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भारतीयों के लिए मधुमेह महामारी के कम होने का कोई संकेत नहीं

तिष संघरा,

Free Diabetes Camp

 

मुंबई: भारत के आर्थिक विकास में लोगों की आय तो बढ़ी है,लेकिन मधुमेह का प्रसार भी बढ़ा है। आर्थिक विकास के दौर में लोगों के वेतन में वृद्धि हुई है। सभी सामाजिक-आर्थिक समूहों में जीवन स्तर ऊंचा तो हुआ है, लेकिन इसी दौर में यानी 2016 से 16 वर्षों में मधुमेह ( इंसुलिन-स्तर को नियंत्रित करने के लिए शरीर की अक्षमता के कारण एक स्थिति, जो ऊतक क्षति और अंग विफलता का कारण बन सकती है ) देश की सबसे तेजी से बढ़ती बीमारी  बन गई है।

 

वर्ष 2017 में लगाए गए अनुमान के अनुसार भारत वर्तमान में 72 मिलियन मामलों के साथ विश्व के मधुमेह के बोझ का 49 फीसदी प्रतिनिधित्व करता है, यह आंकड़ा 2025 तक लगभग 134 मिलियन तक पहुंचने की आशंका है। उच्च जनसंख्या वृद्धि के भविष्य का सामना करने वाले देश में यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती प्रस्तुत करता है और एक सरकार आधे बिलियन लोगों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा प्रदान करने का प्रयास कर रही है।

 

अधिक पैसा, और समस्याएं

 

पिछली तिमाही शताब्दी में पूरे भारत में मधुमेह के प्रसार में 64 फीसदी की वृद्धि हुई है, जैसा कि ‘इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च’ और ‘इन्स्टिटूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड एवुलिएशन’, दोनों शोध संस्थानों और एक संस्था ‘पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ द्वारा नवंबर 2017 की एक रिपोर्ट में पाया गया है।

 

विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, 1990 में, भारत की प्रति व्यक्ति आय 380 डॉलर (24,867 रुपये) थी, जो 2016 में 340 फीसदी बढ़कर 1,670 डॉलर (109,000 रुपये) हो गई थी। इसी अवधि में, मधुमेह के मामले 123 फीसदी  ज्यादा हुए हैं।

 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16 में सबसे समृद्ध क्विंटाइल में ( सर्वेक्षित समूह को धन के अनुसार पांच बराबर समूहों में बांटा गया था ) 2.9 फीसदी महिलाओ और 2.7 फीसदी पुरुषों ने बताया कि उन्हें मधुमेह था। ये दरें सबसे कम क्विंटाइल (महिलाओं के लिए 0.8 फीसदी और पुरुषों के लिए 1.0 फीसदी) में पाए गए दरों का लगभग तीन गुना है।

 

धन ब्रैकेट के अनुसार भारत में मधुमेह का प्रसार

आर्थिक विकास के साथ शारीरिक निष्क्रियता और उच्च कैलोरी खाद्य पदार्थों की अत्यधिक खपत दोनों मधुमेह के जोखिम कारकों को बढ़ाते हैं। इस कारण से, मधुमेह को अक्सर ‘जीवनशैली रोग’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है और आबादी के समृद्ध होने के साथ मधुमेह की संख्या में वृद्धि होती है। हालांकि, हाल के वर्षों में तेजी से, अपेक्षाकृत सस्ते भोजन की उपलब्धता में वृद्धि का मतलब है कि बुरा आहार अब सभी आय वर्गों में पाए जाते हैं।

 

‘लैंसेट डायबिटीज एंड एंडोक्राइनोलॉजी जर्नल’ में प्रकाशित एक अगस्त, 2017 के अध्ययन के मुताबिक, शहरी गरीब मधुमेह के जोखिम में उतना ही है, जितना कि समृद्ध समुदाय । जैसे-जैसे आय बढ़ी है, चीनी और नमक युक्त संसाधित खाद्य को शामिल करने से आहार की प्रकृति बदलती चली गई।

 

जुलाई, 2017 में इंडियास्पेन्ड के साथ एक साक्षात्कार में अग्रणी मधुमेह विशेषज्ञ वी. मोहन ने कहा था कि उच्च सामाजिक-आर्थिक समूहों की तुलना में मधुमेह के लक्षणों और जोखिम कारकों के प्रति जागरूकता की कमी के कारण गरीबों को बीमारी का प्रबंधन करने में अधिक कठिनाई होती है।

 

उन्होंने कहा था कि जानकारी और जागरूकता के स्तर में सुधार से इन समुदायों के लिए बीमारी से निपटना और रोकना आसान है।

 

भारत भर में मधुमेह के प्रसार में वृद्धि सिर्फ बुढ़ापे की आबादी में नहीं है। संपत्ति में वृद्धि से जुड़े जीवनशैली परिवर्तन सभी आयु समूहों को प्रभावित कर रहे हैं।

 

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्चस यूथ डायबिटीज रेजिसट्री के अनुसार वर्तमान में 25 वर्ष से कम उम्र के हर चार लोगों में से एक वयस्क-प्रारंभिक मधुमेह से ग्रसित है, यह एक ऐसी स्थिति है जो आमतौर पर 40-50 साल के लोगों में पाई जाती है।

 

नई दिल्ली के फोर्टिस सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, मेटाबोलिक रोग और एंडोक्राइनोलॉजी के अध्यक्ष अनूप मिश्रा ने अक्टूबर, 2016 में इंडियास्पेन्ड को एक साक्षात्कार में बताया था, “मधुमेह बाकी दुनिया की तुलना में एक दशक पहले भारतीयों पर हमला करता है। इससे उत्पादकता कम हो जाती है, कामकाजी आबादी में अनुपस्थिति बढ़ जाती है और जटिलताएं बढ़ती हैं। “

 

समृद्ध राज्यों में मधुमेह के ज्यादा मामले

 

प्रति 100,000 आबादी पर 53 मौतों के आंकड़े के साथ भारतीय राज्यों में मधुमेह से सबसे ज्यादा मृत्यु दर तमिलनाडु की थी। इसके बाद पंजाब (44) और कर्नाटक (42) का स्थान रहा है जो राष्ट्रीय औसत (23) से काफी अधिक थे।

 

ये राज्य भारत के सबसे समृद्ध राज्यों मे से हैं। यहां, यह टीबी या दस्त जैसी बीमारियां नहीं हैं, जो विकलांगता या जीवन के नुकसान के प्रमुख कारण हैं बल्कि प्रमुख कारण कार्डियोवैस्कुलर बीमारी, उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल है।

 

मधुमेह में वृद्धि इसी अवधि में अपने जोखिम कारकों (बीमारी के संभावित रूप से संशोधित कारणों) की समवर्ती वृद्धि से जुड़ी हुई है।

 

1990 में, डेली में (बीमारी के कारण प्रारंभिक मौत और विकलांगता दोनों का एक उपाय) जोखिम कारक रैंकिंग  में आहार जोखिम, उच्च रक्तचाप और उच्च प्लाज्मा ग्लूकोज चौथे, छठे और सातवें स्थान पर रहा है। एक चौथाई शताब्दी बाद, आहार जोखिम अब तीसरे, उच्च रक्तचाप चौथे और उच्च प्लाज्मा ग्लूकोज पांचवें स्थान पर है – जिनमें से सभी टाइप दो मधुमेह की शुरुआत में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता हैं, जैसा कि इंटरनेश्नल डायबिटीज फाउंडेशन का कहना है।

 

भारत में जोखिम कारकों के लिए जिम्मेदार डेली में परिवर्तन, 1990-2016

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Source: India: Health of the Nation’s States

 

फिर, समृद्ध राज्यों में उच्च रक्तचाप, उच्च प्लाज्मा ग्लूकोज और आहार संबंधी जोखिम की स्थिति वाले आबादी के उच्च उदाहरण होते हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु और पंजाब मधुमेह के जोखिम कारकों के लिए, लगातार डेली (डीएएलवाई ) दर रैंकिंग में शीर्ष तीन स्थान पर रहे हैं। जबकि मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय ( राज्य आर्थिक विकास के निचले सिरे पर स्थित हैं ) लगातार तीनों श्रेणियों के नीचे पाए गए हैं।

 

सकल घरेलू उत्पाद और मधुमेह का रिश्ता

 

‘इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च-इंडिया डायबिटीज’ (आईसीएमआर-इंडियाआईबी) द्वारा 2017 के एक अध्ययन के मुताबिक उच्च प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वाले राज्यों में मधुमेह का अधिक प्रसार है।

 

विश्लेषण किए गए 15 राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों में से चंडीगढ़ का जीडीपी (3,444 डॉलर) सबसे उच्च और 13.6 फीसदी पर मधुमेह का उच्चतम प्रसार था।इसी तरह, बिहार, जहां सकल घरेलू उत्पाद 682 डॉलर है, में 6 फीसदी मधुमेह का प्रसार था।

 

राज्य अनुसार मधुमेह प्रसार और प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद

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Source: The Lancet: Prevalence of diabetes and prediabetes in 15 states of India

 

ये निष्कर्ष पंजाब, तमिलनाडु और केरल जैसे अमीर राज्यों (  2,000 डॉलर (1.3 लाख रुपये), 2,500 डॉलर (1.6 लाख रुपये) और 2,140 रुपये (1.4 लाख रुपये) के जीडीपी के साथ वाले राज्य ) में पाए जाने वाले मधुमेह के जोखिम कारकों और जीवन शैली की बीमारियों के उच्च प्रसार के साथ संरेखित हैं।इन राज्यों में कार्डियोवैस्कुलर बीमारी, मोटापे और उच्च रक्तचाप का उच्चतम हिस्सा है, जो जीवन स्तर में परिवर्तन के कारण आय के स्तर और बीमारियों के बीच सहसंबंध को उजागर करता है।

 

हालांकि आनुवांशिक संवेदनशीलता मधुमेह की शुरुआत में योगदान देने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है (दक्षिण एशियाई आबादी यूरोपीय लोगों की तुलना में बीमारी विकसित करने की चार गुना अधिक है), आहार सहित पर्यावरणीय कारकों को 50 फीसदी से अधिक जोखिम में योगदान दिया गया है।

 

जैसा कि, आर्थिक विकास भारत भर में फैल गया है, अध्ययनों ने ग्रामीण और शहरी आबादी दोनों में मुख्य रूप से परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट से कैलोरी से अधिक परिणाम दिखाए हैं।

 

ब्रितानी ‘जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन’ में प्रकाशित एक 2017 पेपर के अनुसार, सफेद चावल की खपत, जो उच्च-ग्लाइसेमिक इंडेक्स के कारण इंसुलिन के स्तर को बढ़ाती है, भारतीय जनसंख्या में टाइप 2 मधुमेह के जोखिम से दृढ़ता से जुड़ी हुई है।

 

एक महंगी प्रवृत्ति

 

मधुमेह के इलाज के लिए वार्षिक लागत प्रति व्यक्ति 420 डॉलर (27,400 रुपये) होने का अनुमान है, जो अगर जारी रहता है तो 2025 तक 1008 बिलियन डॉलर (1.95 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच जाएगी, जो 2018 स्वास्थ्य बजट की तुलना में छह गुना अधिक है, जैसा कि वैश्विक परामर्श फर्म पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट में बताया गया है।

 

सरकार ने हाल ही में 2020 तक आधे बिलियन लोगों के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा की है। इसलिए नीति निर्माताओं और स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं को इस प्रवृत्ति से संबंधित माना जाता है जहां भारत के विकास के रूप में मधुमेह का प्रसार बढ़ रहा है, जिससे वित्तीय बोझ बढ़ रहा है।

 

कम सकल घरेलू उत्पाद वाले राज्य ( जीवनशैली में बदलाव और बढ़ती आय के कारण बढ़ती मधुमेह से प्रतिरक्षा नहीं ) दोगुनी वित्तीय बोझ का सामना कर रहे हैं। इस 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें मधुमेह के बढ़ते मामलों के साथ संक्रमणीय बीमारियों से निपटना चाहिए, जिनका प्रसार उच्च बना हुआ है।

 

1990 से 2016 तक, उत्तर प्रदेश में मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों की रैंकिंग में मधुमेह 37 वें स्थान से 15 वें स्थान पर पहुंच गया, जबकि दस्त की बीमारियां और तपेदिक शीर्ष के निकट बने रहे हैं, पहले से दूसरे और तीसरे से चौथे स्थान पर जा रहा है।यह गरीब राज्यों द्वारा सामना की जाने वाली असमान चुनौती पर प्रकाश डालता है, जो अपने अमीर पड़ोसियों की तुलना में कम संसाधनों के साथ मधुमेह से जूझ रहे हैं।

 

यह विकासशील भारत में मधुमेह के इलाज और रोकथाम के लिए एक सार्वभौमिक योजना की जरूरत का दर्शाता है। ‘इंडिया स्टेटे लेवल डिजीज बर्डन इनिशटिव रिपोर्ट’ में कहा गया है कि मधुमेह केबढ़ते बोझ से निपटने के लिए किसी भी “नीति और स्वास्थ्य प्रणाली के हस्तक्षेप को प्रत्येक राज्य के विशिष्ट रुझानों पर केंद्रित होना चाहिए।”

 

(संघरा इंटर्न है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 17 अप्रैल, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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