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भारत का इंटरनेट व्यापार चीन से 80 गुना कम

देवानिक साहा,

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जेफ बेजोस, ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन के संस्थापक और सीईओ, बंगलौर में एक शॉपिंग मॉल के बाहर

 

एक डिजिटल अनुसंधान फर्म, ई-मार्केटर के मुताबिक साल 2018 तक भारत में रीटेल (खुदरा) ई-कॉमर्स बिक्री 17.5 बिलियन डॉलर (105,120 करोड़ रुपए) तक पहुंच सकती है। 2014 में यह आंकड़े 5.3 बिलियन डॉलर (31,800 करोड़ रुपए) दर्ज किए गए हैं। ताजा रिसर्च के मुताबिक भारत में 10 में से 2 इंटरनेट उपयोगकर्ता ऑनलाइन खरीददारी करता है।

 

 

2013 में अमेज़न कंपनी के आने के साथ ही भारत में ई-कॉमर्स व्यापार तेजी से बढ़ता दिखा है। अमेज़न के बाद चीन की नामी कंपनी, अलीबाबा भी भारत में अपना ई-कॉमर्स कारोबार चलाने के लिए पूरी तरह तैयार है। अगस्त महीने तक अलीबाबा भारतीय बाज़ार में दस्तक दे सकती है। हाल ही में 550 मिलियन डॉलर (3,300 करोड़ रुपए) के निवेश के बाद भारत की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स फर्म फ्लिपकार्ट अब 15 बिलियन डॉलर (90,000 करोड़ रुपए) की हो चुकी है।

 

ई-मार्केटर के अनुसार भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला देश है। आंकड़े कहते हैं कि साल 2014 के अंत तक देश में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालो की संख्या 200 मिलियन थी। बावजूद इतनी बड़ी संख्या होने के भारत में ई-कॉमर्स की रफ्तार अभी धीमी ही है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे इंटरनेट की कम पहुंच, शहरों के बाहर इंटरनेट की धीमी गति, और खराब ग्राहक सेवा।

 

साल 2014 में भारत में 5.3 बिलियन डॉलर (31,800 करोड़ रुपए) का ई-कॉमर्स व्यापार हुआ है जोकि चीन का 80वां भाग और अमरिका का 54वां भाग के बराबर है। 2014 में चीन में आंकड़े 426.26 बिलियन डॉलर (2,557,760 करोड़ रुपए) रहे और अमरिका में 305.6 बिलियन डॉलर (1,833,900 करोड़ रुपए) रहे।

 

रजनीश, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ के अनुसार “यदि हम जापान, चीन और अमरिका की बात करें तो वहां ई-कॉमर्स की गति 2002-2003 में तेजी से बढ़ी है। आज वह देश जहां खड़े हैं वहां पहुंचने के लिए उन्हें 12-13 साल लगे हैं। जबकि भारत में ई-कॉमर्स 2012-13 के दौरान ही बढ़ा है। भारत को चीन और अमरिका तक पहुंचने में उतना ही समय लगेगा”।

 

चीन: रॉकेट स्पीड के साथ न.1

 

साल 2014 में हुए वैश्विक इंटरनेट खुदरा बिक्री में चीन और अमरिका की हिस्सेदारी 55 फीसदी से भी अधिक रही । अनुमान है ही अगले पांच सालो में चीन में लगातार हो रहे विकास के साथ दोनों देशों के बीच खाई और चौड़ी होगी।

 

संभवत साल 2018 तक खुदरा ई-कॉमर्स बिक्री में चीन 1 ट्रिलियन डॉलर (6,000,000 करोड़ रुपए) का आंकड़ा पार कर जाएगा। और इसके साथ ही चीन की हिस्सेदारी कुल 40 फीसदी हो जाएगी।

 

ई-कॉमर्स व्यापार में टॉप 10 देश ( 2014) 

 

 

साल 2018 तक ई-कॉमर्स बिक्री में 89 फीसदी वृद्धी की उम्मीद की जा रही है। आंकड़ो की बात करें तो साल 2018 तक यह आंकड़े बढ़ कर 2.489 ट्रिलियन डॉलर (14,934,000 करोड़ रुपए), जोकि पूरे खुदरा बिक्री का 8.8 फीसदी है, होने का अनुमान है।

 

 

खुदरा ई-कॉमर्स बिक्री की सफलता एक सबसे बड़ा कारक है डिजिटल खरीददार क्षमता। साल 2014 में भारतीय डिजिटल खरीदार क्षमता काफी कम रहा। भारत में यह आंकड़ा केवल 24.4 फीसदी दर्ज किया गया जबकि विश्व स्तर पर यह आंकड़े 41.6 फीसदी रहे।

 

डिजिटल खरीददार क्षमता में 88 फीसदी से साथ ब्रिटेन सबसे आगे चल रहा है। जबकि चीन 55.2 फीसदी और अमरिका 74.4 फीसदी के साथ पांचवे स्थान से भी नीचे ही है।

 

भारत में ई-कॉमर्स के लिए रास्ता अभी लम्बा

 

प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ रजनीश के अनुसार “भारत में अभी ई-कॉमर्स बिक्री को पूरे रफ्तार में लाने के लिए काफी बाधाएं हैं। बिना उन बाधाओं का हल निकाले यह क्षमता 30 फीसीदी के उपर नहीं जा सकती। उद्हारण के तौर पर भारत में अभी क्रेडिट कार्ड क्षमता भी सीमित ही है। और शायद इसलिए कैश ऑन डिलेवरी (सी.ओ.डी.) मॉडल के कारण ही फ्लिपकार्ट कम समय में बाजार पर कब्जा कर पाया”।

 

35 वर्ष से ऊपर के लोग ऑनलाईन अपना डेबिट कार्ड इस्तेमाल करने में ज़्यादा सहज नहीं होते। हालांकि PayTm और दूसरे ऑनलाईन साईट्स इस समस्या का समाधान करते हैं लेकिन बाधाएं फिर भी कम नहीं। रजनीश के अनुसार “ PayTm जैसे साईट्स से समस्या पूरी तरह हल नहीं हो पाती। अमरिका में सामान पसंद न आने पर उसे वापस करने की प्रक्रिया बहुत सरल है। लेकिन भारत में थोड़ा मुश्किल है। मैंने बे एरिया से अमेजन द्वारा एक कोट ऑर्डर किया था। लेकिन शायद कोट का नाप ठीक नहीं था। उसे लौटाने के प्रक्रिया बेहद सरल थी जबकि ऐसा कुछ जब बंगलूरु में मेरे साथ हुआ तो उसके लौटाने की पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल थी”।

 

कुछ ऐसे ही विचार पारितोष शर्मा के भी हैं। शर्मा तकनीकि स्टार्टअप के सलाहकार हैं साथ ही PayTm से भी जुड़े हैं। शर्मा कहते हैं, “डिजिटल खरीददारी से ग्राहक की काफी अपेक्षाएं जुड़ जाती हैं। हम सामान का ऑर्डर देते हैं और दो से तीन दिनों के अंदर उसे अपने पास देखना चाहते हैं। ज़्यादातर मामलों में ऐसा नहीं हो पाता। कई बार सामान उस श्रेणी का नहीं होता जैसा दिखाया जाता है। साथ ही वापस करने की प्रक्रिया काफी मुश्किल है। इसलिए ज़्यादातर लोग खुद रिटेल स्टोर जाकर, देख-समझ कर सामान खरीदना पसंद करते हैं”।

 

अच्छी सेवा और समर्थन की कमी ऑनलाईन खरीददारी कम होने का दूसरा कारण है। हालांकि काफी सारी ई-कॉमर्स कंपनियां अपनी सेवाओं को फोन और डिजिटल मीडिया के ज़रिए सुधारने की कोशिश में हैं लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में वक्त लगेगा। ज़्यादातर कंपनियां अभी भी ग्राहकों के भीतर विश्वास और संतुष्टि नहीं जगा पाई हैं।

 

अच्छी सेवा और समर्थन की कमी ऑनलाईन खरीददारी कम होने का दूसरा कारण है। हालांकि काफी सारी ई-कॉमर्स कंपनियां अपनी सेवाओं को फोन और डिजिटल मीडिया के ज़रिए सुधारने की कोशिश में हैं लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में वक्त लगेगा। ज़्यादातर कंपनियां अभी भी ग्राहकों के भीतर विश्वास और संतुष्टि नहीं जगा पाई हैं।

 

 

 

नोट:
 

    1. 1) किसी भी इंटरनेट डिवाइस के माध्यम से दिया उत्पादों और सेवाओं का ऑर्डर खुदरा ई-कॉमर्स की बिक्री के अंतर्गत आते हैं। यात्रा और इवेंट टिकट इसके अंदर नहीं आते।
    2.  

    3. 2) डिजिटल खरीदार वैसे इंटरनेट उपयोगकर्ता होते हैं जिनकी उम्र 14 वर्ष से अधिक हो और जिन्होंने कम से कम एक बार ( एक साल में ) ऑनलाईन खरीददारी की हो।
    4.  

    5. 3) डॉलर-रुपया विनिमय दर का इस्तेमाल किया : $ 1 = 60 रुपये

 

(साहा नई दिल्ली में स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार है)

 


 

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