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भारत की जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए अधिक बच्चे रहने चाहिए जीवित

प्राची सालवे,

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समय के साथ भारत 2050 तक विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने की राह पर है। 2011 में देश की आबादी 1.2 बिलियन यानि 120 करोड़ थी जबिक 2050 तक यह बढ़ कर 1.6 बिलियन यानि 160 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। सरकारी आंकड़ों पर किए गए विश्लेषण में यह सामने आया है।

 

दूसरे शब्दों में, यदि अधिक बच्चे जीवित रहते हैं, तो महिलाओं के कम बच्चे होने की उम्मीद होगी जिससे उनके अधिक समय तक जीवित रहने की संभावना होगी। हालांकि, कुछ राज्यों में यदि यह सहसंबध स्पष्ट नहीं है, तो वहां महिलाओं के शिक्षा का संबंध कम बच्चों और उन बच्चों के लिए और उच्च जीवित रहने की दरों से जोड़ा जाता है।

 

स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी की गई परिवार और स्वास्थ्य सांख्यिकी 2015 के अनुसार, 42 वर्षों में, भारत के कुल प्रजनन दर में (टीएफआर) – बच्चे पैदा करने की उम्र में एक महिला द्वारा जन्म दिए गए औसत बच्चे – 55 फीसदी की कमी थी हुई है, 1971 में 5.2 से गिरकर 2013 में यह 2.3 हुआ है।

 

टीएफआर में गिरावट, घटती शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) – प्रति 1,000 जन्मों पर वैसे बच्चों की संख्या जिनकी मृत्यु एक वर्ष से पहले होती है – से प्रभावित है, जो 1971 और 2013 के बीच 129 से गिर कर 40 हुआ है।

 

2000 की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का उद्देश्य वर्ष 2010 तक टीएफआर कम कर 2.1 तक करना था। जबकि इस लक्ष्य को हासिल नहीं किया गया है, भारत में प्रजनन क्षमता में गिरावट के पीछे मुख्य कारण शिशु मृत्यु दर में गिरावट होना है।

 

2011 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार, प्रजनन क्षमता में गिरवाट से मृत्यु दर में गिरावट हो सकती है, जैसा कि परिवार प्रत्येक बच्चे के लिए अधिक संसाधन समर्पित कर सकते हैं।

 

प्रजनन क्षमता एवं शिशु मृत्यु में गिरावट, 1971 से 2013

Source: Ministry of Health

 

आंकड़ों से पता चलता है कि, उन राज्यों में अधिक बच्चों के मृत्यु होने की संभावना है जहां महिलाओं के अधिक बच्चे होते हैं।

 

उच्च प्रजनन क्षमता वाले पांच राज्य

 

प्रति महिला 3.4 बच्चों के साथ बिहार में सबसे उच्च प्रजनन क्षमता दर्ज की गई है। गौर हो कि राष्ट्रीय प्रजनन क्षमता 2.3 है। बिहार का, जो प्रति व्यक्ति आय के मामले में सबसे गरीब राज्य है, आईएमआर (42) भारत का दूसरा सबसे अधिक है, जोकि 40 के राष्ट्रीय औसत से भी बदतर है।

 

वैसे राज्य, जहां महिला साक्षरता दर कम है उन राज्यों में प्रजनन दर उच्च होता है जैसे कि राजस्थान और बिहार, जहां भारत का टीएफआर, 3.4, सर्वोच्च है और भारत की सबसे कम महिला साक्षरता दर, 50.7 फीसदी, है।

 

कम प्रजनन क्षमता वाले पांच राज्य

 

तमिलनाडु में आईएमआर कम, 21, है और टीएफआर 1.7 है, जोकि प्रतिस्थापन के 2.1 दर से नीचे है, वह स्तर जो जनसंख्या स्थिर रखने के लिए जरूरी है। 10 भारतीय राज्यों में प्रजनन दर अब 2.1 के प्रतिस्थापन के स्तर से नीचे हुआ है।

 

हालांकि, कम प्रजनन दर वाले राज्यों में आईएमआर दर के साथ सहसंबंध स्पष्ट नहीं है। कम प्रजनन दर वाले राज्यों का नाम, जैसे कि पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश और पंजाब, कम शिशु मृत्यु दर वाले टॉप पांच राज्य में नहीं है।

 

इससे पता चलता है शिशु मृत्यु दर कुछ हद तक प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है। अन्य कारक जो प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं, वे हैं शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और उपयोग करने और जन्म नियंत्रण के संबंध में जागरूकता।

 

हमने आगे महिला शिक्षा के स्तर के साथ प्रजनन और शिशु मृत्यु दर की तुलना की है और दोनों के बीच सहसंबंध पाया है। कम टीएफआर और साक्षरता के साथ वाले राज्यों में संबंध अधिक पाया गया है: लगभग सभी राज्य जहां प्रजनन दर कम हैं वहां महिला सक्षरता दर अधिक है। उदाहरण के लिए, महिला साक्षरता के संबंध में तमिलनाडु देश में दूसरे स्थान पर है- 89.9 फीसदी महिलाएं साक्षर हैं – और देश में दूसरा सबसे कम टीएफआर, 1.7, है।

 

महिलाओं में साक्षरता का संबंध देर से विवाह होने और गर्भनिरोध के लिए बेहतर उपयोग  के साथ जोड़ा जाता है, जिससे जनसंख्या स्थिर होगी। ज्यां द्रेज द्वारा 2000 में लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में किए एक अध्ययन के अनुसार, शिक्षित महिलाओं की स्थिति बेहतर होती है और बेहतर पोषण और टीकाकरण, बाल स्वास्थ्य और अस्तित्व में सुधार सुनिश्चित होता है।

 

(सालवे इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 06 जून 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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