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भारत में नहीं थम रही जातिवाद की समस्या

हिमाद्री घोष,

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कुछ दिनों पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के फिरोज़ाबाद ज़िले में ऊंची जाति के ग्रामीणों द्वारा एक आतंकवादी हमले में मारे गए दलित सैनिक के अंतिम संस्कार को रोकने की कोशिश, देश के 30.5 करोड़ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित भारतीयों के खिलाफ बड़े पैमाने के भेदभाव को दर्शाता है।

 

गांव के ऊंची जाति के लोगों ने सार्वजनिक भूमि पर वीर सिंह, – नट जाति जो दलितों में आते हैं- के अंतिम संस्कार की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। मामले की सूचना मिलने के बाद स्थानीय प्रशासन को इसमें दखल देना पड़ा। जिला पदाधिकारी के सामने आने के बाद गांव वालों को सहमत किया गया। तीन बच्चों के 35 वर्षीय सिंह, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के योद्धा, की मृत्यु 26 जून 2016 को पंपोर , कश्मीर में हुई थी। डीएनए अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक उनका परिवार एक टिन की छत वाले एक कमरे के घर में रहता था।

 

पूर्व में 1,200 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर कोलकाता के एक झुग्गी बस्ती में सिंह जैसे अन्य बहिष्कृत जाति रहने वालों में से, धर्मेंद्र, जो पिछले 33 वर्षों से एक “मैला ढोने वाला” हैं – जो लोग हाथों से शौचालय और नाली साफ करते हैं, उनके लिए आधिकारिक शब्द – बताते हैं कि वह भेदभाव के इस प्रकार आदि थे कि वे इससे शायद ही वाकिफ थे। उन्हें जानकारी नहीं थी कि मैला ढोना कानूनी रुप से प्रतिबंधित है और अपनी जाति और मेहतर जो अक्सर मलमूत्र में डूबे शौचालय , सेप्टिक टैंक और नाली को साफ करते हैं, उनके लिए नौकरियों में आरक्षण के संबंध में नहीं सुना था।

 

एक छोटा और दुबला सा दिखने वाला आदमी, धर्मेद्र कहता है कि, “मेरे पास कागज़ात भी नहीं है।” धर्मेद्र का असली नाम कार्तिक नायक है। धर्मेद्र कहते हैं कि, “यह मेरा भाग्य है; मेरे भाग्य को कोई बदल नहीं सकता है। मैं जैसा हूं वैसे ही खुश हूं। 51 वर्ष की उम्र में अपनी पत्नी, बेटे और उसके परिवार के साथ ज़िंदा हूं।”

 

आजादी के 68 वर्षों के बाद, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित भारतीयों – 2011 के जनगणना के अनुसार 20.1 करोड़ और 10.4 करोड़ – को न केवल भेदभाव का सामना करना पड़ता है, बल्कि इनके खिलाफ अपराध की घटनाओं में भी वृद्धि हो रही है (इस श्रृंखला के दूसरे भाग में हम विस्तार से बताएंगे।)

 

परिवार : अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य जातियां

Socio-economic Caste Census

 

प्रगति के बावजूद, अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां –  जो संयुक्त रुप से भारत की जनसंख्या का 25.2 फीसदी गठन करती हैं – अन्य भारतीयों के निशान पर बने हुए हैं। मात्रा निर्धारित करने के लिए,  इंडियास्पेंड ने चार मापदंड का इस्तेमाल किया: शिक्षा, आय , जमीन और घर के स्वामित्व और सरकारी नौकरियां।

 

कई बार, वे दलित जिन्हें भारत की जाति के गतिरोध के माध्यम से तोड़ दिया है, उनके लिए समाज की ऊंची जातियों का वर्चस्व का मार्गदर्शन करने में मुश्किल होती है। रोहित वेमुला – हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी का छात्र – जिनकी जनवरी 2016 में आत्महत्या करने से भेदभाव महसूस करने वाले लोगों में गुस्सा भड़का था – ने अपनी सुसाइड नोट में “आदमी के मूल्य” को “उसकी तत्काल पहचान और निकटतम संभावना है, एक वोट, एक नंबर,एक बात, में तब्दील” होने की बात कही थी।

 

शिक्षा

 

2011 की जनगणना के अनुसार, नुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) दोनों भारतीय शैक्षिक संकेतक में पिछड़े हैं : 66 फीसदी अनुसूचित जाति साक्षर हैं , जबकि 59 फीसदी अनुसूचित जनजाति साक्षर हैं, आम जनता के बीच साक्षरता 74 फीसदी है।

 

राज्य अनुसार साक्षरता दर

 

Source: Census 2011

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2010-2011 में, अनुसूचित जाति के 13.5 फीसदी एवं अनुसूचित जनजातियां की 11.2 फीसदी आबादी से अधिक ने उच्च शिक्षा के लिए दाखिला नहीं लिया है, जबकि आम आबादी के लिए यही आंकड़े 19 फीसदी है। कुछ राज्यों में, जैसे बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में उच्च शिक्षा के लिए अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति का नामांकन दर 4 फीसदी और 6 फीसदी के बीच था।

 

राज्य अनुसार उच्च शिक्षा में नामांकन

Source: All India Survey on Higher Education, Ministry of Human Resource DevelopmentThe gross enrolment ratio can be greater than 100% as a result of grade repetition and entry at ages younger or older than the typical age at that grade level.

 

पिछले कुछ वर्षों में, इन आंकड़ों में सुधार हुए हैं। उदाहरण के लिए, 1981 में , अनुसूचित जाति की केवल 21 फीसदी और अनुसूचित जनजातियों की 16.3 फीसदी आबादी ही साक्षर थी । दस वर्ष बाद, 1991 में , अनुसूचित जातियों के लिए साक्षरता दर 37.4 फीसदी और अनुसूचित जनजातियों के लिए 29.6 फीसदी हुई है।

 

आरक्षण से उच्च शिक्षा में नामांकन दर में सुधार होने से सहायता मिली है, लेकिन कई छात्रों उम्मीदों और सूक्ष्म भेदभाव का दबाव महसूस करते हैं। 2014 में, बंबई आईआईटी के छात्र संगठन द्वारा की गई एक सर्वेक्षण (डीएनए अखबार द्वारा रिपोर्ट की गई) के अनुसार, आधे से अधिक अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग (अन्य पिछड़ी जातियों) के छात्रों ने भेदभाव महसूस किया है, हालांकि यह प्रकट नहीं हुआ है। वर्तमान में, सरकार से वित्त पोषित शैक्षणिक संस्थानों के लिए दाखिले का 15 फीसदी सीटें अनुसूचित जातियों के लिए और अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5 फीसदी आरक्षित हैं।

 

इस बात के कम ही प्रमाण हैं कि इस तरह के सकारात्मक कार्रवाई शैक्षिक प्रयास को प्रभावित करता है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के लिए यह 2,016 अध्ययन के अनुसार, “उच्च शिक्षण संस्थान में दाखिले में प्रवेश के स्कोर में महत्वपूर्ण अंतर के बावजूद लाभार्थी समूहों से छात्रों और जो लोग गैर-आरक्षित / खुले सीटों के माध्यम से प्रवेश पाते हैं, उनके बीच  प्रयास और शैक्षणिक दृष्टिकोण कोई महत्वपूर्ण मतभेद नहीं पाया गया है।” हालांकि, अध्ययन में, “जाति समूहों के बीच स्पष्ट और महत्वपूर्ण मतभेद और वर्तिकाग्र की उपस्थिति” का उल्लेख किया गया है।

 

ए.नारायणन CHANGEIndia के निदेशक, चेन्नई आधारित एक संस्था, कहते हैं, “सरकार हस्तक्षेप, कार्यक्रम और नीतियां सहायता कर रही हैं लेकिन वे वास्तविक जरूरत की तुलना में बहुत कम हैं।”

 

2014 की शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (एएसईआर) से पता चलता है कि, “ग्रामीण भारत के निजी स्कूलों में एक से छह आयु वर्ग के बच्चों के नामंकन में वृद्धि हुई है, 2006 में 18.7 फीसदी से बढ़ कर 2014 में 30.8 फीसदी हुआ है।”

 

शिक्षा के निजीकरण दलितों को वंचित कर करा है क्योंकि निजी शिक्षा – औसतन – सरकारी शिक्षा की तुलना में आठ गुना अधिक महंगा है।

शिक्षा के निजीकरण को विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करता है क्योंकि वे भारत की आर्थिक सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर हैं।

 

आय

 

2011 सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC ) के आंकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जाति के परिवारों के 83 फीसदी और अनुसूचित जनजाति के घरों के 86.5 फीसदी के कमाऊ सदस्य की सर्वाधिक मासिक आय 5,000 रुपए से भी कम थी।

 

परिवार जिसमें कमाऊ सदस्य की मासिक आय 5,000 रुपए से कम है

Source: Socio-economic Caste Census

 

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, केरल और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में, अनुसूचित जाति के 86 फीसदी के बीच परिवारों ने सबसे अधिक कमाने वाले सदस्य की मासिक आय 5,000 रुपए से कम होने की बात कही है। अनुसूचित जनजातियों के लिए, यह आय के स्तर का पश्चिम बंगाल, ओडिशा, केरल और छत्तीसगढ़ में 10 में से नौ परिवारों के लिए आदर्श है।

 

भारत में कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, यह पहलचान करने के लिए 2011 की यह पायलट सर्वेक्षण कहती है, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आधे से अधिक परिवार भारत की ‘ गरीब, वंचित परिवारों” का गठन करते हैं। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के घरों और भूमि के मालिकों में अभाव स्पष्ट है।

 

भूमि और घर

 

अपेक्षाकृत समृद्ध राज्यों  जैसे कि गोवा, गुजरात और तेलंगाना में अनुसूचित जनजाति के भूमि जोत सबसे कम है। इन राज्यों में या आबादी 13 फीसदी, 21 फीसदी और 11 फीसदी है का गठन करते हैं। अनुसूचित जातियों के लिए, हरियाणा और छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जातियां बहुत कम या न के बराबर भूमि का स्वामित्व करते हैं। यहां ये आबादी का 23 फीसदी और 14 फीसदी गठन करते हैं।

 

2.5 एकड़ या अधिक भूमि के मालिक वाले परिवार

Source: Socio-economic Caste Census

 

नवीनतम उपलब्ध 2001 एसईसीसी डेटा के अनुसार (टेबल : 5), अनुसूचित जनजाति के 0.36 फीसदी और अनुसूचित जाति के 0.64 फीसदी से अधिक परिवार आयकर का भुगतान नहीं करते हैं। आम आबादी के बीच, 3.81 फीसदी आयकर का भुगतान करते हैं, जैसा कि इंडियास्पेंड ने मई 2016 में विस्तार से बताया है।
 

राज्य अनुसार आयकर का भुगतान करने वाले परिवार

 

Source: Socio-economic Caste Census

 

नारायणन तर्क देते हैं कि, सरकार को समान धन वितरण पर विचार करना चाहिए, जबकि भारत का राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एन.सी.एस.टी.) के अध्यक्ष, रामेश्वर उरांव कहते हैं कि अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के कल्याण के लिए अनेक कार्यक्रमों पर पैसों के खर्चों का कोई खाता नहीं था।

 

उरांव कहते हैं, “सरकार पैसा खर्च कर रही है, लेकिन यह पता नहीं है कि पैसा जा कहां रहा है। पैसे आदिवासी और दलित के कल्याण के लिए है, लेकिन पैसे उन तक पहुंच नहीं रहा है।”

 

सरकारी नौकरियां

 

किस प्रकार अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां निजी क्षेत्र द्वारा नियोजित कर रहे हैं, इस पर कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के विश्लेषण से पता चलता है कि आरक्षण के बावजूद – अनुसूचित जातियों के लिए 15 फीसदी नौकरियां और अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5 फीसदी आरक्षित हैं – वे अन्य भारतीयों की तुलना में पीछे हैं।

 

एसईसीसी 2011 के अनुसार, अनुसूचित जनजाति के 0.48 फीसदी एवं अनुसूचित जाति के 0.73 फीसदी से अधिक परिवारों के पास वेतनभोगी सरकारी (केंद्र और राज्य) नौकरियां नहीं हैं। 1994 में, नवीनतम वर्ष जिसके लिए इस तरह के डेटा उपलब्ध हैं, केन्द्र सरकार के सभी कर्मचारियों में से 16.9 फीसदी अनुसूचित जाति और 5.49 फीसदी अनुसूचित जनजाति के थे।

 

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आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा में सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति का अनुपात सबसे कम है, जबकि तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में अनुसूचित जनजाति का अनुपात सबसे कम था।

 

सरकारी नौकरी वाले परिवार

Source: Socio-economic Caste Census

 

“ग्रुप -डी” सेवाओं – जैसे कि चपरासी और सफाई कर्मचारी – में, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व 18.4 फीसदी और 6.7 फीसदी है। प्रबंधकीय स्तर “ग्रुप ए” और “ग्रुप – बी’ सेवाओं में अनुसूचित जाति के प्रतिनिधित्व 12.2 फीसदी और 14.5 फीसदी है और अनुसूचित जनजाति के लिए, 4.1 फीसदी और 4.6 फीसदी है। गौर हो कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियां संयुक्त रुप से भारत की आबादी का एक चौथाई हिस्से का गठन करते हैं।

 

नौकरियों में आरक्षण मदद करते हैं या बाधा डालते हैं?

 

2016 की भारतीय रेल – भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र के नियोक्ता – की इस उत्पादकता अध्ययन के अनुसार, वहां कुछ सकारात्मक प्रभाव का सबूत है एवं नकारात्मक प्रभाव नहीं दिखता है। इस अध्ययन में दो शोधकर्ताओं , दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अश्विनी देशपांडे एवं मिशिगन विश्वविद्यालय के थॉमस वेकफ ने 1980 और 2002 के बीच के आंकड़ों का इस्तेमाल किया है।

 

2015 की देशपांडे की एक और अध्ययन कहती है कि ऊंची एवं अनुसूचित जाति के बीच कमाई के अंतराल के 55 फीसदी की अस्पष्टीकृत के साथ , ऊंची जातियों की तुलना में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्वरोजगार में अपने कारोबार का प्रदर्शन बद्तर है।

 

डालिया चक्रवर्ती, पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर कहते हैं, “हमारा संविधान ने हाशिए पर रह रहे लोगों के लिए कुछ आरक्षण दिया गया है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। देश का समय के साथ सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता में परिवर्तन होने के साथ हमें प्रावधानों का पुनर्गठन करके की ज़रुरत है।”

 
(घोष एक बंगलूर स्थित स्वतंत्र पत्रकार है और 101Reporters.com  के सदस्य है। 101Reporters.com जमीनी स्तर पर पत्रकारों का भारतीय नेटवर्क है।)
 
यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 2 जुलाई 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।
 

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