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भारत के नए हाइड्रोफ्लोरोकार्बन लक्ष्य में कोयले से उत्सर्जित co2 के 1/6 हिस्से को नष्ट करना हुआ है तय

श्रेया शाह,

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जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के लिए भारत सहित 200 अन्य देशों ने एक वैश्विक समझौते पर सहमति जताई है। इससे ग्रीन हाउस गैस कम होंगे। इंडियास्पेंड की गणना के अनुसार पिछले 35 वर्षों से देश के थर्मल पावर स्टेशनों से जो गैस उत्सर्जित होता रहा है, उसके छठे हिस्से को बंद कराने के बराबर गैस के उत्सर्जन में कमी आएगी। यह गणना 2012 में थर्मल पावर स्टेशनों से कार्बन डाइऑक्साइड के लगातार उत्सर्जन के आधार पर की गई है।

 

अफ्रीकी देश रवांडा में 15 अक्तूबर, 2016 को कम से कम 197 देशों ने एक कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते पर सहमति जताई है। समझौते में  हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) के उत्पादन और खपत को कम करने की बात की गई है। ज्ञात हो कि कार्बन डाइऑक्साइड (co2) की तुलना में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा कर वायुमंडल का ताप बढ़ाने के मामले में 12,000 गुना अधिक खतरनाक है। यह समझौता 1 जनवरी, 2019 से प्रभाव में आएगा और विश्व स्तर पर सीओ2 के बराबर 70 बिलियन टन उत्सर्जन को टाला जा सकेगा। यह उष्णकटिबंधीय वनों की आधी कटाई को रोकने के बराबर है।

 

जलवायु परिवर्तन को सीमित करने का काम कर रहे  गैर सरकारी संगठनों के एक नेटवर्क ‘जलवायु एक्शन नेटवर्क इंटरनेशनल’ द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार भारत ने 2028 से हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के उत्पादन और उपयोग पर कटौती करने की सहमति जताई है। यह भारत के पहले प्रस्ताव की तुलना में यह अधिक महत्वाकांक्षी योजना है।

 

नई दिल्ली स्थित अनुसंधान संस्थान ‘काउंसिल ऑन एनर्जी एन्वाइरन्मन्ट एवं वाटर’ (सीईईजब्लू) में शोधकर्ता वैभव चतुर्वेदी के अनुसार, रवांडा में तय किए गए अंतिम समझौते के तहत 2015 से 2050 के बीच भारत अपनी संचयी हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के उत्सर्जन का 75 फीसदी कम करेगा।

 

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2019 से विकसित देश हाइड्रोफ्लोरोकार्बन कम करना शुरु करेंगे। चीन सहित विकासशील देशों का एक समूह 2024 से हाइड्रोफ्लोरोकार्बन में कटौती शुरु करेंगे। भारत उन देशों के समूह में शामिल है जो हाइड्रोफ्लोरोकार्बन की खपत में कटौती सबसे अंत में शुरु करेंगे। भारत यह कटौती 2028 से शुरु करेगा।

 

यह समझौता मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का हिस्सा है। यह प्रोटोकॉल ओजोन पदार्थों, और अब ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों के उपयोग को कम करने के लिए एक वैश्विक समझौता  है।

 

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार,“ यह समझौता भारत जैसे उच्च वृद्धि वाली अर्थव्यवस्थाओं के विकास की अनिवार्यताओं की पहचान करता है और उच्च ग्लोबल वार्मिंग क्षमता हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के शेड्यूल को बदलने के कार्यान्वयन के लिए एक यथार्थवादी और व्यावहारिक रूपरेखा प्रदान करता है”।

 

हाइड्रोफ्लोरोकार्बन का इस्तेमाल आम तौर पर एयर कंडीशनर और फ्रिज में किया जाता है। सीईईडब्लू द्वारा 2015 की रिपोर्ट के अनुसार एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर के लिए मांग बढ़ने से 2050 में ग्लोबल वार्मिंग को प्रभावित करने वाले हाइड्रोफ्लोरोकार्बन की 5.4 फीसदी गैसें सिर्फ भारत में उत्सर्जित होंगीं। 2050 में सबसे अधिक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन उत्सर्जन आवासीय एयर कंडीशनिंग (35 फीसदी) और वाणिज्यिक कंडीशनिंग (28 फीसदी) से आने की संभावना है।

 

2050 तक दुनिया में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन उत्सर्जन में 10 से 15 फीसदी वृद्धि होने की उम्मीद है और CO2 उत्सर्जन के 200 मिलियन टन के बराबर योगदान कर सकता है। वॉशिंगटन डीसी स्थित अनुसंधान संगठन ‘इंस्टीय्यूट फॉर गवर्नेंनस एंड सस्टैनबल डिवलपमेंट’ द्वारा 2015 के सारपत्र के अनुसार, इन उत्सर्जन की वृद्धि की रोकथाम से पृथ्वी की वार्मिंग को 0.5 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जा सकता है।

 

हाइड्रोफ्लोरोकार्बन कम करने लिए विकासशील देशों के लिए यह समझौता जिसमें भारत, पाकिस्तान, ईरान और इराक भी शामिल है, भारत के पिछले प्रस्ताव की तुलना में अधिक महत्वकांक्षी है, लेकिन उत्तर अमेरिकी प्रस्ताव की तुलना में अधिक व्यापक नहीं है।

 

इससे पहले भारत ने 2031 तक विकासशील देशों के लिए हाइड्रोफ्लोरोकार्बन खपत को स्थिर करने के लिए एक योजना का प्रस्ताव दिया था। इसका मतलब हुआ कि हाइड्रोफ्लोरोकार्बन का उपयोग और उत्पादन उस साल में सबसे ज्यादा होगा, और 2031 के बाद से हर साल उसमें कमी होगी। उत्तरी अमेरिका द्वारा प्रत्युत्तर प्रस्ताव में 2021 से विकासशील देशों को हाइड्रोफ्लोरोकार्बन उत्पादन और खपत स्थिर करने का करने का सुझाव दिया है।

 

पहले स्थिर और आधारभूत सहमति संशोधन के तहत का मतलब यह है कि भारत अपने मूल प्रस्ताव की तुलना में अधिक co2 के बराबर की कटौती करेगा।

 

नए समझौते के तहत भारत 2018 तक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन की खपत और इस्तेमाल स्थिर करेगा, जबकि 2047 तक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन की औसत खपत में 15 फीसदी की कटौती हो पाएगी और 2024-2026 तक इस्तेमाल में कमी हो पाएगी।

 

सीईईडब्लू के शोधकर्ता चतुर्वेदी कहते हैं कि इन सब में भारत को 16.48 बिलियन डॉलर (1.1 करोड़ लाख रुपये) की लागत आएगी। देशों के एक अन्य समूह, जिसमें चीन सहित दूसरे विकासशील देश शामिल हैं, ने 2014 से हाइड्रोफ्लोरोकार्बन की खपत और उपयोग स्थिर करने की सहमति जताई है। 2045 तक, ये देश 2020 से 2022 के बीच औसत खपत का 80 फीसदी हाइड्रोफ्लोरोकार्बन कम करेंगे।

 

संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों जैसे विकसित देशों ने 2019 में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन की खपत और उपयोग स्थिर करने की सहमति जताई है और 2036 तक 2011 और 2013 के बीच हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के औसत उपयोग और उपभोग का 15 फीसदी कम कर पाएंगे।

 

15 अक्टूबर, 2016 के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विट किया, “भारत और अन्य देशों द्वारा दिखाए गए लचीलापन और सहयोग से ही निष्पक्ष, न्यायोचित और महत्वाकांक्षी एचएफसी समझौता बनाया गया है।”

 

हाइड्रोफ्लोरोकार्बन(HFCs) से कम ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता वाले अन्य विकल्पों की तरफ जाने के लिए भारत और अन्य विकासशील देशों को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, फिलैन्थ्रपी, और अन्य विकसित देशों के बहुपक्षीय कोष से सहायता प्रदान की जाएगी। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने 14 अक्टूबर 2016 को विस्तार से बताया है।

 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार भारत सरकार ने 13 अक्टूबर, 2016 को भी उत्पादकों के लिए एचएफसी -23 नष्ट करने के लिए आदेश पारित किया है। CO2 की तुलना में HFC -23 में ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता के साथ वाले गैस 12,500 गुना अधिक होते हैं। लाइव मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली स्थित अनुसंधान संगठन ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरामेंट’ के निदेशक चंद्र भूषण कहते हैं, “इससे अगले 15 वर्ष में, भारत में co2 के बराबर का 100 मिलियन टन उत्सर्जन नष्ट होगा।”

 

(शाह पत्रकार / संपादक है और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 18 अक्टूबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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