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भारत में सीजेरियन प्रसव में वृद्धि, अमीर शहरी महिलाओं का झुकाव ज्यादा

निधि जमवाल,

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वर्ष 1992-93 और वर्ष 2013-14 के बीच भारत में अधिक धन पंचमक में सीजेरियन प्रसव के मामलों में 10 से 30 फीसदी की वृद्धि हुई है। हम बता दें कि देश के अमीर पंचमक में आय के अनुसार 20 फीसदी आबादी आती है। हाल ही में एक राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के विश्लेषण (1992-1992 से 2015-16 ) और बच्चों के बीच रैपिड सर्वे (2013-14) के आंकड़ों पर ‘लैंसेंट’ द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार वर्ष 1992-93 और वर्ष 2013-14 के दौरान देश में औसत सीजेरियन सेक्शन के मामले 5 फीसदी से बढ़ कर 18 फीसदी हुए हैं। गरीबों के बीच सीजेरियन सेक्शन की दर 5 फीसदी पर स्थिर है।

 

मातृ स्वास्थ्य पर अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने यह तथ्य ‘मातृ स्वास्थ्य सीरीज -2016’ के जारी होने के मौके पर प्रस्तुत किया । यह रिपोर्ट एक अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल ‘लैंसेंट’ द्वारा 3 फरवरी, 2017 को मुंबई में जारी की गई है। यह कार्यक्रम ‘ह्यूमन राइट्स इन चाइल्डबर्थ इंडिया कांफ्रेंस’ का हिस्सा था।

 

सितंबर 2016 में प्रकाशित रिपोर्ट एनएफएचएस के अलावा अन्य स्वतंत्र आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है। रिपोर्ट में सीजेरियन सेक्शन की दर 10 फीसदी बताई गई है। यह एनएफएचएस डेटा के विश्लेषण में दर्ज 18 फीसदी से कम है।

 

सीजेरियन सेक्शन विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त एक मातृ स्वास्थ्य देखभाल का सूचक है। जब आबादी की तुलना में सीजेरियन सेक्शन दर 10 फीसदी की ओर बढ़ती है, तब मातृ एवं नवजात शिशु में होने वाली मौतों में गिरावट होती है। जब दर में 10 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि होती है, तो मां या नवजात बच्चों के मृत्यु दर में सुधार के कोई प्रमाण नहीं मिलते। 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के एक बयान में यही कहा गया है…और ऐसा भारत में हो रहा है।

 

यदि सामान्य प्रसव में मां या बच्चे के लिए जोखिम होता है, तब सीजेरियन सेक्शन आवश्यक हो जाता है। हालांकि, सीजेरियन सेक्शन गंभीर जटिलताओं, विकलांगता या मौत का कारण बन सकता है। विशेष रुप से वहां, जहां सुरक्षित ऑपरेशन और संभावित जटिलताओं के इलाज के लिए सुविधाओं की कमी है। डब्ल्यूएचओ की ओर से वर्ष 2015 के बयान में ये चेतावनी दी गई है।

 

स्वास्थ्य लेखकों द्वारा राज्यवार आंकड़ों के आधार पर सीजेरियन प्रसव को लेकर विश्लेषण किया गया है। इस विश्लेषण से पता चलता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों की तुलना में निजी स्वास्थ्य संस्थानों में सीजेरियन सेक्शन की दरें उच्च हैं। उदाहरण के लिए, त्रिपुरा के निजी स्वास्थ्य संस्थानों में सीजेरियन सेक्शन दर 74 फीसदी के करीब है, जबकि सार्वजनिक संस्थानों में यह 18 फीसदी है। पश्चिम बंगाल के लिए भी कहानी कुछ ऐसी ही है। यहां निजी और सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में सीजेरियन सेक्शन दरें क्रमश: 70.9 फीसदी और 18.8 फीसदी है।

 

23.2 फीसदी के आंकड़ों के साथ राजस्थान में  निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में सीजेरियन सेक्शन की दर सबसे कम है। बिहार में 2.6 फीसदी के आंकड़ों के साथ सार्वजनिक संस्थानों में सीजेरियन सेक्शन की दर न्यूनतम है।  तेलंगाना में 75 फीसदी और 40.6 फीसदी के साथ निजी और सार्वजनिक दोनों स्वास्थ्य संस्थानों में सबसे अधिक सीजेरियन सेक्शन दर की सूचना दी गई है।

 

वर्ष 2015-16 के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य-4 (एनएफएचएस -4) सर्वेक्षण शहरी और ग्रामीण, और अमीर और गरीब के बीच सीजेरियन सेक्शन में असमानताओं को दर्शाता है। एनएफएचएस-4 के अनुसार, त्रिपुरा में शहरी क्षेत्रों के निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में सीजेरियन सेक्शन की दरें 87.1 फीसदी और और ग्रामीण क्षेत्रों में 57.6 फीसदी रही है।

 

सार्वजनिक बनाम निजी: भारतीय राज्यों में सीजेरियन सेक्शन दर (प्रतिशत में, वर्ष 2015-16)

Source: National Family Health Survey-4, 2015-16; Ministry of health and family welfare

 

58 फीसदी के साथ भारत के तेलंगाना राज्य में सबसे ज्यादा सीजेरियन सेक्शन की घटनाएं दर्ज की गई है। एक दशक से 2015-16 तक सीजेरियन सेक्शन दरों में वृद्धि हुई है। दक्षिणी तमिलनाडु में सीजिरियन सेक्शन जन्मों की प्रतिशत 2005-06 में 20.3 फीसदी से बढ़ कर 2015-16 में 34.1 फीसदी हुआ है। 31.4 फीसदी के साथ गोवा दूसरे स्थान पर है। हम बता दें कि 2005-06 में गोवा के लिए यह आंकड़े 25.7 फीसदी थे।

 

मणिपुर में यह दर वर्ष 2005-06 में 9 फीसदी से बढ़ कर वर्ष 2015-16 में 21.1 फीसदी हुआ है। असम में इस दर में वृद्धि 5.3 फीसदी से 13.4 फीसदी और  और ओडिशा में 5.1 फीसदी से 13.8 फीसदी दर्ज की गई है।

 

एक दशक के दौरान सीजेरियन सेक्शन (प्रतिशत में)

Sources: National Family Health Survey-3 and National Family Health Survey-4

 

मध्यम आय वाले देशों के चलते वैश्विक वृद्धि

 

सीजेरियन सेक्शन दरें विश्व स्तर पर बढ़ रही हैं।

 

सीजेरियन सेक्शन में वैश्विक और क्षेत्रीय रुझान, 1990-2014

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Source: The Increasing Trend in Caesarean Section Rates: Global, Regional and National Estimates: 1990-2014, https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4743929/

 

मध्यम आय और उच्च आय वाले देशों की तुलना में कम आय वाले देशों में सीजेरियन सेक्शन की कम दरें (10 फीसदी तक) दर्ज की गई हैं। ‘लैंसेट’ के मातृ स्वास्थ्य सीरीज रिपोर्ट में यह बात बताई गई है। दुनिया भर में उच्चतम सीजेरियन सेक्शन दरें मध्यम आय वाले देशों में हैं। यह दर 40 फीसदी से लेकर 60 फीसदी तक है।

 

सीरीज के एक मुख्य लेखक और सैन फ्रांसिस्को के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में प्रसूति, स्त्री रोग और प्रजनन स्वास्थ्य विभाग के प्रोफेसर सुल्लेन मिलर कहते हैं, “इस तरह की उच्च दर की वजहअमीर देशों में कम आय वाले देशों से लोगों का आना भी है, जहां के अत्याधुनिक संसाधन लोगों को लुभाते हैं।”

 

अनावश्यक सीजेरियन प्रसव में स्वास्थ्य के संसाधन खर्च होते हैं, इससे पूरा हेल्थ सिस्टम कमजोर होता है।

 

बहुत कम, बहुत देर -बहुत ज्यादा, बहुत जल्द

 

देशों के बीच और देशों के भीतर सीजेरियन सेक्शन दरों में असमानता का वर्णन करने के लिए, सीरीज लेखकों ने नए शब्दावली गढ़ी है: बहुत कम, बहुत देर और बहुत ज्यादा, बहुत जल्द
 

बहुत कम, बहुत देर- अपर्याप्त संसाधनों के साथ देखभाल को दर्शाता है। यह कम आय वाले देशों में उच्च मातृ मृत्यु दर के लिए जिम्मेदार है, जहां महिलाओं की समय पर स्वास्थ्य देखभाल की कमी के कारण मृत्यु  जाते हैं।

 

प्रसव के दौरान खून की कमी के साथ होने वाली जटिलताओं के कारण भारत में करीब हर घंटे पांच महिलाओं की मौत होती है।

 

बहुत ज्यादा, बहुत जल्द- उच्च आय वाले देशों की समस्या है, जहां महिलाओं को सामान्य गर्भावस्था और जन्म के दौरान अधिक-चिकित्सा संसाधनों की जरूरत होती है। इसमें प्रसव की पीड़ा, ऑक्सीटोसिन वृद्धि (हार्मोन) सीजेरियन सेक्शन, अपीजीआटमी और अतिरिक्त भ्रूण की निगरानी, ​​आदि शामिल हैं।

 

‘लैंसेट’ की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2010 में उच्च आय और मध्यम आय वाले देशों में 35 लाख से 57 लाख अनावश्यक सीजेरियन सेक्शन हुए, जबकि कम आय वाले देशों में 35 लाख सीजेरियन सेक्शन की जरुरत थी, लेकिन किए नहीं गए ।

 

आंकड़े कम आंकने की संभावना

 

सीजेरियन प्रसव की दरें, आर्थिक सुविधा , सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से बढ़ रहे हैं।
 

प्राकृतिक जन्म एक इंतज़ार कर खेल हो गया है, जबकि सीजेरियन प्रसव जल्दी होता है । इसमें डॉक्टर और मरीज दोनों के लिए समय की बचत होती है। अमीर परिवार सीजेरियन प्रसव वहन कर सकते हैं। इसमें डॉक्टरों को  सामान्य प्रसव की तुलना में ज्यादा पैसे मिलते हैं। हालांकि सीजेरियन प्रसव में कुछ गलत हो जाने पर डॉक्टरों को खराब नतीजों (शारीरिक शोषण या कानूनी) का भय भी होता है।

 

बेंग्लूरु स्थित स्त्री रोग विशेषज्ञ फातिमा पूनावाला, जो एक कॉर्पोरेट अस्पताल में काम छोड़ चुकी हैं, कहती हैं, “कॉर्पोरेट अस्पतालों में डॉक्टरों के लिए सीजेरियन प्रसव का कोटा दिया जाता है। यदि उसे पूरा करने में आप विफल होते हैं तो आपको बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। ” पूनावाला अब अपना ‘अफिया क्लिनिक’ चलाती हैं। वह कहती हैं कि भारत में 10-15 फीसदी का सीजेरियन प्रसव दर का आंकड़ा कम आंका गया है, ऐसा लगता है।

 

स्त्री रोग विशेषज्ञ और पुणे स्थित गैर सरकारी संगठन ‘सपोर्ट फॉर एडवोकेसी एंड ट्रेंनिंग टू हेल्थ इनिशिएटिव’ ( एसएटीएचआई ) के समन्वयक, अरुण गादरे कहते हैं, “ राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और ‘लैंसेट’ सीरीज के आंकड़े वास्तविकता के मुकाबले काफी कम हैं। ” एसएटीएचआई सभी के लिए स्वास्थ्य अभियान चलाता है।

 

भारत में शहरी और ग्रामीण क्षेत्र दोनों “अनियमित सीजेरियन प्रसव एक किस्म की ‘महामारी’ की तरह है। इसके मुकाबले, भारत  में समग्र 10 फीसदी सीजेरियन सेक्शन दर स्वीकार्य लगती है।  वास्तव में हमें सार्वजनिक, निजी, शहरी, ग्रामीण, अमीर, गरीब हर क्षेत्र में कुछ अलग करने की जरूरत है। मिलर कहते हैं, असमानताएं ताजनक हैं।

 

(जामवाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और मुंबई में रहती हैं।)

 

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