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भारत में बुजुर्गों को नहीं मिलता पर्याप्त पेंशन, काम करने को मजबूर

किंजल संपत और नंदिनी डे,

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के निकट एक धान खरीद केंद्र पर धान बेचने के लिए आया हुए एक एक बुजुर्ग किसान। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के मुताबिक भारत के एक तिहाई- करीब 38 फीसदी– बुजुर्गों का काम करना जारी है।

 

कमला देवी ( बदला हुआ नाम ) बुजुर्ग हैं। वह राजस्थान के उदयपुर में एक वन्यजीव अभयारण्य में अंदर बहुत दूर एक आदिवासी गांव लोहारी में रहती हैं। वर्ष 2016 में गर्मियों के दिनों में हमने उनसे एक अध्ययन के हिस्से के रूप में बातचीत की। हमने उनसे बढ़ते उम्र, काम, आमदनी, और पेंशन से जुड़े सवाल किए। जब हम उनके पास पहुंचे तो वह बकरियां चरा रही थीं।

 

पहले ही सवाल पर वह चिढ़ गई। हमने उनसे पूछा कि क्या बूढ़ों के लिए सरकार की गैर-अंशदायी पेंशन योजना का लाभ उन तक पहुंच रहा है? उन्होंने खीझ के साथ बताया कि हालांकि उनको लाभ मिलता है, लेकिन वह लाभ लेना नहीं चाहती हैं।

 

स्थानीय अधिकारियों ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा के तहत उन्हें काम देने से इनकार कर दिया है। उसके बाद से उन्हें योजना के तहत पेंशन के रूप में 500 रुपए प्रति माह का भुगतान किया जा रहा है।

 

कमला देवी की पात्रता को मनरेगा नियमों के स्पष्ट उल्लंघन के रूप में देखा गया।  कमला देवी को अधिकारियों ने सूचित किया गया था कि उन्हें मनरेगा के तहत काम से वंचित करने का कारण पेंशन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह जीवित रहने के लिए काम करना जारी रखना चाहती हैं। इसलिए नहीं कि पेंशन बहुत कम है। उनका कहना है कि कि वह श्रम करने में अब भी सक्षम हैं।

 

अध्ययन के दौरान हम उदयपुर जिले के कोटदा ब्लॉक मुख्यालय भी पहुंचे थे। वहां हमें इरफान के घर जाने का मौका मिला। उनकी उम्र 60 साल के आस-पास है। वह बताते हैं कि अपने जीवन का बड़ा हिस्सा उन्होंने बोझा ढ़ोने के काम में लगाया है। अपनी बुढ़ापे में पुनर्विवाह करने के बाद, इरफान अपनी युवा पत्नी और 10 वर्षीय बेटे के साथ रहते हैं।  उन्होंने कहा कि वह पीठ और मांसपेशियों के दर्द से पीड़ित हैं और अब वो काम नहीं करना चाहते हैं। हालांकि, अपने बेटे की स्कूल की फीस और अपने ही मेडिकल बिल के लिए उन्हें काम करना ही होगा। उनके पास और कोई चारा बचा ही नहीं है। अब उनकी पत्नी ने भी काम की तलाश शुरू कर दी है।

 

अध्ययन के दौरान हम उदयपुर जिले के कोटदा ब्लॉक मुख्यालय भी पहुंचे थे। वहां हमें इरफान के घर जाने का मौका मिला। उनकी उम्र 60 साल के आस-पास है। वह बताते हैं कि अपने जीवन का बड़ा हिस्सा उन्होंने बोझा ढ़ोने के काम में लगाया है। अपनी बुढ़ापे में पुनर्विवाह करने के बाद, इरफान अपनी युवा पत्नी और 10 वर्षीय बेटे के साथ रहते हैं।  उन्होंने कहा कि वह पीठ और मांसपेशियों के दर्द से पीड़ित हैं और अब वो काम नहीं करना चाहते हैं। हालांकि, अपने बेटे की स्कूल की फीस और अपने ही मेडिकल बिल के लिए उन्हें काम करना ही होगा। उनके पास और कोई चारा बचा ही नहीं है। अब उनकी पत्नी ने भी काम की तलाश शुरू कर दी है।

 

कोई आय और सामाजिक सुरक्षा नहीं

 

विश्व भर में सरकार विभिन्न कारणों से पेंशन देती है। हालांकि, वृद्धावस्था पेंशन के पीछे तर्क यह है कि उन लोगों को जिंदगी में सक्षम बनाया जाए जो एक निश्चित उम्र पा चुके हैं, जिससे वे सशुल्क श्रम में संलग्न हुए बिना उचित जीवन स्तर बनाए रख सकें। भारत में  सरकारी सेवा और अन्य कई क्षेत्रों में काम से सेवानिवृत्ति के बाद मासिक पेंशन प्राप्त करते हैं। पर, गैर-औपचारिक क्षेत्र में लोग किसी भी निर्धारित आयु में काम से रिटायर नहीं होते हैं।

 

कार्यबल में बुजुर्गों की भागीदारी व्यापक है, खासकर असंगठित क्षेत्र में जो रोजगार के औपचारिक शर्तों के बिना, अधिकांश भारतीयों को रोजगार देता है।

 

‘राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण’ कार्यालय द्वारा आयोजित रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण 2011-12 के 68 वें दौर के अनुसार, भारत के एक तिहाई बुजुर्गों से अधिक (करीब -38 फीसदी) का काम करना जारी है। जनगणना 2011 में देश में 10.3 करोड़ बुजुर्गों हैं और भारत में वेतन पर काम करने वाले बुजुर्गों की संख्या 3.9 करोड़ है।

 

नई दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज’ (सीईएस) ने अगस्त से अक्टूबर 2016 तक ग्रामीण और शहरी राजस्थान के सात स्थानों में एक अध्ययन का आयोजन किया । हालांकि यह अध्ययन अब तक प्रकाशित नहीं हुआ है। अध्ययन में प्रशिक्षित जांचकर्ताओं ने आय सुरक्षा के बिना बुजुर्ग लोगों के अनुभव को समझने के लिए 55 वर्ष से अधिक आयु के 791 लोगों से बातचीत की। 791 उत्तरदाताओं में से 57 फीसदी महिलाएं और 43 फीसदी पुरुष थे। 59 फीसदी कम से कम लाभकारी नौकरी में लगे हुए थे। क्षेत्रीय जांचकर्ताओं ने तय इलाके के अलग-अलग घरों में जाकर 55 वर्ष से ऊपर के अलग-अलग लोगों से बातचीत की।

 

नौकरी से जुड़े पेंशन या फिर आयकर दाता होने की वजह से जो लोग राज्य के वृद्ध पेंशन के लिए अनुपयुक्त थे, उन्होंने कम और छोटे प्रश्नों का उत्तर दिया, लेकिन उनकी संख्या काफी सीमित थी ( केवल16 व्यक्ति)।

अध्ययन का एक मुख्य निष्कर्ष यह था कि पर्याप्त आय और सामाजिक सुरक्षा की अनुपस्थिति में बुजुर्गों के पास कार्य की प्रकृति, वेतन और क्षेत्र को चुनने का कोई विकल्प नहीं होता है। वे अपनी पसंद से कुछ नहीं कर सकते।

 

काम करने का कम विकल्प

 

अध्ययन में एक सवाल सबसे पूछे गए थे। ऐसी परिस्थिति में जब जीवन यापन के लिए आपको पर्याप्त पेंशन मिलता है, क्या आप:

 

1.पहले की तरह ही काम करेंगे (पर्याप्त पेंशन प्राप्त करने से पहले)

 

2. काम जारी रखेंगे, लेकिन कम काम करेंगे

 

3. बिल्कुल भी काम नहीं करेंगे।

 

क्या पर्याप्त पेंशन मिलने के बाद भी बुजुर्ग काम करना जारी रखेंगे

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Source: Centre for Equity Studies; N=791

 

काम के साथ संबंध में बुजुर्ग उत्तरदाताओं की राय भिन्न थी। एक चौथाई ने कहा कि वे पर्याप्त पेंशन दिए जाने के बाद भी पहले की तरह काम करना जारी रखेंगे।  लगभग आधे लोगों ( 23 फीसदी ) ने कहा कि वे कम काम करेंगे । 25 फीसदी ने कहा कि प्रयाप्त पेंशन मिलने के बाद वे काम ही नहीं करेंगे।

 

जिन लोगों ने कहा कि वे पहले ही जितना काम करना जारी रखेंगे, उनमें से 86 फीसदी ने कहा कि वे फिलहाल काम से जुड़े हुए हैं।  इसके विपरीत, 25 फीसदी ऐसे लोग जिन्होंने कहा कि वे काम नहीं करेंगे,वे वर्तमान में नियमित रूप से फायदेमंद कार्य में लगे हुए थे।

 

वर्तमान में काम से संबंधित और काम जारी रखने का विकल्प

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Source: Centre for Equity Studies; P Value: 0.00, N=599

 

पर्याप्त पेंशन कितना हो? एक अन्य सर्वेक्षण के सवाल ने उत्तरदाताओं से उन मौद्रिक राशि का ब्योरा मांगा गया, जिनसे उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी हो । औसत राशि 1,875 रुपए आई, जो वर्तमान में मासिक पेंशन के तीन गुना अधिक है। जबकि मध्य मूल्य 1500 रुपए थी, जो  वर्तमान मासिक पेंशन का तीन गुना है।

 

पर्याप्तता एक ऐसी अवधारणा है जिसे अकेले मौद्रिक शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता है, फिर भी पूरी तरह से मौद्रिक शब्दों में भी, लोगों ने पेंशन की पर्याप्तता को अलग ढंग से समझा है। ऐसे उत्तरदाता जिन्होंने पहले के जैसा ही काम जारी रखने की बात कही, उन्होंने 1,600 रुपये को “पर्याप्त” पेंशन माना है। यह मौजूदा वृद्धावस्था पेंशन से तीन गुना ज्यादा है। जबकि ऐसे लोग जिन्होंने कहा कि वे पहले के मुकाबले कम काम करेंगे या काम ही नहीं करेंगे, उनके लिए प्रयाप्त पेंशन का मतलब 2,000 रुपए है, जो दिए जाने वाले पेंशन का चार गुना है। जाहिर है, उन्होंने काम करने की अपनी क्षमता के संबंध में पर्याप्तता और पेंशन को पूरक के रूप में देखा।

 

इसी समय में, पर्याप्त रुप से 2,000 रुपए प्रति माह उल्लेखित पेंशन राशि मौजूदा न्यूनतम मजदूरी से आधी है और राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय से चार गुना कम है।

 

जेंडर का भी मामला है!

 

काम जारी रखने के संबंध में पुरुष और महिला उत्तरदाताओं की प्रतिक्रिया में एक बड़ा अंतर था।
 

महिला उत्तरदाताओं (26 फीसदी) की तुलना में पुरुष उत्तरदाताओं (36 फीसदी) ने प्रयाप्त पेंशन मिलने पर कम मात्रा में काम करने की बात कही है।

हालांकि एक तिहाई से अधिक पुरुषों और महिलाओं के अनुपात ने कहा कि वे पेंशन के बावजूद काम करना जारी रखेंगे।  पुरुषों ( 28 फीसदी ) की तुलना में अधिक महिलाएं (36 फीसदी) ने कहा कि वे बिल्कुल भी काम नहीं करेंगे।

 

लिंग अनुसार काम जारी रखने का विकल्प

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Source: Centre for Equity Studies; P Value: 0.01, N=599

 

पर्याप्त पेंशन मिलने पर महिलाओं के मुकाबले वृद्ध पुरुषों में कम से कम काम करने की संभावना अधिक होती है और ऐसे लोगों में से अधिकतर वेतन पर काम करने वाले नहीं हैं।

 

भारत में आमतौर पर वेतन पर काम करने वाली महिलाओं की भागीदारी कम है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक वर्तमान में ये आंकड़े लगभग 25 फीसदी हैं।ए. भीमेश्वर रेड्डी द्वारा सामाजिक अर्थशास्त्र के अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, 60 साल की उम्र से अधिक महिलाओं के लिए ये आंकड़े और भी कम हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि इसके पीछे का कारण पुरुषों के मुकाबले तुलना में वेतन पर काम करने वाली महिलाओं के संबंध ज्यादा जटिल हैंश्रम के व्यापक लिंग आधारित विभाजन के कारण महिलाएं अलग-अलग मोर्चों पर काम करती हैं। कार्यस्थल पर फायदेमंद कामों में योगदान देती हैं और अक्सर पुरुषों के काम की तुलना में कम मौद्रिक मूल्य और घर पर गैर-लाभकारी काम में योगदान देती हैं।

 

सीईएस ने पाया कि इस अध्ययन में  यह समझना मुश्किल है कि महिलाएं जब कहती हैं कि वे बिल्कुल भी काम नहीं करेंगी, इससे उनका क्या मतलब है। महिलाओं के लिए, जिनके श्रम को कई तरह से अनदेखा किया जाता है, स्वयं द्वारा सेवानिवृत्ति एक भ्रामक अवधारणा है।

 

पेंशन एक ताकत

 

पर्याप्त पेंशन के बिना एक ऐसी स्थिति की कल्पना करना असंभव है जिसमें बुजुर्ग के पास यह विकल्प हो कि वह काम करे या नहीं। बुजुर्गों के लिए जिंदगी जीने का एक सम्मानित मानक सुनिश्चित करने के लिए समय पर और पर्याप्त पेंशन अनिवार्य है।

 

‘काम करें या न करें’, यह विकल्प उन लोगों के लिए अस्तित्व में है जो अपनी नौकरी से रिटायर होने के बाद पेंशन प्राप्त करते ही हैं। यह विकल्प सभी बुजुर्ग लोगों के लिए इस देश में हो।

 

टिप्पणियां:

 

  • यह अध्ययन राजस्थान में आस्था संस्थान, उन्नत्ति और मजदूर किसान शक्ति संगठन, राजस्थान की साझेदारी के साथ आयोजित किया गया था। वृद्धावस्था पेंशन पर अधिक विस्तृत चर्चा सीईएस और योडा प्रेस द्वारा मई 2017 में जारी होने वाली  ” इंडिया एक्सक्लूशन रिपोर्ट 2016″ में पाया जा सकता है।
  • कमला देवी बदला हुआ नाम है। उनकी पहचान छुपाने के लिए ऐसा किया गया है।

 

(संपत शोधकर्ता हैं और दिल्ली में रहते हैं। डे  नई दिल्ली के इक्विटी स्टडीज सेंटर के साथ जुड़े शोधकर्ता हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 20 अप्रैल 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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