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भारत में बढ़ रही है लोगों की आमदनी, लेकिन बेटियों के जन्म में कमी

संजुक्ता नायर,

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पिछले 65 वर्षों में भारतीय जनसंख्या में लिंग अनुपात लगातार कम हुआ है। लिंग अनुपात का मतलब है। प्रति 1,000 लड़कों पर जीवित जन्म ली हुई लड़कियां। ये आंकड़े 946 से गिर कर 887 हुए हैं। यहां हम बता दें कि इस अवधि के दौरान प्रति व्यक्ति आय में 10 गुना की वृद्धि हुई है। यह जानकारी हाल ही में जारी की गई सरकारी रिपोर्ट में सामने आई है।

 

जन्म के समय भारत का लिंगानुपात और प्रति व्यक्ति आय, 2005-14

Source: Census of India, Budget 2015-16; *per capita net national income at constant prices in rupees; **base 2011-12

 

पिछले कुछ वर्षों में भारत के बाल लिंग अनुपात या छह वर्ष से नीचे प्रति 1,000 लड़कों के जन्म पर जीवित जन्म लेने वाली लड़कियों की भी संख्या में गिरावट हुई है। वर्ष 2011 में यह आंकड़े 914 थे। यह संख्या स्वतंत्रता के बाद से सबसे कम हैं।

 

भारत का बाल लिंग अनुपात, 1961-2011

Source: Census of India

 

ऐसे समाज जहां बेटों को वरीयता दी जाती है, विशेष रुप से मध्य पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में, जहां समृद्धि में वृद्धि से प्रजनन दर में गिरावट के साथ परिणाम के रुप में विषम लिंग अनुपात भी देखा गया है।

 

इसके पीछे का एक कारण है आय में वृद्धि। इससे साक्षरता दर में वृद्धि हुई और परिवारों के लिए लिंग परीक्षण प्रक्रिया तक पहुंच आसान हुई है। इस संबंध में इंडियास्पेंड ने जून 2015 में विस्तार से बताया है। इस लेख के दूसरे हिस्से में हम बताएंगे कि क्यों लिंग अनुपात में सुधार के लिए महिलाओं को शिक्षित होने के साथ-साथ सशक्त होना भी महत्वपूर्ण है।

 

भारत में प्रति व्यक्ति वर्षिक आय 72,889 रुपए पर है। इसके साथ ही प्रजनन दर ( प्रति महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चों की औसत संख्या) वर्ष 1960 में 5.9 से गिर कर वर्ष 2012 में से 2.5 और वर्ष 2014 में 2.4 हुआ है। लेकिन जन्म के समय इसके लिंग अनुपात में भी गिरावट हुई है।

 

भारत के अलावा अन्य एशियाई देशों में भी यह माना जाता है कि बेटे ही परिवार को आगे बढ़ाते हैं और परिवार के लिए दहेज कमाने के अलावा उत्तराधिकार प्राप्त करते हैं।

 

सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के वर्ल्ड फैक्टबुक के अनुसार वर्ष 2015 में, चीन की प्रति व्यक्ति आय  7,924.7 डॉलर थी, जबकि भारत के लिए यही आंकड़े 1,581.6 डॉलर थे। लेकिन इस साल इसका जन्म के समय लिंग अनुपात 869 होने का अनुमान किया गया है। हम बता दें कि यह 971 के वैश्विक औसत से काफी कम है।

वर्ष 2006 में दक्षिण कोरिया की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय  20.971 डॉलर थी। यह पहले उन कुछ एक देशों में से था, जहां  लिंग परीक्षण तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग से जन्म के समय विषम लिंग अनुपात की रिपोर्ट सामने आई थी।

 

समृद्ध राज्यों में जन्म के समय बद्तर लिंग अनुपात

 

विभिन्न भारतीय राज्यों से प्राप्त आंकड़ों के अध्ययन से बढ़ती आय, गिरता प्रजनन दर और जन्म के समय लिंग अनुपात के बीच की कड़ी स्पष्ट होगी।

 

समृद्ध राज्य लेकिन जन्म के समय बद्तर लिंग अनुपात

Source: Census of India, Sample Registration System Report, Budget 2015-16; per capita income at current prices in rupees for 2013-14

 

भारत के पांच सबसे समृद्ध राज्यों में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। इन राज्यों में कुल प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से कम है। लेकिन, सिक्किम के अपवाद के साथ इन सभी राज्यों में लिंग अनुपात 950 से कम दर्ज किया गया है। वर्ष 2013-14 में, दिल्ली देश का ऐसा दूसरा राज्य था, जहां प्रति व्यक्ति वार्षिक आय सबसे ज्यादा थी। एक व्यक्ति के लिए एक वर्ष में यह आंकड़ा 221219 रुपए का था, लेकिन जन्म के समय में लिंग अनुपात का आंकड़ा 900 के पार नहीं गया है। यहां का लिंग अनुपात 896 है।

 

भारत के नवीनतम राज्य तेलंगना में जन्म के समय लिंग अनुपात ज्यादा है। इस तरह का यह चौथा राज्य है और यहां प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय 95,961 रुपए है। इस आंकड़े के साथ यह राज्य देश के टॉप दस समृद्ध राज्यों में से एक है। हालांकि, इसके कई जिलों में बाल लिंग अनुपात में गिरावट देखी गई है।

 

जिन राज्यों में जन्म के समय उच्च लिंग अनुपात दर्ज किया गया है उनमें से केवल केरल ही ‘टॉप 10’ समृद्ध राज्यों में से है। अरुणाचल प्रदेश में वर्ष 2014 में जन्म के समय लिंग अनुपात देश में सबसे ज्यादा था। यहा यह आंकड़ा 993 का पाया गया। यह राज्य प्रति व्यक्ति आय की सूची में 13 वें स्थान पर है।

 

जन्म के समय उच्च लिंग अनुपात वाले राज्य

 

जन्म के समय 948 के लिंग अनुपात के आंकड़े के साथ केरल की स्थिति अलग है । इसका कारण उच्च साक्षरता दर है। वर्ष 2011 में केरल की साक्षरता दर देश में सबसे अधिक, 93.91 फीसदी थी।

 
भारत में जन्म के समय लिंग अनुपात में लड़की शिशुओं के अनुकूल वाली केवल दो जगह हैं, अंडमान -निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप। यहां के लिए आंकड़े 1,031 और 1,043 दर्ज किए गए हैं।
 

जन्म के समय कम लिंग अनुपात वाले राज्य

Source: Census of India, Budget 2015-16 Sample Registration System Report; per capita income at current prices in rupees for 2013-14

 

प्रति व्यक्ति आय के मामले में हरियाणा और तमिलनाडु तीसरे और पांचवे समृद्ध राज्य हैं। जबकि जन्म के समय लिंग अनुपात के संबंध में इन राज्यों के आंकड़े काफी कम हैं। यह राज्य चौथे और तीसरे स्थान पर हैं।

 

तमिलनाडु में कन्या भ्रूण हत्या के मामलों में वृद्धि हुई है । इसी का परिणाम है कि राज्य के लिंग अनुपात में गिरावट आई है। वर्ष 2005 में 935 पर था, जो गिरकर  वर्ष 2014 में 834 हुआ है। इसी अवधि में इसकी इसकी प्रति व्यक्ति आय चार गुना बढ़ी है।

 

Sources: Census of India, Budget 2015-16 Sample Registration System Report; per capita income at current prices in rupees for 2013-14

 

महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश और त्रिपुरा जैसे राज्यों में कुछ साल के जन्म के समय लिंग अनुपात के अधिकारिक आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं।

 

त्रिपुरा में जन्म के समय लिंग अनुपात में भारी गिरावट हुई है। वर्ष 2013 में 1,055 था जो गिरकर अगले वर्ष 882 हुआ है। नागालैंड में वर्ष 2013 में जन्म के समय लिंग अनुपात 873 था, जबकि वर्ष2014 में यह गिर कर 860 हुआ है। वर्ष 2013 में  मणिपुर में यह आंकड़ा 700 का था, जो कम होकर वर्ष 2014 में 684 पर आ गया।

 

भारत में जनजातीय आबादी परंपरागत रूप से लिंगानुपात में रहती है। लेकिन उच्च जनजातीय आबादी के साथ वाले राज्यों में अब बाल लिंग अनुपात में गिरावट की सूचना मिल रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इस वजह इन समाजों का तथाकथित ऊंची जातियों के तरीके की नकल करना हो सकता है।

 

प्रजनन दर और लिंग अनुपात के बीच की कड़ी

 

जब परिवार कम बच्चे होने का चुनाव करते हैं तो परिवार की महिलाओं पर बेटे को जन्म देने का दबाव ज्यादा हो जाता है। समाचार पत्रिका, इकोनोमिस्ट में मार्च 2010 के लेख में कहा गया है, “आधुनिकीकरण और बढ़ती आय से अपने बच्चों के लिंग के चयन में आसानी हुई है। और इसके अलावा अधिक आय के साथ छोटे परिवारों के लिए बेटे को जन्म देने का विचार और अधिक मजबूत बनता है।”

 

अमेरिका के नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा वर्ष 2006 में प्रकाशित लेख में धन, प्रजनन दर और एक विषम बाल लिंग अनुपात के बीच की कड़ी का पता लगाया गया है: “जब बड़े परिवार का आकार आदर्श है और गर्भनिरोध तक पहुंच सीमित है, तब बेटे को वरीयता का प्रभाव बाल लिंग अनुपात पर कम होता है। क्योंकि ऐसे में मोटे तौर पर लिंग पर ध्यान दिए बगैर बच्चों का जन्म होता है। परिवारों में पुरुष-महिला अनुपात बढ़ने के लिए ऐसे समाज में कन्या भ्रूण हत्या, नवजात लड़कियों का परित्याग, और बेटियों की उपेक्षा की घटनाएं जिम्मेदार हैं।”

 

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कि जन्म के समय लिंग अनुपात विषम हो तब लड़कों के पक्ष में जाता है, जब प्रजनन दर इच्छा से या दबाव में कम होता है। तब “परिवार के आदर्श आकार के भीतर बेटों की वांछित संख्या के लिए अनुमति देने के लिए महिला जन्म रोका जाना चाहिए।”

 

इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि किस प्रकार चीन ने अनिवार्य रुप से एक बच्चे की नीति अपना कर प्रजनन दर कम (2016 में 1.6 रहने का अनुमान) किया है। बेटे की वरीयता के साथ इस  उपाय से जन्म के समय लिंग अनुपात में गिरावट आई है। शहरी इलाकों में लिंग चयन की अनुमति दी गई थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों का गर्भपात या परित्याग नहीं किया जाता है।

 

चीन में जन्म के समय लिंग अनुपात का जिक्र करते हुए 2013 में सीएनएन ने एक रिपोर्ट में बताया कि, “हाल के दशकों में, सस्ते अल्ट्रासाउंड के प्रसार, और सरकार के एक बच्चे की नीति से गर्भपात कराने के साधनों तक आसानी से पहुंच से कन्या भ्रूण हत्या में व्यापक वृद्धि हुई है।”

 

इस श्रृंखला लेख का पहला भाग है। कल दूसरे भाग में हम बताएंगे कि क्यों लड़कियों का शिक्षित होने के साथ-साथ सशक्त होना भी है महत्वपूर्ण।

 

(नायर मुंबई विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और सांख्यिकी में स्नातक है। नायर इंडियास्पेंड से साथ जुड़े हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 20 दिसंबर 2016 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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