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भारतीय विद्यालयों में व्यापक नामांकन के अलावा कम उपस्थिति, उच्च ड्रॉप आउट

अश्विनी देशपांडे और मनजिष्ठा बनर्जी,

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11 से 14 वर्ष की उम्र के बीच लगभग 3.5 फीसदी और 15 से 16 वर्ष की उम्र के बीच 13.5 फीसदी बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया था और जिस दिन टीम ने स्कूल का दौरा किया उस दिन कक्षा 1 से 8 तक के 25 फीसदी से अधिक बच्चे स्कूल से अनुपस्थित थे।

 

सर्वेक्षण वाले दिन उपस्थिति

Source: Annual Status of Education Report (ASER) survey

 

यह  ऐन्यूअल स्टेट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट-2016 (एएसईआर) सर्वेक्षण के निष्कर्ष है। यह ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा और सीखने के स्तर का एक घरेलू सर्वेक्षण है। इस सर्वेक्षण में भारत के 589 जिलों में 3 से 16 साल के बीच 560,000 से अधिक बच्चों को शामिल किया गया था।

 

भारत के स्कूलों में सर्वव्याप्त नामांकन की रिपोर्ट में स्कूल शिक्षा में जारी प्रमुख चुनौतियों पर बात नहीं होती। एक तो ड्रॉप आउट की उच्च दर और कक्षाओं में कम उपस्थिति।

 

बच्चों के स्कूल छोड़ने या स्कूल नहीं जाने के परिणाम खतरनाक ही हैं। इससे शिक्षा प्रणाली की उत्पादकता में हानि होती है, क्योंकि उच्च ड्रॉप आउट दर से स्कूल शिक्षा की प्रति यूनिट लागत में वृद्धि होती है। साथ ही मानव संसाधन के विकास में गिरावट होती है।

 

‘नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन’ द्वारा वर्ष 2011 के एक अध्ययन के मुताबिक ड्रॉप आउट से रोजगार के मोर्चे पर अर्द्ध कुशल और अकुशल श्रम की संभावना बढ़ जाती है। नीति के संदर्भ में देखें तो वर्तमान सरकार की ‘स्किल इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रमों की मामूली सफलता के लिए भी स्कूल शिक्षा से संबंधित इन दो मुद्दों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।

 

बच्चें क्यों नहीं जाते स्कूल, क्यों छोड़ देते हैं स्कूल?

 

भारत के स्कूलों में दाखिला लेने का मतलब यह नहीं है कि बच्चे स्कूल में उपस्थित होंगे ही। राष्ट्रीय स्तर पर जब एसईआर टीम ने वर्ष 2016 में स्कूलों का दौरा किया तो प्राथमिक विद्यालय ( कक्षा 1 से 4 ) या उच्च प्राथमिक विद्यालय ( कक्षा 5 से 7 / 8) में नामांकित केवल तीन-चौथाई बच्चे ही कक्षा में उपस्थित थे।

 

पढ़ाई पूरी होने के बीच में ही स्कूल छोड़ देने या अनुपस्थिति की समस्या विशेष रुप से बीमारु राज्यों में ज्यादा है। हम बता दें कि बीमारु राज्यों में बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे कम विकसित राज्य शामिल हैं। जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक,  इन राज्यों में 11 से 16 वर्ष की उम्र के बीच वाले 5.1 करोड़ से अधिक या भारत की कुल बाल आबादी के 46 फीसदी बच्चे हैं।

 

वर्ष 2013 और 2015 के बीच बिहार में नालंदा जिले और महाराष्ट्र में सतारा में आयोजित एएसईआर केंद्र के ‘मिडिल स्कूल स्टडी’ के अनुसार माध्यमिक विद्यालयों में स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण पहुंच है, ( जैसे कि स्कूल की दूरी, विशेष रुप से लड़कियों के लिए ) लेकिन तथ्य बताते हैं कि स्कूल छोड़ने का मुख्य कारण ‘रुचि की कमी’ है। तीन साल के इस अध्ययन में प्राथमिक स्कूल के बाद लगभग 6,000 बच्चों की शैक्षिक गति को ट्रैक किया गया है।

 

वर्ष 2016 में स्कूल में दाखिला जारी रखने वाले बच्चों की तुलना में 11 से 16 वर्ष के आयु वर्ग वाले ऐसे बच्चे जिन्होंने 2015 से 2016 के बीच स्कूल छोड़ा है, उनका अनुपात उच्च है। स्कूल छॉने वाले बच्चों में  बुनियादी पढ़ने और अंकगणित कौशल की कमी देखी गई।

 

यह संभव है कि कई छात्रों के ज्ञान का स्तर अपनी कक्षा स्तर से बहुत नीचे हो, लेकिन शिक्षक केवल कक्षा स्तर पर ही छात्रों को पढ़ाते हैं, जैसा कि वर्ष 2017 के इस अध्ययन से पता चलता है। यदि बच्चे स्कूल में पिछड़ जाते हैं और स्कूल में उनके ज्ञान स्तर को सुधारा नहीं जाता है तो वो स्कूल छोड़ देते हैं।

 

हालांकि अनुपस्थिति पर डेटा एकत्र करना मुश्किल है। सीखने में पिछड़ जाने और अनुपस्थिति के बीच का रिश्ते को भी साबित नहीं किया जा सकता।

 

यहां यह मान लेना उचित है कि स्कूल में अनुपस्थित रहने वालों बच्चों की तुलना में नियमित स्कूल आने वाले बच्चों के सीखने के परिणाम बेहतर होते हैं।

 

बीमारु राज्यों में उच्च-प्राथमिक विद्यालय-आयु के छात्रों का ड्रॉप आउट एक बड़ी समस्या

 

वर्ष 2016 के एएसईआर रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 में 6 से 14 साल के आयु वर्ग के केवल 3.1 फीसदी बच्चे स्कूल से बाहर थे, लेकिन आयु वर्ग के आधार पर स्कूली बच्चों के बाहर होने में भिन्नताएं थीं।

 

एएसईआर सर्वेक्षण में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों सहित सभी बच्चों की नामांकन स्थिति शामिल की गई है। हालांकि, 6 से 10 वर्ष आयु वर्ग के केवल 1.7 फीसदी बच्चे, संभवत: प्राथमिक विद्यालय के, स्कूल से बाहर थे, जबकि 11 से 14 साल की आयु वर्ग के 4.6 फीसदी बच्चे ऊपरी प्राथमिक कक्षाओं से बाहर थे।

 

स्कूल में कभी दाखिला न लेने वाले बच्चों की तुलना में ड्रॉप आउट यानी स्कूल छोड़ना एक बड़ी समस्या है। एएसईआर सर्वेक्षण- 2016 में पाया गया कि   11 और 14 वर्ष की आयु के बीच 1.1 फीसदी बच्चों ने कभी स्कूल में दाखिला नहीं लिया, जबकि 3.5 फीसदी बच्चों स्कूल ड्रॉप आउट हुए हैं।

 

11-14 साल की आयु वर्ग में, अन्य राज्यों की तुलना में  बीमारू राज्यों में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में 6.3 फीसदी, मध्य प्रदेश में 5.8 फीसदी और राजस्थान में 5 फीसदी छत्तीसगढ़ में 4 फीसदी  और झारखंड में 3.7 फीसदी। इन सारे राज्यों स्कूल  में  11-14 साल की आयु वर्ग में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की  संख्या 3.5 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से ऊपर है।

 

2016 में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी

Source: Annual Status of Education Report (ASER) survey

 

वैसे राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल छोड़ने वालों का अनुपात स्थिर रहा है। यह 2012 में 3.9 फीसदी से गिरकर 2016 में 3.5 फीसदी हुआ है। इसके विपरीत एईएसईआर-2016 के अनुसार, नमूने में शामिल किए गए मध्यप्रदेश में 5.8 फीसदी बच्चों ने स्कूल छोड़ा है। वर्ष 2010 की तुलना ये आंकड़े 3.7 फीसदी ज्यादा हैं। मध्यप्रदेश एकमात्र ऐसा राज्य है जहां इस संबंध में वृद्धि देखी गई है।

 

माध्यमिक विद्यालय के आयु वर्ग के बच्चों की स्कूल छोड़ने की संख्या अधिक

 

स्कूल ड्राप आउट बच्चों का अनुपात 15 से 16 साल के आयु वर्ग में बढ़ा है। आम तौर पर माध्यमिक विद्यालय ( कक्षा 9 और कक्षा 10 ) के छात्रों ज्यादा संख्या में स्कूल छोड़ रहे हैं।

 

15 से 16 वर्ष आयु वर्ग के कम से कम 15.3 फीसदी बच्चे स्कूल ड्रॉप आउट थे, जबकि 11 से 14 वर्षीय बच्चों के लिए यह आंकड़े 4.6 फीसदी रहे हैं।

 

एएसईआर-2016 के सर्वेक्षण के मुताबिक 15- से 16 साल  आयु वर्ग के 13.5 फीसदी बच्चे स्कूल ड्रॉप आउट थे।

 

मध्य प्रदेश में 15 से 16 साल के उम्र के बच्चों के स्कूल छोड़ देने की दर सबसे अधिक देखी गई है।  यहां इस उम्र वर्ग में लगभग 23.6फीसदी बच्चे स्कूल ड्रॉप आउट देखे गए।

 

अन्य बीमारू राज्यों में यह आंकड़ा इस तरह है-उत्तर प्रदेश में 18.7 फीसदी, छत्तीसगढ़ में17.5 फीसदी और राजस्थान में 16.5 फीसदी।

 

बीमारू राज्यों की तुलना में गुजरात आर्थिक रूप से उन्नत राज्य है। लेकिन स्कूल ड्रॉप आउट बच्चों का दूसरा सबसे ज्यादा आंकड़ा गुजरात से है। करीब 19.3 फीसदी। इसके पीछे के कारण अब तक स्पष्ट नहीं हैं।

 

एएसईआर आंकड़ों के मुताबिक, भारत भर में, 15-16 साल की आयु वर्ग के स्कूल ड्रॉप आउट बच्चों के अनुपात में कमी हुई है। वर्ष 2012 में यह 14.1 फीसदी था, जो घटकर 2016 में 13.5 फीसदी हुआ है।

 

उदाहरण के लिए, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में स्कूल ड्रॉप आउट बच्चों की संख्या में 2010 और 2014 के बीच वृद्धि हुई, जबकि 2016 में गिरावट देखी गई।

 

इसमें अन्य बीमारू राज्यों की प्रवृत्ति कुछ अलग है। उदाहरण के लिए  उत्तर प्रदेश में यह 2010 के 17.6 फीसदी से बढ़कर 2012 में 20.2 फीसदी हुआ है, लेकिन फिर 2016 में यह घटकर 18.7 फीसदी हो गया है।

 

दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में स्कूल छोड़ने वालों का अनुपात 2010 में 11.6 फीसदी से बढ़कर 2016 में 23.6 फीसदी हुआ है। अलग-अलग रुझानों के पीछे के कारणों को समझना मुश्किल है और हमें राज्यों में ड्रॉप आउट वालों के पैटर्न को समझने के लिए आगे अध्ययन की आवश्यकता है।

 

कुछ राज्यों में, लड़कों की तुलना में लड़कियों को स्कूल छोड़ने की संभावना अधिक

 

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में 11 से 16 आयु वर्ग में, लड़कियों के स्कूल छोड़ने की संभावना ज्यादा होती है। मध्य प्रदेश में, 15-16 साल की आयु वर्ग की 28 फीसदी लड़कियों ने स्कूल छोड़ा है, जबकि लड़कों के लिए ये आंकड़े 19.4 फीसदी रहे हैं। गुजरात में  22.5 फीसदी लड़कियों ने स्कूल छोड़ा , जबकि लड़कों के लिए ये आंकड़े 16.3 फीसदी रहे हैं।

 

अन्य बीमारू राज्यों में बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में 15 से 16 आयु वर्ग में लड़कियों की तुलना में लड़कों की स्कूल छोड़ने की संभावना ज्यादा होती है। लड़कों और लड़कियों के बीच के इस अंतर को समझ पाना बहुत आसान नहीं है और इस पर गहन अध्ययन की जरूरत है।

 

(देशपांडे एक रिसर्च एसोसिएट हैं और बनर्जी सीनियर रिसर्चर हैं। दोने एएसईआर केंद्र से जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 11 अप्रैल 17 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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