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भारत में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की स्थिति बद्तर, वेतन कम, पर्याप्त प्रशिक्षण की भी कमी

प्राची सालवे एवं स्वागता यदवार,

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मध्यप्रदेश की रेखा रेवात एक मान्यताप्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) हैं। आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य देखभाल सुविधा के लिए समाज के सबसे गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के घरों में जा-जा कर मदद करती हैं। करीब 22 फीसदी या 26.9 करोड़ भारतीय अब भी गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं।

 

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, करीब दस लाख स्वास्थ्य कार्यकर्ता के पास न तो पर्याप्त प्रशिक्षण है और न ही उन्हें पर्याप्त वेतन मिलता है। यह तथ्य निश्चित रुप से स्वास्थ्य सेवा के सार्वजनिक प्रयासों में देश के विकास की गति को कम करता है।

 

मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा) को स्वैच्छिक कार्यकर्ता माना जाता है और सरकार द्वारा उन्हें प्रोत्साहन राशि दी जाती है। अधिकतर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को महीने में 1,000 रुपए मिलते हैं। यह राशि एक माल्ट की बोतल या एक ब्रांडेड शर्ट की कीमत से भी कम है। आशा कार्यकर्ताओं के लिए 12 महीनों में  23-दिन के प्रशिक्षण का प्रावधान है।

 

लेकिन उत्तर बिहार के एक ब्लॉक में एक तिहाई आशा कार्यकर्ताओं को कार्य आरंभ करने से पहले प्रशिक्षण नहीं मिला।  बाकी कार्यकर्ताओं को सिर्फ 7 दिन का प्रशिक्षण मिला और उन्होंने बहुत सारी चीजें मैनुअल पढ़ कर सीखा है। 187 गांवों में किए गए वर्ष 2015 के इस अध्ययन से इस तरह की बातेंम पता चलती हैं।

 

एक आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य देखभाल सुविधा देने के लिए काम करती है। वह समाज के सबसे गरीब और सबसे कमजोर वर्ग के लोगों के घरों तक जाती है। करीब 22 फीसदी या 26.9 करोड़ भारतीय अब भी गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। आशा कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियां प्रजनन और बाल स्वास्थ्य, प्रतिरक्षण, परिवार नियोजन और सामुदायिक स्वास्थ्य से संबंधित हैं। इसमें गर्भवती महिलाओं के घर का दौरा और परामर्श, गांव की स्वास्थ्य योजनाओं में मदद करना , मामूली बीमारियों जैसे कि दस्त, बुखार और मामूली चोटों के लिए प्राथमिक उपचार प्रदान करना भी शामिल है।

 

विश्व स्तर पर हर साल 303,000 मातृ मौतों का पांचवां हिस्सा भारत में होता है। विश्व स्तर पर नवजात शिशुओं की मृत्यु में से 26 फीसदी की हिस्सेदारी भारत की है।इस बारे में सितंबर, 2016 में इंडियास्पेंड ने विस्तार से  बताया है। 12 से 23 महीने की उम्र के बीच केवल 62% भारतीय बच्चों को पूरी तरह से प्रतिरक्षित किया गया है। इस संबंध में भी इंडियास्पेंड ने मार्च 2017 में विस्तार से बताया है।

 

10 आशाओं में सात से अधिक ने कहा कि उन्हें बेहतर प्रशिक्षण की जरूरत

 

करीब 70-90 फीसदी आशा कार्यकर्ताओं ने कहा कि उन्हें बेहतर प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और दवाओं की किट की बेहतर पूर्ति की जरूरत है। आशा कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि उन्हें पंचायत और सहायक नर्स दाइयों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की ओर से मिल रहे सीमित समर्थन से कोई मदद नहीं मिलती।

 

उत्तर बिहार में वर्ष 2015 के अध्ययन के अनुसार सर्वेक्षणों में शामिल केवल 22 फीसदी आशा कार्यकर्ताओं को अपनी भूमिका के बारे में पता था। अधिकांश आशा कार्यकर्ताएं मातृ और शिशु देखभाल में शामिल जरूर थीं, लेकिन स्थानीय स्वास्थ्य योजना या स्वास्थ्य सक्रियता से संबंधित अन्य कामों में वे शामिल नहीं थीं।

 

आशा कार्यकर्ता की उम्र 25 से 45 साल के बीच होती है। वह आठवीं कक्षा या उससे अधिक शिक्षित होती हैं । आमतौर पर, 1000 लोगों की आबादी पर एक आशा कार्यकर्ता तैनात होती हैं लेकिन बाद में यह गिर कर प्रति 910 की आबादी पर एक आशा कार्यकर्ता का अनुपात हो गया है।

 

किसी आशा कार्यकर्ता का चुनाव समुदाय समूह, स्व-सहायता समूह, आंगनवाडी, ब्लॉक नोडल अधिकारी, जिला नोडल अधिकारी और ग्राम सभा (गांव परिषद) से संबंधित प्रक्रिया के माध्यम से होता है।

 

‘नेशनल आशा मेन्टरिंग ग्रुप’ द्वारा 16 राज्यों में अद्ययन के बाद वर्ष 2015  की इस रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चे की बीमारी के दौरान कम से कम 65 फीसदी मामलों में  आशा कार्यकर्ताओं से परामर्श किया गया, लेकिन “कौशल में कमी, आपूर्ति या सीमित साधन की कमी” के कारण आशा कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन कमतर देखा गया।

 

उदाहरण के लिए बिहार में 27 फीसदी, झारखंड में 37 फीसदी, राजस्थान में 56 फीसदी और असम में 54 फीसदी माम्लों में आशा कार्यकर्ता अपने किट से मौखिक रीहाइड्रेशन घोल की आपूर्ति करने में सक्षम थी।

 

‘इंडियन पीडीऐट्रिक्स ’ में प्रकाशित वर्ष 2016 के इस अध्ययन के अनुसार, तापमान माप के लिए 52 फीसदी मामलों में, हाथ धोने के लिए 61 फीसदी मामलों, वजन माप के लिए 43 फीसदी मामलों और त्वचा की देखभाल के लिए 68 फीसदी मामलों में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका संतोषजनक देखी गई।

 

जीवन बचाते हैं, हमेशा आपातकाल के लिए तैयार, लेकिन मासिक आय 1,000 से 1,200 रुपए

 

32 वर्षीय संध्या वैद्य 2010 में आशा कार्यकर्ता बनी थी। वह घर से बाहर जाकर काम करना चाहती थी । वह चाहती थी कि महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के नक्सल प्रभावित कर्पणा तालुका में अपने गांव वानसादी की महिलाओं की मदद करे।

 

काम में संध्या को मन लगता था। अपनी उपलब्धियों के बारे में बात करते हुए उसके चेहरे पर आज भी मुस्कान तैरने लगती है। एक बार उसने एक ऐसे बच्चे को बचाया जो जन्म के दौरान नलियों से बुरी तरह फंस गया था। लेकिन इंडियास्पेंड से बात करते हुए संध्या ने यह भी कहा कि वेतन बहुत ही कम था।

 

रोगी के घर तक के प्रत्येक दौरे के लिए उन्हें 2 रुपए दिए जाते थे, जबकि प्रत्येक मलेरिया टेस्ट के लिए 3 रुपए, माताओं की पोषण की जरूरतों के बारे में जागरूकता पैदा करने के एक सत्र के लिए 150 रुपए दिए जाते थे। साथ ही गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली महिलाओं को डिलीवरी के लिए उप-केंद्र तक ले जाने के लिए 600 रुपए दिए जाते थे।  ( दरें संशोधित की गई हैं। )

 

जैसा कि हमने कहा, आशा कार्यकर्ताओं को स्वैच्छिक श्रमिक माना जाता है और वेतन का भुगतान किया जाता है। संध्या के लिए, यह प्रति माह 1,000 रुपए से 1200 रुपए होता था, प्रत्येक दो या तीन महीनों में एकमुश्त राशि दी जाती थी।

 

संध्या ने बताया कि ड्रग किट प्राप्त करने में उसे दो साल का वक्त लगा था, जिसे हर घर के दौरे के समय साथ ले जाना होता था। दवा की किट में साधारण बीमारियों के लिए दवाएं शामिल होती हैं। संध्या बताती हैं कि हर साल उसे प्रशिक्षण दिया जाता था, लेकिन ज्यादातर बार उन्हें मैनुअल से पढ़ने के लिए कहा गया था।

 

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32 वर्षीय संध्या वैद्य वर्ष 2010 में एक मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता बनीं। प्रत्येक घर के दौरे के लिए उन्हें 2 रुपए और मलेरिया टेस्ट के लिए 3 रुपए दिए जाते हैं। जबकि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी के लिए उप-केंद्र ले जाने के लिए 600 रुपए दिए जाते हैं। वर्ष 2015 कम वेतन से तंग आकर संध्या ने दूसरी नौकरी के लिए आवेदन दिया और पुलिस कांस्टेबल चुन ली गई

 

शहरों में 20 मिनट के भीतर और ग्रामीण इलाकों में 40 मिनट के भीतर पहुंचने वाली 108 एम्बुलेंस सेवा शुरू होने से पहले संध्या महिलाओं को स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों तक ले जाने के लिए अपने ही पैसे खर्च करती थी। वह कहती हैं, “गर्भवस्था के दौरान मैंने कई महिलाओं की मदद की है। मैंने बच्चों के पहले महीने में भोजन, दवाएं और कपड़े भी दिए हैं। ”

 

वर्ष 2015 कम वेतन से तंग आकर संध्या ने दूसरी नौकरी के लिए आवेदन दिया और पुलिस कांस्टेबल चुन ली गई। वह कहती हैं, “अब मैं प्रति माह 3,000 रुपए कमाती हूं और ज्यादा काम भी नहीं है। आशा कार्यकर्ता के रूप में, मुझे रात में आपात बुलावे पर जाना पड़ता था। पल्स पोलियो और हाथी रोगों के लिए सर्वेक्षण कराया जाता था, जहां पूरे दिन घूमते हुए हमें 50 रुपए प्राप्त होते थे। ”आशा कार्यकर्ता  न्यूनतम मजदूरी और खुद को सरकारी कर्मचारी बनाने के लिए लगातार आंदोलन कर रही हैं।

 

वर्ष 2016 में महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दिए जवाब में कहा गया कि- “निर्धारित मासिक मानदंड के भुगतान के मुद्दे पर कई मौकों पर जांच की गई है और मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने का फैसला किया गया है। ”

 

“मंत्रालय ने न केवल कुछ मौजूदा आशा कार्यकर्ताओं को दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि को बढ़ाया है, बल्कि रूटीन गतिविधियों के लिए नए प्रोत्साहन भी पेश किए हैं, जो अन्य मौजूदा रूटीन गतिविधियों के साथ मिलकर प्रत्येक आशा कार्यकर्ताओं को कम से कम 1,000 रुपये प्रति माह पाने में सक्षम बनाएगी। ”

 

ग्रामीण भारत में 8.3 फीसदी आशा कार्यकर्ताओं की कमी, धीमी गति से प्रशिक्षण, प्रमाणीकरण में विलंब

 

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत ग्रामीण भारत में 983,533 (91.7 फीसदी) आशा कार्यकर्ता होने चाहिए, जबकि अभी काम कर रही कार्यकर्ताओं की संख्या 873,759 है।

 

बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्य, जहां कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकेतक और कमजोर बुनियादी ढांचे हैं, वहां आशा कार्यकर्ताओं की लक्षित संख्या लगभग 90 फीसदी थी। पूर्वोत्तर राज्यों में लगभग 99 फीसदी लक्षित संख्या थी, जबकि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में आशा कार्यकर्ताओं की 15 फीसदी की कमी है।

 

राज्य अनुसार स्वैच्छिक स्वास्थ्य श्रमिकों (आशा) की उपलब्धता

Source: National Health Systems Resource Centre
Note: Delhi has selected ASHAs only in certain identified clusters, at the level of 1 for 2,000 population. Chhattisgarh has selected ASHAs at habitation level. Tamil Nadu has selected ASHAs only in tribal areas.

 

गोवा ने आशा कार्यक्रम से बाहर होने का विकल्प चुना है।

 

आशा वर्ष 2013 में शुरू किए गए राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन का एक अभिन्न अंग भी हैं। शहरी क्षेत्रों में 70,721 (60 फीसदी) के लक्ष्य के सामने 42,769 आशा कार्यकर्ताएं सक्रिय है।

 

शहरीकरण के बाद मलिन बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों के विस्तार को देखते हुए सभी शहरों और कस्बों में आशा कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ने की संभावना है।

 

अधिक आशाओं की भर्ती के लिए कार्यक्रम भी अपर्याप्त प्रशिक्षण में अटका हुआ है। प्रशिक्षण की सुस्त गति से जानकारी और कौशल में भटकाव दिखता है। और आशा कार्यकर्ताओं के प्रमाणन को दर्ज करने के लिए राज्य की तत्परता भी जरूरी है।

 

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के ग के रूप में काम कर रहे ‘नेशनल हेल्थ सिस्टम रिसोर्स सेंटर’ की ओर से जुलाई 2016 के इस अध्ययन में ये बातें पता चली हैं।

 
अध्ययन में कहा गया है कि, “”आशा कार्यकर्ता के स्तर पर प्रशिक्षण में विलंब का मतलब है संसाधनों की कमी। वित्तीय स्तर पर भी और मानव संसाधन के मामले में भी । ”
 

(सालवे विश्लेषक हैं और यादवार प्रमुख संवाददाता हैं। दोनों इंडियास्पेंड से साथ जुड़ी हैं।)

 

यह लेख मूलत: अंग्रेजी में 16 मई 2017 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 

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