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भारत में महिलाओं के विवाह में यौन अधिकारों के लिए प्रगतिशील रुख में गिरावट

एलिसन सलदानहा,

 

लैंगिक हिंसा के खिलाफ #Me आंदोलन ने विश्व स्तर पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। भारत में( दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाला देश ) वर्ष 2016 की समाप्ति के दशक में  सहमति के संबंध में सकारात्मक दृष्टिकोण और पुरुषों के बीच सुरक्षित सेक्स में 7 प्रतिशत अंकों की गिरावट आई है। यह जानकारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2015-16 (एनएफएचएस -4) और 2005-06 (एनएफएचएस -3) डेटा पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आई है।

 

पुरुषों में, महिलाओं और विवाह में उनके यौन अधिकार के प्रति प्रगतिशील रुख वर्ष 2005-06 में 70.3 फीसदी से घटकर 2015-16 में 63 फीसदी हुआ है। पिछले एक दशक से 2015-16 तक, महिलाओं में इसमें 1 फीसदी से भी कम की वृद्धि हुई है, यानी यह आंकड़े 2005-06 में 67.5 फीसदी से अब 68.4 फीसदी हुए हैं।

 

वर्तमान में, छह महिलाओं में से एक (16.9 फीसदी) का मानना ​​है कि पत्नी का अपने पति के साथ सेक्स करने से इनकार करना न्यायसंगत नहीं है, भले ही उसे यौन संचारित बीमारी हो, या अगर उसके पास कई यौन साझेदार हों या अगर वह थकी हुई या मूड में न हो । छह में से एक से कम पुरुषों का भी ऐसा ही मानना है, जैसा कि आंकड़ों से पता चलता है।

 

एक शादी में महिलाओं के यौन अधिकारों पर पुरुषों के लिए आगे के प्रश्नों से पता चलता है कि करीब 10 में से एक का मानना है कि पुरुष अपनी पत्नियों पर खुद को मजबूर कर सकते हैं, जबकि 8.9 फीसदी ने महसूस किया कि एक पत्नी का इनकार करना, अतिरिक्त विवाहेतर यौन संबंधों का संकेत देते हैं।

 

भारत में, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा सबसे ज्यादा उन व्यक्तियों द्वारा की जाती है जिनके साथ उनका अंतरंग रिश्ता होता है। एनएफएचएस -4 के आंकड़ों में बताया गया है। ‘कभी विवाह की हुई’ महिलाओं, ( 15-49 वर्ष की आयु के बीच, जिन्होंने कम से कम एक बार विवाह किया हो और भले ही वे अब अकेली हों ) जिन्होंने कभी यौन हिंसा का अनुभव किया है, 83 फीसदी ने अपने वर्तमान पति और 9 फीसदी ने अपने पूर्व पति के दोषी होने की बात कही है।

 

यौन संबंध पर महिलाओं को मिलने वाला नियंत्रण केवल उनके सशक्तिकरण का संकेत नहीं है, बल्कि जनसांख्यिकीय और स्वास्थ्य परिणामों के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ भी हैं, जैसा कि एनएफएचएस की रिपोर्ट में बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह सामाजिक मापदंडों में महिलाओं की उस स्वीकृति को भी मापता है, जिसके तहत अब तक वह इसी दवाब में जीती रही थी कि वह किसी भी स्थिति में अपने पति के साथ यौन संबंध को मना नहीं कर सकती है।

 

यौन रोग, व्यभिचार, थकावट पति सेक्स से इनकार करने का कारण नहीं हो सकता

 

हमारे विश्लेषण के दूसरे भाग के लिए, हमने महिलाओं (16.9 फीसदी) और पुरुषों (14.7 फीसदी) के अनुपात पर ध्यान केंद्रित किया है, जिन्होंने सर्वेक्षण में कहा है कि पत्नियों को अपने पति के यौन संबंधों से इंकार नहीं करना चाहिए, भले ही उनके पास एसटीडी है, कई यौन साथी हैं या वे थकी हुई / मूड में नहीं महसूस कर रही हैं।

 

एक दशक से 2015-16 तक, ऐसी महिलाओं ( 15-49 वर्ष की उम्र ) का प्रतिशत, जिनका मानना है कि पत्नियों को उनके पति के साथ यौन संबंध बनाने से इंकार नहीं करना चाहिए, उनमें चार प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है। यानी यह आंकड़े 2005-06 में 13.1 फीसदी से बढ़ कर 16.9 फीसदी हुआ है। ऐसा ही मानने वाले पुरुषों के अनुपात में करीब 6 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है।

 

सहमति और सुरक्षित यौन संबंध पर नजरिया: तब और अब

Source: National Family Health Surveys 2015-16 & 2005-06

 

आंकड़ों से पता चलता है कि, युवा महिलाओं के अपने पति के यौन संबंध को अस्वीकार करने के पत्नी के अधिकार से असहमति होने की संभावना अधिक थी। इस तरह से महसूस करने वाली महिलाओं का सबसे बड़ा प्रतिशत (22.3 फीसदी) 15 से 1 9 वर्ष की उम्र के बीच था।

 

ऐसी महिलाएं जो मानते थे कि पत्नियां सेक्स से रोक सकती हैं, उनमें से ज्यादातर 25-29 साल (71.3 फीसदी) और 20-24 वर्ष (70.9 फीसदी) के आयु वर्ग की थीं। 2015-16 में कभी विवाहित नहीं हुई महिलाओं की विपरीत दृष्टिकोण रखने की संभावना रही है। 2005-06 में भी कुछ ऐसा ही मामला रहा है। गैर-मूल घरेलू संरचनाओं (13.7 फीसदी) की तुलना में मूल परिवार में अधिक महिलाएं (15.4 फीसदी) अधिक प्रतिगामी विचार साझा किए।

 

अशिक्षित महिलाएं (17.2 फीसदी) और ऐसी महिलाएं जो सबसे कम संपदा स्तर (15.8 फीसदी) से संबंधित हैं, वैवाहिक यौन संबंध में लिंग समानता पर प्रतिगामी विचार रखने की संभावना महिलाओं के उच्चतम प्रतिशत का गठन करती हैं।

 

पुरुषों में, सहमति और सुरक्षित सेक्स के प्रति इस रवैये प्रति 15-19 वर्ष (19.3 फीसदी) के सबसे कम आयु वर्ग के लोग, अशिक्षित (17.2 फीसदी), कभी-विवाहित नहीं (17 फीसदी), मूल परिवार संरचनाओं (15.4 फीसदी) से जुड़े और धन सूचकांक पर सबसे कम समूह से संबंधित लोगों की उच्च हिस्सेदारी है।

 

एक दशक से 2006-16 तक, अविवाहित पुरुषों (17 फीसदी) और वर्तमान में विवाहित पुरुषों (13.1 फीसदी) के बीच शादी में महिलाओं के यौन अधिकारों के प्रति दृष्टिकोण लगभग 6 प्रतिशत अंक (क्रमशः 11.1 फीसदी और 7.8 फीसदी से) की गिरावट आई है।

 

सिख, जैन शादी में यौन सहमति के लिए सबसे सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं

 

ईसाई (21.3 फीसदी) और हिंदू (17.2 फीसदी) महिला उत्तरदाताओं का सबसे ज्यादा अनुपात था, जिन्होंने महसूस किया कि एक महिला को तीन कारणों से अपने पति से साथ यौन संबंध बनाने से इनकार करना उचित नहीं है, जैसा कि एनएफएचएस के आंकड़े बताते हैं। 2005-06 के आंकड़ों में भी ज्यादा अंतर नहीं पाया गया है। आंकड़ों के अनुसार, ने महिलाओं की यौन सहमति के बारे में सबसे सकारात्मक रुख सिख (91.7 फीसदी) और जैन (80.2 फीसदी) महिलाओं ने दिया है।

 

इसी प्रकार पुरुषों में, ईसाई (16.5 फीसदी) और हिंदुओं (15 फीसदी) में सबसे ज्यादा प्रतिशत पुरुषों ने महिलाओं के अपने पति के साथ यौन संबंध बनाने से मना करने के अधिकारों से असहमती जताई है। 2005-06 में, इस तरह के विचार रखने वाले सबसे बड़े समूह ईसाई (12.4 फीसदी) और मुस्लिम (10.9 फीसदी) पुरुष थे।

 

सहमति और सुरक्षित सेक्स के प्रति पुरुषों का रुख ( धर्म के अनुसार )

Source: National Family Health Surveys 2015-16 & 2005-06

 

वैवाहिक यौन संबंध पर कम शहरी पुरुषों के विचार अब प्रगतिशील हैं

 

2015-16 में शहरी और ग्रामीण इलाकों में पुरुष और महिलाएं सहमति और सुरक्षित सेक्स पर काफी हद तक समान विचार रखते हैं। शहरी इलाकों में पुरुषों के बीच एक तेज  अधिकता में गिरावट देखी गई। शहरी भारतीय पुरुष, जो ऐसा समझते हैं कि महिलाओं का अपने पति के साथ यौन संबंध बनाने के लिए इंकार करना उचित नहीं है, उनका प्रतिशत, 2015-16 में 2005-06 की तुलना में 7.2 प्रतिशत अंक अधिक रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में, इस तरह के विचार रखने वाले पुरुषों में 5 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है।

 

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सहमति और सुरक्षित सेक्स के प्रति रुख

Source: National Family Health Surveys 2015-16 & 2005-06

 

शहरी क्षेत्रों की महिलाएं, जो इस आधार पर यौन संबंध बनाने से इनकार करने के महिलाओं के अधिकारों से असहमत हैं, उनका प्रतिशत 2005-06 से 5.1 फीसदी बढ़ा है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धि दर तीन प्रतिशत अंक रहा है।

 

अब अधिक पुरुष मानते हैं कि यौन संबंध बनाने से इनकार करने के लिए पत्नियों को दंडित किया जाना चाहिए

 

एनएफएचएस सर्वेक्षण में लिंग के समानतावादी दृष्टिकोणों का आकलन करने के लिए पुरुषों के लिए अतिरिक्त प्रश्न भी शामिल किए गए हैं।

 

सहमति या इसके अभाव के माहौल को समझने के लिए, लोगों से पूछा गया: यदि एक औरत अपने पति के साथ यौन संबंध रखने से इनकार करती है, तो क्या उसे 1) गुस्से में आना और उसे फटकारने का अधिकार है; 2) उसकी वित्तीय सहायता से मना करना चाहिए; 3) उस पर जबरदस्ती करनी चाहिए; और 4) अतिरिक्त-वैवाहिक संबंध है।

 

हालांकि, 77.6 फीसदी पुरुषों का मानना ​​है कि पत्नी के इनकार करने पर चार प्रतिक्रियाओं में से किसी को चुनना औचित्य नहीं है, जो चारों विकल्पों के साथ सहमत हैं, उनका प्रतिशत में 3.7 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है, यानी यह आंकड़ा 2005-06 में 1.1 फीसदी से बढ़कर 2015-16 में 4.8 फीसदी हुआ है।

 

एक पांचवे ( 17.6 फीसदी ) पुरुषों ने पहले उल्लेख किए गए तीन आधारों पर यौन संबंध बनाने से इंकार करने वाली महिलाओं पर क्रोध और झुंझलाहट को उचित बताया है। इसके अलावा, 9.2 फीसदी लोगों ने अपनी पत्नियों पर जबरदस्ती संबंध बनाने और 8.9 फीसदी ने यह महसूस किया कि वे अतिरिक्त विवाहेतर यौन संबंधों को उचित ठहराते हैं। करीब 10.5 फीसदी ने सहमति व्यक्त की कि यदि पत्नियों ने तीन कारणों के लिए सेक्स करने के लिए सहमति नहीं दी है, तो वे वित्तीय सहायता को वापस ले सकते हैं।

 

संपत्ति सूचकांक के दूसरे उच्चतम स्तर (या चौथे क्विंटल) में ऐसे पुरुषों की संख्या सबसे ज्यादा है जिन्होंने सभी चार प्रतिक्रियाओं को उचित ठहराया है। यह यौन सहमति पर अन्य मापदंडों से एक प्रस्थान है जहां सबसे कम क्विंटल की आबादी नकारात्मक रुख में सबसे अधिक हिस्सेदारी रखती है। एक दशक पहले, संपत्ति के सूचकांक के तीसरे क्विंटिल से जुड़े लोग ऐसी सोच रखने वाले सबसे अधिक (1.4 फीसदी) थे।

 

संपत्ति सूचकांक के अनुसार यौन संबंध से इंकार करने वाली महिलाओं पर पुरुषों के अधिकार के प्रति पुरुषों का रुख

Source: National Family Health Surveys 2015-16 & 2005-06

 

वर्तमान में विवाहित पुरुषों के बीच सबसे बड़ा हिस्सा (5.1 फीसदी) था, जिन्होंने महसूस किया था कि उन्हें नाराज और फटकार (18 फीसदी), वित्तीय सहायता (10.7 फीसदी) को वापस लेने, सेक्स के लिए बल (9.4 फीसदी) का उपयोग करने या पत्नी का सेक्स के लिए इंकार करने पर दूसरी महिला के साथ यौन संबंध रखने का अधिकार है।

 

25-29 आयु वर्ग के पुरुष नियंत्रित करने के व्यवहार के पक्ष में अधिक

 

मापदंडों के पार, अधिकांश पुरुष, जो सभी चार व्यवहारों के साथ सहमत थे, वे 40-49, 30-39 और 20-24 के आयु समूह में थे। पुरुषों का सबसे अधिक प्रतिशत, जो पत्नी की सहमति न होने पर बल के उपयोग पर सहमत हुए, वह 25-29 साल (5.6 फीसदी) के आयु वर्ग के लोग थे।

 

ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले अधिक शहरी पुरुषों ने चार व्यवहारों के साथ सहमति व्यक्त की, लेकिन दोनों समूहों के बीच का अंतर छोटा है। संयुक्त परिवार संरचनाओं के मुकाबले मूल परिवार के पुरुषों ने इस व्यवहार को अधिक समर्थन दिया है।

 

मुस्लिम (5.1 फीसदी), सिख (5.1 फीसदी), और हिंदू (4.9 फीसदी) पुरुष सभी चार व्यवहारों के लिए सबसे ज्यादा सहमत हुए। 2005-06 में, सिख (3.2 फीसदी) और जैन (1.3 फीसदी) पुरुषों ने इस संबंध में सबसे ज्यादा प्रतिशत का आयोजन किया।

 

अधिक मुस्लिम (10 फीसदी) और हिंदू (9.2 फीसदी) पुरुष पत्नी के असहमत होने पर भी जबरन सेक्स के पक्ष में थे। यौन संबंध के लिए पत्नी के इंकार पर पत्नियों के लिए वित्तीय सहायता वापस लेने की कार्रवाई के साथ इनकी संख्या भी सबसे ज्यादा, 11.8 फीसदी और 10.5 फीसदी रही है। हालांकि, ईसाई पुरुष सबसे बड़ा समूह थे, जो अभी भी महिलाओं की सहमति और विवाह के सुरक्षित सेक्स के प्रति अपरिवर्तनीय दृष्टिकोण की रिपोर्ट करते हैं, जैसा कि हमने कहा, जैनियों (1.3 फीसदी) के बाद, सभी चार व्यवहारों को उचित ठहराने वालों की संख्या सबसे कम (3.3 फीसदी ) थी।

 

फिर भी, पत्नी द्वारा यौन संबंध बनाने से इंकार करने पर दूसरी महिला के साथ संबंध बनाने को उचित ठहराने वाले सबसे ज्यादा संख्या ईसाई पुरुषों ( 11.4 फीसदी ) की रही है। इस संबंध में दूसरे स्थान पर मुस्लिम ( 9.3 फीसदी ) रहे हैं। स्कूली शिक्षा का स्तर का प्रभाव पुरुषों के व्यवहार पर बहुत कम था। 8-9 वर्ष की स्कूली शिक्षा के साथ पुरुषों के सभी चार दृष्टिकोण के साथ सबसे कम हिस्सेदारी ( 3.9 फीसदी ) रही है।

 

शिक्षा के स्तर के अनुसार यौन संबंध से इंकार करने वाली महिलाओं पर पुरुषों के अधिकार के प्रति पुरुषों का रुख

Source: National Family Health Surveys 2015-16 & 2005-06

 

(सलदानहा सहायक संपादक हैं और इंडियास्पेंड के साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 24 जनवरी, 2018 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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