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भारत की अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ क्यों बढ़ रहे हैं अपराध?

हिमाद्री घोष,

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भारत के समृद्ध राज्यों में से एक है केरल और केरल का एक समृद्ध ज़िला है कन्नूर। कन्नूर की 39 वर्षीय एरामंगलतु चित्रलेखा ऑटोरिक्शा चलाने वाली पहली दलित महिला ड्राइवर थी। चित्रलेखा ने 2005 में ऑटोरिक्शा चलाना शुरु किया था। चित्रलेखा के काम शुरु करते ही ऊंची जातियों में गुस्सा भड़क गया। उसे काम बंद करने की धमकी दी गई और उसी वर्ष उसकी ऑटोरिक्शा में आग लगा दिया गया था। 2013 में, यह मरम्मत करने लायक नहीं रहा। जून 2014 में, जिला कलेक्टर ने चित्रलेखा को नई ऑटोरिक्शा तोहफे में दी लेकिन 4 मार्च, 2016 में उसे फिर नष्ट कर दिया गया।

 

चित्रलेखा का भविष्य क्या होगा उसे नहीं पता लेकिन एक बात जो उसे स्पष्ट लगता है वो यह कि वह हिंदू धर्म की गहरी जड़ें जातिगत भेदभाव का शिकार है । वह कहती है कि, “नायर (सवर्ण) पुरुषों द्वारा मेरे घर में तोड़फोड़ की गई थी। मेरे चरित्र के संबंध में अफवाहें उड़ाने लगे और मेरे बेटे को अपमानित कर ज़बरदस्ती स्कूल छोड़ने को मजबूर किया गया। मेरा बेटा आठवीं कक्षा तक पढ़ा है। अब वह 22 वर्ष को हो गया है और अब भी रोज़गार की तलाश में है।”

 

चित्रलेखा पुलाया जाति की है, जिन्हें उनके गांव में अदियार या गुलाम कहा जाता है। चित्रलेखा कहती हैं, “हम निचली जाति में पैदा हुए हैं। हमें उसी कुएं से पानी लेने या उसी थाली से खाने या ग्लास से पानी पीने की अनुमाति नहीं जिससे ऊंची जाति के लोग लेते हैं।”

 

चित्रलेखा का ऑटोरिक्शा नष्ट किया जाना, 2016 में दलितों के खिलाफ हुए कई आपराधिक मामलों में से एक उद्हारण है: मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर रोक से लेकर – उत्तराखंड में, हरियाणा में दूल्हे, कर्नाटक में समुदाय  – घर जलाने, महिलाओं की पिटाई करने, तमिलनाडु में दलित का स्वर्ण जाति की महिला से शादी करने पर उसकी हत्या करना, और केरल में लॉ छात्र की बलात्कार और हत्या शामिल है।

 

यह घटनाएं, वर्ष 2016 में, देश भर में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ हुए अपराधिक मामलों के यादृच्छिक स्नैपशॉट हैं, जिनके लिए आंकड़े तैयार नहीं किए गए हैं। ऐसा नहीं है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराध – पांच साल से 2014 के दौरान 40 फीसदी और 118 फीसदी तक – राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों में प्रवृत्ति दिखाई नहीं देगा।

 

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति – जिनका  भारत की 1.2 अरब की आबादी में 25 फीसदी या 305 मिलियन की हिस्सेदारी है – केवल ऐतिहासिक और प्रणालीगत भेदभाव सहते ही नहीं आए हैं, जैसा कि लेख के पहले भाग में हमने बताया है बल्कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में अपने जीवन में सुधार करने के प्रयास करने के साथ वे बढ़ती हिंसा का लक्ष्य हैं।

 

कानून की कमी नहीं लेकिन भेदभाव स्थानिक है

 

जैसा कि चित्रलेखा पर हुए निर्मम हमले दर्शाते हैं, कि इसकी कोई गारंटी नहीं कि शिक्षा और समृद्धि से उनके व्यवहार में बदलाव आएगा। भारत के उच्चतम साक्षरता दर और सातवीं सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय के साथ, केरल में भी इसकी जनसंख्या के सापेक्ष में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ उच्चतम अपराध दर है।

 

निरपेक्ष संदर्भ में, 2014 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ सर्वाधिक अपराध उत्तर प्रदेश में (8075) राजस्थान (8028) और बिहार (7893) में दर्ज किया गया है जबकि अनुसूचित जनजाति के खिलाफ सबसे अधिक अपराध राजस्थान (3952), मध्य प्रदेश (2279) और ओडिशा (1,259) में दर्ज किया गया है।

 

अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के खिलाफ सबसे अधिक मामले दर्ज होने वाले राज्य, 2014

Source: National Crime Records Bureau

 

भारत के वंचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ हिंसा से निपटने के लिए कानून की कोई कमी नहीं है।

 

विशेष कानून में सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम , 1989 शामिल है। इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) है, जो भारत में सबसे अधिक अपराध को नियंत्रित करता है, जिसमें पर्याप्त कानूनी प्रावधान है – यदि लागू किया जाए तो।

 

चित्रलेखा कहती है कि, “जब भी मैं गुंडों के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई, पुलिस उन्हें छोड़ देती है। दूसरी बाद जब मैं शिकायत करने गई तो शिकायत लिखने की बजाय वहां के सब-इंस्पेक्टर ने मुझे गिरफ्तार कर लेने की धमकी दी।”

 

हालांकि, बेहतर रिपोर्टिंग और रजिस्टर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराधों की बढ़ती संख्या के लिए एक कारण प्रतीत होता है, 2009 में  33412 (एससी) और 5,250 (एसटी) से बढ़कर 2014 में 47064 (एससी) और 11,451 (एसटी) हुए हैं।

 

 

Source: National Crime Records Bureau

 

लेकिन मामला दर्ज करने के लिए अनिच्छा जारी है, जैसा कि हिंसा से बचे दलितों के साथ हुई हमारी बातचीत से संकेत मिलता है।

 

मंजीत की हत्या , और जितेंद्र के बच्चों को जलना, उद्देश्यों के लिए खोज

 

जय भगवान के नहीं पता कि क्यों 16 फरवरी 2016 को उसके बेटे की हत्या की गई है।

 

रोहतक, हरियाणा के करतारपुर गांव में, दलितों को नियमित रुप से अपमान सहना पड़ता है, जैसा कि भगवान के बेटे मंजीत को सहना पड़ा।

 

भगवान कहते हैं, “वह काम करके घर लौट रहा था जब उसकी हत्या की गई। परेशान करना रोज़ की बात थी लेकिन इस बार क्या हुआ था ये हमें पता भी नहीं चला। पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया”, और उसके बाद मामले का क्या हुआ कुछ पता नहीं चला।

 

मंजीत को उसकी पत्नी सुमन , बेटा प्रिंस (5) और बेटी काजल (7) द्वारा बचाया गया है।

 

कभी कभी, कुछ हमले इतने क्रूर होते हैं कि यह राष्ट्रीय सुर्खियां बन जाते हैं, जैसा कि फरीदाबाद में जितेंद्र कुमार के बच्चों की हत्या की गई थी, भगवान के घर से लगभग 100 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है।

 

कुमार, उनकी पत्नी, दो वर्षीय वैभव और नौ महीने की दिव्या, सो रहे थे जब सवर्ण हमलावरों ने घर को आग लगा दिया था। इस हमले में दोनों बच्चों की मृत्यु हो गई और हमले का कारण कोई विवाद बताया गया।

 

कांचा इलैया, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल एक्लुज़न एंड इंक्लुसिव पॉलिसी ऑफ मौलाना आजाद नैश्नल उर्दू युनिवर्सिटी, हैदराबाद के निदेशक कहते हैं अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा बढ़ रही मुखरता का प्रतिक्रिया है।

 

जैसे दलित मुखर हो रहे हैं और नौकरियां कम हो रही हैं, और सवर्ण प्रतिक्रिया हो रही है

 

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ 704 हत्या और 2233 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए हैं एवं अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ 157 हत्या और  925 बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं।

 

इलैया कहते हैं, “अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों की प्रगति की वजह से सवर्ण असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। यह इतिहास की प्राकृतिक पाठ्यक्रम है। ऊंची जातियों के लोग अभी भी एक दुनिया में है, जहां दलितों और आदिवासियों को अछूत माना जाता है और गुलाम समझा जाता है।”

 

फरवरी 2016, जब दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के उच्च श्रेणी के जाटों के लिए आरक्षण की मांग के हिंसक आंदोलनकारियों से हिल गया था, दलितों पर धड़ल्ले से हमला किया गया, और कुछ को मार डालने की सूचना भी मिली थी।

 

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यह दंगे, भारत के एक मिलियन युवा लोगों के लिए पर्याप्त रोज़गार उत्पन्न करने की असमर्थता की अभिव्यक्ति थी। 2014 में,संगठित उद्योगों में 500,000 से अधिक नौकरियां संकलित नहीं हुई हैं, जैसा कि फरवरी 2016 में इंडियास्पेंड ने विस्तार से बताया है। विशेषज्ञ कहते हैं कि ऊंची जाति आपस में लड़ते हैं लेकिन दलितों को दौड़ से बाहर रखने के लिए एक हो जाते हैं।

 

डालिया चक्रवर्ती, पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के एक एसोसिएट प्रोफेसर, कहती हैं, “हम सब कहते हैं कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां समानता है लेकिन वास्तव में हम नहीं हैं। जाति पदानुक्रम और जातिवाद गहराई से हमारे समाज में निहित हैं। मैं सत्ता के लिए एक लड़ाई का ऐसा रुप देख रही हूं जहां मजबूत हमेशा हाशिए पर रह रहे लोगों को दबा कर रखना चाहते हैं।”

 

रामेश्वर उरांव, अनुसूचित जनजाति के राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षस कहते हैं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराध में वृद्धि, बेहतर मामले रिपोर्टिंग और पंजीकरण को दर्शाता है। इंडियास्पेंड से बात करते हुए उरांव कहते हैं, “आयोग अभी भी चिंतित है और केंद्र सरकार को अपनी चिंता व्यक्त की है।” आंकड़ों से उनकी चिंता दिखती है।

 

अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अपराधों में कम अभियुक्तों को दोषी करार

 

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, सभी आईपीसी के मामलों की तुलना में 45 फीसदी दोषसिद्धि की दर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराधों के 28 फीसदी से अधिक मामलों में सज़ा नहीं मिली है।

 

उरांव कहते हैं, अत्याचार निवारण अधिनियम के (पीओए) , 1955 और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को ठीक से लागू नहीं किया गया है। वे कहते हैं, “राज्य पीड़ितों के क्षतिपूर्ति और पुनर्वास करने में असफल रहा है।”

 

इलैया कहते हैं, “हमारी पुलिस अपने साथ जाति को लेकर चलती है, यहां तक ​​कि जब वे ड्यूटी पर हैं , वे भेदभाव करते हैं।”

 

महाराष्ट्र के पूर्व डॉयरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, राहुल गोपाल अधिकारी भेदभाव की पुष्टि की है। वे कहते हैं, “ऐसे कई उदाहरण हैं जहां पुलिस निचली जातियों के लोगों के साथ भेदभाव कर रहे थे। पीओए अधिनियम से काफी कम सहायता मिली है।”

 

दिसंबर 2015 में, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ अपराधों के प्रयास और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए विशेष अदालतों की स्थापना के लिए पीओए में संशोधन किया गया था।

 

(घोष एक बंगलूर स्थित स्वतंत्र पत्रकार है और 101Reporters.com  के सदस्य है। 101Reporters.com जमीनी स्तर पर पत्रकारों का भारतीय नेटवर्क है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 4 जुलाई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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