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भारत में लगातार गर्म होते मौसम के साथ बढ़ती जाएगी किसानों की आत्महत्याएं, एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने दी ‘त्वरित’ कार्रवाई की सलाह

चारु बाहरी,

 

भारत के खेतों में, गर्मी के मौसम में 20 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर हर एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि 67 आत्महत्याओं का कारण बनती है।   वर्ष 1980 से अब तक जलवायु परिवर्तन के कारण 59,300 आत्महत्याएं हुई हैं। यह जानकारी संयुक्त राज्य अमरीका के ‘कैलिफोर्निया-बर्कले यूनिवर्सिटी’ में कृषि संसाधन अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट छात्र तम्मा कार्लेटन द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में सामने आई है।

 

अत्यधिक गर्मी के कारण होने वाले फसलों की नुकसान से  सालाना उपज में 0.5 फीसदी की गिरावट आई है। जुलाई, 2017 में एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, गर्मी बढ़ने वाले मौसम में दिन तापमान 18 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस तक गया है।

 

इसका निष्कर्ष यह है कि होने वाले इन नुकसानों से किसानों के आत्महत्याओं के मामलों में वृद्धि होती है। यह समस्या भारत में नीति निर्माताओं के लिए तत्काल रुप से कार्रवाई करने का संकेत देती है, क्योंकि तम्मा कार्लेटन को कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं कि भारतीय किसानों ने बढ़ते तापमान के लिए अपने को कुछ भी अनुकूलित नहीं किया है। हम बता दें कि कार्लेटन ने भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो, कृषि फसल की पैदावार और हाई-रिजाल्यूशन  क्लाइमिट के आंकड़ों से आत्महत्याओं के डेटा का इस्तेमाल किया है।

 

29 वर्षीय कार्लेटन ने ई-मेल के जरिए इंडियास्पेंड को बताया कि,“अनुकूलन अब एक प्राथमिकता है। जलवायु परिवर्तन अब पसर चुका है।” वर्ष 2050 तक, भारत का औसत तापमान 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ने का अनुमान है, जिसके परिणामस्वरूप देश अब तक के सबसे कठिन अनुभव से गुजरेगा।  

 

कार्लेटन बताती हैं कि अनुकूलन के बिना, भारत में किसानों की आत्महत्या महामारी की तरह फैलेगा और हजारों लोगों की जिंदगी तबाह हो जाएगी।”

 

कार्लेटन एक अमेरिकी कृषि परिवार से हैं और एक ऐसे ग्रामीण समुदाय में बड़ी हुई हैं जहां भोजन मुख्य रूप से खेतों से मिलता था, इसलिए कृषि को लेकर उनका अनुभव अपेक्षाकृत ज्यादा है। कार्लेटन कहती हैं कि उनका अध्ययन वैश्विक खाद्य प्रणाली, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय परिवर्तन सहित उसके दिल के करीब वाले विषयों को छूता है।

 

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संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया-बर्कले विश्वविद्यालय में कृषि और संसाधन अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट छात्र- तम्मा कार्लेटन।

 

कार्लेटन ने ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से ‘इन्वाइरन्मेनल चेंज एंड मैनेजमेंट एंड इकोनोमिक्स’ में स्नातकोत्तर किया है। यहां उन्हें विकास अर्थशास्त्र में उनके काम के लिए ‘जॉर्ज वेब मेडले’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने ‘यूएस फेडरल ट्रेड कमिशनस ब्यूरो ऑफ इकोनोमिक्स’ के साथ रिसर्च एनालिस्ट के रुप में भी काम किया है। भारत में किसानों की आत्महत्या पर उनसे विस्तार से बातचीत।

 

वैश्विक स्तर पर होने वाले आत्महत्याओं की घटनाओं में से पांचवां हिस्सा भारत में होता है। वर्ष 1980 के बाद से भारत में आत्महत्या की दर दोगुनी हो गई है, और आत्महत्याओं में समग्र वृद्धि में 6.8 फीसदी का कारण जलवायु परिवर्तन का माना जाता है। भारत में होने वाली आत्महत्याओं की संख्या में जलवायु परिवर्तन को आप किस तरह से देखती हैं?

 

मैं दो कारणों के लिए 6.8 फीसदी मान को महत्वपूर्ण संख्या देखती हूं। सबसे पहले, जलवायु परिवर्तन अभी पसरना शुरू हुआ है । 1980 के बाद से होने वाली गर्मी, आने वाले दशकों में होने वाले अनुमानों की तुलना में बहुत कम है। इसलिए, भविष्य में गर्मी के कारण होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि होने की आशंका है। क्योंकि भारत की आबादी इतनी ज्यादा है और आत्महत्या की दर अपेक्षाकृत अधिक है, कुल विकास दर में 6.8 फीसदी का योगदान करने का मतलब है कि जलवायु परिवर्तन ने कई हजार लोगों के जीवन को तबाही की ओर धकेला है। प्रभावित किया है। आत्महत्या के द्वारा जीवन का नाश सदमा देने वाला है। तथ्य यह है कि 59,000 से अधिक जीवन जलवायु परिवर्तन की भेंट चढ़ गए। इसलिए जलवायु शमन और अनुकूलन नीति पर तत्काल ढंग से बहुत कुछ करने की जरूरत है।

 

आपने पाया कि 20 डिग्री तापमान के ऊपर 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि, रोजाना 67 आत्महत्याएं होती हैं । आपने यह भी पाया कि हर साल 1 सेंटीमीटर तक की बढ़ती मौसम की वर्षा, आत्महत्या की दर में औसतन 7 फीसदी की गिरावट के साथ जुड़ा था। ये दो प्रमुख जलवायु निर्धारक तापमान और वर्षा को कृषि उपज और आत्महत्याओं के साथ आप किस तरह से जोड़ कर देखती हैं?

 

मैंने प्रभावित करने वाली दोनों चीजें, तापमान और वर्षा को देखा है जो कि भारत और दुनिया में कृषि उपज को प्रभावित करते हैं। मैंने पाया कि तापमान और वर्षा, दोनों आत्महत्या दर को प्रभावित करते हैं। सामान्य तौर पर यह पता चलता है कि आत्महत्या की बढ़ती दर के लिए तापमान बड़ा कारक है, वर्षा नहीं। दुनिया के कई हिस्सों से फसल की पैदावार पर अध्ययन बताता है कि फसलें बारिश के मुकाबले तापमान से अधिक प्रभावित होती हैं।

 

आपने कहा कि “मुझे कोई सबूत नहीं मिल रहा है कि अनुकूलन, बढ़ती आय या अनुकूलन के अन्य अप्रत्यक्ष संचालक उत्पन्न हो रहे हैं।” किस आधार पर आपने निष्कर्ष निकाला था कि भारतीय किसानों ने बढ़ते तापमान को समायोजित करने के लिए अपनी प्रथाओं को नहीं बदला है? कौन सी प्रथाएं और अन्य हस्तक्षेप खेती करने वाले परिवारों को गर्म जलवायु के लिए अनुकूल बना सकते हैं?

 

इसमें ऊष्मीय तापमान के खिलाफ पैदावार और खेती की आय के संरक्षण के लिए खेत-आधारित समाधानों में गर्मी प्रतिरोधी फसल किस्मों की ओर किसानों का जाना या अनिश्चित वर्षा से निपटने के लिए सिंचाई प्रौद्योगिकियों में निवेश करना शामिल है। जलवायु में उतार-चढ़ाव से आर्थिक उतार-चढ़ाव का एक रिश्ता है। इससे बचने के लिए फसल बीमा का उपयोग करना जरूरी है। साथ ही ग्रामीण बाजारों का निर्माण सही ढंग से हो, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है, जहां से किसान कम ब्याज वाले ऋण का लाभ उठा सकते हैं। कर्ज भार किसानों को असहनीय बनाता है। इस तरह के हस्तक्षेप बड़ते पारे के कारण होने वाली आत्महत्याओं के मामले को कम कर सकते हैं। हालांकि, इन रणनीतियों की संभावित सफलताएं अच्छी तरह से मुझे ज्ञात नहीं हैं क्योंकि मेरे पास इन व्यक्तिगत रणनीतियों की जांच करने के लिए पर्याप्त डेटा नहीं है, और न ही मैंने सीधे परीक्षण किया है । जानने की जरूरत यह है कि क्या परिवार सचमुच बदलते माहौल के जवाब में कुछ विशेष विकल्प बना रहे हैं? यह साक्ष्य देखना जरूरी है कि कुछ परिवारों के लिए अनुकूली उपाय आत्महत्या पर तापमान के प्रभाव को कम कर रहे हैं, या नहीं? मैंने मूल्यांकन किया कि किस प्रकार तापमान और आत्महत्या के बीच के संबंध भारत के भीतर विभिन्न बिंदुओं पर और अलग-अलग आबादी में भिन्न होता है। मुझे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला।

 

विभिन्न औसत आय वाले राज्यों में तापमान और आत्महत्या के बीच समान संबंध देखा गया है। 47 वर्षों के आंकड़ों का मैंने विश्लेषण किया है और पाया कि भारत धीरे-धीरे गर्म हुआ है, जबकि देश ने मजबूत आर्थिक विकास का अनुभव भी किया है। इसके बावजूद, तापमान और आत्महत्या के बीच का रिश्ता हाल के वर्षों में लगभग समान है। इससे पता चलता है कि बढ़ती आय, धीरे-धीरे गर्म होता मौसम, और भारत की विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था ने आत्महत्या पर तापमान के छोटे प्रभावों को परिवर्तित नहीं किया है या कम नहीं किया है।

 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से मिले आंकडों का जो इस्तेमाल मैंने किया है, उनमें अधिकांश में किसानों और अन्य व्यवसायियों के बीच कोई फर्क नहीं है। केवल हाल के वर्षों में व्यवसाय, लिंग और अन्य जनसांख्यिकी दर्ज किए गए हैं। इसलिए, मेरा विश्लेषण आत्महत्या पर तापमान के प्रभाव पर महज एक अनुमान बताता है, वह व्यवसाय के फर्क के बिना औसतन पूरी आबादी पर केंद्रित है। लेकिन वास्तव में अगर किसान और कृषि श्रमिक ,अन्य व्यवसायियों के मुकाबले जलवायु से ज्यादा प्रभावित होते हैं, तो मेरा अनुमान सही दिशा में जाता है, जो कि इन कमजोर आबादी पर लागू होता है।

 

आपका अध्ययन निर्णायक रूप से साबित करता है कि गर्म दिनों में आत्महत्याओं में वृद्धि का कारण, तंत्रिका तंत्र पर गर्मी के प्रभावों के कारण आक्रामक व्यवहार नहीं है।आपने अपने अध्ययन के मॉडल में जलवायु परिवर्तन को शामिल किया है। जिसका अर्थ है कि पिछले पांच वर्षों में उच्च बढ़ते मौसम के तापमान में आत्महत्या की दर में जोरदार वृद्धि हुई है और उच्च बढ़ती मौसम के कारण आने वाले दो से तीन वर्षों में आत्महत्या की दर कम हो जाती है। क्या आप इस आशय की व्याख्या कर सकती हैं?

 

मैंने आत्महत्याओं पर तापमान का एक महत्वपूर्ण संचयी सकारात्मक प्रभाव पाया है अतिरिक्त वर्षा का एक महत्वपूर्ण नकारात्मक संचयी प्रभाव पाया है। इस वर्ष के बढ़ते मौसम के दौरान उच्च तापमान भविष्य में पांच साल तक उच्च आत्महत्या की दर का कारण बनता है, जबकि भारी बारिश आत्मघाती दर को भविष्य में दो से तीन साल तक कम करने का कारण बानता है।

 

इन मध्यम प्रभावों की गणना के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विधि से पता चलता है कि अपेक्षाकृत उच्च वर्षा का एक वर्ष, दो साल बाद तक आत्महत्या की दर लगभग 4 फीसदी कम करता है। अगर जलवायु परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से बायोफिजिकल चैनलों के जरिये आत्महत्या के प्रसार को प्रभावित कर रहे हैं तो यह विलंबित प्रभाव नहीं निकलेगा। अगर अच्छी वर्षा या अच्छे तापमान से लाभकारी उपज है, जिससे व्यक्तियों को फसलों और आय को बचाने में मदद मिलती है, जिससे भविष्य की आत्महत्या कम हो जाती है।

 

आपने देखा कि चार दक्षिणी राज्यों- आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल, – जो आम तौर पर उत्तर की तुलना में गर्म हैं, वहां 1967 और 2013 के बीच आत्महत्याओं में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। इसके विपरीत,  इसी अवधि के दौरान, उत्तरी राज्यों में आत्महत्या की दर काफी हद तक स्थिर बनी हुई है। दक्षिणी राज्यों में आत्महत्या की दर उत्तरी राज्यों की तुलना में अब छह गुना अधिक है। क्या दक्षिण में आत्महत्या की दर में वृद्धि दर्शाती है कि उन राज्यों की उपज उच्च तापमान के प्रति अधिक संवेदनशील है?

 

विश्लेषण किए गए 47 वर्षों के आंकड़ों में मैंने पाया कि कुछ उत्तरी राज्यों में आत्महत्या दर प्रति 100,000 व्यक्तियों पर 5 से कम बनी हुई है। जबकि कुछ दक्षिणी राज्यों में आत्महत्या की दर प्रति 100,000 पर 10 से बढ़ कर प्रति 100,000 पर 30 तक हुआ है। समय के साथ आत्महत्या की दर में ये बढ़ोतरी आंशिक रुप से केवल गर्म वातावरण के रूप से होती हैं। राष्ट्रीय आत्महत्या दरों में कुल वृद्धि दर का लगभग 6.8 फीसदी, गर्म जलवायु के कारण होता है। दक्षिण में आत्महत्या की दर में बढ़ोतरी का कारण गर्म वातावरण के कारण हुआ है, हालांकि अन्य कई कारक समय के साथ आत्महत्या की दर में परिवर्तन करते हैं।

 

ऐसा क्यों है कि आपको अत्यधिक वर्षा- सूखा या भारी वर्षा (बाढ़) और आत्महत्या की दर के बीच मजबूत संबं

 

सांख्यिकीय महत्व की यह कमी इस तथ्य के कारण हो सकती है कि मैंने जलवायु स्तर को राज्य स्तर पर एकत्रित किया है। चूंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो स्थानीय ढांचे में वार्षिक आत्महत्या के मामले एकत्र करता है। राज्य स्तर पर मानसून की वर्षा का आकलन गलत भी हो सकता है, क्योंकिक्योंकि मानसून के आगमन और निकासी में महत्वपूर्ण अंतर हो सकता है। मैंने निष्कर्ष निकाला कि बढ़ती मौसम के महीनों के दौरान बारिश आत्महत्या की दर पर नकारात्मक प्रभाव डालती है, लेकिन उच्च अनिश्चितता के साथ।

 

मैंने निष्कर्ष निकाला कि बढ़ती मौसम के महीनों के दौरान बारिश आत्महत्या की दर पर नकारात्मक प्रभाव डालती है । सांख्यिकीय मॉडल औसत प्रभाव का अनुमान लगाया जाता है, साथ ही उस औसत के आसपास अनिश्चितता बनी हुई रहती है। अनिश्चितता का मतलब है कि उपलब्ध आंकड़ों में अनुमानित अनुमान से एक कारक का दूसरे पर प्रभाव अधिक या कम हो सकता है। इस संदर्भ में, वर्षा के प्रभाव में उच्च अनिश्चितता का अर्थ है कि वर्षा और आत्महत्या के बीच का वास्तविक संबंध, मेरे द्वारा उपलब्ध सीमित आंकड़ों का उपयोग करके अनुमानित अनुमान से काफी हद तक अलग हो सकता है। सच यह है कि मुझे सूखा का सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं दिखता है, और आमतौर पर मेरे वर्षा के अनुमानों में अनिश्चितता है , लेकिन भविष्य में इस पर शोध में मुझे दिलचस्पी है।

 

(बाहरी एक स्वतंत्र लेखक और संपादक हैं और राजस्थान के माउंट आबू में रहती हैं।)

 

यह साक्षात्कार मूलत: अंग्रेजी में 20 अगस्त 17 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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