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भारत में स्वास्थ्य क्षेत्रों में कम निवेश, आम लोगों पर प्रभाव

हिमाद्री घोष,

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पूर्वी भारतीय शहर सिलीगुड़ी के सरकारी अस्पताल के गलियारे में सोते मरीज़। भारत के गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, स्वास्थ्य क्षेत्र में हुए कम निवेश को दर्शाता है।

 

वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार देश के 4,000 करोड़ रुपए की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से केवल 9 परियोजनाएं ( 0.21 फीसदी ) – 938 करोड़ रुपए के कुल निवेश के साथ – स्वास्थ्य क्षेत्र की हैं।

 

सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी ) परियोजनाओं का विस्तार डायगनोस्टिक सेंटर से लेकर सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों तक है।

 

परिवहन और ऊर्जा के क्षेत्रों की तुलना में स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश काफी कम हुए हैं।
 
विभिन्न क्षेत्रों में बुनियादी विकास परियोजनाएं

 

2014 की एक ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्ट के अनुसार भारत के गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी क्षेत्र में हुए कम निवेश को दर्शाता है।  ग्रामीण क्षेत्रों के 182,709 सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का करीब 20 फीसदी (35,389) के पास स्वंय का परिसर नहीं है।

 

राज्यसभा में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च, 2014 तक 6,700 (23 फीसदी) सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों और 2,350 (33 फीसदी) सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की कमी दर्ज की गई है।

 

वर्ष 2014-15 में सरकार द्वारा स्वाथ्य क्षेत्र में करीब 37,000 करोड़ रुपए ( 5.5 बिलियन डॉलर ) का निवेश किया गया है जबकि वर्ष 2015 में यह कम हो कर 30,000 ( 4.5 बिलियन डॉलर ) करोड़ रुपए हुआ है।

 

डॉ गीता सेन, एक नीति विशेषज्ञ के मुताबकि हालांकि भारत स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) का 5 फीसदी के आसपास खर्च करता है लेकिन इसका केवल 1 फीसदी ही सरकार की ओर से आता है। गीता कहती हैं कि, “आप 1 फीसदी के सार्वजनिक खर्च के साथ मलेरिया, टीबी और एचआईवी का मुकाबला नहीं कर सकते। ”

 

2013 में भारत ने स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति 69 डॉलर खर्च किया है जोकि विकासशील देशों में सबसे कम है। आर्थिक सहयोग और विकास के लिए संगठन द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार यहां तक कि सबसे गरीब अर्थव्यवस्थाओं जैसे कि इंडोनेशिया और मैक्सिको में भी इससे बेहतर निवेश किया जाता है।

 
विश्व भर में प्रति व्यक्ति खर्च
 

 

सरकारी स्वास्थ्य व्यय की तुलना अन्य ब्रिक्स देशों, जैसे कि दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चीन के साथ किया गया है।

 
विश्व स्वास्थ्य व्यय
 

 

अन्य देशों के मुकाबले स्वास्थ्य के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद का कम अनुपात आवंटन के बावजूद भारत ने अच्छा परिणाम दिखाया है। टीबी प्रसार दर 1991 में प्रति 100,000 आबादी पर 466 से गिरकर 2013 में 211 दर्ज किया गया है।

 

शिशु मृत्यु दर ( आईएमआर) में भी गिरावट दर्ज की गई है। 2005 में यह आंकड़े प्रति 1000 जीवित जन्मों के लिए 58 थे वहीं 2011 में यह आंकड़े 44 दर्ज की गई है। साथ ही जीवन प्रत्याशा में पांच वर्ष की वृद्धि दर्ज की गई है यानि कि भारत की जीवन प्रत्याशा 61.9 (2000) से बढ़ कर 66.1 (2010) हुई है।

 

इन सब उपलब्धियों के बावजूद भारत अब भी अपने पड़ोसियों से पीछे है। उद्हारण के तौर पर नेपाल और बांग्लादेश में, औसत जीवन प्रत्याशा  66.3 और 67.5 वर्ष है। इसी तरह, नेपाल और बांग्लादेश के लिए लिए शिशु मृत्यु दर 29.4 और 30.7 है ।

 

ओईसीडी के आंकड़ों के अनुसार, प्रति 1000 जनसंख्या पर अस्पताल के बिस्तर का अनुपात 0.5 है।

 
प्रति 1000 जनसंख्या पर अस्पताल के बिस्तर
 

 

2012 विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ ) के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति 100,000 लोगों में से कम से कम 682 लोगों की मजत्यु गैर – संचारी रोग के कारण होती है जबकि वैश्विक औसत 539 दर्ज की गई है।

 
प्रति 100,000 आबादी पर मृत्यु दर (गैर संचारी रोगों से होने वाली मौत )
 

 

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश का निराशाजनक स्तर भारत के सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को पूरा न कर पाने का एक कारण हो सकता है।

 

आठ सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों (एमडीजी) में से भारत केवल चार लक्ष्यों को पूरा कर सकता है, जिसकी समय सीमा इस वर्ष ही समाप्त होगी।

 

स्वास्थ्य क्षेत्र का एक लक्ष्य जो पीछे छूट जाएगा वह है बाल मृत्यु दर में कमी, प्रति 1,00,000 पर 140 से 109 तक।

सार्वजनिक स्वास्थ्य शोधकर्ता डॉ लीला वार्की कहती हैं, “लक्ष्य पूरा नहीं हो पाने के पीछे दो कारण हैं। पहला, हमारी प्रणाली के संघीय ढांचे के कारण नीतियों का ठीक प्रकार से कार्यान्वयन न होना। दूसरा कारण जनसंख्या का तेज से विकास होना है।”

 

लोगों के स्वास्थ्य के आंदोलन के स्वास्थ्य शोधकर्ता डॉ रखल गायतोंडे के अनुसार केवल बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में निवेश ही नहीं किया जाना चाहिए बल्कि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को भी मजबूत किया जाना चाहिए।

 

गायतोंडे आगे कहते हैं कि बुरे स्वास्थ्य सूचकांक सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए आवंटित कम धनराशि का प्रतिबिंब है।

 

हालांकि वर्ष 2015-16 के लिए वित्त पोषण बढ़ा कर 33,150 करोड़ रुपये ( 4.6 बिलियन डॉलर ) तक की गई है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह जनसंख्या में वृद्धि के लिए क्षतिपूर्ति करने के लिए पर्याप्त नहीं है। डॉ गायतोंडे कहते हैं,“ केंद्र की ओर से स्वास्थ्य बजट में कटौती एक निरपेक्ष आपदा था।”

 

निधीकरण में कमी आने से प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल पर असर पड़ा है। एक वरिष्ठ केंद्रीय स्वास्थ्य अधिकारी नाम न बताने की शर्त पर बताया कि केंद्रीय वित्त पोषण, छोटे राज्यों जैसे कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और झारखंड के लिए महत्वपूर्ण है जो कि ग्राम स्तर पर ऑपरेशन चलाता है।

 

अधिकारी ने बताया कि, “केंद्र सरकार के अस्पतालों का निर्माण और उपकरण खरीदने के लिए उन्हें वित्त पोषित किया था;  लेकिन बजट में अचानक हुई कमी के साथ अब  वे सुविधा बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं । दरअसल कुछ राज्यों ने वेतन तक भुगतान करने के लिए धन नहीं होने के बारे में हमें करने के लिए लिखा है।”

 

डॉ वार्की कहते हैं, “कुछ राज्यों में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे पर भारी मात्रा में खर्च कर रहे हैं , लेकिन असमानता मौजूद हैं।”

 

राज्यों में स्वास्थ्य  क्षेत्र में मामलों में बुरे प्रदर्शन का एक अन्य कारण सरकारी डॉक्टरों की कमी है।

 

वैश्विक स्वास्थ्य कर्मचारियों की संख्या पर 2012 डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में प्रति 10,000 लोगों पर केवल 7 डॉक्टर हैं। डब्ल्यूएचओ कहती है कि यह अनुपात 1: 600 होनी चाहिए।

 

नाम न बताने की शर्त पर, कर्नाटक सरकार के 42 वर्षीय एक सिविल सर्जन बताते हैं कि सरकार द्वारा दिए जाने वाले वेतन स्तर बेहद कम हैं।

 

( घोष 101reporters.com के साथ जुड़े हैं। 101reporters.com ज़मीनी पत्रकारों का भारतीय नेटवर्क है। घोष राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं। )

 

यह लेख मूलत: अंग्रेज़ी में 21 दिसंबर 2015 को indiaspend.com पर प्रकाशित हुआ है।

 
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