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भारतीय महानगरों में 92 फीसदी चोरी के मामलों में नहीं होती है रिपोर्ट

अवंती दुरानी और नेहा सिन्हा,

Police 620

 

एक नए अध्ययन के मुताबिक, चार प्रमुख भारतीय शहरों में चोरी जैसी घटनाओं में केवल 6 से 8 फीसदी एफआईआर दर्ज होते हैं। शेष 92 से 94 फीसदी किसी भी आधिकारिक रिकार्ड में प्रतिबिंबित नहीं होते हैं।

 

चोरी की घटनाओं की रिपोर्ट कम

 

ऐसा क्यों होता है? मुंबई स्थित एक संस्था ‘आईडीएफसी इंस्टीट्यूट’ द्वारा किए गए सर्वेक्षण, सेफ्टी ट्रेंड्स एंड रिपोर्टिंग ऑफ क्राइम (एसएटीएआरसी ) के अनुसार इसके दो कारण हैं। पहला कारण यह कि कुछ मामलों में पीड़ित पुलिस के पास आने से बचते हैं। और दूसरा कारण यह कि कई बार पुलिस विभिन्न कारणों से पीड़ितों के मामले दर्ज नहीं करती है।

 

सर्वेक्षण में मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई में 20,597 घरों को शामिल किया गया है। इन शहरों में अपराधों की घटनाओं, वहां पुलिस के साथ बातचीत करने और सुरक्षा के बारे में लोगों के अनुभव को देखा गया है। अपराधों में चोरी, हमला, उत्पीड़न, घर में जबरदस्ती घुसना, धमकी, अप्राकृतिक मौत और लापता हो गए व्यक्तियों के मामलों को शामिल किया गया है।

 

अध्ययन में पाया गया कि दिल्ली के 4 फीसदी लोग चोरी जैसे अपराध के शिकार हैं। यह आंकड़े चार राज्यों में सबसे ज्यादा हैं। इन पीड़ितों में से 45 फीसदी ही पुलिस के पास घटना रिपोर्ट कराने गए हैं और केवल 16 फीसदी ही पुलिस एफआईआर दर्ज कराने में कामयाब रहे हैं।

 

पुलिस क्या करती है जब पीड़ित रिपोर्ट लिखाने जाते हैं?

 

यह लेख भारत में अपराध और सुरक्षा पर दो भागों की श्रृंखला का पहला भाग है। यह लेख अपराध की घटनाओं और सुरक्षा और पुलिस के सार्वजनिक विचारों की पड़ताल करता है। पहले भाग में हम अपराध के पंजीकरण, लोगों और आपराधिक न्याय प्रणाली के बीच प्ररंभिक संबंध पर चर्चा करेंगे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा बनाई गई आधिकारिक अपराध रिकॉर्ड, केवल पंजीकृत अपराधों को लेखा-जोखा देते हैं। आधिकारिक आंकड़े सटीक नहीं है या अपराध की गणना के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यह तर्क क्रिमिनोलोजिस्ट और विशेषज्ञों द्वारा भी दिया गया है। अपराध दर्ज न कराना न्याय प्रक्रिया में बाधा डालता है, क्योंकि इससे पीड़ित परेशान रहते हैं और अपराधी को भागने में मदद मिलती है। यह गरीबों और अधिक हाशिए पर रह रहे लोगों पर भी असर डालता है, क्योंकि वे सुरक्षा के निजी तरीकों तक पहुंच नहीं सकते हैं और सुरक्षा के लिए केवल राज्य पुलिस मशीनरी पर निर्भर हैं।

 

भारतीय कानून के तहत अपराध पंजीकरण अनिवार्य है। यह पुलिस के लिए महत्वपूर्ण है ताकि अपराध को प्रभावी ढंग से लक्षित किया जा सके।

 

लोग चोरी की रिपोर्ट क्यों नहीं करते हैं?

 

विभिन्न शहरों के उत्तरदाताओं ने चोरी की रिपोर्ट करने के लिए पुलिस के पास नहीं आने के विभिन्न कारणों का हवाला दिया। दिल्ली में, 30 फीसदी उत्तरदाताओं का मानना ​​था कि पुलिस उनकी शिकायत पर विचार नहीं करेगी।  मुंबई में, 35 फीसदी ने यह नहीं सोचा कि घटना काफी गंभीर है। चेन्नई में, 51 फीसदी उत्तरदाताओं ने सबूत की कमी का उल्लेख किया और बेंगलुरु में, 35 फीसदी पुलिस / अदालती प्रक्रियाओं में उलझना नहीं चाहते थे।

 

सर्वेक्षण में यह नहीं पता चला है कि पुलिस द्वारा एफआईआर पंजीकृत क्यों नहीं किए गए थे। यह भी ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि कुछ मामलों में पुलिस के पास शिकायतकर्ता की रिपोर्ट दर्ज न करने का वैध कारण हो सकता है।

 

हालांकि, अपराधों की रिपोर्टिंग न करने के कई अन्य कारण हो सकते हैं। पुलिस द्वारा सामना किए जाने वाले मानव और तकनीकी संसाधनों की कमी, सार्वजनिक समर्थन की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप और नागरिकों के प्रति पुलिस जवाबदेही की कमी।

 

आज की तारीख में पुलिसकर्मियों द्वारा अपराध के मामले दर्ज न करना व्यापक रूप से देखा जा सकता है, जैसा कि समिति की रिपोर्ट और पुलिस के सदस्यों के सदस्यों द्वारा बताया गया है।

 

वास्तविक अपराध दर पर परदा

 

आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत, पुलिस अधिकारियों को यह निर्णय लेने के लिए विवेकाधीन शक्ति है कि मामला दर्ज किया जाना चाहिए या नहीं। अधिकांश पीड़ितों को एक रिपोर्ट दाखिल करने की प्रक्रिया से जुड़ी क़ानूनों की समझ नहीं होती है। इस कारण आरोप पत्र और एफआईआर के लिए वे पूरी तरह से पुलिस अधिकारियों पर निर्भर होते हैं।

 

चूंकि एफआईआर ही बाद की पुलिस कार्रवाई का निर्धारण करती है, इन दो कारकों का ( रिपोर्ट दाखिल करने में मदद के लिए मामले के पंजीकरण और अधिकारियों पर नागरिक की निर्भरता पर निर्णय लेने के लिए पुलिस के साथ विवेकाधीन शक्ति ) पुलिस और आपराधिक न्याय की संस्था पर काफी प्रभाव पड़ता है।

 

अध्ययन यह मानता है कि जितने कम गंभीर अपराध, उतना अधिक घटनाओं की आधिकारिक संख्या दबती है। उदाहरण के लिए, हत्या, डकैती, और चोरी सहित कुछ बड़े अपराधों की तुलना में चोरी, महिलाओं के खिलाफ अपराध, और साधारण चोट जैसे अपराधों के लिए मामलों को दबा देने की प्रवृति अधिक है।

 

अपराध की रिपोर्ट न दर्ज करना, सीधे पुलिस बल के प्रदर्शन और मूल्यांकन से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में, अपराध के आंकड़े, अर्थात, पंजीकृत अपराध की संख्या और पंजीकृत अपराध के परिणाम, पुलिस प्रदर्शन को निर्धारित करते हैं। अनुसंधान बताता है कि, चूंकि पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन अपराध दर में वृद्धि और गिरावट से किया जाता है, इसलिए कम अपराध दर्ज किए जाते हैं और कई आरोपों की गंभीरता को कम करके दिखाए जाते हैं।

 

इन अपराधों के आंकड़ों के पूरक के लिए पीड़ितों का सर्वेक्षण एक उपयोगी उपकरण हो सकते हैं। लेकिन चुनौती यहां खत्म नहीं होती है – यहां भी पुलिस के पारंपरिक तरीकों के निरीक्षण और पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन जरूरी  है।

 

(दुरानी मुंबई स्थित विचार मंच ‘आईडीएफसी इंस्टीट्यूट’ में एसोसिएट निदेशक और सिन्हा  एसिसटेंट निदेशक हैं।)

 

दो लेखों की श्रृंखला का यह पहला भाग है। अगला भाग कल प्रकाशित होगा।

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 27 सितंबर 2017 को Indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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