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भारत के सतत पिछड़ेपन का संकेत देती है रिपोर्ट

सौम्या तिवारी,

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* भारत में काम करने की उम्र वाली करीब 45 फीसदी महिलाएं (करीब 153 मिलियन या 1530 लाख) घरेलू कार्य करती हैं। यह आंकड़े उनके श्रमशक्ति से प्रतिरोध के पैमाने का संकेत देती है।

 

* करीब एक-चौथाई भारतीय (300 मिलियन या 3000 लाख) अशिक्षित हैं, छह से 14 वर्ष के आयु वर्ग के बीच करीब 10 फीसदी स्कूल जाना छोड़ देते हैं।

 

* कुल घरों में से करीब आधे घरों (47 फीसदी) में नल द्वारा पीने के पानी और साफ-सफाई की कमी है।

 

* डायरिया से होने वाली मौतों में करीब 88 फीसदी मौते स्वच्छता की कमी के कारण होती हैं।

 

यह कुछ बिंदु हैं जो भारत के सतत पिछड़ेपन के पैमाने– आर्थिक प्रगति के बावजूद – एवं जीवन की बेहतर गुणवत्ता के लिए गरीबी, स्वास्थ्य और पहुंच के बीच संबंधों की याद दिलाते हैं। इन बिंदुओं को इंडियाज़ एक्सक्लूज़न रिपोर्ट (आईएक्सआर) 2015 में विस्तार से बताया गया है। यह रिपोर्ट 5 मार्च को नई दिल्ली सेंटर ऑफ इक्विटी स्टडीज द्वारा जारी की गई है।

 

इंडियास्पेंड, रिपोर्ट के डेटा रिसर्च के साथ जुड़ा था।

 

 

मूल अधिकार के लिए किस प्रकार भारत करता है संघर्ष

 

283 पेज की रिपोर्ट पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि खराब मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवा का परिणाम 66 वर्ष की जीवन प्रत्याशा है (यह 71 के वैश्विक औसत से कम है, इथियोपिया के 65 से वर्ष से केवल 1 वर्ष अधिक एवं कंबोडिया जैसे गरीब देश के 73 के आंकड़े से सात वर्ष पीछे है।)।

 

हालांकि, 2011 की जनगणना रिपोर्ट जीवन प्रत्याशा 66 वर्ष बताती है लेकिन 2014 के लिए सरकार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक जीवन प्रत्याशा 71.5 वर्ष दर्ज की गई है, जोकि विश्व औसत के साथ बराबरी पर है।

 

यह सूचकांक विशेष रूप से पीने के लिए नल-जल की कमी और स्वच्छता से संबंधित हैं – 47 फीसदी भारतीय घरों में नहीं हैं – एवं गरीब और कमजोर तबकों को आधारभूत संरचना उपलब्ध कराने में सरकारी विफलताओं पर प्रकाश डालता है।

 

आईएक्सआर उन प्रथाओं के उपयोग पर भी चर्चा करता है जो इन कमियों को दूर करने में मदद कर सकता है।

 

यह गरीबों के लिए, पिंपरी चिंचवाड़, महाराष्ट्र में मुक्त, स्वच्छ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का वर्णन करता है। चेन्नई में, यह एक निगरानी, बीमारी की रोकथाम और फैलने की प्रतिक्रिया का विश्लेषण करती है; रायपुर, छत्तीसगढ़, मजबूत समुदाय प्रथाओं तक पहुंचती है।

 

झुग्गी बस्तियों को निर्दयतापूर्वक खाली कराने के बजाए, अहमदाबाद के परिवर्तन कार्यक्रम ने, जो 1996 में आरंभ किया गया था, झुग्गीवासियों को आश्वासन दिया है कि वे अगले 10 वर्षों के लिए वहां से निकाले नहीं जाएंगे। आश्वासन, कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं था, लेकिन निगम से वित्तीय सहायता के साथ, भौतिक बुनियादी ढांचे (पानी की आपूर्ति, स्वच्छता, जल निकासी, सड़कों) को उन्नत करने के लिए समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने में मदद मिली है।

 

बैंगलोर में, बैंगलोर जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड, शहरी गरीबों को संभावित ग्राहक मानता है। 2000 में, पानी का कनेक्शन देने की प्रक्रिया को सरल बनाया गया था:  रिपोर्ट कहती है – “नए कनेक्शन के लिए औपचारिक कार्यकाल दस्तावेजों की आवश्यकता को सरल अधिभोग प्रमाण (भूमि कार्यकाल की चिंताओं को दूर करने के लिए) के साथ बदल दिया गया था, कनेक्शन की फीस कम हो गई थी और न्यूनतम मासिक शुल्क (सामर्थ्य की चिंताओं को दूर करने के लिए) लागू करने के लिए घरेलू पानी के लिए टैरिफ संरचना संशोधित की गई थी और साझा कनेक्शन की पेशकश एक विकल्प के रुप में की गई थी।”

 

सार्वजनिक वस्तुओं से प्रतिरोध का विशेष प्रभाव महिलाओं, बच्चों पर

 

प्रतिरोध को, सार्वजनिक वस्तुओं (जो सरकार नागरिक समाज द्वारा प्रदान की जाती है ) तक पहुंच की कमी के रुप में देखा गया है जैसे कि स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे, साफ-सफाई, पीने के पानी और काम करने के अवसर। इन्हें विशेष कर महिलाओं तक पहुंच की कमी के रुप में देखा गया है।

 

खराब स्वास्थ्य और शिक्षा के बुनियादी ढांचे का प्रतिकूल प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। महिलाओं तक मातृ स्वास्थ्य लाभ आसानी से नहीं पहुंचता है एवं शिक्षा की पहुंच में कमी, उनमें रोजगार के अवसर सीमित करता है; रिपोर्ट के अनुसार 15 से 59 वर्ष के आयु वर्ग के बीच 49 फीसदी महिलाएं घरेलू काम करती हैं।

 

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भारत 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, देश में 71 मिलियन (या 710 लाख) अकेली रहने वाली महिलाएं हैं एवं इंडियास्पेंड के विश्लेषण के अनुसार एक दशक में अकेली रहने वाली महिलाओं में 39 फीसदी की वृद्धि हुई है। अकेली रहने वाली महिलाओं में विधवा और तलाकशुदा महिलाएं शामिल हैं; आईएक्सआर रिपोर्ट कहती है कि उनकी स्थिति के साथ जुड़ा सामाजिक बट्टा आर्थिक गतिविधियों में समान रुप से भाग लेने से वर्जित करता है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में एक अनुमान के अनुसार 44 मिलियन (या 440 लाख) बच्चे काम करते हैं। शिक्षा पर पहुंच की कमी के अलावा इन बच्चों में बेहतर स्वस्थ्य की भी कमी है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, “शहरी बाल श्रमिकों के लिए अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध नहीं है, हालांकि व्यवसाय के रुप में कुछ संदर्भ दिए गए हैं जैसे कि निर्माण, कारखानों में काम करने वाले एवं सेवा क्षेत्र। गरीबी और सामाजिक सुरक्षा का अभाव, बाल श्रम के मुख्य कारण हैं।” आर्थोपेडिक रोगों, चोटों, गैस्ट्रो आंत्र सहित बाल श्रमिक कई बिमारियों से ग्रसित होते हैं। इसका मुख्य कारण तनाव और जोखिम एवं सामान्य बच्चों की तुलना में बाल श्रमिकों का मादक द्रव्यों के सेवन की अधिक से अधिक प्रधानता है।

 

वंचित समूह: हिंसा के शिकार

 

सितंबर 2013 में, पश्चिमि उत्तर प्रदेश के दो ज़िलो, मुजफ्फरनगर और शामली के 14 गांवों में (जिसका प्रभाव आसपास के 74 गांवों तक हुआ), “52 व्यक्तियों की मौत, करीब 60 गंभीर रुप से घायल हुए एवं कई घर आगजनी का शिकार हुए।”

 

हिंसा मुजफ्फरनगर और शामली के निकटवर्ती जिले के लगभग 74 गांवों तक फैला था। रिपोर्ट कहती है कि, हाल के दिनों में सबसे बड़ी हिंसा प्रेरित पलायन –  विशेष रुप से मुस्लिम परिवारों का – एक सतत घटना का हिस्सा है, जो चेतावनी है कि, “लोगों की मृत्यु , चोटों, यौन हिंसा, और संपत्ति के विनाश के कई उदाहरण इन दिनों असंख्य रह रहे हैं।” वास्तव में, सरकारी आंकड़ों में ही काफी भिन्नता है, जैसा कि इंडियास्पेंड की इस रिपोर्ट में बताया गया है।

 

क्या नए कर गरीबों के लिए जीवन और अधिक मुश्किल करेंगे?

 

आईएक्सआर के अनुसार, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के कार्यान्वयन से सकल घरेलू उत्पाद में 2 फीसदी की वृद्धि होगी। इससे संभवत: सरकार की कर आय में वृद्धि हो सकती है जिससे संभवत: बेहतर सेवाएं प्रदान हो सकेंगी।

 

रिपोर्ट यह भी कहती हैं कि, टैक्स “अनिवार्य रुप से उन पर बोझ है जिन्हें इसका भुगतान करना पड़ता है।” उपभोक्ता वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर उच्च हैं, और इसका मतलब हुआ कि हर किसी को – अमीर या गरीब – समान रुप से भुगतान करना होगा।

 

रिपोर्ट कहती है कि, “ …. अप्रत्यक्ष कर (जैसे कि उत्पादन, व्यापार और माल और सेवाओं की बिक्री पर लगाए गए कर) प्रतिगामी प्रकृति के हैं जैसा कि वे अपने भुगतान करने की क्षमता के आधार पर संभावित कर दाताओं का भेद नहीं करते हैं या दूसरे शब्दों में, उनकी आय के आधार पर …सामान के कीमत का एक भाग के रूप में शामिल होने के आधार पर, अप्रत्यक्ष कर भी, विशेष रूप से गरीब उपभोक्ताओं के लिए सामाजिक-आर्थिक प्रतिरोध उत्पन्न करता है।”

 

“केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक आम सहमति बनने की कोशिश में जीएसटी अब भी ड्राइंग बोर्ड पर बना हुआ है। इसके कार्यान्वयन के वास्तविक स्वरूप पर निर्भर करते हुए कि ऐसा कब होता है, कराधान की दर और वस्तुओं की सूची जिन्हें कराधान से छूट दी गई है, उनके सहित, गरीब के घरों पर जीएसटी बोझ के निहितार्थ का पुनर्मूल्यांकन करना होगा।”

 

(तिवारी इंडियास्पेंड के साथ विश्लेषक है।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 07 मार्च 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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