नई दिल्ली: जन्म के समय भारतीय शिशुओं का वजन अब पहले से कहीं ज्यादा हो रहा है। यह निश्चत रुप से शिक्षित, समृद्द और अधिक जागरूक माताओं और बेहतर स्वास्थ्य देखभाल का संकेत है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच साल वर्षों(2010-15) में केवल 18 फीसदी जीवित बच्चों का वजन जन्म के समय कम था । ये आंकड़े एक दशक पहले के आंकड़ों की तुलना में 22 फीसदी कम हैं। यहां बता देना जरूरी है कि 2.5 किलो से कम वजन बचपन की बीमारी, मृत्यु दर के प्रारंभिक जोखिम का एक महत्वपूर्ण सूचक है ।

जन्म के समय कम वजन वाले बच्चों की सबसे ज्यादा प्रतिशत दिल्ली की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से रिपोर्ट की गई है, जैसा कि 12 जनवरी, 2018 को जारी गई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2015-16 (एनएफएचएस -4) की अंतिम रिपोर्ट से पता चलता है।

एनएफएचएस -4 की रिपोर्ट में कहा गया है, "जिन बच्चों का वजन जन्म के समय 2.5 किलो से भी कम है, उनकी बचपन में मृत्यु का सबसे ज्यादा जोखिम होता है।"

1992 में शुरू किया गया एनएफएचएस परिवार कल्याण, मातृ एवं बाल स्वास्थ्य, पोषण और अन्य स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों जैसे संकेतकों पर राष्ट्रीय आंकड़ों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

ऐसी माताओं के साथ बच्चों का जन्म के समय वजन बढ़ने का मां की शिक्षा और समृद्दि से जुड़ा है।

एनएफएचएस -4 सर्वेक्षण से पहले पांच साल (2010-15) में 249, 949 जीवित जन्मों में से, 78 फीसदी या 194,833 जन्मों में जन्म के समय बच्चे के वजन का एक लिखित रिकॉर्ड था या माता बच्चे के वजन को याद करने में सक्षम थी। यह आंकड़े एनएफएचएस -3 (2005-06) के आंकड़ों से 34 फीसदी ज्यादा है और यह बढ़ती जागरूकता का संकेत है।

12 या उससे अधिक वर्षों की शिक्षा वाली मांओं में केवल 15 फीसदी बच्चों का जन्म के समय कम वजन था, जबकि बिना किसी शिक्षा वाली माताओं में ये आंकड़े 20 फीसदी थे।

माताओं की शिक्षा के स्तर के अनुसार जन्म वजन

Source: National Family Health Survey, 2015-16

शिक्षित माताओं से जन्म होने वाले बच्चों के जीवित रहने की संभावना अधिक होती है। ऐसी माताएं जिन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं, उनके बीच पांच वर्षों से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर( पांच वर्ष की आयु के भीतर प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर मौत की संख्या ) 67.5 रहा है जबकि 12 या अधिक सालों तक शिक्षा प्राप्त मांओं के बीच ये आंकड़े आधे ( 26.5) रहे हैं। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 16 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में विस्तार से बताया है।

भारत की आबादी का लगभग एक-तिहाई या 33.6 फीसदी किशोर गर्भधारण से पैदा होता है, जैसा कि इंडियास्पेंड ने 12 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

2017 में, पांच किशोरों ( 14 से 18 साल ) में से केवल एक ने आठ साल की स्कूली शिक्षा पूरी की थी ।2018 तक 32 फीसदी महिलाओं ने स्कूल छोड़ा है, जबकि पुरुषों के लिए ये आंकड़े 28 फीसदी रहे हैं, जैसा कि शिक्षा रिपोर्ट के नवीनतम वार्षिक सर्वेक्षण में बताया गया है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 17 जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में बताया है।

सबसे समृद्ध परिवारों की मां के बीच 15 फीसदी से अधिक बच्चे कम वजन वाले नहीं थे, जबकि गरीब परिवारों से माताओं के बीच ये आंकड़े 20 फीसदी थे, जैसा कि एनएफएचएस -4 की रिपोर्ट में बताया गया है।

2.5 किलो से कम वजन के साथ दिल्ली (26.2 फीसदी) ने जन्म का उच्चतम प्रतिशत दर्ज किया है। इसके बाद उत्तराखंड (24.7 फीसदी), और दादरा और नगर हवेली (23.1 फीसदी) का स्थान रहा है।

2.5 किलो से कम वजन के साथ, उच्च प्रतिशत के जन्म के साथ टॉप 3 राज्य/संघ शासित प्रदेश

Source: National Family Health Survey, 2015-16

(त्रिपाठी प्रमुख संवाददाता हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़े हैं।)

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 06 फरवरी, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

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