-पचने योग्य पौधे , जो प्रोबायोटिक्स के विकास को बढ़ावा देते हैं ) पाए जाते हैं, वे कुछ मामलों में तो दवा की जगह ले सकते हैं।

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी कहना है कि पर्याप्त मात्रा में इस्तेमाल करने पर प्रोबायोटिक्स हमारे स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं।

 

आहारनाल के माइक्रोबायोटा में लाभकारी और हानिकारक दोनों प्रकार के जीवाणुओं का समावेश होता है। इसकी संरचना में होने वाला परिवर्तन मोटापा, मधुमेह, आंत का रोग, पेट का कैंसर और अस्थमा जैसे रोगों का कारण हो सकता है।  प्री और प्रोबायोटिक्स युक्त समृद्ध खाद्य पदार्थ जीवाणुओं के अनुकूलतम पारिस्थितिकी को बनाए रखने में सहायता करते हैं। इससे शरीर में स्वास्थ्य लाभों की एक विस्तृत श्रृंखला तैयार होती है।

 

अप्रैल 2016 में ‘मिनर्वा यूरोलोगॉका ए नेफ्रोगोका’ में प्रकाशित प्रकाशित इस अध्ययन से बात साफ हो जाती है।गंभीर रूप से किडनी रोग से पीड़ित कुछ मरीजों ने कम प्रोटीन युक्त आहार के साथ छह महीने तक दिन में तीन बार प्रीबीटिक और प्रोबायोटिक आहार लिया। कुछ गंभीर किडनी रोगियों को केवल कम प्रोटीन आहार दिया गया। बाद में दोनों तरह के रोगियों की किडनी की जांच हुई। पाया गया कि जिन रोगियों ने कम प्रोटीन युक्त आहार के साथ प्रीबीटिक और प्रोबायोटिक डोज लिया था, उनकी किडनी का एस्टमैटड ग्लोमेर्युलर फिल्ट्रैशन रेट बेहतर था। यह जांच बताता है कि किडनी किस तरह से काम कर रही है।

 

कर्नाटक के बीजी नगर में चिकित्सा विज्ञान संस्थान ‘आदीचंचनागिरी इंस्टीट्यूट ऑफ नेफ्रोलॉजी’ के विभाग प्रमुख और शोधकर्ता पवन मन्लेशप्पा ने इस मामले में इंडियास्पेंड से बात की। उनका मानना है कि “इससे क्रोनिक किडनी रोग की के बढ़ने की रफ्तार धीमी हो जाएगी, जो आम तौर पर अंत-चरण में गुर्दे की बीमारी पर समाप्त होता है, आवधिक डायलिसिस की आवश्यकता होती है और जीवन काल समाप्त हो जाता है । ”

 

ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडीज के मुताबिक, यह शोध भारत के लिए अधिक महत्व रखता है, जहां वर्ष 2015 में मौत का आठवां प्रमुख कारण किडनी रोग था।

 

दस्त से लड़ने में प्री-और प्रोबायोटिक्स के फायदे भी उल्लेखनीय हैं। दस्त भारत में एक कठिन सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। इससे हर घंटे पांच साल से कम उम्र के 13 बच्चे या हर दिन 328 बच्चे मौत और जिंदगी से लड़ते रहते हैं।

 

‘एपडेमीऑलजी एवं इंफेक्शन’ में प्रकाशित जून 2011 के अध्ययन के अनुसार, 12 सप्ताह तक प्रतिदिन लैक्टोबैसिलस केसिनी शिरोटा युक्त प्रोबायोटिक पेय लेने से कोलकाता के झुग्गी-निवासियों के बच्चों में दस्त की घटनाओं में 14 फीसदी की गिरावट देखी गई है।

 

भारत में टॉप 10 बीमारी, जिनसे है मौत का खतरा

Top 10 death causing disease

Source: Global Burden of Disease study

 

प्रोबायोटिक्स हाइपरकोलेस्ट्रोलाइमिया (उच्च कोलेस्ट्रॉल) और इंसुलिन प्रतिरोध पर प्रभाव डाल सकता है। यह दोनों हृदय रोग और मधुमेह के प्रमुख लक्षण होते हैं। वर्ष 2015 ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजिज स्टडीज’ के अनुसार हृदय रोग और मधुमेह भारत में मृत्यु का पहला और सातवां प्रमुख कारण है। यह कब्ज को कम करने में भी मदद कर सकते हैं। भारत में सात में से एक व्यक्ति कब्ज से और 10 में से तीन व्यक्ति अपच से पीड़ित है।

 

मुबंई की 71 वर्षीय गृहणी लता पाठक को करीब चार साल पहले पेट और छाती में जलन की शिकायत हुई। इसके बाद उनका मधुमेह बढ़ गया, जिस पर उन्होंने बढ़ी मुश्किल से एक दशक की मेहनत के बाद नियंत्रण पाया ।

 

उन्होंने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया, “मैं कब्ज के लिए हर्बल औषधि का इस्तेमाल करती थी, लेकिन मैं इसे आदत नहीं बनाना चाहती थीं।” एक आहार विशेषज्ञ ने रोजाना बस 30 ग्राम ओट्स, तीन समय दही और एक एल्ची केला खाने को कहा।

 

यह भोजन काम कर गया। पाठक को उसके बाद से हर्बल औषधि की आवश्यकता नहीं पड़ी है। वह कहती हैं, “मुझे अब कब्ज और एसीडिटी की शिकायत नहीं है और ब्लड ग्लूकोज रीडिंग पहले से बेहतर है। ”

 

मुंबई के ‘नानावती सुपर स्पेशलिटी अस्पताल’ की डायटिशन सुवर्णा पाठक ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, घर में जमाई दही में लैक्टोबैसिलस एसिडाफिलस बैक्टीरिया होता है  जो पाचन को बढ़ाता है। ओट्स से लता पाठक को घुलनशील फाइबर बीटाग्लुकन प्राप्त हुआ। जबकि एलिची केले से इनुलीन मिला। यह आहार फाइबर का एक वर्ग होता है, जिसे फलैपी कहा जाता है, जो अच्छे जीवाणुओं के विकास को प्रोत्साहित करता है और उनके काम करने की गति को बढ़ा देता है। प्रीबायोटिक्स से पेट की समस्या को नियमित करने में मदद मिली जबकि प्रोबायोटिक्स ने पोषक तत्वों को अवशोषित करने में मदद की।

 

कैसे काम करते हैं प्रीबायोटिक्स और प्रोबायोटिक्स?

 

प्रोबायोटिक्स फायदेमंद बैक्टीरिया हैं जो आंत में रहते हैं और पाचन सुधार में मदद करते हैं। प्रोबायोटिक्स के विपरीत प्रीबायोटिक्स न पचने वाले कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जो फाइबर से भरे होते हैं और ये आंतों में बैक्टीरिया के विकास को बढ़ावा देते हैं। आप प्रीबायोटिक्स को हजम नहीं कर सकते हैं। चूंकि प्रीबायोटिक्स और प्रोबायोटिक्स सहजीवी तरीके से काम करते हैं, इसलिए दोनों के संयोजन फायदेमंद होता है।

 

‘मदर डेयरी फल और सब्जी’ में डेयरी प्रॉडक्ट्स के बिजनेस हेड सुभाशीष बसु ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, ” एक उत्पाद में दोनों का संयोजन तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है।” इसलिए आमतौर पर डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ प्री या प्रोबायोटिक्स होते हैं। हालांकि चिकित्सीय पूरक खुराक में अक्सर दोनों होते हैं।

 

वे अपनी भूमिकाओं में प्रभावी होने करने के लिए जीवन में अपने आंत्र तक पहुंचने में सक्षम होना चाहिए। वो भी बड़ी संख्या में। भारत के प्रोबायोटिक एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सचिव और संस्थापक तथा राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल के पूर्व प्रमुख और एमेरिटस के प्रोफेसर वीरेंद्र कुमार बातिश ने इंडियास्पेंड से बातचीत के क्रम में कहा-“ए बिलियन डे, कीप्स योर डॉक्टर अवे”।  वर्ष 2016 में इंडियन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ स्टडी ने रोजाना प्रोबायोटिक्स के 1× 107 कॉलोनी  फॉर्मिंग युनिट (सीएफयू) लेने की सिफारिश की है।

उदाहरण के लिए अमुल के प्रोबायोटिक आइस-क्रीम में 1 × 106 कॉलोनी फॉर्मिंग युनिट (सीएफयू) होता है। प्रत्येक में लोकप्रिय प्रोबायोटिक विफोडोबैक्टीरियम लैक्टिस बीबी -12 और लैक्टोबैसिलस एसिडोफिलस ला -5 होता है। ‘जर्नल ऑफ इंटरनेशनल ओरल हेल्थ’ में प्रकाशित सितंबर 2015 के अध्ययन के मुताबिक 6 से 12 वर्ष उम्र के लोगों में एक सप्ताह रोजाना 54 ग्राम की खपत से स्ट्रेप्टोकोकस म्युटान्स का स्तर 12.5 फीसदी कम होते देखा गया है।

 

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वर्ष 2015 में एक शोध के मुताबिक हानिकारक बैक्टीरिया की जगह प्रो-बायोटिक्स ले लेते हैं। सिर्फ एक हफ्ते तक अमूल की प्रो-बायोटिक आइस-क्रीम की रोजाना 54 ग्राम सेवन से लार वाले जीवाणुओं के स्तर 12.5 फीसदी तक कमी आ जाती है,जो 6 से 12 साल के बच्चों के दांतों के लिए भारी नुकसानदेह होते हैं।

 

रायचूर के नवोदय डेंटल कॉलेज के बाल और दंत चिकित्सा विभाग के तारनथा महान्तेश ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए बताया कि, “प्रोबायोटिक्स अच्छे गैर-रोगजन्य जीवाणुओं के साथ मिलकर खराब (रोगजनक) जीवाणुओं की जगह लेते हैं।”

 

कोलकाता के दस्त अध्ययन के लिए, टीम ने दानोन के बने बनाए प्रो-बायोटिक पेय, याकुल्ट का उपयोग किया, जिसमें लैक्टोबैसिलस केसिनी शिरोटा के 6.5 x 109 सीएफयू शामिल था।

 

गंभीर किडनी रोग पर अध्ययन में स्ट्रैपटोकोकस थर्मोफिल्स, लैक्टोबैसिलिल एसिडोफिलस और बिफिडोबैक्टीरियम लॉन्मम, और प्रीबियोटिक के 100 मिलीग्राम के प्रत्येक 15×109 सीएफयू युक्त कैप्सूल का उपयोग किया गया।

 

मल्लेश्प्पा ने इंडियास्पेंड को बताया कि, यह पूरक गुर्दे की बीमारियों के रोगियों के आंतों के सूक्ष्म जीवाणु को संशोधित करके काम करता है और इस प्रकार पेट में विषाक्त पदार्थों के उत्पादन को कम करता है। वह कहते हैं, “अब मैं गंभीर किडनी गियों के लिए प्रोबायोटिक और प्रीबीओटिकल सप्लीमेंट्स का सुझाव देता हूं जो उनका खर्च वहन कर सकते हैं। ”

 

कौन सा प्रोबायोटिक्स आपके लिए सही?

 

बातिश कहते हैं, “ प्रोबायोटिक्स आपकी आँतों में भोजन को गति करने में सहायता देते हैं। वे कुछ स्थितियों जैसे इरिटेबल बोवेल सिंड्रोम, अतिसार, आँतों की सूजन आदि की चिकित्सा करते हैं। जब आप अपने शरीर के “अच्छे” बैक्टीरिया खो देते हैं (उदाहरण के लिए, जब आप एंटीबायोटिक्स लेते हैं), तो प्रोबायोटिक्स उनकी जगह लेने में सहायता करते हैं। ये आंत में स्थित हानिकारक बैक्टीरिया को कम करने में भी सहायता करते हैं। प्रिबायोटिक्स आंतों में घावों, जैसे एडेनोमा और कार्सिनोमा (गाँठ और कैंसर की स्थिति) की वृद्धि को भी रोकते हैं, और इस प्रकार आँतों और मलाशय के रोगों को घटाते हैं।“

 

‘फार्मास्युटिकल साइंसेस रिव्यू और रिसर्च इंटरनेशनल जर्नल’ में छपे सितंबर-अक्टूबर 2015 की समीक्षा लेख में बताया गया है कि मधुमेह रोगियों में कम क्लोस्ट्रीडिया, बिफिडोबैक्टीरियम और फेलेलिबेक्टेरियम प्रोनेशनीजी बैक्टीरिया और गैर-डायबिटीज़ की तुलना में अधिक बीटा-प्रोटीबैक्टीरिया पाया गया।

 

बातिश कहते हैं कि बैक्टेरिया में अपार समभावनाएं हैं। उचित शोध के बाद अगर इस पर ध्यान दिया जाए तो यह पूरे भारत को स्वास्थ्य के मुददे पर विजय दिला सकते हैं।

 

संक्षेप में आपके लिए इसका मतलब यह है कि   आप प्री-या प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थों या खुराक की पहचान करने के लिए एक विशेषज्ञ से परामर्श लें, जो आपकी स्वास्थ्य जरूरतों के अनुकूल है और फिर स्वस्थ रहें।

 

अतिरिक्त मात्रा भी खतरनाक

 

विशेषज्ञों का कहना है कि प्री-बायोटिक्स का सेवन बढ़ाने से सबको फायदा हो सकता है, लेकिन अतिरिक्त मात्रा में लिया जाने वाला प्रो-बायोटिक्स हानिकारक हो सकता है।

 

पाठक कहते हैं, “अपनी उर्जा की जरूरत के अनुसार आप प्रो-बायोटिक खाद्य पदार्थों के कुछ प्रकार के साथ प्रीबाइटी युक्त खाद्य पदार्थों का 6 से 12 बार उपभोग कर सकते हैं। ”

 

 

प्री-बॉयटिक्स के अच्छे स्रोतों में गेहूं की भूसी, शकरकंद, अलसी और जिमीकंद शामिल हैं।

 

अच्छे प्रभाव के लिए प्रोबायोटिक्स लंबे समय तक लेना चाहिए, जिससे फायदा होता है।

 

कोलकाता में तेज दस्त पर हुए अध्ययन की प्रमुख और कोलकाता के ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉलरा’ एंड ऐन्टरिक डिसीज’ की पूर्व निदेशक वैज्ञानिक दीपिका सुर ने इंडियास्पेंड से बात करते हुए कहा कि, “ हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यदि हमारे पास छह महीने तक प्रो-बायोटिक पूरक जारी रखने के लिए धन है तो सुरक्षात्मक प्रभाव 30 फीसदी तक पहुंच जाएगा। ”

 

हालांकि, खुराक सावधानी से चुना जाना चाहिए क्योंकि अगर अधिक मात्रा में लिया जाता है, प्रो-बायोटिक्स सूजन और मितली का कारण बन सकता है।

 

पाठक कहते हैं, यह बने बनाए प्रोबायोटिक डेयरी खाद्य पदार्थों की ज्यादा खुराक का एक सामान्य रूप से साइड-प्रभाव है। जब ऐसा होता है, तो वह उत्पाद में बदलाव करने का सुझाव देती हैं। इसके अलावा, सभी डिब्बाबंद प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थ स्वस्थ नहीं होते, जैसा कि आइसक्रीम दावा करते हैं।

 

महान्तशे कहते हैं कि, “हमारी खोज का मतलब यह नहीं है कि प्रो-बायोटिक आइसक्रीम खानी ही चाहिए। चीनी से अवांछित कैलोरी के बारे में सोचिए … लेकिन अगर आप या बच्चों को आइसक्रीम खाना ही है, तो प्रोबायोटिक विविधता चुनें।”

 

1 जनवरी 2018 के बाद तब यह जानना आसान हो जाएगा कि एक डिब्बाबंद प्रो-बायोटिक भोजन अधिक जीवाणुयुक्त है- या अधिक कैलोरी-युक्त, जब प्रोबियोटिक्स सहित आठ श्रेणियों के खाद्य पदार्थों के लिए खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के लेबलिंग आवश्यकताओं को लागू किया जाएगा।

 

कंपनियों को स्पष्ट रूप से वर्ग, प्रजातियों और जीवाणुओं के स्तर ,उसकी अवधि, उनकी व्यवहार्य संख्या, अनुशंसित सेवारत आकार, पोषक तत्व संरचना, आदि का उल्लेख करना होगा।

 

बताशी कहते हैं, “पूर्ण लेबलिंग यह सुनिश्चित करेगा कि ग्राहकों के लिए सही है कि नहीं।”

 

और हां, इसके बाद आपके लिए भोजन को दवा के रूप में इस्तेमाल करने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।

 

(बाहरी एक स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं और माउंट आबू, राजस्थान में रहती हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 30 मार्च 2017 को indiaspend.com पर प्रकशित हुआ है।

 

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